नवीन समाचार, नैनीताल, 14 मई 2026 (UK High Court News 14 May 2026)। उत्तराखंड (Uttarakhand) उच्च न्यायालय (High Court) ने सरकारी विभागों में वर्षों से कार्यरत उपनल (UPNL) संविदा कर्मियों के नियमितीकरण, चयनित वेतनमान और वेतन से जीएसटी कटौती के मामलों में राज्य सरकार के रवैये पर कड़ा रुख अपनाया है। न्यायालय ने स्पष्ट कहा कि पूर्व में दिए गए आदेशों का अब तक अनुपालन न होना प्रथम दृष्टया न्यायालय की अवमानना प्रतीत होता है।
साथ ही संबंधित अधिकारियों के विरुद्ध चार्ज फ्रेम करने पर भी सवाल उठाए गये हैं। दूसरी ओर पिटकुल (PITCUL) में निदेशक पद की भर्ती प्रक्रिया और चंपावत (Champawat) के बनबसा (Banbasa) क्षेत्र में वन भूमि अतिक्रमण से जुड़े मामलों में भी उच्च न्यायालय ने महत्वपूर्ण निर्देश जारी किये हैं।
उपनल कर्मियों के मामले में सरकार से मांगा जवाब
न्यायमूर्ति राजेश थपलियाल (Rajesh Thapliyal) की एकलपीठ में उपनल संविदा कर्मचारियों के नियमितीकरण और चयनित वेतनमान न दिये जाने से संबंधित अवमानना याचिका पर सुनवाई हुई। याचिका में आरोप लगाया गया है कि उच्च न्यायालय के पूर्व आदेशों के बावजूद राज्य सरकार ने अब तक नियमितीकरण और वेतनमान से जुड़े निर्देशों का पालन नहीं किया है। साथ ही कर्मचारियों के वेतन से जीएसटी कटौती जारी रखी जा रही है।
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से न्यायालय को बताया गया कि सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) के निर्णय को मंत्रिमंडल के समक्ष रखा गया है और निर्णय के लिए अतिरिक्त समय की आवश्यकता है। इस पर न्यायालय ने कहा कि समय देने का प्रश्न अलग है, लेकिन पूर्व आदेशों का अनुपालन अब तक क्यों नहीं हुआ, यह गंभीर विषय है।
अधिकारियों के खिलाफ चार्ज फ्रेम करने के संकेत
न्यायालय ने पूछा कि आदेशों की अवहेलना करने वाले अधिकारियों के विरुद्ध चार्ज फ्रेम क्यों न किया जाए। कोर्ट ने राज्य सरकार से 19 मई तक स्पष्ट रूप से बताने को कहा है कि न्यायालय के आदेशों का पालन क्यों नहीं हो रहा है। वहीं शासकीय अधिवक्ता ने जवाब दाखिल करने के लिए दो दिन का समय मांगा।
सुनवाई के दौरान शासन की ओर से प्रस्तुत एक नए अनुबंध पर भी न्यायालय ने नाराजगी जतायी। कोर्ट ने प्रथम दृष्टया माना कि यह अनुबंध पूर्व आदेशों के विपरीत प्रतीत होता है। न्यायालय ने यह भी पूछा कि जब न्यूनतम वेतनमान और जीएसटी कटौती रोकने के स्पष्ट निर्देश पहले से मौजूद हैं, तो नए अनुबंध की आवश्यकता क्यों पड़ रही है।
संविदा कर्मचारी संघ की ओर से अधिवक्ताओं ने कहा कि पूर्व में खंडपीठ ने नियमितीकरण के संबंध में आदेश पारित किया था, लेकिन उस पर अब तक कोई निर्णय नहीं लिया गया। संघ ने मामले की प्राथमिकता के आधार पर सुनवाई की मांग भी की।
पिटकुल भर्ती नियमों पर भी हाईकोर्ट के गंभीर सवाल
इधर पिटकुल में निदेशक पद की भर्ती प्रक्रिया से जुड़े संशोधित सेवा नियमों को लेकर भी उच्च न्यायालय ने गंभीर प्रश्न उठाए हैं। मुख्य न्यायाधीश मनोज कुमार गुप्ता (Manoj Kumar Gupta) और न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय (Subhash Upadhyay) की खंडपीठ ने ऊर्जा विभाग के प्रमुख सचिव को व्यक्तिगत शपथपत्र दाखिल कर स्थिति स्पष्ट करने के निर्देश दिए हैं।
