चेक पर हस्ताक्षर नहीं, फिर भी भागीदार जिम्मेदार; नैनीताल हाईकोर्ट के पांच अहम मामलों में बड़े निर्देश
नवीन समाचार, नैनीताल, 19 अगस्त 2026 (Nainital HIgh Court News 19 Aug 2026)। उत्तराखंड उच्च न्यायालय (Uttarakhand High Court) ने चेक अनादरण, बच्चों की शिक्षा, नर्सिंग अधिकारियों के वेतनमान, नागरिकता आवेदन और गंगा किनारे अवैध खनन से जुड़े पांच महत्वपूर्ण मामलों में अलग-अलग आदेश और निर्देश जारी किए हैं। न्यायालय ने एक मामले में स्पष्ट किया कि साझेदारी फर्म (Partnership Firm) के सक्रिय भागीदार को केवल चेक पर हस्ताक्षर नहीं होने के आधार पर पराक्रम्य लिखित अधिनियम (Negotiable Instruments Act) की धारा 138 की आपराधिक कार्यवाही से राहत नहीं मिल सकती। वहीं गौला नदी पार कर स्कूल जाने वाले बच्चों के मामले में सरकार से प्रगति रिपोर्ट मांगी गई है।
चेक पर हस्ताक्षर नहीं करने वाले भागीदार की जमानत याचिका खारिज
प्राप्त जानकारी के अनुसार न्यायमूर्ति राकेश थपलियाल (Justice Rakesh Thapliyal) की एकलपीठ ने मेसर्स वैष्णवी फूड प्रोडक्ट (M/s Vaishnavi Food Product) फर्म द्वारा जारी 50 लाख रुपये के चेक के अनादरण से जुड़े मामले में ललित मोहन चंद्र भट्ट (Lalit Mohan Chandra Bhatt) की याचिका खारिज कर दी। याचिकाकर्ता ने बाजपुर स्थित न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत में लंबित शिकायत की कार्यवाही को निरस्त करने की मांग की थी।
शिकायतकर्ता अफसर अली (Afsar Ali) के अनुसार 6 जनवरी 2025 को जारी किया गया 50 लाख रुपये का चेक खाते में पर्याप्त राशि नहीं होने के कारण अनादरित हो गया था। ललित मोहन चंद्र भट्ट का तर्क था कि वह चेक के अधिकृत हस्ताक्षरकर्ता नहीं थे और चेक पर राजेंद्र कुमार शर्मा (Rajendra Kumar Sharma) तथा अनिल कुमार शर्मा (Anil Kumar Sharma) के हस्ताक्षर थे।
न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत दस्तावेजों और याचिकाकर्ता के स्वयं के बयानों से सामने आया कि वह 1 अप्रैल 2023 से फर्म में भागीदार थे और चेक जारी होने की तिथि पर फर्म के दैनिक कामकाज और प्रबंधन में सक्रिय भूमिका निभा रहे थे।
न्यायमूर्ति राकेश थपलियाल ने पराक्रम्य लिखित अधिनियम की धारा 141 का उल्लेख करते हुए कहा कि साझेदारी फर्म अपने भागीदारों से अलग कोई स्वतंत्र कानूनी इकाई नहीं होती। फर्म द्वारा किए गए अपराध के लिए उसके व्यवसाय के संचालन के प्रभारी सभी सक्रिय भागीदार प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से जिम्मेदार हो सकते हैं।
अदालत ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita-BNSS) 2023 की धारा 528, जो पूर्ववर्ती दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 482 के अनुरूप है, के तहत अपनी अंतर्निहित शक्तियों का प्रयोग करने से इनकार कर दिया। अदालत ने माना कि निचली अदालत द्वारा सम्मन जारी करने में कोई क्षेत्राधिकार संबंधी त्रुटि नहीं हुई है।
गौला नदी पार कर स्कूल जाने वाले बच्चों के मामले में सरकार से जवाब तलब
उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने हल्द्वानी क्षेत्र के उडुवा (Uduwa) और पस्तोला (Pastola) गांवों के बच्चों के गौला नदी पार कर स्कूल जाने के मामले को गंभीरता से लिया है। मुख्य न्यायाधीश मनोज कुमार गुप्ता (Chief Justice Manoj Kumar Gupta) और न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय (Justice Subhash Upadhyay) की खंडपीठ ने राज्य सरकार और संबंधित अधिकारियों से दो सप्ताह के भीतर जवाब मांगा है।
प्राप्त जानकारी के अनुसार खंडपीठ वर्ष 2021 में दायर जनहित याचिका (Public Interest Litigation-PIL) पर सुनवाई कर रही थी। याचिका गगनदीप चड्ढा (Gagandeep Chadha) ने दायर की थी। इसमें बताया गया कि दोनों गांवों में इंटर कॉलेज नहीं होने के कारण बच्चों को हैड़ाखान (Haidakhan) स्थित विद्यालय जाना पड़ता है।
