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तीखी बात : मोदी सरकार ने बदली मैकाली की शिक्षा व्यवस्था, अब यूपीएससी सहित सभी परीक्षाओं में अंग्रेजी की अनिवार्यता समाप्त करने की जरूरत

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-अखिल भारतीय भाषा संरक्षण संगठन के राष्ट्रीय सचिव रवींद्र धामी ने कहा हर स्तर पर अंग्रेजी की अनिवार्यता खत्म कर राष्ट्रभाषा हिंदी और मातृ भाषा लागू हो, नई शिक्षा नीति का स्वागत करते हुए कहा, लॉकडाउन के बाद सरकार के समक्ष उठाएंगे यूपीएससी सहित सभी परीक्षाओं में अंग्रेजी की अनिवार्यता समाप्त करने की
नवीन समाचार, खटीमा, 2 अगस्त 2020। भाषाई अस्मिता के लिए संघर्षरत अखिल भारतीय भाषा संरक्षण संगठन के राष्ट्रीय सचिव रवींद्र धामी ने कहा कि हिंदी भाषा को लेकर लड़ी गई लड़ाई के फलस्वरूप आज शिक्षा नीति में बदलाव देखकर बहुत खुशी हुई है। देर से ही सही मोदी सरकार ने शिक्षा नीति को लेकर आज जो फैसला लिया है वह स्वागत योग्य है। उन्होंने यूपीएससी समेत सभी परीक्षाओं में भी अंग्रेजी की अनिवार्यता समाप्त कर राष्ट्र भाषा हिंदी समेत भारतीय भाषा लागू की करने की मांग की।
नई शिक्षा नीति का स्वागत करते हुए अंग्रेजी की अनिवार्यता हर स्तर पर समाप्त कर मातृभाषा को बढ़ावा देने के लिए संघर्षरत रवींद्र सिंह धामी ने कहा कि भाषा आंदोलन में शामिल उनकी मांगों में मैकाले की शिक्षा व्यवस्था को बदलकर मातृभाषा में शिक्षा देने की मांग भी थी, जो आज मोदी सरकार ने पूरी की है। मैकाले की शिक्षा नीति को बदलने की अब तक कोई हिम्मत नहीं जुटा पाया। धामी ने कहा कि मैकाले की शिक्षा नीति देश से भारतीय सनातन संस्कृति को धीरे-धीरे खत्म कर रही थी, क्योंकि मैकाले ने भारत में अंग्रेजीयत की शिक्षा नीति लागू की थी। उन्होंने कहा कि बच्चों का बौद्धिक और मानसिक विकास मातृभाषा में ही बेहतर होता है। लिहाजा, मातृभाषा में प्राथमिक शिक्षा होने से इसके सार्थक नतीजे बहुत जल्द सामने आएंगे। साथ ही भारतीय संस्कृति की वाहक भारतीय भाषाओं को बढ़ावा मिलेगा। उन्होंने बताया कि गांधीजी ने भी मातृभाषा में प्राथमिक शिक्षा की जरूरत बताई थी।
90 के दशक में हुए भाषा आंदोलन के बाबत धामी ने कहा कि अखिल भारतीय भाषा संरक्षण संगठन के बैनर तले 12 मई 1994 को अपनी मातृ भाषा के लिए दिल्ली में संघ लोक सेवा आयोग के समक्ष ऐतिहासिक धरना दिया था, जिसमें पूर्व राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह, पूर्व प्रधानमंत्री वीपी सिंह, अटल विहारी वाजयेपी, उप प्रधानमंत्री देवीलाल आदि समेत कई नेता, संपादक और साहित्यकार शामिल हुए थे। इस दौरान आंदोलनकारी कई बार गिरफ्तार हुए और तिहाड़ जेल तक गए, लेकिन कदम पीछे नहीं हटाए, नतीजतन अंग्रेजीयत बेनकाब हुई और भारतीय भाषा को बढ़ावा मिला।
उन्होंने कहा कि 90 के दशक में अंग्रेजीयत के खिलाफ ऐतिहासिक आंदोलन में शामिल रही शक्तियों के आगे आने के बाद ही मातृभाषा को लेकर ही इस पर विचार मंथन तेज हुआ। उन्होंने मांग की कि जिस तरह नई शिक्षा नीति बनाई गई है, उसी तरह यूपीएससी समेत सभी परीक्षाओं में भी हिंदी समेत भारतीय भाषाएं लागू की जाए। उन्होंने मोदी सरकार और भाषा आंदोलन के समर्थकों से आग्रह किया कि यूपीएससी समेत सभी परीक्षाओं में अंग्रेजी की अनिवार्यता समाप्त करने की पहल करें। आम आदमी की सोच की तरह अगर आम आदमी के लिए नीतियां बनेंगी तो भारत फिर विश्व गुरू बन सकता है। उन्होंने कहा कि जल्द ही यूपीएससी समेत अन्य परीक्षाओं में भी अंग्रेजीयत का वर्चस्व खत्म करने के लिए लॉकडाउन के बाद दिल्ली में सरकार के समक्ष मामला उठाया जाएगा।

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डॉ. केतकी तारा कुमैय्या, जिलाध्यक्ष, वीरांगना वाहिनी मंच, नैनीताल
आज पूरे विश्व को ICU में पहुंचाकर चीन ने वेंटीलेटर मास्क और सेनेटाइजर बेचने फिर से शुरू कर दिए हैं। यह अपने काल को आमंत्रित करना है।  आज विश्व के सर्वाधिक देश और उनके महत्वपूर्ण शहर जहाँ इस कोरोना महामारी को झेल रहे है, वहीँ चीन के मुख्य शहर ‘बीजिग’और ‘संघाई ‘इस वायरस की चपेट से प्रतिरक्षित है, या फिर कहे उनका DNA ऐसा रहा जैसे उन्होंने ही समुद्र मंथन से निकले अमृत को ग्रहण किया है। चौकाने वाली बात यह है कि सबसे अधिक मृत्यु इटली में हुई न की चीन में। और अब अमरीका उस वायरस के जाल में फस चुका है। 
यहाँ समझने वाली बात यह है कि चीन अपना प्रभुत्व साम-दाम-दंड-भेद से मनवाना चाहता है। पहले ही भू -क्षेत्र में अपना वर्चस्व (OBOR) के द्वारा और जलमार्ग में ‘STRING OF PEARLS PROJECT के द्वारा चीन ने अपना निर्विवाद प्रभुत्व स्थापित कर लिया है। वहीँ उसे भारत जैसे उभरते देश से मुँह की खानी पड़ रही थी, जिसने अपनी संप्रभुत्ता को सर्वोपरि रखते हुए ONE BELT ONE ROAD  प्रोजेक्ट को स्वीकार नहीं किया और न ही अभी हुई RCEP (Regional Comprehensive Economic Partnership ) में अपनी दिलचस्पी दिखाई। अंतराष्ट्रीय पटल पर इस प्रकार की दोहरी हार से झल्लाए चीन ने कोरोना वायरस तैयार किया जिसमें चाहे वह खुद भस्म हो जाएं लेकिन वह हार नहीं मानेगा। 
इस त्रासदी में चीन ने उन देशों को मोहरे की तरह उपयोग किया, जहाँ या तो उसने पूंजी निवेश की है या फिर जो DEBT-Trapped है या फिर चीन के देनदार /कर्जदार हैं, जैसे इस विमर्श में बार-बार आने वाला नाम है WHO के वर्तमान मुखिया तेड्रोस, जो चीन के Stooge माने जा रहे है, इन्होंने Quid-pro-Quo के तहत न केवल चीन के वास्तविक मृत्यु के तथ्यों को छिपाया बल्कि इस वायरस की भयावहता व वीभत्सता को घोषित करने में भी उदासीन दिखाई।
आज इसी भयानक गठबंधन WHO हान (चीन ) के कारण विश्व की स्वास्थ्य व्यवस्था तहस -नहस हो चुकी है और स्थिति यहाँ तक पहुंच गई है कि अब देश ना केवल इस वायरस से बल्कि STOCKHOLM SYNDROME से भी ग्रस्त हो चुके हैं। जिसमें देशों को अपने ही शोषणकर्ता (चीन ) का मुँह जीवन रक्षक वस्तुओं लिए (दोनों स्वास्थ्य व अर्थव्यवस्था ) देखना पड़ रहा है। 
कुछ महत्वपूर्ण स्रोत बताते है कि अमरीका UN छोड़ रहा है और UN की कई विशिष्ट इकाईयों जैसे UNESCO, WHO, ILO में चीन का वर्चस्व अमरीका के मुकाबले अधिक है। अभी यहां चीन को इस जघन्य अपराध के लिए प्रतिबंधित करने की बात हो ही रही थी कि मार्च में चीन को UN के सुरक्षा परिषद की अध्यक्षता मिल गई है, ऐसी स्थिति में हालत और नासाज और नाजुक हो चुके है। 
यहां अब कहा जा सकता है कि भारत ही एक ऐसा देश है जो इस गरल का विष समाप्त कर सारे विश्व को नवजीवन दे सकता है। चरणबद्ध तरीके से जिस प्रकार भारत न केवल अपनी अर्थव्यवस्था के स्वास्थ्य का ध्यान रख रहा है, वह वास्तव में इस कोरोना वायरल का स्टॉक (Anti-dote एंटी -डॉट) है। इसलिए समस्त भारतवासियों से अपेक्षित है कि वह (सोशल डिस्टेंसिंग) यानी सामाजिक दूरी का पालन करें क्यूंकि यही एक ऐसा शस्त्र है जो न केवल वायरस का अंत करेगा बल्कि चीन के खतरनाक मंसूबों का भी अंत करेगा !

