कच्चे तेल से कितनी गैस, पेट्रोल और डीजल बनता है? समझिए भारत में तेल उत्पादन, आयात, उत्पादन व एथेनॉल मिश्रण की पूरी कहानी

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नवीन समाचार, नई दिल्ली, 14 मार्च 2026 (Complete story of Oil Production)। इन दिनों चर्चा में चल रहे ऊर्जा क्षेत्र (Energy Sector) से जुड़े एक महत्वपूर्ण विषय पर हम आपके लिए पूरी जानकारी लेकर आए हैं। अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों और गैस आपूर्ति को लेकर चर्चा के बीच लोगों के मन में यह प्रश्न उठ रहा है कि रिफाइनरी (Oil Refinery) में जब 100 लीटर कच्चा तेल (Crude Oil) पहुंचता है तो उससे वास्तव में कितनी रसोई गैस (LPG), पेट्रोल (Petrol) और डीजल (Diesel) निकलता है। विशेषज्ञों के अनुसार कच्चे तेल से केवल पेट्रोल या डीजल ही नहीं, बल्कि कई प्रकार के पेट्रोलियम उत्पाद (Petroleum Products) तैयार होते हैं, जिनका उपयोग परिवहन, ऊर्जा, उद्योग और निर्माण क्षेत्रों में किया जाता है।

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100 लीटर कच्चे तेल से क्या-क्या निकलता है

(Complete Story Of Oil Production) 100 लीटर कच्चे तेल को प्रोसेस करके कितनी गैस, पेट्रोल और डीजल निकलता है? और क्या  बनता है इससे? - News18 हिंदीपेट्रोलियम योजना एवं विश्लेषण प्रकोष्ठ (Petroleum Planning and Analysis Cell – PPAC) के औसत आंकड़ों के अनुसार जब 100 लीटर कच्चे तेल को रिफाइनरी में प्रसंस्कृत किया जाता है, तो उससे लगभग निम्न उत्पाद प्राप्त होते हैं—

  • पेट्रोल (Petrol) : लगभग 45 से 50 लीटर

  • डीजल (Diesel) : लगभग 25 से 30 लीटर

  • रसोई गैस (Liquefied Petroleum Gas – LPG) : लगभग 2 से 4 लीटर

  • जेट ईंधन (Aviation Turbine Fuel – ATF) : लगभग 8 से 10 लीटर

  • बिटुमेन या डामर (Bitumen) : लगभग 3 से 5 लीटर

  • अन्य पेट्रोकेमिकल उत्पाद (Petrochemicals) : लगभग 10 से 15 लीटर

यही कारण है कि 100 लीटर कच्चे तेल से बहुत कम मात्रा में एलपीजी गैस बनती है। भारत की गैस आवश्यकता को पूरा करने के लिए केवल कच्चे तेल पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं होता, इसलिए देश को अलग से तरलीकृत प्राकृतिक गैस (Liquefied Natural Gas – LNG) भी आयात करनी पड़ती है।

जब देश में ही तेल निकलता है तो फिर विदेशों से क्रूड क्यों मंगाता है भारत?

भारत के नक्शे पर नज़र डालें तो असम के डिगबोई से लेकर मुंबई के समुद्री क्षेत्र मुंबई हाई और गुजरात के तटीय इलाकों तक कई जगह तेल के भंडार मौजूद हैं। ऐसे में आम लोगों के मन में यह सवाल अक्सर उठता है कि जब देश के भीतर ही तेल के स्रोत हैं, तो फिर भारत को अरब देशों या रूस जैसे देशों से कच्चा तेल क्यों खरीदना पड़ता है?