मामला अनुपम सिंह (Anupam Singh) बनाम प्रमुख सचिव ऊर्जा विभाग से संबंधित है। याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया कि संशोधित नियमों के अनुसार निदेशक पद के लिए वही अधिकारी पात्र होगा जिसने बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स में चीफ इंजीनियर या जनरल मैनेजर स्तर पर कार्य किया हो, जबकि पिटकुल में ऐसा पद अस्तित्व में ही नहीं है।
नई भर्ती प्रक्रिया पर रोक के निर्देश
सुनवाई में यह भी उल्लेख किया गया कि राज्य सरकार पूर्व में स्वीकार कर चुकी है कि नियमों में त्रुटि रह गयी है और उसे सुधारने की प्रक्रिया जारी है। इस पर खंडपीठ ने सरकार से पूछा कि अब तक सुधार के लिए क्या कदम उठाये गये हैं। साथ ही निर्देश दिया गया कि जब तक त्रुटि दूर नहीं हो जाती, तब तक निदेशक पद के लिए कोई नया विज्ञापन जारी न किया जाए। मामले की अगली सुनवाई 25 मई को होगी।
बनबसा वन भूमि अतिक्रमण मामले में छह सप्ताह में रिपोर्ट मांगी
उधर चंपावत जिले के बनबसा क्षेत्र में वन विभाग की भूमि पर कथित अतिक्रमण से जुड़े जनहित याचिका मामले में भी उच्च न्यायालय में सुनवाई हुई। मुख्य न्यायाधीश मनोज कुमार गुप्ता और न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की खंडपीठ ने उत्तर प्रदेश सिंचाई विभाग के सचिव को निर्देश दिया कि अतिक्रमण से जुड़े मामलों की पुनः सुनवाई कर छह सप्ताह के भीतर रिपोर्ट न्यायालय में प्रस्तुत की जाए।
न्यायालय ने मामले की अगली सुनवाई छह सप्ताह बाद निर्धारित की है। यह मामला वन भूमि संरक्षण और सीमा क्षेत्रों में प्रशासनिक समन्वय से जुड़ा महत्वपूर्ण विषय माना जा रहा है।
उच्च न्यायालय की इन टिप्पणियों और निर्देशों ने एक बार फिर यह स्पष्ट किया है कि न्यायालय सरकारी आदेशों के अनुपालन, कर्मचारियों के अधिकारों और प्रशासनिक पारदर्शिता को लेकर सख्त रुख अपनाए हुए है। आने वाले दिनों में इन मामलों का असर राज्य की प्रशासनिक और विधिक व्यवस्था पर भी दिखाई दे सकता है।
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डॉ.नवीन जोशी, पिछले 20 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय, ‘कुमाऊँ विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में पीएचडी की डिग्री प्राप्त पहले और वर्ष 2015 से उत्तराखंड सरकार से मान्यता प्राप्त पत्रकार हैं। 15 लाख से अधिक नए उपयोक्ताओं के द्वारा 150 मिलियन यानी 1.5 करोड़ से अधिक बार पढी गई आपकी अपनी पसंदीदा व भरोसेमंद समाचार वेबसाइट ‘नवीन समाचार’ के संपादक हैं, साथ ही राष्ट्रीय सहारा, हिन्दुस्थान समाचार आदि समाचार पत्र एवं समाचार एजेंसियों से भी जुड़े हैं। देश के पत्रकारों के सबसे बड़े संगठन ‘नेशनल यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट्स (इंडिया) उत्तराखंड’ के उत्तराखंड प्रदेश के प्रदेश महामंत्री भी हैं और उत्तराखंड के मान्यता प्राप्त राज्य आंदोलनकारी भी हैं। डॉ. जोशी के बारे में विस्तार से पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।
नवीन समाचार’ विश्व प्रसिद्ध पर्यटन नगरी नैनीताल से जून 2009 से इंटरननेट-वेब मीडिया पर सक्रिय, उत्तराखंड का सबसे पुराना ऑनलाइन पत्रकारिता में सक्रिय समूह है। यह उत्तराखंड शासन से मान्यता प्राप्त रहा, अलेक्सा रैंकिंग के अनुसार उत्तराखंड के समाचार पोर्टलों में अग्रणी, गूगल सर्च पर उत्तराखंड के सर्वश्रेष्ठ, भरोसेमंद समाचार पोर्टल के रूप में अग्रणी, समाचारों को नवीन दृष्टिकोण से प्रस्तुत करने वाला ऑनलाइन समाचार पोर्टल भी है।