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-मानव अधिकारों की रक्षा करने की भारतीय सांस्कृतिक मजबूती देता है CAA

डॉ. केतकी तारा कुमय्या, जिलाध्यक्ष, वीरांगना वाहिनी मंच नैनीताल। ‘धर्म एवं हतों हंति धर्मो रक्षति रक्षित :। अर्थात जो धर्म की रक्षा करता हैं धर्म भी उसकी रक्षा करता है। इसी की परिणीति है CAA यानी नागरिकता संसोधन अधिनियम। इसे मोदी सरकार के एक और ऐतिहासिक कदम के रूप में देखा जाना चाहिए, जो कि ‘idea of india’ की संकल्पना को पुनर्जीवित करता है। जिसे 1947 के विभाजन ने जर्जर हालत में छोड़ दिया था, दशकों से विषम परिस्थितियों में अपने आत्म-सम्मान, अपनी आस्था और अपने धर्म को बचा रहे अल्पसंख्यकों को मोदी जी ने जिस प्रकार मुख्यधारा से जोड़ने का प्रयास किया हैं वह वास्तव में नैतिक ईमानदारी और नैतिक सुचिता का सच्चा प्रमाण है। यह अधिनियम एक समावेशी, बहुसांस्कृतिक और धर्मनिरपेक्ष भारत की स्थापना करता है। जहाँ हमारे बिछड़े सहोदरों को एक गरिमामयी जीवन जीने का दोबारा अवसर दिया गया है। समझने वाली बात यह भी हैै कि कठोर संसदीय चर्चाओं और बहसों से गुजरने के बाद इसे विधिवत रूप से संसद में पारित किया गया है तो यह पूर्णतया संविधान सम्मत है और किसी भी प्रकार से किसी भी धर्मपंथ व संप्रदाय के हितों को आहत नहीं करता है। भारतीय संसद की सयुंक्त समिति के अनुसार इस कानून से केवल 31,313 व्यक्तियों/शरणार्थियों यानी 25,447 हिन्दुओं (ज्यादातर पिछडी जाति और दलित), 55 ईसाई, 5807 सिख, 2 पारसी तथा 2 बौद्ध व जैन) को ही नागरिकता का लाभ मिल पाएगा तो फिर इतनी कम संख्या पर इतना बवाल क्यों ? कारण मुख्यत: है जानकारी का अभाव और दूसरा विभाजनकारी शक्तियों की सत्तालोलुपता।
सबसे पहले हमें यह समझ लेना चाहिए कि व्यवस्थित तरीके से नागरिकों का दस्तावेजीकरण न केवल अपरिहार्य और समय की एक तात्कालिक आवश्यकता है, वरन वैध दस्तावेजों का निरीक्षण इसलिए भी अति आवश्यक है क्योंकि यह देश के वास्तविक नागरिकों को संसाधनों का उचित आवंटन सुनिश्चित करता है, और विवेकपूर्ण रूप से अप्रवासियों और शरणार्थीयों के बीच तार्किक अंतर कर आंतरिक सुरक्षा को भी मजबूती देता है। आज बांग्लादेश के पास NID एक अनिवार्य राष्ट्रीय पहचान पत्र के रूप में और इसी तरह पाकिस्तान के पास CNIC (कप्यूटरीकृत राष्ट्रीय पहचान पत्र) जो एक व्यक्ति को पाकिस्तानी नागरिक के रूप में प्रमाणित करने के लिए पहचान दस्तावेज के रूप में कार्य करता है, इसलिए यदि भारत CAA के द्वारा अपने नागरिकों का अद्यतन डेटाबेस तैयार कर रहा है तो यह व्यर्थ अभ्यास नहीं है बल्कि एक अनिवार्य आवश्यकता है।
दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि यह तीन धार्मिक देशों यानी अफगानिस्तान, पाकिस्तान व बांग्लादेश से छ: धार्मिक रूप से उत्पीड़ित अल्पसंख्यक समुदायों को नागरिकता प्रदान करता है जहाँ इन्हेें ‘काफ़िर ‘ या धिम्मी या नीच नागरिक के रूप मे देखा जाता है। यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि नागरिकता का लाभ उन शरणार्थीयों को दिया जायेगा जो दिसम्बर 2014 से पहले से हमारे देश मे रह रहे हैं। इसमें 11 साल के प्राविधान को घटाकर 5 वर्ष के प्रवास को महत्व दिया गया है ताकि उन्हें शीघ्र ही गरिमापूर्ण जीवन मिल सके। इन्हीं छ: समुदायोें को नागरिकता प्रदान करने के लिए चुने जाने का कारण एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक पृष्ठभूमि है जो नरसंहार, दुष्कर्म, बलपूर्वक, धर्मातरण, अतिरिक्त न्यायिक हत्याअों और हिंदू मंदिरों में बबर्रता व पलायन जैसे प्रसंगों से रक्तरंजित हैं।
Global human right defense की एक हाल ही में आयी रिपोर्ट में बताया गया है कि पाकिस्तान में किस प्रकार जबरन धर्मातरण एक सर्वव्यापी तथ्य बन गया है वहीं कुछ रिपोर्ट के अनुसार हर महीने-20-25 युवा हिंदू लड़कियों का अपहरण कर जबरन सिंध में इस्लाम में मतांतरित कर दिया जाता है। इन्हीं भीषण अत्याचारों के कारण भारत ने अपने पट इन समुदायों के लिए खोल दिये हैं जिन्हें उन देशों में न तो सामाजिक स्वीकृति प्राप्त हुयी है और न ही वो हक़-हकूक मिले हैं, जो वहां की स्वदेशी आबादी भोगती है।
पाकिस्तान में अल्पसंख्यक और गैर मुस्लिमों के संस्थागत उत्पीड़न की बात करें तो सब से उग्र कानून जनरल जिया-उल-हक़ के द्वारा शुरू किया गया ईशनिंदा कानून है जो अल्पसंख्यकों को लक्षित करने के लिए उपयोग किया जाता है। हाल ही में यह क़ानून आशिया बीबी के कारण वैश्विक जाँच के अधीन रहा और दुनिया में उजागर किया गया। इस निर्मम क़ानून की आलोचना यूरोपीय संघ की संसद की रिपोर्ट ‘RELIGIOUS MINORITIES IN PAKISTAN’ मे भी की गयी है। अगर गौर से देखा जाए तो पिछले 30 वर्षो में (1987-2017 के बीच) लगभग 1500 व्यक्ति (मुख्यत: हिंदू व ईसाई) इस दमनकारी कानून का शिकार हुए हैं। इस सच्चाई को उनके अपनी घऱेलू सांसद, नेशनल असेंबली की पूर्व सदस्य, फ़ाराहनाज इसपहानी ने अपनी पुस्तक ‘PURIFYING THE LAND OF THE PURE: PAKISTAN’S RELIGIOUS MINORITIES में स्पष्ट करते हुए लिखा है कि 1947 में विभाजन के समय पाकिस्तान की लगभग 23% आबादी गैर -मुस्लिम नागरिकों से बनी थी, जबकि आज गैर-मुस्लिमों की वही आबादी मात्र 3% रह गई है। यह विडबनापूर्ण है लेकिन सत्य है कि यह सब नेहरू-लियाकत समझौते (1950) के बावजूद हुआ जो कि आधिकारिक तौर पर भारत और पाकिस्तान के अल्पसंख्यकों की पारस्परिक रक्षा और सम्मान करने का वादा करता है। लेकिन जहाँ भारत अपने वादे पर अटल रहा वही पाकिस्तान ने समझौते में निहित विश्वास को तार-तार कर दिया। जहाँ तक CAA की उत्पत्ति की बात है तो इसकी पटकथा आज की नहीं बल्कि गाँधी, नेहरू, राजेंद्र प्रसाद, मौलाना आजाद और हाल तक मनमोहन सिंह सहित कई राजनीतिक हस्तियों द्वारा लिखी जा चुकी थी, इसलिए इसे सांप्रदायिक और धार्मिक ध्रुवीकरण का साधन कहा जाना एक तरह से उन विभूतियों की सदियों पुरानी समझदारी पर आघात करना है। उदाहरण के लिए पाकिस्तान से हिन्दुओं और सिखों की वापसी के बारे में गाँधी के इस प्रकार विचार थे, “इस मामले में भारत सरकार उन्हें आरामदायक जीवन जीने के लिए नागरिकता, रोजगार और सुविधाए प्रदान करने के लिए बाध्य हैं ” इसी प्रकार नेहरू ने भी इसी स्वर में कहा था, ‘यह स्पष्ट करना चाहता हूँ कि वे हमारे हैं और हमारे ही रहेंगे, उनका कल्याण हमारा सर्वोपरि लक्ष्य है। मैं उन्हें, पाकिस्तान के हिन्दुओं और सिखों को आश्वस्त करना चाहता हूँ कि वे यहाँ आने के लिए स्वतंत्रत हैं, जब वे भारत आना चुनते है, हम उन्हें स्वीकार करेंगे।’
अत: यह कहा जा सकता है कि CAA न तो नागरिकों के विरोध में है और न ही धर्म बनाम धर्म है। बल्कि यह इंडिक सभ्यता को मजबूत करता है। यह भारतीयों के द्वारा व भारतीयों के लिए एक सकारात्मक कदम है जिसका हम सबको खुले हृदय से स्वागत करना चाहिए। भारत पहले भी मानवाधिकारों के संरक्षक के रूप में जाना जाता था और आज भी CAA के द्वारा विभाजन की ऐतिहासिक भूल का नैतिक सुधार कर अपने नैतिक प्रमाण दे रहा है, जिसका हम सबने समर्थन करना चाहिए। जय हिन्द !