असलियत यह है कि भारत अपनी जरूरत का लगभग 85 प्रतिशत कच्चा तेल विदेशों से आयात करता है। आखिर ऐसा क्यों है? क्या देश के तेल के कुएँ सूख रहे हैं या इसके पीछे कोई और वजह है? आइए इसे सरल भाषा में समझते हैं।

घरेलू उत्पादन और बढ़ती मांग के बीच बड़ा अंतर

भारत में कच्चे तेल का उत्पादन कई दशकों से हो रहा है, लेकिन समस्या यह है कि देश में तेल की मांग उत्पादन से कहीं ज्यादा तेज़ी से बढ़ रही है। आज भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल उपभोक्ता देश बन चुका है। देश की रिफाइनरियों को चलाने और परिवहन व्यवस्था को बनाए रखने के लिए रोज़ बड़ी मात्रा में कच्चे तेल की जरूरत होती है।

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देश में जमीन और समुद्र से जो तेल निकलता है, वह कुल खपत का करीब 15–20 प्रतिशत ही पूरा कर पाता है। इसलिए बाकी 80–85 प्रतिशत जरूरतें पूरी करने के लिए भारत को अंतरराष्ट्रीय बाजार से तेल खरीदना पड़ता है

नए भंडारों की खोज और सीमित संसाधन

ऐसा नहीं है कि भारत में नए तेल भंडार खोजने की कोशिशें नहीं हो रही हैं। सरकारी कंपनियां ओएनजीसी (ONGC) और ऑयल इंडिया लगातार नए क्षेत्रों में खोज और ड्रिलिंग का काम कर रही हैं। लेकिन तेल की खोज एक महंगी और अनिश्चित प्रक्रिया है।

कई पुराने तेल क्षेत्र, जैसे मुंबई हाई, अब परिपक्व अवस्था में पहुंच चुके हैं। ऐसे क्षेत्रों में तेल निकालना पहले की तुलना में कठिन और महंगा होता जा रहा है, जिससे उत्पादन धीरे-धीरे कम हो रहा है। इसके विपरीत, सऊदी अरब, इराक जैसे देशों में तेल अपेक्षाकृत आसानी से और कम लागत में निकल जाता है।

तेल की गुणवत्ता और रिफाइनरी की जरूरत

हर देश से निकलने वाला कच्चा तेल एक जैसा नहीं होता। कुछ तेल कम सल्फर वाले होते हैं, जिन्हें “स्वीट ऑयल” कहा जाता है, जबकि कुछ में सल्फर की मात्रा अधिक होती है।

भारत की आधुनिक रिफाइनरियां, जो BS-VI मानक का पेट्रोल और डीजल तैयार करती हैं, उन्हें अलग-अलग ग्रेड के तेल का मिश्रण चाहिए होता है। कई बार घरेलू तेल की गुणवत्ता उस स्तर की नहीं होती जो उच्च गुणवत्ता के ईंधन के लिए जरूरी है। इसलिए रिफाइनरियां अपनी क्षमता का पूरा उपयोग करने के लिए विदेशों से अलग-अलग किस्म का कच्चा तेल आयात करती हैं।

आर्थिक कारण और वैश्विक तेल व्यापार

कभी-कभी विदेश से तेल खरीदना आर्थिक रूप से भी फायदेमंद साबित होता है। उदाहरण के तौर पर, रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान भारत को रूस से कच्चा तेल काफी रियायती कीमतों पर मिला। जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल सस्ता मिलता है, तो उसे आयात करना देश की अर्थव्यवस्था के लिए बेहतर हो सकता है।

इसके अलावा, ऊर्जा सुरक्षा बनाए रखने और खाड़ी देशों के साथ आर्थिक संबंध मजबूत रखने के लिए भी भारत वैश्विक तेल व्यापार का हिस्सा बना रहता है।

कच्चे तेल को रिफाइन करने की प्रक्रिया कैसे होती है

कच्चे तेल के जहाज सामान्यतः रूस (Russia), कतर (Qatar), संयुक्त अरब अमीरात (UAE) या अन्य देशों से भारत के बंदरगाहों जैसे जामनगर (Jamnagar) या वाडिनार (Vadinar) तक पहुंचते हैं। इसके बाद रिफाइनरी तक पहुंचने और तैयार ईंधन बनने की प्रक्रिया कई चरणों में पूरी होती है।