बरसात के दौरान गौला नदी का जलस्तर बढ़ जाने पर बच्चों का स्कूल जाना कठिन हो जाता है और उनकी पढ़ाई प्रभावित होती है। याचिका में यह भी बताया गया था कि अधिकारियों की ओर से पहले झूला पुल और छह किलोमीटर लंबी सड़क बनाने का आश्वासन दिया गया था, लेकिन अब तक जमीनी स्तर पर अपेक्षित कार्य नहीं हुआ है।
अदालत ने राज्य सरकार और संबंधित अधिकारियों से प्रस्तावित सड़क तथा झूला पुल की योजना पर अब तक हुई कार्रवाई की जानकारी मांगी है। बच्चों की शिक्षा पर पड़ रहे इस प्रभाव को देखते हुए न्यायालय ने सरकार से प्रगति रिपोर्ट भी मांगी है।
श्रीनगर के नर्सिंग अधिकारियों के न्यूनतम वेतनमान पर छह सप्ताह में निर्णय
उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने श्रीनगर स्थित वीर चंद्र सिंह गढ़वाली राजकीय आयुर्विज्ञान एवं अनुसंधान संस्थान (Veer Chandra Singh Garhwali Government Institute of Medical Science and Research) के नर्सिंग अधिकारियों को न्यूनतम वेतनमान नहीं दिए जाने के मामले में चिकित्सा शिक्षा निदेशक को कानून के अनुसार निर्णय लेने के निर्देश दिए हैं।
वरिष्ठ न्यायमूर्ति मनोज कुमार तिवारी (Justice Manoj Kumar Tiwari) की एकलपीठ ने प्रतीक कुमार डांगरोलिया (Prateek Kumar Dangarolia) और अन्य की ओर से दायर 10 अन्य याचिकाओं पर एक साथ सुनवाई की। याचिकाकर्ताओं ने बताया कि वे वर्ष 2010 से स्टाफ नर्स, जिसे अब नर्सिंग ऑफिसर कहा जाता है, के पद पर सेवाएं दे रहे हैं।
याचिकाकर्ताओं का कहना था कि संस्थान में उनके समान पदों पर कार्यरत अन्य कर्मचारियों को न्यूनतम वेतनमान का लाभ दिया जा रहा है, लेकिन उन्हें इससे वंचित रखा गया है। उन्होंने इसे सेवा नियमावली के विपरीत बताते हुए कहा कि उनका मामला 2 जुलाई 2026 के शासनादेश (Government Order) से पूरी तरह आच्छादित है।
याचिकाकर्ताओं की ओर से यह भी बताया गया कि संस्थान के प्राचार्य ने न्यूनतम वेतनमान के लिए 29 मई 2026 को जो सूची जारी की थी, उसमें मुख्य याचिकाकर्ता का नाम आठवें स्थान पर था। राज्य सरकार की ओर से कहा गया कि याचिकाकर्ताओं ने पहले सक्षम प्राधिकारी के समक्ष कोई औपचारिक मांग नहीं रखी थी।
अदालत ने याचिकाकर्ताओं को दो सप्ताह के भीतर चिकित्सा शिक्षा निदेशक (Director of Medical Education) के समक्ष अपना प्रत्यावेदन देने का निर्देश दिया। निदेशक को प्रत्यावेदन प्राप्त होने के बाद छह सप्ताह के भीतर कानून के अनुसार निर्णय लेकर उसका निस्तारण करना होगा।
तिब्बती मूल के तेनजिन थिनले के नागरिकता आवेदन पर छह सप्ताह में निर्णय का निर्देश
उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने तिब्बती मूल के तेनजिन थिनले (Tenzin Thinley) की याचिका पर सुनवाई करते हुए देहरादून के जिलाधिकारी को उनके भारतीय नागरिकता आवेदन पर छह सप्ताह के भीतर कानून के अनुसार निर्णय लेने और पात्र पाए जाने पर आवेदन को केंद्र सरकार के संबंधित सक्षम प्राधिकारी को भेजने का निर्देश दिया है।
प्राप्त जानकारी के अनुसार वरिष्ठ न्यायमूर्ति मनोज कुमार तिवारी की एकलपीठ में मामले की सुनवाई हुई। तेनजिन थिनले ने नागरिकता अधिनियम, 1955 की धारा 6(i) के तहत देशीयकरण (Naturalisation) के माध्यम से भारतीय नागरिकता के लिए आवेदन किया था। आवेदन का फाइल नंबर 2026080177 है। याचिकाकर्ता का कहना था कि देहरादून के जिलाधिकारी ने अब तक उनका आवेदन केंद्र सरकार को अग्रसारित नहीं किया, जिसके कारण उन्हें उच्च न्यायालय की शरण लेनी पड़ी।