यह भी पढ़ें : सावरकर ने नहीं राहुल ने मांगी थी माफी

  • स्वतंत्रता संग्राम में सर्वाधिक क्रूरता और सबसे लंबी कैद भुगती थी सावरकर ने
  • इंदिरा गांधी ने उन्हें भारत का सपूत बताया उन पर डाक टिकट जारी किया
  • आपत्तिजनक है ऐसे महान स्वतंत्रता सेनानी की खिल्ली उड़ाना

डा. गिरीश रंजन तिवारी।विनायक दामोदर सावरकर के असाधारण बलिदान की भले ही हाल में राहुल गांधी ने खिल्ली उड़ाई हो लेकिन सच्चाई यह है कि स्वतंत्रता संग्राम में सबसे लंबी कैद और अंग्रेजों की सर्वाधिक क्रूरता भुगतने वाले सावरकर का नाम इस आंदोलन में स्वर्णाक्षरों में लिखा जाना चाहिए।
सावरकर के साथ अंडमान की जेल में 10 वर्षों तक जो जुल्म किया गया वो विश्व के अब तक के सर्वाधिक अमानवीय जुल्मों में शुमार है जिसे सुनने मात्र से किसी के भी रोंगटे खड़े हो जाएं। जेल में उन्हें जिस कोठरी में रखा गया उसके भीतर ही एक कोने में ही शौच भी करना होता था। खाने के नाम पर उबला हुआ चावल का चूरा, बरसाती पानी और जंगली घास की कीड़ों से युक्त सब्जी होती थी। राजनैतिक कैदियों का मनोबल तोड़ने के लिए अंग्रेज भूख-प्रताड़ना – तन्हाई फॉर्मूला अपनाते थे। इनमें भूख और प्रताड़ना से सावरकर का मनोबल न तोड़ पाने पर उन्हें छह माह इस कोठरी में तन्हाई में रखा गया। इसके अलावा सावरकर को बेड़ियों में बांध कर और हाथ छत से बांधकर लगातार सात दिन खड़ा रखा गया। दस दिन उन्हें त्रिभुज के आकार के लट्ठों में पैर फैलाकर जंजीर से बांधकर रखा गया।

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कालापानी में उन्हें एक लंगोट पहनकर बैल की तरह जुए में जुतकर प्रतिदिन तीस किलो तिल का तेल भी निकलना पड़ता था। जब भी किसी कैदी को फांसी दी जाती सावरकर को वह फांसी दिखाने ले जाया जाता। इन हालातों में अनेक कैदी मारे गए, कुछ ने आत्महत्या कर ली यहां तक कि पागल भी हो गए पर सावरकर ने संघर्ष की अद्भुत मिसाल दर्शाई जिसने क्रूर अंग्रेजों को तोड़ कर रख दिया। जेल का जीवन कितना अमानवीय था यह इसीसे समझा जा सकता है कि बहुत बाद में 1933 में कैदियों को हाथ धोने को साबुन और ‘खा सकने लायक भोजन’ तक के लिए 45 दिन तक भूख हड़ताल करनी पड़ी थी।
इन तमाम हालातों के बीच उन्होंने जेल की दीवारों में 5000 पंक्तियां कविताओं की लिखीं और याद भी रखीं। इससे पूर्व गिरफ्तारी के बाद जिस जहाज से उन्हें लंदन से भारत लाया गया उसमें उन्हें कैदियों के मलमूत्र से भरे ड्रम के सटाकर बिठाया गया था।
सावरकर से अंग्रेज किस कदर खौफजदा थे यह इससे पता चलता है कि उन्हें दो जन्मों के कारावास की सजा सुनाई गई । यही नहीं कालापानी में अंग्रेजों ने किसी भी कैदी को पांच वर्ष से ज्यादा नहीं रखा, या तो उन्हें रिहा कर दिया या जेल के बाहर खुले में उनके परिवारजनों के साथ रख दिया लेकिन सावरकर को इस जेल में दस वर्ष रखा गया। 1918 में जब तमाम राजनैतिक कैदियों को आम माफी दे दी गई तब भी सावरकर और उनके बड़े भाई गणेश बाबाराव को रिहा नहीं किया गया। अन्य कैदियों के परिजनों को वर्ष में एक बार उनसे मुलाकात कराई जाती थी लेकिन सावरकर को आठ साल तक परिवारजनों से नहीं मिलने दिया गया। 1921 में जेल से छूटने के बाद भी उन्हें 1926 तक रत्नागिरी में जेल में और फिर 1937 तक नजरबंदी में रखा गया। इस तरह वे भारत के एकमात्र स्वतंत्रता सेनानी रहे जो सर्वाधिक 27 वर्ष तक जेल या नजरबंदी में रहे।
सावरकर को मार्च 1910 में लंदन में ब्रिटिश सरकार विरोधी गतिविधियों और पूर्व में बम्बई में भड़काऊ भाषणों के आरोप में गिरफ्तार कर एसएस मोरिया जहाज से भारत लाया जा रहा था। फ्रांस के तट पर वे खिड़की से कूद कर सिपाहियों की गोलियों की बौछार के बीच तैरते हुए फ्रांस जा पहुंचे। अंग्रेजों ने अंतरराष्ट्रीय कानून के खिलाफ धोखे से फ्रांस से उन्हें गिरफ्तार कर लिया।
ये सारा वर्णन सावरकर की जीवटता का अहसास कराता है और उनके ब्रिटिश सरकार से कथित माफी मांगने के दुष्प्रचार की असलियत समझी जा सकती है। अंग्रेज सरकार के दस्तावेजों के मुताबिक सावरकर ने सरकार से कई बार माफी की गुहार लगाई थी। अंग्रेजों द्वारा सावरकर की छवि धूमिल करने के इस दुष्प्रचार को ही राहुल गांधी ने मान्यता देते हुए हाल में कहा था कि मैं सावरकर नहीं जो माफी मांग लूं। वह बात अलग है कि राफेल मामले में देश को गुमराह करने के प्रयास में सुप्रीम कोर्ट को लपेटने के बाद कोर्ट की एक फटकार भर में राहुल ने बाकायदा माफी मांग ली थी वह भी तब जब माफी न मांगने पर उन्हें बमुश्किल एकआद दिन हिरासत भर ही होती जहां उन्हें वीवीआईपी आतिथ्य मिलता। इसके अलावा राहुल एजेएल घोटाले सहित अहमदाबाद के दो कोर्ट से विभिन्न मामलों में जमानत पर चल रहे हैं। जमानत मांगना भी एक तरह से जेल भेजे जाने से माफी मांगने जैसा ही है। ऐसे में सावरकर जैसे स्वतंत्रता सेनानी का मखौल उड़ाने का राहुल को कितना नैतिक अधिकार है यह सहज ही समझा जा सकता है।
अंग्रेजों द्वारा सावरकर का मनोबल तोड़ने का हर प्रयास असफल रहा तो उन्होंने उनकी छवि धूमिल करने को इस दुष्प्रचार का सहारा लिया यह अनेक तथ्यों से प्रमाणित होता है। पहली बात यह कि यदि सावरकर ने अनेक बार माफी मांगी थी तो वे सर्वाधिक अवधि तक इस जेल में क्यों रहे जबकि इस बीच माफी मांगने, न मांगने वाले दूसरे तमाम कैदी रिहा कर दिये गए?
अंडमान की अमानवीय यातनाओं में अनेक कैदी मारे गए सावरकर अपनी जिजिविषा के चलते सब सह गए उन्होंने अन्य कैदियों को भी आमरण अनशन न कर जीवित रह कर संघर्ष करने का मंत्र दिया वह स्वयं के लिए माफी कैसे मांग सकते थे। यदि उन्होंने माफी मांगी थी तो उन्हें वीर की उपाधि से क्यों नवाजा गया। सावरकर की जीवटता इससे भी समझी जा सकती है कि 1966 में गंभीर बीमार होने पर उन्होंने आत्म अर्पण की अपनी थ्योरी के तहत भोजन, दवा और पानी तक त्याग दिया और 26 दिन ऐसे ही रहकर प्राण समर्पित किये।
प्रसिद्ध इतिहासविद प्रो अजय रावत कहते हैं कि सावरकर का माफी मांगना अंग्रेजों का फैलाया हुआ झूठ था जिसे कुछ भारतीय इतिहासकारों ने भ्रामक तरीके से प्रस्तुत किया। इस संबंध में अंग्रेजों के खुद के बनाये पेपर्स के अलावा अन्य कोई साक्ष्य नहीं है। वैसे भी जेल के ऐसे कठोर माहौल में वे किसी से कुछ भी लिखवा सकते थे। सावरकर की जीवनी सावरकर ईकोज फ्रॉम द फॉरगॉटन पास्ट के लेखक विक्रम संपथ ने इस संबंध में लंदन जा कर संबंधित दस्तावेजों का अध्ययन कर यह निष्कर्ष निकाला कि सावरकर ने माफी नहीं मांगी बल्कि नियमों में उपलब्ध प्रावधानों के तहत बैरिस्टर होने के नाते स्वयं अपनी पैरवी की थी। ऐसे प्रावधानों के सहारे तमाम बड़े बड़े नेता सजा पूरी होने से पहले रिहा होते रहे थे। उन नेताओं पर तो किसी ने उंगली नहीं उठाई फिर अपनी पैरवी करने मात्र पर सावरकर को बदनाम करना कहां तक उचित है।
सावरकर के खिलाफ यह दुष्प्रचार अंग्रेजों ने इसलिए किया जिससे वे भारतीय जनमानस के हीरो न बन सकें। वह बात अलग है कि 1937 में फिर सामाजिक गतिविधियों में सक्रिय हुए सावरकर की लोकप्रियता इतनी व्यापक थी कि हर पार्टी उन्हें अपने दल में शामिल करने को आतुर थी हालांकि गांधी नेहरू से वैचारिक मतभेदों के चलते सावरकर ने अपनी प्रथक राह चुनी।
इस सबके बावजूद भी यह मान लिया जाय कि उन्होंने माफी मांग भी ली थी तो भी इसके लिए उनके समस्त संघर्ष और सामाजिक कार्यों को दरकिनार कर उन्हें दोषी, मजाक का पात्र और राजनैतिक अछूत नहीं माना जा सकता क्योंकि इन हालातों में दस वर्ष क्या दस दिन भी किसी को रहना पड़े तो वह माफी मांग कर बाहर आना ही चाहेगा।
अंग्रेजों का दावा था कि सावरकर ने कभी सरकार विरोधी कार्य न करने का हवाला दे कर माफी मांगी थी लेकिन सच्चाई यह है कि 1937 में हर तरह की बंदी से आजादी के बाद उन्होंने भारतीय युवाओं को अंग्रेजों के विरुद्ध सैन्य प्रशिक्षण देने के लिए नासिक में मिलिटरी स्कूल प्रारंभ किया बल्कि रास बिहारी बोस और सुभाष चंद्र बोस के बीच तालमेल बनाकर आईएनए की स्थापना तक में भूमिका निभाई जिसने बाद में अंग्रेजी साम्राज्य की जड़ें हिला दी थीं। इस दौरान वे जातिवादी व्यवस्था, छुआछूत और रूढ़िवादी परंपराओं की समाप्ति के अभियान में भी लगे रहे। रत्नगिरि में उन्होंने जातिवादी व्यवस्था समाप्त करवा भी दी थी।
हिंदुत्व शब्द के प्रणेता सावरकर के लिए इसका अर्थ हिंदूवाद नहीं बल्कि जातिरहित समरस समभाव समाज से था जहां किसी के साथ कोई भेदभाव न हो। वरना धार्मिक रूप से तो सावरकर एक कट्टर नास्तिक थे जिनका पूजापाठ आदि में कोई विश्वास नहीं था।
इसे दुर्भाग्य ही कहा जायेगा कि स्वतंत्रता से पूर्व अंग्रेजों ने उन्हें साजिशन बदनाम किया तो स्वतंत्रता के बाद भारतीय नेताओं ने उनकी लोकप्रियता और वैचारिक स्पष्टवादिता से बौखलाकर उन्हें गांधी की हत्या में दोषी ठहराने के कुचक्र रचा। हांलांकि कोर्ट में इस आरोप का पर्दाफाश हो गया और इस मामले में उनकी संलिप्तता नहीं पाई गई।
आज यह जरूरी है कि सावरकर के संघर्ष और बलिदान का सही मूल्यांकन हो और वर्ग विशेष उनका मखौल उड़ाने के बजाय समुचित सम्मान दे।