1. जहाज से उतारना और पाइपलाइन से भेजना

सबसे पहले कच्चे तेल को जहाज से उतारकर पाइपलाइन (Pipeline) के माध्यम से रिफाइनरी तक पहुंचाया जाता है। इस प्रक्रिया में सामान्यतः एक से दो दिन का समय लग सकता है।

2. आसवन प्रक्रिया (Distillation Process)

रिफाइनरी में कच्चे तेल को बड़े टावरों में अत्यधिक तापमान पर गर्म किया जाता है। इस प्रक्रिया को अंश आसवन (Fractional Distillation) कहा जाता है। अलग-अलग तापमान पर अलग-अलग उत्पाद निकलते हैं। हल्की गैसें ऊपर की ओर और भारी उत्पाद जैसे बिटुमेन नीचे की ओर अलग हो जाते हैं। यह प्रक्रिया लगभग 12 से 24 घंटे में पूरी हो जाती है।

3. गुणवत्ता परीक्षण और आपूर्ति

उत्पाद तैयार होने के बाद उनकी गुणवत्ता की जांच की जाती है। इसके बाद पेट्रोल, डीजल और अन्य उत्पादों को रेलगाड़ियों (Rail Tankers) और सड़क टैंकरों के माध्यम से विभिन्न ईंधन भंडार केंद्रों और पेट्रोल पंपों तक भेजा जाता है। इस पूरी आपूर्ति श्रृंखला में सामान्यतः 5 से 15 दिन का समय लग सकता है।

गैस की कमी क्यों दिखाई देती है

ऊर्जा विशेषज्ञ बताते हैं कि कच्चे तेल से गैस की मात्रा बहुत कम निकलती है। इसी कारण भारत अपनी कुल एलपीजी आवश्यकता का बड़ा हिस्सा आयात करता है।

हाल के समय में खाड़ी क्षेत्र (Gulf Region) में भू-राजनीतिक तनाव के कारण कुछ गैस टैंकरों की आवाजाही प्रभावित हुई है, जिससे कई शहरों में वाणिज्यिक एलपीजी सिलेंडरों की आपूर्ति सीमित करनी पड़ी है। हालांकि घरेलू उपभोक्ताओं की रसोई गैस आपूर्ति को प्राथमिकता दी जा रही है।

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सरकार का क्या कहना है

केंद्रीय पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्री हरदीप सिंह पुरी (Hardeep Singh Puri) ने कहा है कि भारत की ऊर्जा सुरक्षा व्यवस्था मजबूत है और पेट्रोल-डीजल की उपलब्धता में किसी प्रकार की कमी नहीं होने दी जाएगी।

उन्होंने बताया कि आपूर्ति श्रृंखला में कुछ बदलाव अवश्य हुए हैं, लेकिन देश में ईंधन भंडार और आयात व्यवस्था पर्याप्त है।

भारत के पास कितना रणनीतिक भंडार है

भारतीय सामरिक पेट्रोलियम भंडार लिमिटेड (Indian Strategic Petroleum Reserves Limited – ISPRL) के अनुसार भारत के पास विशाखापत्तनम (Visakhapatnam) और कर्नाटक (Karnataka) सहित कई स्थानों पर भूमिगत भंडारण केंद्रों में इतना कच्चा तेल सुरक्षित है कि आपूर्ति बाधित होने की स्थिति में भी देश लगभग 6 से 8 सप्ताह तक अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं को पूरा कर सकता है।