याचिका में संबंधित अधिकारियों को आवेदन समयबद्ध तरीके से आगे बढ़ाने, नागरिकता प्रमाणपत्र जारी करने और मामले से संबंधित दस्तावेज उपलब्ध कराने के निर्देश देने की मांग की गई थी। सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से उप महाधिवक्ता ममता बिष्ट (Mamata Bisht) ने अदालत को बताया कि याचिका में दर्ज तथ्यों के अनुसार याचिकाकर्ता का जन्म 15 सितंबर 1992 को हुआ था और वह 12 मई 2013 को तिब्बत से भारत आए थे।
अदालत ने मामले का निस्तारण करते हुए जिलाधिकारी देहरादून को याचिकाकर्ता के आवेदन और उससे जुड़े सभी दस्तावेजों की जांच करने को कहा। यदि जांच में आवेदन नियमानुसार पाया जाता है तो आदेश की प्रमाणित प्रति प्राप्त होने की तिथि से छह सप्ताह के भीतर आवेदन केंद्र सरकार के संबंधित सक्षम प्राधिकारी को भेजना होगा।
गंगा किनारे अवैध खनन मामले में 24 अगस्त को अगली सुनवाई
उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने हरिद्वार में गंगा नदी के किनारे हो रहे अवैध खनन से संबंधित जनहित याचिका पर अगली सुनवाई के लिए 24 अगस्त की तिथि निर्धारित की है। मुख्य न्यायाधीश मनोज कुमार गुप्ता और न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की खंडपीठ ने संबंधित पक्षों से अपना जवाब पेश करने को कहा है।
प्राप्त जानकारी के अनुसार याचिकाकर्ता की ओर से मामले की शीघ्र सुनवाई के लिए प्रार्थना पत्र दिया गया। इसमें कहा गया कि पूर्व में न्यायालय द्वारा दिए गए आदेशों का अनुपालन नहीं हो रहा है और गंगा नदी में अब भी अवैध खनन जारी है। याचिकाकर्ता ने प्रशासन को पूर्व आदेशों का सख्ती से अनुपालन सुनिश्चित कराने के निर्देश देने की मांग की।
सुनवाई के दौरान स्टोन क्रशर संचालकों की ओर से कहा गया कि वे निर्धारित नीति के अनुसार कार्य कर रहे थे, लेकिन उन्हें सुनवाई का अवसर दिए बिना बंद करने के आदेश जारी कर दिए गए। उन्होंने इसे खनन नियमावली के विपरीत बताते हुए खनन कार्य पर लगी रोक हटाने और उनके वाहनों को छोड़ने की मांग की।
इसके जवाब में मातृ सदन (Matri Sadan) की ओर से कहा गया कि 30 जुलाई 2025 को न्यायालय ने अवैध रूप से संचालित स्टोन क्रशरों पर रोक लगाई थी, इसके बावजूद उनके अनुसार अवैध खनन जारी है।
स्टोन क्रशर संचालकों ने इस दावे का विरोध करते हुए कहा कि न्यायालय के आदेश के बाद उनके स्टोन क्रशरों में लगे वाहन जब्त किए जा चुके हैं। उन्होंने वाहनों को जारी करने की अनुमति मांगी और कहा कि वाहन जब्त होने के कारण वे बैंक की किस्तें नहीं चुका पा रहे हैं तथा उन पर ब्याज बढ़ रहा है।
गंगा संरक्षण से जुड़े इस मामले में न्यायालय पहले भी हरिद्वार क्षेत्र में गंगा किनारे संचालित स्टोन क्रशरों को लेकर कड़े निर्देश दे चुका है। जुलाई 2025 में उच्च न्यायालय ने 48 स्टोन क्रशरों को बंद करने और संबंधित बिजली तथा पानी के कनेक्शन काटने के निर्देश दिए थे।
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डॉ.नवीन जोशी, पिछले 20 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय, ‘कुमाऊँ विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में पीएचडी की डिग्री प्राप्त पहले और वर्ष 2015 से उत्तराखंड सरकार से मान्यता प्राप्त पत्रकार हैं। 15 लाख से अधिक नए उपयोक्ताओं के द्वारा 150 मिलियन यानी 1.5 करोड़ से अधिक बार पढी गई आपकी अपनी पसंदीदा व भरोसेमंद समाचार वेबसाइट ‘नवीन समाचार’ के संपादक हैं, साथ ही राष्ट्रीय सहारा, हिन्दुस्थान समाचार आदि समाचार पत्र एवं समाचार एजेंसियों से भी जुड़े हैं। देश के पत्रकारों के सबसे बड़े संगठन ‘नेशनल यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट्स (इंडिया) उत्तराखंड’ के उत्तराखंड प्रदेश के प्रदेश महामंत्री भी हैं और उत्तराखंड के मान्यता प्राप्त राज्य आंदोलनकारी भी हैं। डॉ. जोशी के बारे में विस्तार से पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।
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