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अनिल मिश्र ‘कामिल’ @ नवीन समाचार, 16 फरवरी 2019। देश का जनमानस आज आहत है। हमारी रक्षा करने वाले जांबाज सैनिकों पर पाकिस्तान के कायरतापूर्ण हमले का तुरंत मुंहतोड़ जवाब नहीं दे पाने की मजबूरी इस पीड़ा को और हवा दे रही है। जबकि कड़वा सच यह है कि यह धैर्य रखने का समय है। यह समय है इस पूरी घटना के पीछे खड़ी मानसिकता को जानने का और फिर उसके समूल नाश के लिए एकजुट होने का।

भारतीय सेना पर पाक प्रायोजित आतंकियों का यह कोई पहला हमला नहीं था। आकार और वीभत्सता में भयंकर होने के बावजूद यह कायरतापूर्ण परोक्ष युद्ध की पुनरावृत्ति मात्र ही है। ऐसी घटनाओं को अंजाम देने को लेकर कभी जैश-ए-मुहम्मद तो कभी लश्करे तैयबा या हिजबुल का नाम आगे आना असल में मुख्य समस्या से ध्यान हटाने के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है।

इन नापाक घटनाओं के मूल में मसूद अजहर, हाफिज सईद या जाकिर मूसा के महत्व को बढ़ावा दिया जाना भी एक साजिश का ही परिणाम है, जिससे कि जन भावनाएं व्यक्ति और संघटन के विरुद्ध केंद्रित रहें और मूल संक्रमित विचारधारा को संरक्षित रखा जा सके। सीधा सच यह है कि आज आतंकवाद वैश्विक कूटनीति का अहम हिस्सा बन चुका है। तमाम सम्पन्न देश भी इसका इस्तेमाल रणनीति के रूप में करते हैं।

यदि यह सत्य नहीं है तो 33 वर्ष बाद भी संयुक्त राष्ट्र में आतंकवाद जैसी वैश्विक त्रासदी के विरुद्ध राष्ट्रों के मध्य सहमति क्यों नहीं बन सकी? यूएन में वीटो के मार्फत मसूद अजहर को संरक्षित करके चीन पाकिस्तान में रोड वन बेल्ट की अपनी अति महत्वाकांक्षी परियोजना को सफलतापूर्वक चला रहा है। इजराइल को दबाने के लिए तमाम देशों ने फिलिस्तीनी आतंकवाद को शह दे रखी है। स्वयं भारत ने भी फिलिस्तीन में हमास सहित अन्य संगठनों को देशों से आतंकवादी नहीं माना है। उधर रूस को परेशान करने के लिए यूरोपियन यूनियन के राष्ट्र चेचेन्या और क्रोएशिया के आतंकी संगठनों की हिमायत से बाज नहीं आते। मध्य और पूर्वी अफ्रीका में व्यापक रूप से पांव पसार रहे बोको हराम को खाड़ी देशों का समर्थन है। जबकि गल्फ क्षेत्र में राष्ट्रों की आपसी रस्साकशी ने तमाम आतंकी संगठनों को पनपाया है। मिस्र में मुस्लिम ब्रदरहुड से लेकर दक्षिण पश्चिम एशिया में आईएसआईएस तक को परोक्ष रूप से तमाम देशों का आर्थिक व सामरिक समर्थन हासिल है।

बीते कुछ वर्षों में भारत ने आतंकवाद के खिलाफ बहुत स्पष्ट नीति का प्रतिनिधित्व किया है। भारत सभी वैश्विक मंचों पर ‘अच्छे और बुरे आतंकवाद’ की आड़ में हिंसा को संरक्षित किये जाने का पुरजोर विरोध करता रहा है। और यही भविष्य का रास्ता भी है। भारत को कटु सत्य स्वीकारना होगा कि निजी हितों के कारण विश्व आज खुलकर पाकिस्तान के विरुद्ध कार्रवाई में साथ नहीं दे सकता। भारत को अपना वर्तमान और भविष्य सुरक्षित करने के लिए स्वावलंबन का मार्ग ही चुनना पड़ेगा। पुलवामा में भारतीय सेना पर परोक्ष हमले के लिए पाकिस्तान को और इसे अंजाम देने वाले आतंकी संगठनों को कठोर सबक सिखाकर भारत विश्व के सामने एक मिसाल प्रस्तुत कर सकता है। किसी भी प्रकार के आतंकवाद से समझौता नहीं करने की हमारी वर्तमान रणनीति को अमलीजामा पहनाने का यह एकदम सही समय है।

हर बार परमाणु सम्पन्न राष्ट्र की धमकी देने वाले पाकिस्तान में आतंकियों का फलन-फूलना और सुरक्षित रहना बताता है कि पाकिस्तान एक संस्था के रूप में एक वैश्विक समस्या का संरक्षक बन बैठा है। आतंकवाद को प्रश्रय न देने की अमेरिकी चेतावनी पाकिस्तान में धरातल पर हमेशा निरर्थक साबित हुई है। यदि भारत परमाणु हमले की धमकी को दरकिनार करके एक-एक दोषी को उसके अंजाम तक पहुंचाने की अपनी दृढ़ प्रतिज्ञा मूर्त करे तो निश्चित रूप से आतंकवाद के विरुद्ध एक राष्ट्र के रूप में भारत 21वीं सदी का वैश्विक प्रणेता बनकर उभरेगा। दुनिया से अपनी सुरक्षा की अनुमति लेने के बजाय कायरतापूर्ण हिंसा को क्षत-विक्षत करके भारत विश्व के समक्ष आतंकवाद के निराकरण का पूर्ण संकल्पित, सदृष्ट और साहसिक उदाहरण प्रस्तुत कर सकता है, जो निश्चित रूप से भविष्य में पूरे विश्व के लिए अनुकरणीय होगा।