भविष्य की तैयारी और रणनीतिक तेल भंडार

भारत पूरी तरह आयात पर निर्भर रहने के जोखिम को समझता है। इसलिए सरकार ने स्ट्रैटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व बनाने की योजना शुरू की है। इसके तहत विशाखापत्तनम, मंगलुरु जैसी जगहों पर भूमिगत टैंकों में आपातकालीन तेल भंडार तैयार किए गए हैं, ताकि युद्ध या सप्लाई बाधित होने की स्थिति में देश को ऊर्जा संकट का सामना न करना पड़े।

साथ ही सरकार इथेनॉल मिश्रण, जैव ईंधन और इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा दे रही है ताकि भविष्य में कच्चे तेल पर निर्भरता कम की जा सके।

कुल मिलाकर, भारत में तेल के भंडार होने के बावजूद घरेलू उत्पादन कम और खपत बहुत ज्यादा होने के कारण देश को बड़ी मात्रा में कच्चा तेल विदेशों से मंगाना पड़ता है। जब तक वैकल्पिक ऊर्जा स्रोत पूरी तरह विकसित नहीं हो जाते, तब तक विदेशी तेल भारत की ऊर्जा जरूरतों का अहम हिस्सा बना रहेगा।

अभी कहां-कहां से आयात हो रहा है तेल

हालिया ऊर्जा व्यापार आंकड़ों के अनुसार वर्तमान समय में रूस भारत का सबसे बड़ा कच्चा तेल आपूर्तिकर्ता बन गया है और वहां से प्रतिदिन लगभग 15 लाख बैरल तेल भारत पहुंच रहा है। इसके अलावा अमेरिका (United States) और ब्राजील (Brazil) से भी तेल आयात किया जा रहा है ताकि भारत केवल एक मार्ग जैसे होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) पर निर्भर न रहे।

ऊर्जा विशेषज्ञों का कहना है कि कच्चे तेल से मिलने वाले विभिन्न उत्पादों और आपूर्ति श्रृंखला को समझने से यह स्पष्ट हो जाता है कि गैस, पेट्रोल और डीजल की उपलब्धता कई अंतरराष्ट्रीय और तकनीकी कारकों पर निर्भर करती है।

पेट्रोल में एथेनॉल मिश्रण क्या है, इसके फायदे और नुकसान क्या हैं? समझिए भारत की ईंधन नीति

भारत सरकार (Government of India) पेट्रोल में एथेनॉल मिश्रण (Ethanol Blending in Petrol) की नीति को तेजी से आगे बढ़ा रही है। इसका उद्देश्य कच्चे तेल (Crude Oil) पर निर्भरता कम करना, किसानों (Farmers) की आय बढ़ाना और प्रदूषण कम करना है। वर्तमान में देश में ईंधन विपणन कंपनियां (Oil Marketing Companies – OMCs) पेट्रोल में लगभग 20 प्रतिशत तक एथेनॉल मिलाने की दिशा में काम कर रही हैं, जिसे एथेनॉल मिश्रण कार्यक्रम (Ethanol Blending Program – EBP) कहा जाता है।

एथेनॉल क्या है और यह कैसे बनता है

एथेनॉल (Ethanol) एक प्रकार का जैव ईंधन (Biofuel) है, जो मुख्यतः गन्ना (Sugarcane), मक्का (Maize), शीरा (Molasses) और अन्य कृषि उत्पादों से बनाया जाता है। यह अल्कोहल आधारित ईंधन है जिसे पेट्रोल के साथ मिलाकर वाहनों में उपयोग किया जाता है।

भारत में पेट्रोल में एथेनॉल मिलाने का मुख्य उद्देश्य आयातित पेट्रोलियम (Imported Petroleum) पर निर्भरता को कम करना और जैव ईंधन आधारित ऊर्जा व्यवस्था को बढ़ावा देना है।

भारत में एथेनॉल मिश्रण नीति क्या है

भारत सरकार ने वर्ष 2025 तक पेट्रोल में 20 प्रतिशत एथेनॉल मिश्रण (E20 Fuel) का लक्ष्य निर्धारित किया है। इससे पहले देश में E10 (10 प्रतिशत मिश्रण) और E12–E15 जैसे चरण लागू किए जा चुके हैं।

