मारपीट के आरोपित आयुष बोरा की जमानत अर्जी खारिज
नवीन समाचार, नैनीताल, 30 सितंबर 2026 (Nainital-UK Court News 30 Sept 2026)। जिला एवं सत्र न्यायाधीश प्रशांत जोशी की अदालत ने भीमताल क्षेत्र में मारपीट और जानलेवा हमला करने के आरोपित आयुष बोरा की जमानत अर्जी खारिज कर दी। अभियोजन की ओर से जिला शासकीय अधिवक्ता फौजदारी सुशील कुमार शर्मा ने जमानत का विरोध करते हुए घटना, घायलों की स्थिति और चिकित्सकीय रिपोर्ट को अदालत के समक्ष रखा।
अभियोजन के अनुसार छह जुलाई 2026 की रात भीमताल क्षेत्र में एक रेस्टोरेंट के पास आयुष बोरा, राहुल रावत, गौरव रौतेला, अजय कुल्याल, गौरव कुल्याल सहित अन्य लोगों द्वारा शिकायतकर्ता हिमांशु रैक्वाल और उसके साथियों के साथ मारपीट की गई। आरोप है कि शराब पीने को लेकर हुए विवाद के बाद आरोपितों ने गाली-गलौज करते हुए मारपीट की। शिकायतकर्ता के छोटे भाई राहुल रैक्वाल ने बीच-बचाव का प्रयास किया तो उसके साथ भी मारपीट की गई। आरोपितों पर शिकायतकर्ता के सिर पर लोहे की रॉड से वार करने का भी आरोप है।
घटना के बाद शिकायतकर्ता के मामा दीपक किरौला और उनके मित्र मौके पर पहुंचे। आरोप है कि उनके साथ भी लाठी-डंडों से मारपीट की गई। बाद में भीमताल क्षेत्र में फिर विवाद हुआ और शिकायतकर्ता तथा उसके परिजनों के साथ मारपीट किए जाने का आरोप है। घायल को भीमताल सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र ले जाया गया, जहां प्राथमिक उपचार के बाद चिकित्सकों ने उसे उच्च चिकित्सा केंद्र के लिए भेजा। बाद में कृष्णा अस्पताल और दिल्ली के मैक्स अस्पताल में उसका उपचार कराया गया।
जिला शासकीय अधिवक्ता ने अदालत को बताया कि चिकित्सकीय रिपोर्ट में घायल रमेश किरौला के सिर में फ्रैक्चर सहित अन्य चोटें पाई गई हैं और चिकित्सकों के अनुसार चोटें गंभीर एवं जानलेवा प्रकृति की हैं। दोनों पक्षों की बहस और उपलब्ध चिकित्सकीय रिपोर्ट का अवलोकन करने के बाद जिला एवं सत्र न्यायाधीश प्रशांत जोशी ने आरोपित आयुष बोरा की जमानत प्रार्थना पत्र निरस्त कर दिया।
बाहर से उत्तराखंड लाकर कृषि उत्पादों से विनिर्माण करने पर विकास सेस की वसूली असंवैधानिक, हाईकोर्ट का महत्वपूर्ण फैसला
उत्तराखंड उच्च न्यायालय (Uttarakhand High Court) के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति मनोज कुमार गुप्ता (Justice Manoj Kumar Gupta) और न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय (Justice Subhash Upadhyay) की खंडपीठ ने कृषि उत्पादों पर विकास सेस (Development Cess) की वसूली को लेकर महत्वपूर्ण फैसला दिया है।
न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यदि कृषि उत्पाद उत्तराखंड के बाहर से केवल विनिर्माण (Manufacturing) या प्रसंस्करण (Processing) के लिए राज्य के किसी बाजार क्षेत्र (Market Area) में लाया जाता है और वहां उसकी कोई बिक्री या खरीद नहीं होती तो केवल इस आधार पर विकास सेस नहीं लगाया जा सकता।
मामला उत्तराखंड में स्थापित विभिन्न विनिर्माण इकाइयों से जुड़ा था। ये इकाइयां धान, गेहूं, मक्का, दालें और लकड़ी आदि अधिसूचित कृषि उत्पाद राज्य के बाहर से लाकर उनसे आटा, सूजी, मैदा, चावल, कॉर्न स्टार्च, ग्लूटेन, पेपर बोर्ड, लैमिनेट और प्लाईवुड आदि उत्पाद तैयार करती हैं।
