पिंडारी हिमनद क्षेत्र में जैव विविधता और आजीविका की चुनौतियां उजागर, अनूप साह व डॉ. जीएस रावत ने सुझाये संरक्षण के उपाय

इस समाचार को सुनने के लिए यहाँ क्लिक करें

नवीन समाचार, नैनीताल, 23 अक्टूबर 2026 (Challenges Regarding Pindari Glacier)। उत्तराखंड के बागेश्वर जनपद में स्थित पिंडारी परिदृश्य हिमालय के सर्वाधिक आकर्षक प्राकृतिक क्षेत्रों में से एक है। अपनी ऊंची पर्वत चोटियों, हिमनदों, घने वनों, अल्पाइन बुग्यालों, विविध वन्यजीवों और समृद्ध स्थानीय संस्कृति के कारण यह क्षेत्र देश-विदेश के प्रकृतिविदों, शोधकर्ताओं, छायाकारों, पदयात्रियों और साहसिक पर्यटन के शौकीनों को आकर्षित करता रहा है।

Challenges Regarding Pindari Glacierइस विस्तृत परिदृश्य की प्रमुख पहचान सुंदरढूंगा, पिंडारी और सरयू घाटियां हैं। पिंडारी घाटी के साथ कफनी घाटी भी इस क्षेत्र की प्राकृतिक विविधता का महत्त्वपूर्ण हिस्सा है। यहां मैकटोली, बलजूरी, पनवाली द्वार, नंदा खाट, नंदाकोट, छांगुज और लास्पा धुरा जैसी पर्वत चोटियां तथा ट्रेल्स पास और दानू धुरा जैसे ऊंचे पर्वतीय दर्रे स्थित हैं।

इस परिदृश्य का निचला हिस्सा मल्ला दानपुर कहलाता है। यहां के ग्रामीण समुदाय लंबे समय से कृषि, पशुपालन, वन संसाधनों और स्थानीय प्राकृतिक परिस्थितियों के अनुरूप विकसित आजीविका पर निर्भर रहे हैं। उनके पास औषधीय वनस्पतियों, वन्यजीवों, मौसम और प्राकृतिक संसाधनों से जुड़ा पारंपरिक ज्ञान भी है।

यह पूरा क्षेत्र नंदा देवी जैवमंडल आरक्षित क्षेत्र का हिस्सा है और बागेश्वर वन प्रभाग की ग्लेशियर रेंज के अंतर्गत आता है। जैवमंडल आरक्षित क्षेत्रों का मूल उद्देश्य प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण और स्थानीय समुदायों की आजीविका के बीच संतुलन स्थापित करना है। इसके लिए प्रकृति आधारित पर्यटन, सांस्कृतिक पर्यटन, स्थानीय कृषि उत्पादों और अन्य पर्यावरण अनुकूल गतिविधियों के माध्यम से रोजगार के अवसर विकसित किए जा सकते हैं।

लेकिन इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए कुछ बुनियादी प्रश्नों पर विचार करना आवश्यक है। क्या पिंडारी क्षेत्र की प्राकृतिक और सांस्कृतिक विरासत सुरक्षित है? क्या यहां के वन्यजीवों और औषधीय वनस्पतियों की स्थिति संतोषजनक है? क्या पर्यटन से स्थानीय समुदायों को पर्याप्त लाभ मिल रहा है? और क्या वर्तमान विकास गतिविधियां प्रकृति की संवेदनशीलता को ध्यान में रखकर संचालित की जा रही हैं?

इन प्रश्नों के उत्तर खोजने के लिए दोनों लेखकों ने युवा छायाकार आदित्य चौधरी और कुछ स्थानीय टूर गाइडों के साथ अक्टूबर 2026 में पिंडारी हिमनद तथा सरयू जलग्रहण क्षेत्र के ऊपरी हिस्सों के समीपवर्ती क्षेत्रों का भ्रमण किया।

इस यात्रा का विशेष महत्त्व इसलिए भी है कि लेखक अनूप साह वर्ष 1964 से इस क्षेत्र का भ्रमण करते रहे हैं। उन्होंने वर्ष 1972 में नंदा खाट पर प्रथम आरोहण किया तथा उसी वर्ष बलजूरी, वर्ष 1990 में मैकटोली और वर्ष 1994 में ट्रेल्स पास का आरोहण किया। उन्होंने वर्ष 2024 में भी बलजूरी का आरोहण किया। दूसरे लेखक डॉ. जी. एस. रावत वर्ष 1980 से नंदा देवी जैवमंडल आरक्षित क्षेत्र की वनस्पतियों और जीव-जंतुओं का अध्ययन कर रहे हैं। इस दीर्घकालिक अनुभव और अक्टूबर 2026 के क्षेत्रीय अवलोकनों के आधार पर लेखकों ने पिंडारी परिदृश्य की चुनौतियों और संभावनाओं को रेखांकित किया है।