सरकार के अनुसार इस नीति से भारत को अरबों डॉलर की विदेशी मुद्रा बचत और कृषि क्षेत्र को अतिरिक्त आय प्राप्त होने की संभावना है।

एथेनॉल मिश्रण के प्रमुख लाभ

1. कच्चे तेल के आयात में कमी

भारत अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं का बड़ा हिस्सा आयातित कच्चे तेल से पूरा करता है। एथेनॉल मिश्रण से पेट्रोल की खपत कम होती है और विदेशी तेल पर निर्भरता घटती है।

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2. किसानों की आय में वृद्धि

एथेनॉल उत्पादन के लिए गन्ना, मक्का और अन्य कृषि उत्पादों की मांग बढ़ती है। इससे किसानों को अतिरिक्त बाजार मिलता है और उनकी आय बढ़ने की संभावना रहती है।

3. पर्यावरण प्रदूषण में कमी

एथेनॉल मिश्रित ईंधन के उपयोग से कार्बन मोनोऑक्साइड (Carbon Monoxide) और अन्य हानिकारक गैसों का उत्सर्जन कम हो सकता है। इसे अपेक्षाकृत स्वच्छ ईंधन माना जाता है।

4. ग्रामीण अर्थव्यवस्था को लाभ

एथेनॉल उत्पादन इकाइयों की स्थापना से ग्रामीण क्षेत्रों में उद्योग और रोजगार के अवसर बढ़ सकते हैं।

एथेनॉल मिश्रण के संभावित नुकसान

1. ईंधन की ऊर्जा क्षमता कम

एथेनॉल की ऊर्जा घनत्व (Energy Density) पेट्रोल की तुलना में कम होती है। इसलिए अधिक मिश्रण वाले ईंधन से कुछ वाहनों की माइलेज में थोड़ी कमी देखी जा सकती है।

2. पुराने वाहनों पर प्रभाव

कुछ पुराने वाहन या इंजन उच्च एथेनॉल मिश्रण के लिए डिज़ाइन नहीं किए गए होते। ऐसे वाहनों में इंजन के हिस्सों पर प्रभाव पड़ने की आशंका रहती है।

3. कृषि संसाधनों पर दबाव

यदि एथेनॉल उत्पादन के लिए खाद्यान्न या कृषि भूमि का अधिक उपयोग होता है, तो इससे खाद्य सुरक्षा और कृषि संसाधनों पर दबाव बढ़ सकता है।

4. ईंधन वितरण और इंजन तकनीक की चुनौती

उच्च एथेनॉल मिश्रण वाले ईंधन के लिए विशेष इंजन तकनीक (Flexible Fuel Engine) और वितरण प्रणाली की आवश्यकता होती है।

डीजल में एथेनॉल क्यों नहीं मिलाया जाता

विशेषज्ञ बताते हैं कि एथेनॉल मुख्यतः पेट्रोल आधारित इंजनों के लिए उपयुक्त होता है। डीजल इंजनों में इसकी रासायनिक प्रकृति और दहन प्रक्रिया अलग होने के कारण एथेनॉल का व्यापक मिश्रण तकनीकी रूप से संभव नहीं है।

हालांकि भविष्य में जैव-डीजल (Biodiesel) जैसे विकल्पों पर अनुसंधान जारी है।

आगे क्या हो सकता है

ऊर्जा विशेषज्ञों के अनुसार एथेनॉल मिश्रण कार्यक्रम भारत की ऊर्जा सुरक्षा रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है। यदि वाहन निर्माता कंपनियां एथेनॉल अनुकूल इंजन विकसित करती हैं और उत्पादन संतुलित रहता है, तो यह नीति दीर्घकाल में ऊर्जा आयात घटाने और पर्यावरण संरक्षण में सहायक हो सकती है।

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