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अनिल मिश्र ‘कामिल’ @ नवीन समाचार, 4 फरवरी 2019। देश के कई राज्यों की सरकारों ने महत्वाकांक्षी आयुष्मान भारत योजना का विरोध कर, इसे लागू करने से इनकार कर दिया है। यदि आप भी ऐसा ही सोचते हैं कि उन राज्यों में आयुष्मान भारत योजना के विरोध का कारण राजनीति मात्र है तो आपका आंकलन एकदम गलत है। वास्तविकता यह है कि इस योजना का राजनीतिक विद्वेष के कारण विरोध किया जाना सिर्फ एक बहाना भर है और इसकी आड़ में कई राज्य भ्रष्टाचार की दशकों पुरानी बेल को पोषित करने के खेल में जुटे हैं।दरअसल जिस तिकड़म के जरिए एक अस्पताल अपने अशक्त-मजबूर मरीज को लूटता है, आयुष्मान भारत योजना उस कुत्सित खेल पर करारा प्रहार है। यही नहीं, बगैर लिखापढ़ी के आने वाली रकम प्रवाहित-एकत्रित हो रहे कालेधन के पहाड़ पर भी इससे रोक लगनी तय है। दो टूक कहें तो अब अस्पाल में एक मरीज के इलाज पर हुए खर्च का हिसाब किसी गरीब-मजलूम को नहीं बल्कि एक कुशल बीमा कंपनी को पूछना है। वह स्वास्थ्य बीमा कंपनी, जिसके पास मेडिकल साइंस की विशेषज्ञ टीम है। वह किसी बीमारी के उपचार में होने वाले टेस्ट से लेकर चलने वाली दवाओं और आईसीयू आदि के खर्च लिए भुगतान करने हेतु नियत है। अब वह अस्पताल के समस्त बिलों का अंकेक्षण करेगी। नाजायज खर्च पर सवाल खड़े होंगें। मतलब साफ है कि इस योजना के लागू होने का सही अर्थ यह है कि अस्पतालों की मनमानी लूट पर विराम संभव हो सकेगा। सिर्फ इतना ही नहीं, आयुष्मान भारत योजना के पूर्णतः लागू हो जाने का अर्थ यह भी होगा कि समाज का समूचा निर्धन, निम्न और मध्यम वर्ग इसमें शामिल हो जाएगा। वहीं उच्च मध्यम, सशक्त और धनाढ्य वर्ग अब पहले ही स्वेच्छा से अपने परिवार को स्वास्थ्य बीमा के माध्यम से सुरक्षित रखने के लिए पर्याप्त रूप से जागरूक व सक्षम है। इसका स्पष्ट अर्थ हुआ कि आयुष्मान भारत योजना के पूर्णतः लागू होने की स्थिति में पूरा देश उपचार के लिए स्वास्थ्य बीमा से जुड़ जाएगा। इस स्थिति में अस्पताल अपने समस्त व्यापार को दर्शाने के लिए मजबूर हो जाएंगे। मरीजों की वास्तविक संख्या और उनके उपचार में हुए वास्तविक खर्च की जानकारी देश की वित्तीय संस्थाओं को मिल सकना संभव हो जाएगा। आंकड़ों के आधार पर देश की जीडीपी में स्वास्थ्य क्षेत्र का योगदान 4.86% है, लगभग जो 9.09 लाख करोड़ रुपये के बराबर है। जबकि इसका वास्तविक आंकड़ा 13 लाख करोड़ रुपए से अधिक है। भारत में 72% ग्रामीण और 79% शहरी आबादी निजी क्षेत्र के अस्पतालों में ही उपचार कराती है। अतः निजी क्षेत्र के अस्पतालों में प्रवाहित लगभग 9.75 करोड़ रुपए में से प्रतिवर्ष एक बड़ी राशि कालेधन का माध्यम बन रही है। आयुष्मान भारत योजना सिर्फ गरीबों के हित का ही संरक्षण नहीं करती, यह देश को भ्रष्टाचार और कालेधन से मुक्त करने का एक महत्वपूर्ण साधन भी साबित होने वाली है। 
इतना सबकुछ जानने-समझने के बाद भी मंशा पर संदेह का छद्म करके दिल्ली, पश्चिम बंगाल, आंध्र, तेलंगाना और उड़ीसा जैसे राज्य यदि इस महत्वाकांक्षी योजना को सफल होने से रोक रहे हैं तो कहीं न कहीं खुद इनकी मंशा भी संदेहास्पद हो जाती है। इन राज्यों की जनता को आयुष्मान भारत का महत्व समझना होगा। इसे शीघ्र-अतिशीघ्र लागू किए जाने के लिए दबाव बनाए जाने की जरूरत है। 

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अनिल मिश्र ‘कामिल’ @ नवीन समाचार, 1 फरवरी 2019। राजनीतिक तुष्टिकरण किसी वर्ग विशेष का उन्माद तृप्ति कर भी दे मगर इसका स्याह पक्ष यह है कि सामान्य से अतिरिक्त पाने का मूल्य वह वर्ग अपनी मूलभूत आवश्यकताओं की तिलांजलि देकर चुकाता है। इसका सीधा कारण यह है कि उस वर्ग के नागरिक अपनी प्राथमिकताएं बदल देते हैं। नतीजतन समूह के लोग विकास की मुख्य दौड़ में पीछे छूट जाता है।

आप सोंच रहे होंगे कि तुष्टिकरण का जींद विधानसभा में हुए उपचुनाव के नतीजों से क्या संबंध है? जहाँ कांग्रेस पार्टी के फायर ब्रांड राष्ट्रीय प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला एक विधानसभा चुनाव में अपमानपूर्ण पराजय झेलकर बमुश्किल अपनी जमानत बचा पाते हैं। तीसरे स्थान पर रहे सुरजेवाला को जनता का सीधा संदेश यह है कि वह अपने राजनीतिक दल को प्रसन्न करने के लिए जिस प्रकार झूठ को प्रचारित-प्रसारित करते हैं, वह अब बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। राफेल से लेकर ईवीएम हैकिंग जैसे दर्जनों फर्जी मुद्दों को बतौर प्रवक्ता जिस प्रकार सुरजेवाला ने हवा दी और अंतरराष्ट्रीय पटल पर देश व उसकी प्रतिष्ठित संस्थाओं को बदनाम किया गया, जनता का साफ-साफ संदेश यही है कि वह अवसरवादिता के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं था।

कांग्रेस पार्टी में सुप्रीमो परिवार को प्रसन्न करने के लिए किसी भी हद तक तुष्टिकरण करना कार्यकर्ताओं और नेताओं की पुरानी आदत रही है। हालाँकि 21वीं सदी के इस दशक में सोशल मीडिया के विस्तार ने सही-गलत के निरपेक्ष और बेलाग परीक्षण की जो व्यापक व्यावस्था खड़ी की है, संभवतः कांग्रेस पार्टी के नेता और कार्यकर्ता अभी उसका ठीक-ठीक अनुभव नहीं कर सके हैं। काँग्रेस के नेता, प्रवक्ता और कार्यकर्ता यह भुला बैठे हैं कि उनकी क्षमता की साख पार्टी के भीतर न होकर जान सामान्य के मध्य होनी चाहिए। किसी भी नेता के लिए आवश्यक है कि वह जानता की आवश्यकताओं और भावनाओं को जाने, उसे महसूस करे। जो समाज की जमीनी हकीकत को गंभीरता से लेता है, उसी नेता की जनता में पैठ होती है। और यदि एक नेता के तौर पर समाज में पकड़ हो तो वह किसी पार्टी की दया का याचक नहीं होता। उल्टे राजनीतिक दल उसके दरवाजे पर पद-प्रतिष्ठा देने के लिए सदैव खड़े रहेंगे।

सुरजेवाला विगत तीन-चार वर्षों में दिव्यांग और सर्जिकल स्ट्राइक जैसे मुद्दों से लेकर विकास दर और गरीबी उन्मूलन से जुड़ी योजनाओं के विरुद्ध पार्टी सुप्रीमो का तुष्टिकरण करने के लिए देश को बरगलाते रहे। वह भूल गए कि धरातल का भी अपना महत्व है। जनता के भी अपने अनुभव हैं। असल में रणदीप सुरजेवाला की जींद विधानसभा सीट पर हार कांग्रेस पार्टी के हर स्थानीय नेता और कार्यकर्ता के लिए सीधा सबक है कि सरकार का विरोध करने की आड़ में देश का विरोध करने की अवसरवादिता नहीं स्वीकारी जाएगी। पार्टी सुप्रीमो की प्रसन्नता किसी नेता या कार्यकर्ता को पार्टी के भीतर अनपेक्षित लाभ दिलवा सकती है मगर इससे जन सामान्य में पकड़ भी बन जाए, इसकी कोई गारंटी नहीं है।

एकदम संक्षेप में कहें तो राष्ट्रीय स्तर पर सुरजेवाला का मिथ्यावाचन, उनकी अवसरवादिता और तुष्टिकरण की नीति को विधानसभा चुनावों में जनता ने निशाने पर ले लिया। हालांकि हार के तुरंत बाद ईवीएम पर निशाना साध कर सुरजेवाला ने साफ कर दिया है कि उन्होंने इस हार से कोई सबक नहीं लिया है और वह जन भावनाओं का सम्मान करने को अभी भी तैयार नहीं हैं।

(सुरजेवाला के केंद्र की राजनीति में स्थापित होने के बावजूद हरियाणा के जींद से विधानसभा चुनाव लड़ने पर बहुत लोगों को आश्चर्य हुआ था। लेकिन सच्चाई यह थी कि वह हरियाणा की राजनीति में उतरने, खासकर आगे विधानसभा चुनाव के बाद कांग्रेस से मुख्यमंत्री पद के दावेदार के रूप में स्थापित होने के लिए जिंद का उप चुनाव लड़े थे। दूसरी तरफ भाजपा ने यह चुनाव आसन्न विधानसभा चुनाव से पहले अपनी ताकत को मापने-भाँपने के अवसर के रूप में लिया था। अब जबकि सुरजेवाला का मंसूबा ध्वस्त हो गया है और दूसरी तरफ भाजपा बड़े बहुमत से यह चुनाव जीती है और हरियाणा में उसकी ताकत पर जनता ने मुहर लगा दी है ऐसे में कोई आश्चर्य नहीं कि वह लोकसभा चुनाव के साथ ही विधानसभा चुनाव कराने जा सकती है। -नवीन समाचार)

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(#सैयदशुजा शाह की प्रेस कॉन्फ्रेंस पर त्वरित टिप्पपणी)

अनिल मिश्र ‘कामिल’ @ नवीन समाचार, 23 जनवरी, 2019। क्या हिंदी जानने वाला हर व्यक्ति पत्रकार बन सकता है? यदि नहीं तो महज अंग्रेजी भाषा की जानकारी के आधार पर लोगों को बड़े-बड़े अखबार का संपादक क्यों बना दिया जाता है?