ऐसे पहुंचें पिंडारी, कफनी और सुंदरढूंगा ग्लेशियर

पिंडारी ग्लेशियर उत्तराखंड के कुमाऊं क्षेत्र के बागेश्वर जिले में समुद्र तल से 3627 मीटर (11657 फीट) की ऊंचाई पर नंदा देवी और नंदा कोट की हिमाच्छादित चोटियों के बीच स्थित है। हिमालय के अन्य सभी ग्लेशियरों की तुलना में सबसे आसान पहुंच के कारण पर्वतारोहियों और ट्रेकरों की पहली पसंद पिंडारी ग्लेशियर अपनी खूबसूरती से भी मना को लुभाने वाला है। 3.2 किमी लंबे और 1.5 किमी चौड़े इस ग्लेशियर का जीरो पॉइंट समुद्र तल से 3660 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। यहीं से पिंडर नदी निकलती है, जो बाद में कर्णप्रयाग से होते हुए अलकनंदा नदी में जाकर मिलती है।

पिंडारी ग्लेशियर के बांई ओर समुद्र तल से जिसकी ऊंचाई 3860 मीटर की ऊंचाई पर कफनी ग्लेशियर स्थित है, जिसके लिए द्वाली नाम के पड़ाव से रास्ता अलग होता है। पिंडारी ग्लेशियर जाने के लिए बागेश्वर से कपकोट की ओर 48 किमी आगे सौंग, लोहारखेत तक सड़क जाती है, जहां से धाकुड़ी टॉप तक खड़ी चढ़ाई, वहां से उतार के पैदल मार्ग से इस ट्रेक के आखिरी खाती गांव, द्वाली व फुरकिया होते हुए पिंडारी ग्लेशियर के आखिरी पड़ाव जीरो प्वाइंट पहुंचा जाता है।

क्षेत्रीय अवलोकन: कृषि संकट और मानव-वन्यजीव संघर्ष

पिंडारी हिमनद के प्रवेशद्वार के रूप में प्रसिद्ध खाती गांव के आसपास भ्रमण के दौरान कृषि उत्पादन में गिरावट की समस्या सामने आई। ग्रामीणों के अनुसार, इसके प्रमुख कारण युवाओं की खेती के प्रति घटती रुचि, बदलती जलवायु और वन्यजीवों द्वारा फसलों को पहुंचाया जाने वाला नुकसान हैं।

लंगूर, रीसस मकाक यानी बंदर, जंगली सूअर और साही जैसे वन्यजीव फसलों को नुकसान पहुंचाते हैं। कभी-कभार काला भालू भी खेतों के लिए चुनौती बनता है। इसके अतिरिक्त, एक ग्रामीण ने बताया कि तेंदुए ने उसकी दो बकरियों को मार दिया था। उसे इस बात की चिंता थी कि नुकसान के लिए पर्याप्त मुआवजा मिल पाएगा या नहीं।

ग्रामीणों के अनुसार, नुकसान की सूचना देने के लिए भराड़ी स्थित वन क्षेत्र कार्यालय तक जाना और फिर घटना की पुष्टि कराने की प्रक्रिया पूरी करना व्यावहारिक रूप से कठिन पड़ता है। इससे मुआवजे की व्यवस्था की उपयोगिता पर भी प्रश्न उठता है।

एक अन्य महत्त्वपूर्ण तथ्य यह सामने आया कि ग्रामीण गांवों के आसपास वन्यजीवों की बढ़ती उपस्थिति की बात करते हैं, लेकिन उनके अनुसार आसपास के जंगलों में वन्यजीवों की संख्या घट रही है। यह विरोधाभास मानव-वन्यजीव संघर्ष की जटिलता को सामने लाता है। केवल वन्यजीवों की संख्या के आधार पर इस समस्या का समाधान नहीं खोजा जा सकता। इसके लिए प्राकृतिक आवासों की स्थिति, भोजन की उपलब्धता, वन पारिस्थितिकी और ग्रामीण आजीविका के बीच संबंधों को समझना आवश्यक है।