याचिकाकर्ताओं का कहना था कि संबंधित कृषि उत्पादों को उत्तराखंड में किसी बिक्री अथवा खरीद के लिए नहीं, बल्कि सीधे प्रसंस्करण या विनिर्माण के लिए लाया जाता है।
हाईकोर्ट ने सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) के गुजरात अंबुजा एक्सपोर्ट्स लिमिटेड बनाम स्टेट ऑफ उत्तराखंड मामले में दिये गये फैसले का उल्लेख करते हुए कहा कि केवल कृषि उत्पाद को राज्य के बाहर से बाजार क्षेत्र में लाकर उसका विनिर्माण या आगे प्रसंस्करण करना अपने आप में ऐसा करयोग्य आयोजन नहीं है, जिस पर राज्य सरकार बाजार शुल्क (Market Fee) अथवा विकास सेस लगा सके।
खंडपीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल किसी क्षेत्र को बाजार क्षेत्र घोषित कर देने से वहां आने वाले प्रत्येक कृषि उत्पाद पर सेस लगाने की विधायी शक्ति (Legislative Power) स्वतः पैदा नहीं हो जाती।
राज्य सरकार की इस दलील को भी न्यायालय ने स्वीकार नहीं किया कि विकास सेस इसलिए लिया जा सकता है क्योंकि संबंधित औद्योगिक इकाइयां मंडी समितियों द्वारा विकसित सड़कों, पुलों और अन्य आधारभूत सुविधाओं का उपयोग करती हैं। न्यायालय ने कहा कि किसी लेवी (Levy) से प्राप्त धनराशि का इस्तेमाल किस उद्देश्य के लिए किया जाता है, यह अलग प्रश्न है। इससे उस लेवी को लगाने की विधायी शक्ति स्वतः पैदा नहीं होती।
तीन सप्ताह के भीतर किच्छा और सिरौली कलां नगर पालिका चुनाव की मतगणना कराने का आदेश
उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने किच्छा (Kichha) और सिरौली कलां (Sirauli Kalan) नगर पालिकाओं में हुए चुनाव की मतगणना नहीं कराने को लेकर दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए राज्य सरकार को तीन सप्ताह के भीतर चुनाव की मतगणना कराने के निर्देश दिए हैं।
मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति मनोज कुमार गुप्ता और न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की खंडपीठ ने की। राज्य सरकार के प्रार्थना पत्र पर सुनवाई के दौरान खंडपीठ ने तीन सप्ताह के भीतर हुए चुनाव की मतगणना कराने का आदेश दिया।
राज्य निर्वाचन आयोग (State Election Commission) की अधिसूचना के बाद हाईकोर्ट की एकलपीठ ने मामले की अगली सुनवाई के लिए पांच अक्टूबर की तिथि निर्धारित की है। बुधवार को मतगणना को लेकर आयोग और राज्य सरकार के आदेश को खंडपीठ में चुनौती दी गयी थी, जिस पर खंडपीठ ने यह आदेश पारित किया।
उखीमठ स्वास्थ्य केंद्र के मामले में चार सप्ताह में प्रगति रिपोर्ट पेश करे स्वास्थ्य विभाग: हाईकोर्ट
उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने उखीमठ (Ukhimath) के जन स्वास्थ्य केंद्र के उच्चीकरण (Upgradation) और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में मूलभूत जन सुविधाएं उपलब्ध नहीं कराये जाने को लेकर दायर जनहित याचिका पर सुनवाई की।
मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने मामले की सुनवाई के बाद राज्य सरकार के स्वास्थ्य विभाग को निर्देश दिए कि चिकित्सालय प्रशासन की ओर से प्रस्तुत रिपोर्ट पर कितना अमल हुआ, इसकी प्रगति रिपोर्ट चार सप्ताह के भीतर न्यायालय में पेश की जाए।