मैं यह इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि कल लंदन में एक संदिग्ध हैकर की पत्रकार वार्ता को भारत के अंग्रेजी अखबारों ने इस प्रकार शब्दशः छाप दिया मानो वहाँ भारत की सरकार ब्रीफिंग कर रही हो। मतलब साफ है कि कुछ एक हिन्दी और समस्त अंग्रेजी अखबारों के लिए सनसनी के समक्ष तथ्य और व्यवस्था कोई मायने नहीं रखते। या फिर इनके पत्रकारों और संपादकों को इसकी समझ ही नहीं है। अन्यथा हम, यह सब किसी मूल्य के बदले रची जाने वाली साजिश मानने को मजबूर हैं।

कल लंदन हैकॉथन में एक कथित साइबर विशेषज्ञ सैयद शुजा शाह ने कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और वकील कपिल सिब्बल की मौजूदगी में एक पत्रकार वार्ता की। इस दौरान उसने सनसनीखेज दावा किया कि भारत में 2014 में हुए लोकसभा चुनाव के नतीजे साइबर हैकर्स ने तय किए थे। महज 14 लोगों की एक टीम ने दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र और चुनाव प्रक्रिया को बंधक बनाकर देश भर के करीब साढ़े दस लाख पोलिंग बूथ और 26 लाख से अधिक ईवीएम मशीनों को अपने नियंत्रण में ले लिया। इसी काम को करने के लिए भारत की सरकार को करीब 650 आईएएस, 3000 पीसीएस और लाखों कर्मचारी नियुक्त करने पड़ते हैं।

अब यहां पहले थोड़ी सी तकनीकी जानकारी समझना जरूरी है। पहली यह कि जियो को टेलीकॉम का लाइसेंस अप्रैल-2013 में मिला। मई-2013 में कंपनी ने टावर इरेक्शन शुरू किया। पूरे भारत में लाखों पार्टियों(भूमि एवं मकान मालिकों) के साथ टावर स्थापना के लिए समझौते शुरू हुए, जिनमें से महज कुछ हजार ही पूर्ण हो सके। नतीजतन जून-2014 तक कंपनी पूरे भारत में सिर्फ 20-25 फीसद क्षेत्रफल पर ही नेटवर्क कायम कर सकी। हालांकि इस दौरान भी यह टावर ट्राई के नियमों के तहत टेस्टिंग के अधीन थे। अगस्त-2014 में जियो की लॉन्चिंग के वक्त कंपनी लुभावने ऑफर के बावजूद टावर विस्तार में पिछड़ने के कारण अपेक्षित कारोबार नहीं कर सकी। परिणामस्वरूप उसने अन्य कंपनियों के टावर से शेयरिंग करके संचालन शुरू किया। 2016 में अनिल अम्बानी की आरकॉम के बंद होने पर उसका सारा टावर जिओ ने खरीदा। तत्पश्चात बीएसएनएल के टावरों का अधिग्रहण करके जियो ने देश भर में अपने नेटवर्क सुनिश्चित किये।

अब वापस अप्रैल-2014 पर लौटते हैं। जिस जियो के पास तत्कालीन लोकसभा चुनाव के वक्त देश के 75 प्रतिशत भूभाग पर नेटवर्क था ही नहीं, उसकी बदौलत चौदह हैकरों ने ‘लो-फ्रीक्वेंसी’ की मदद से पूरे भारत के करीब साढ़े दस लाख पोलिंग स्टेशन और करीब 25 लाख ईवीएम हैक कर लिए। इससे भी महत्वपूर्ण यह है कि जो, 650 आईएएस और पीसीएस निर्वाचन अधिकारी की भूमिका निभा रहे थे, उनमें से किसी को भी इसकी भनक नहीं लगी। इन एक हजार अधिकारियों में 10-20 टेलीकॉम इंजीनियर जरूर होंगे और इन एक हजार अधिकारियों के शायद 25-50 आईटीएस(इंडियन टेलीकॉम सर्विसेज) मित्र भी होंगें। यहां यह जानना भी जरूरी है कि पूरे भारत में किसी स्थान विशेष पर किसी भी कंपनी के नेटवर्क की प्रति सेकेंड की समस्त जानकारी ट्राई व सूचना एवम प्रसारण मंत्रालय के पास होती है। इसी आधार पर किसी इलाके का नेटवर्क या इंटरनेट विशेष परिस्थिति में बंद किया जाता है। मतलब जिस 25% भूभाग पर जियो का कथित ‘लो-फ्रीक्वेंसी’ नेटवर्क हॉकर्स की मदद कर रहा था, उसकी जानकारी देश भर के एक भी आईटीएस को नहीं हुई।

यह भी महत्वपूर्ण तथ्य है कि साइबर विशेषज्ञ कम्प्यूटर पर किसी सूचना आदि को लुप्त अथवा अदृश्य कर भी लें, वह किसी टेलीकॉम कंपनी के नेटवर्क को अदृश्य नहीं कर सकते। यदि ऐसा संभव हो जाए तो इस टेलीकॉम युग में किसी भी देश की समस्त संस्थाओं को, इनकी सूचनाओं के डिकोड करना और उस देश के संचालन को ध्वस्त करना बहुत आसान हो जाता। फिर युद्ध जीतने के लिए परमाणु बम नहीं चाहिए होंगे। ध्वनि की चाल से दुगुने रफ्तार वाले जेट जहाज तक का सिग्नल पकड़ लिया जाता है।

अब उसी प्रेस कांफ्रेस के दूसरे हिस्से पर नजर डालिये। संदिग्ध साइबर जानकर ने दावा किया है कि एनआईए के डिप्टी डायरेक्टर तंजील अहमद(जिनकी हत्या बिजनौर के सहवारा में हुई) इसी मामले में हुई थी। क्योंकि वरिष्ठ भाजपा नेता गोपीनाथ मुंडे वाहन दुर्घटना की चपेट में आकर नहीं मरे बल्कि लोकसभा चुनाव मैनेज करने के कारण उनकी हत्या करा दी गयी, जिसका खुलासा तंजीम अहमद करने वाले थे। अब, जबकि तथ्य और तकनीक से ही स्पष्ट है कि ईवीएम हैक करने का सारा दावा किसी आधारहीन साजिश से अधिक और कुछ भी नहीं। ऐसे में वरिष्ठ भाजपा नेता एवं संघ कार्यकर्ता की मौत को हत्या जताने का षड्यंत्र बहुत खोखला है। अब थोड़ी सी बात तंजील पर भी के ली जाए ताकि कथित खुलासे का जमीनी सच भी बयाँ हो सके।

एनआईए के डिप्टी डायरेक्टर तंजील अहमद की हत्या 07 अप्रैल 2016 को बिजनौर के सहवारा में देर रात उस वक्त हुई, जब वह अपने परिवार के साथ एक विवाह समारोह से लौट रहे थे। इस मामले में तंजील के जीजा जखावर और उसके बेटे रेहान व जैनी मुख्य साजिशकर्ता के रूप में गिरफ्तार किये जा चुके है। एसटीएफ के 10 लोगों की हत्या में नामजद हिस्ट्रीशीटर मुनीर अहमद ने तंजील अहमद की हत्या को अंजाम दिया था। जिसके इकबालिया बयान के आधार पर जखावर, रेहान और जैनी पुलिस के हत्थे चढ़े थे। एनसीआर में करोड़ों की एक विवादित संपत्ति को लेकर जखावर और तंजील के बीच झगड़ा था। शूटर मुनीर के मना करने पर भी तंजील उस विवादित संपत्ति से हटने को तैयार न हुए, जिसके कारण मुनीर ने तंजील की हत्या कर दी।

गौरतलब है कि 07 अप्रैल-16 को हत्या से पूर्व तंजील एनआईए से 01 अप्रैल-16 को निजी अवकाश पर चले गए थे। इससे ठीक पहले वह पठानकोट हमले की जांच के लिए बनी पांच सदस्यीय समिति में बतौर सदस्य कार्यरत थे। जबकि इससे पहले वह बीएसएफ में अपनी सेवाएं दे रहे थे। एनआईए में कार्यरत रहकर उन्होंने सिमी और इंडियन मुजाहिदीन जैसे आतंकी संगठनों का नेटवर्क उजागर किया था। उनकी हत्या के उपरांत कई एजेंसियों को इसके पीछे आतंकवादियों का हाँथ होने का शक था, जिस कारण इसकी गंभीर जांच में पारिवारिक और संपत्ति संबंधी द्वेष का खुलासा हुआ।

जबकि इतनी जानकारी मेरे जैसे सामान्य नागरिक के पास उपलब्ध है, ऐसे में एक अखबार या न्यूज चैनल के संपादक को यह तथ्य ख्याल क्यों नहीं आए? क्या वह इसे समझने में अक्षम थे? या इन तथ्यों की अनदेखी करने का उन्हें निर्देश था?? क्योंकि यदि वह निर्देशित नहीं थे तो इस कथित साइबर विशेषज्ञ की पत्रकारवार्ता को छापने के साथ ही अपने स्तर पर दावों की बखिया उधेड़ सकते थे। यह मीडिया हाउस यदि खुले शब्दों में इसे भारत गणराज्य और यहां की निर्वाचन प्रणाली पर हमला कहकर साजिश के विरुद्ध कानूनी कार्यवाही की पैरवी करते तो शायद कुछ निरपेक्षता परिलक्षित होती। बहुत ही आश्चर्यजनक है कि सेना के डीजीएमओ द्वारा देश को जानकारी दिए जाने के बाद भी मीडिया और राजनीति का एक वर्ग सर्जिकल स्ट्राइक पर भरोसा करने को तैयार नहीं था। वही वर्ग आज एक संदिग्ध और कथित साइबर जानकार के एक-एक शब्द को शास्त्र की तरह पढ़-पढ़ा रहा है।

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वामपंथियों का वह पत्र जिसमें राजीव गाँधी हत्याकांड की पुनरावृत्ति करने की बात कही गयी है..