न्यायालय ने कहा कि मामला क्षेत्र के लोगों के जन स्वास्थ्य से जुड़ा है। इसी प्रकार के एक अन्य मामले में भी न्यायालय पहले से सुनवाई कर रहा है।
मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति मनोज कुमार गुप्ता और न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की खंडपीठ में हुई।
नाबालिग से दुष्कर्म मामले में दोषसिद्धि बरकरार, हाईकोर्ट ने सजा 12 से घटाकर 10 वर्ष की
उत्तराखंड उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति रवींद्र मैठानी (Justice Ravindra Maithani) और न्यायमूर्ति सिद्धार्थ शाह (Justice Siddharth Shah) की खंडपीठ ने वर्ष 2017 के पाक्सो (POCSO) और दुष्कर्म मामले में दोषसिद्ध विजय बहादुर की आपराधिक जेल अपील पर निर्णय सुनाया है। न्यायालय ने उसकी दोषसिद्धि बरकरार रखते हुए 12 वर्ष के कठोर कारावास की सजा को घटाकर 10 वर्ष कर दिया।
विशेष सत्र न्यायाधीश, पाक्सो, बागेश्वर (Bageshwar) ने फरवरी 2018 में विजय बहादुर को 10 वर्षीय नाबालिग के साथ दुष्कर्म का दोषी ठहराते हुए 12 वर्ष के कठोर कारावास और 10 हजार रुपये के जुर्माने की सजा सुनायी थी। घटना कपकोट (Kapkote) क्षेत्र की है, जहां मजदूरी करने वाले परिवार की बच्ची को आरोपित अपने तंबू में ले गया था। मामले में पीड़िता का भाई प्रत्यक्षदर्शी गवाह था।
हाईकोर्ट ने अपील पर सुनवाई करते हुए कहा कि प्राथमिकी (FIR) दर्ज कराने में देरी और एफएसएल (Forensic Science Laboratory) रिपोर्ट से संबंधित तर्कों के बावजूद पीड़िता और उसके प्रत्यक्षदर्शी भाई के बयान पूरी तरह सुसंगत, भरोसेमंद और अकाट्य हैं। पीड़िता की चिकित्सकीय जांच में हाइमन के फटने की पुष्टि को भी अभियोजन के पक्ष को मजबूती देने वाला तथ्य माना गया।
अदालत ने निचली अदालत के दोषसिद्धि के फैसले को सही माना। हालांकि, यह ध्यान में रखते हुए कि दोषसिद्ध व्यक्ति पहले ही नौ वर्ष और दो महीने से अधिक की सजा काट चुका है, न्यायालय ने 12 वर्ष की सजा को घटाकर 10 वर्ष के कठोर कारावास में कर दिया। इसके साथ ही अपील का आंशिक रूप से निस्तारण कर दिया गया।
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डॉ.नवीन जोशी, पिछले 20 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय, ‘कुमाऊँ विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में पीएचडी की डिग्री प्राप्त पहले और वर्ष 2015 से उत्तराखंड सरकार से मान्यता प्राप्त पत्रकार हैं। 15 लाख से अधिक नए उपयोक्ताओं के द्वारा 150 मिलियन यानी 1.5 करोड़ से अधिक बार पढी गई आपकी अपनी पसंदीदा व भरोसेमंद समाचार वेबसाइट ‘नवीन समाचार’ के संपादक हैं, साथ ही राष्ट्रीय सहारा, हिन्दुस्थान समाचार आदि समाचार पत्र एवं समाचार एजेंसियों से भी जुड़े हैं। देश के पत्रकारों के सबसे बड़े संगठन ‘नेशनल यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट्स (इंडिया) उत्तराखंड’ के उत्तराखंड प्रदेश के प्रदेश महामंत्री भी हैं और उत्तराखंड के मान्यता प्राप्त राज्य आंदोलनकारी भी हैं। डॉ. जोशी के बारे में विस्तार से पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।
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