अनिल मिश्र।
षड्यंत्र के तहत किए गए किसी हमले का शिकार यदि प्रधानमंत्री मोदी होते हैं तो देश पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा? सभी जानते हैं कि भारत में कोहराम मच जाएगा और उसके बाद होने वाले आम चुनाव अनैतिहासिक मतदान और अद्वितीय ध्रुवीकरण की इबारत लिखेंगे। ऐसी स्थिति में नक्सली, माओवादी या अन्य चरमपंथी-देशद्रोही ताकतें भाजपा के विजय रथ को रोक सकें, यह कल्पना ही आधारहीन है। निश्चित रूप से पुणे पुलिस द्वारा माओवादी रोमा विल्सन के घर से बरामद पत्र की विवेचना और व्याख्या में कोई न कोई चूक जरूर हो रही है।
माओवादियों और नक्सलियों की साजिश को समझने के लिए हमें यह याद रखना होगा कि भारत में वामपंथ का जनाधार लगभग नगण्य है। देश में 90 फीसद लोकसभा और विधानसभा सीटों पर जमानत बचाना तो दूर, वामपंथी उम्मीदवार नोटा को मिले मतों से भी कम वोट प्राप्त करते हैं। इसलिए यह तो स्पष्ट है कि आगामी चुनावों में प्रधानमंत्री मोदी की अनुपस्थिति का लाभ वाम दलों को कतई नहीं मिलेगा। एक और महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि हिंसक-अहिंसक वामपंथी संगठनों के मूल में विचारधारा की अहमियत ज्यादा होती है और वह हिंसा या अहिंसक प्रयोजनों से अन्य संगठनों की विचारधारा पर ही हमला करते हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो घटना के प्राथमिक प्रभावों के अतिरिक्त वह द्वितीयक प्रभावों की अधिक फिक्र करते हैं। अर्बन नक्सल द्वारा विगत वर्षों में असहिष्णुता, ‘नॉट इन माई नेम’ और ‘बागों में बहार है’ जैसे नैरेटिव इसी दृष्टिकोण से गढ़े गए।
इसी प्रकार हिंसक माओवादी और नक्सल गिरोह हमेशा अशिक्षित और पिछड़े इलाकों में-जहां लोगों को बरगलाना आसान होता है-वहां अपनी जड़ें जमाकर हिंसक साजिशें रचते हैं। जबकि वह अपनी जघन्य हिंसाओं को भी छद्म पर गढ़ी हुई नक्सल बौद्धिकता के सहारे न्यायसंगत सिद्ध करने का कोई मौका नहीं चूकते। इसके लिए वह समाज में उपस्थित मतभेदों जैसे जातिगत, धार्मिक, क्षेत्रवाद एवं वर्ग विभेद को बुरी तरह नकारात्मकता से भर कर समूहों को उकसाते और भ्रमित करते हैं। इससे यह भी साफ हो जाता है कि दोनों ही प्रकार के वामपंथी संगठन व्यक्ति के बजाय व्यवस्था पर चोट करने वाली साजिशों को ही तरजीह देंगे। मतलब, मोदी की हत्या से यदि भाजपा का जनाधार समाप्त हो जाए तो नक्सली इसे तुरंत अंजाम देने में जुट जाएंगे।
लेकिन धरातल पर स्थिति इसके उलट है और नरेंद्र मोदी के जीवन पर पड़ने वाली किसी भी आंच से भाजपा नुकसान के बजाय लाभ की स्थिति में होगी। रोमा विल्सन के घर से मिले नक्सली पत्र में भी इसी की पुष्टि होती है। पत्र में सभी सदस्यों की तरफ भाजपा के बढ़ते कद पर चिंता जाहिर की गई है।
भाजपा की प्रचंड लहर को रोकने के लिए ‘राजीव गांधी हत्याकांड जैसी योजना’ का जिक्र है। मगर यह कहीं स्पष्ट नहीं होता कि इसका संबंध प्रधानमंत्री मोदी से है। तार्किक दृष्टि से विचारें तो भाजपा के रथ को रोकने के लिए किसकी बलि ली जा सकती है? वह, जिसकी हत्या से भावुक हुई जनता भाजपा के विरुद्ध वोट कर सके। या सहानुभूति स्वरूप मृत नेता की पार्टी के पक्ष में मतदान करे। राष्ट्रीय स्तर पर अभी भी सिर्फ काँग्रेस ही एकमात्र दल है, जो पूरे देश में चुनाव लड़ सकता है। भावनाओं को भुनाकर, उसे वोट बैंक में तब्दील करके काँग्रेस ही भाजपा को केंद्र में दुबारा सरकार बनाने से रोक सकती है। इस दृष्टिकोण से राहुल या सोनिया चरमपंथियों के निशाने पर सबसे पहले होंगे। इनके साथ किसी अनहोनी के घटित होने पर काँग्रेस पार्टी पूरे देश में लोगों की सहानुभूति बटोर सकती है।
एक और महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि राहुल या सोनिया गांधी पर होने वाले किसी भी हमले के लिए प्रथम दृष्टया हिंदूवादी संगठनों या संघ को निशाना बनाए जाने के कारण नक्सली सीधे तौर पर संदेह के घेरे में नहीं आएंगे। देश के एक बड़े वर्ग में हिंदूवादियों के लिए घृणा और गुस्से का माहौल तैयार होगा, जिससे भाजपा और मोदी के लगातार बढ़ रहे रथ को रोकना आसान हो सकेगा। गौरतलब है कि ऐसी किसी घटना की जांच पूरी होने और उस पर निर्णय आने तक लोकसभा चुनाव पूर्ण हो चुके होंगे। बाद में किसी को भी सजा हो, भाजपा के विजय रथ को रोकने का लेफ्ट चरमपंथियों का संकल्प तब तक पूरा हो चुका होगा।
विश्वासघात और षड्यंत्र की जिस विचारधारा से वाम चरमपंथी संगठन काम करते हैं, उसे दृष्टिगत रखते हुए यह अंदाजा कि वह सीधे मोदी को निशाना बनाने की कोशिश करेंगे, तर्कसंगत नहीं लगता। महाराष्ट्र एटीएस, आईबी और एनआईए को इस मामले की गहराई में जाकर तथ्यों को दुबारा जांचना चाहिए। अन्यथा नक्सलियों-माओवादियों द्वारा अंजाम दी गयी कोई कुटिल हिंसक वारदात पूरे देश का माहौल बिगाड़ सकती है। पत्र में वर्णित बातों की पुर्नव्याख्या और नए सिरे से विवेचना सुरक्षा व खुफिया एजेंसियों के लिए एक चुनौती है, जिस पर यथासंभव यथाशीघ्र काम शुरू होना चाहिए।

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इतिहास का अध्ययन एवं खोज इसलिए आवश्यक है क्योंकि अनुभव हमें भविष्य में गलतियां दोहराने से बचा सकता है। अनुभव के आधार पर ही ऐतिहासिक घटनाओं को सही और गलत ठहराया जाता है। यदि वर्तमान के अनुभव बताते हों कि इतिहास में किसी घटना या व्यवस्था को इसलिए गलत या आपराधिक समझा गया क्योंकि सिद्धांत ही अव्यवहारिक थे, तो ऐसे सिद्धांतों, नियमन को मिटा देना ही इतिहास से लिया गया सही सबक है। यह एक सतत प्रक्रिया है, जो हर देश-काल में अपनाई जाती है। भारत में भी राजशाही से जनतंत्र और लोकतंत्र से पारदर्शी एवं निरपेक्ष व्यवस्था की स्थापना के पथ पर भी बहुत से अनुभवजनित बदलाव मील के पत्थर की तरह टिके खड़े हैं। कार्यपालिका- व्यवस्थापिका, संविधान और चुनाव-सभी को इस सुधार से गुजरना पड़ता है। कभी भावी आवश्यकताओं के लिए तो कभी पुरानी त्रुटियों को दुरुस्त करने के लिए इस प्रकार के सुधार आवश्यक हो जाते हैं।

 
भारतीय लोकतंत्र ने 1975 से 77 के मध्य जिस संकट का सामना किया, जिस बलात अन्याय को सहा है, उसके निशान चार दशक बाद भी देश और हमारी व्यवस्थाओं में मौजूद हैं। सत्ता की लालसा ने लोकतंत्र के इस काले अध्याय में वह सब कुछ लिखा और मिटाया, जिससे सत्ता का अतिक्रमण न्यायोचित बताया जा सके। वह दौर संविधान में अतार्किक, अप्रामाणिक, अन्यायपूर्ण और ‘आपराधिक’ बदलावों का था।
 
इमरजेंसी के दिनों में ही चुनाव सुधारों के नाम पर आरएफसीए कानून में बदलाव कर ऐसी सभी संस्थाओं, उपक्रमों और कंपनियों को विदेशी करार कर दिया गया, जिनमें एक फीसद भी विदेशी निवेश शामिल था। जिनकी अपनी कोई शाखा या अनुषांगिक इकाई भारत से बाहर स्थापित थी। ऐसा सिर्फ इसलिए किया गया था क्योंकि तत्कालीन इंदिरा सरकार ने देश की समस्त सरकारी और निजी संस्थाओं पर एक प्रकार से कब्जा कर लिया था। उसे पता था कि भारत की कोई भी इकाई विपक्ष को चुनाव में खड़े होने के लिए आर्थिक मदद नहीं दे सकेगी। मगर, जानते-बूझते लोकतंत्र का गला घोंट रही इंदिरा को यह भी बखूबी मालूम था कि निरंकुश और स्वार्थी सरकार के विरुद्ध व्यापक असंतोष के परिणामस्वरूप अगणित भारतीय संस्थाएं विपक्ष की सहायता के लिए व्याकुल हैं और वह अपनी विदेशों में स्थित शाखाओं से विपक्ष की मदद जरूर करेंगी। असंतोष और जनाक्रोश पर जारी असंख्य असंवैधानिक निषेधों की श्रृंखला में एक और संविधान संशोधन किया गया। तत्कालीन ‘अमर्यादित’ सरकार ने आरएफसीए  कानून में बदलाव कर विदेशी चंदे की परिभाषा को अपने अनुरूप बना दिया, जिससे भारत की कोई भी शक्ति परोक्ष रूप से भी तत्कालीन अलोकतांत्रिक सरकार के विरुद्ध आवाज न उठा सके।
 
पिछले सप्ताह संसद ने आरएफसीए कानून की उस धारा को मिटा दिया। इसे लेकर देश की मीडिया में व्यापक विरोध भी देखने को मिला, जो लोकतांत्रिक देश में सचमुच आश्चर्यजनक है। देश भर की मीडिया बार-बार यही कहती देखी जा रही है कि भाजपा-कांग्रेस ने सुप्रीम कोर्ट से बचने के लिए इस कानून में गुपचुप संशोधन कर लिया और इस कानूनी बदलाव के परिणामस्वरूप अब 1976 से अभी तक के राजनीतिक चंदे की जांच नहीं कि जाएगी। सच तो यह है कि यह मीडिया का बहुत ही हास्यास्पद दृष्टिकोण है और इस प्रकार की अतार्किक, खोज और शोधरहित रिपोर्टिंग से आने वाले दिनों में पत्रकारिता की विवेकशक्ति पर गंभीर सवाल खड़े होंगे।
 
क्या वर्तमान सरकार ने 1976 से राजनीतिक दलों को मिले चंदे की जांच रोकने के लिए कोई विशिष्ट कानून बनाया है? नहीं ! पिछले सप्ताह एक धारा को रद्द किया गया है, जो आपातकाल के दौरान निजी लाभ के लिए खड़ी की गई थी। यदि यह सही नहीं है तो मीडिया देश को बताए कि आखिर चंदे की देशी-विदेशी के आधार पर जांच के लिए वर्ष 1976 को ही क्यों चुना गया? यह अवधि स्वातंत्रोपरांत 1947 से क्यों नहीं मानी गई? आरएफसीए कानून की गलत व्याख्या 1976 में की गई थी, जिसे एक पिछड़े-विकासशील देश ने चार दशक बाद दुरुस्त किया है।
 
चुनाव सुधारों को लेकर शुचिता और पारदर्शिता का रोना रोने वाले जनता को यह नहीं बता सके कि खतरनाक नकदी राजनीतिक चंदे को खत्म करने के लिए भी आरएफसीए कानून में संशोधन अनिवार्य हो गया था। चार दशक के बाद, आज देश की कंपनियां दुनिया भर में परचम लहरा रही हैं। उन कंपनियों के अपने हित, अधिकार और स्वतंत्रता है। किसी कंपनी में दो-चार-10 फीसद विदेशी निवेश होने या उसकी विदेश में शाखा-अनुषांगिक इकाई होने के कारण उसे लोकतंत्र के महापर्व से अलग किया जाना निश्चित तौर पर एक अन्याय है। किसी कंपनी या संस्था का विकास और उद्भव यदि उसे राष्ट्र की मुख्यधारा से अलग करता हो तो ऐसे कानून और व्यवस्था को एक विकासोन्मुख राष्ट्र के लिए किसी भी प्रकार से तार्किक और प्रोत्साहन देने वाला नहीं कहा जा सकता। न ही यह लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा करता है।
 
आरएफसीए कानून में संशोधन के अवसर पर देश की मीडिया को जिस सबसे महत्वपूर्ण तथ्य पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए था, अतार्किक विरोध की धुन में उसने उस तथ्य को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया। विदेशी चंदे की परिभाषा बदले जाने के उपरांत यह गंभीर प्रश्न भी खड़ा होता है कि 1976 में उक्त कानून के पास हो जाने के बाद से 2014 तक देश के राजनीतिक दलों ने इस प्रकार से प्राप्त धन को कैसे खपाया और दर्शाया होगा? यह स्वयं में एक बहुत बड़ा भ्रष्टाचार हो जाएगा, जिसमें भारत के राजनीतिक दलों के साथ ही असंख्य उद्योग, कारोबारी और संस्थाएं 1976 के उस काले कानून के कारण अपराधी की श्रेणी में खड़े हो जाएंगे। जबकि तथ्य यह है कि देश के चुनाव में यहाँ की कंपनियों और संस्थाओं का शामिल होना कोई अपराध नहीं है। यदि सच में कुछ गलत है तो वह इन संस्थाओं से चंदा लेकर उस धनराशि को बेनामी बताना है। आरएफसीए कानून में सुधार के माध्यम से केंद्र ने इस दिखावे और झूठ को खत्म कर दिया है।
 
नई व्यवस्था में बांड के माध्यम से चंदा देने वाले की पहचान उजागर नहीं होने बावजूद दानकर्ता की बैलेंसशीट में वह राशि स्पष्ट दिखाई देगी। सबसे महत्वपूर्ण यह है कि बैंकिंग बांड के लिए दानकर्ता को केवाईसी की जिम्मेदारी पूरी करनी होगी। मतलब दानकर्ता की जांच धनराशि अदा करते समय ही हो जाएगी। साथ ही उक्त राशि का भारतीय होना भी मौके पर ही सुनिश्चित हो जाएगा। राजनीतिक दल अब सिर्फ अपने आधिकारिक बैंक खातों के माध्यम से ही बैंकिंग बांड और चेक से चंदे का लाभ ले सकेंगे, जिसका अर्थ हुआ की छोटी-छोटी राशि की फर्जी रसीदों के माध्यम से राजनीति में अनैतिक धन की आमद का सिलसिला काफी हद तक कम हो जाएगा। हालांकि हर व्यवस्था में एक चूक भी छिपी होती है और इसी कारण इन सुधारों में भी आगे कई संशोधन देखने को मिलेंगे।
 
मीडिया ने संसद में आरएफसीए कानून में संशोधन के दौरान बिल के विरोध की अनुपस्थिति को बार-बार रेखांकित किया मगर कहीं भी इसकी पड़ताल नहीं कि गई कि बजट में ₹ 2000 से अधिक राशि के लिए डिजिटल लेनदेन अनिवार्य किए जाने के कारण देश भर की पार्टियां फर्जी रसीद काटने की आदत से निजात को उचित मान कर चुप रहीं। जबकि आपातकाल के काले अध्याय को लिखने वाली कांग्रेस के लिए इस बिल का विरोध करना लोकतंत्र के उस भयावह दौर को पुनः स्मृत कराने जैसा था। संसद में चुप्पी साधने के बाद बाहर वोटबैंक की राजनीति के लिए जनता को गुमराह करने वाला विरोध कुछ दलों ने किया- जिसे नवोदित मीडिया से बहुत सहानुभूति भी मिली-मगर ऐसी पार्टियों के प्रवक्ता भी सार्वजनिक मंच पर संसद में अपनी चुप्पी के लिए तार्किक उत्तर नहीं दे पाने के कारण जन का विश्वास नहीं जीत सके। सिर्फ अव्यवहारिक सिद्धांतों वाले वामदलों ने ही संसद में बिल का विरोध किया, जो स्वयं एक दौर में चीन से पेंशन लेने के लिए बदनाम रहे हैं! यह मामला संसद तक में उठ चुका है। दुर्भाग्यवश उस दौर की सरकारों ने इस गंभीर वित्तीय नियमितता की जांच नहीं कराई, जो लोकतंत्र के लिए किसी दुर्भाग्य से कम नहीं है।
 
भारतीय जनप्रतिनिधि कानून में पारदर्शिता और शुचिता के लिए आरएफसीए बिल में संशोधन एक महत्वपूर्ण निर्णय है, जो मीडिया की एकतरफा रिपोर्टिंग के कारण जनमानस तक सही अर्थों में नहीं पहुंच सका। भविष्य के शोध और अनुभव निश्चित तौर पर आज के दौर की मीडिया को इसके लिए दोषी ठहराएंगे। अगली पीढ़ी का भारत और शोधार्थी मीडिया की इस पूर्वाग्रही रिपोर्टिंग को यदि उसे अविवेकी करार दे तो इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं होगी। और, यदि एफडीआई को चुनावों से दूर ही रखना है तो चुनाव आयोग देश की मीडिया को इसमें कोई छूट क्यों दे? इस आधार पर भारत के वह सभी समाचार पत्र और न्यूज चैनल भी चुनाव प्रक्रिया से अलग कर दिए जाने चाहिए, जिनमें एक फीसद भी विदेशी निवेश शामिल है।
♦ अनिल मिश्र ‘कामिल’
नवीन समाचार
‘नवीन समाचार’ विश्व प्रसिद्ध पर्यटन नगरी नैनीताल से ‘मन कही’ के रूप में जनवरी 2010 से इंटरननेट-वेब मीडिया पर सक्रिय, उत्तराखंड का सबसे पुराना ऑनलाइन पत्रकारिता में सक्रिय समूह है। यह उत्तराखंड शासन से मान्यता प्राप्त, अलेक्सा रैंकिंग के अनुसार उत्तराखंड के समाचार पोर्टलों में अग्रणी, गूगल सर्च पर उत्तराखंड के सर्वश्रेष्ठ, भरोसेमंद समाचार पोर्टल के रूप में अग्रणी, समाचारों को नवीन दृष्टिकोण से प्रस्तुत करने वाला ऑनलाइन समाचार पोर्टल भी है।
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