इस स्थिति में वन्यजीवों के आवासों का संरक्षण, फसल और पशुधन की क्षति रोकने के उपाय तथा मुआवजे की प्रक्रिया को सरल और व्यावहारिक बनाना महत्त्वपूर्ण होगा।

स्थानीय आजीविका: मधुमक्खी पालन, शहद और कृषि उत्पाद

मल्ला दानपुर क्षेत्र की पारंपरिक अर्थव्यवस्था में शहद और घी का विशेष स्थान रहा है। स्थानीय बुजुर्गों के अनुसार, कभी यह क्षेत्र इन दोनों उत्पादों के लिए जाना जाता था, लेकिन वर्तमान में मधुमक्खी पालन करने वाले परिवारों की संख्या सीमित रह गई है।

यात्रा के दौरान लेखकों की मुलाकात एक महिला मधुमक्खी पालक से हुई, जिसके पास मधुमक्खियों के छह बक्से थे। वह मधुमक्खी पालन और शहद निकालने की प्रक्रिया में दक्ष थी। यह उदाहरण बताता है कि उपयुक्त प्रशिक्षण और संसाधन उपलब्ध होने पर ग्रामीण महिलाएं भी स्थानीय प्राकृतिक संसाधनों पर आधारित आजीविका को आगे बढ़ा सकती हैं।

हालांकि, क्षेत्र में अधिकांश मधुमक्खी पालक आधुनिक बक्सों के बजाय पारंपरिक लकड़ी के लट्ठों से बने छत्तों का उपयोग करना पसंद करते हैं। उनका अनुभव है कि मधुमक्खियां आधुनिक बक्सों में टिककर नहीं रहतीं। इसके अतिरिक्त, शहद निकालने की प्रचलित विधि में काफी शहद व्यर्थ हो जाता है।

इस समस्या का समाधान स्थानीय अनुभव को नकारने के बजाय पारंपरिक ज्ञान और वैज्ञानिक तकनीकों के समन्वय से खोजा जाना चाहिए। ग्रामीणों को आधुनिक मधुमक्खी पालन, शहद निकालने की कम अपव्ययी तकनीकों, स्थानीय सब्जियों के उत्पादन, मशरूम की खेती और प्राकृतिक संसाधनों पर आधारित अन्य आजीविका गतिविधियों का प्रशिक्षण दिया जा सकता है।

यदि इन गतिविधियों को तकनीकी सहायता, बाजार और उचित मूल्य उपलब्ध कराने वाली व्यवस्था से जोड़ा जाए, तो ग्रामीण परिवारों की आय बढ़ सकती है। इससे कृषि और पारंपरिक आजीविका के प्रति युवाओं की रुचि भी पुनर्जीवित हो सकती है।

आप यह भी पढ़ना चाहेंगे :  धामी कैबिनेट के बड़े फैसले: निराश्रित महिलाओं के लिए नई योजना, दिव्यांग विद्यार्थियों को 5 अंक की छूट; खिलाड़ियों को मुफ्त बस यात्रा

वन्यजीवों और औषधीय वनस्पतियों में गिरावट

यात्रा के अंतिम चरण में लेखकों की मुलाकात झूनी गांव के 85 वर्षीय भागीचंद्र सिंह टाकुली से हुई। उन्हें स्थानीय वनस्पतियों और जीव-जंतुओं, विशेषकर औषधीय महत्त्व वाले पौधों के संबंध में व्यापक पारंपरिक ज्ञान प्राप्त है।

उनके अनुसार, लगभग 40 से 50 वर्ष पहले सरयू जलग्रहण क्षेत्र के ऊपरी हिस्सों और पंखू क्षेत्र में वन्यजीवों की अच्छी उपस्थिति थी। यहां कस्तूरी मृग, सांभर, काकड़ और एशियाई काला भालू जैसे वन्यजीव पाए जाते थे। उन्होंने बताया कि वर्ष 1972 में उन्होंने कस्तूरी मृग के दो शावकों को पकड़ा था, जिन्हें धरमघर स्थित कस्तूरी मृग प्रजनन केंद्र ले जाया गया था।

उनके अनुभव के अनुसार, ऊंचाई वाले क्षेत्रों के वन अब काफी हद तक क्षतिग्रस्त हो चुके हैं। औषधीय पौधों की कई प्रजातियों की उपलब्धता में भी तेजी से गिरावट आई है। उन्होंने यह भी बताया कि कस्तूरी मृग इस क्षेत्र से स्थानीय स्तर पर विलुप्त हो चुका है। यहां स्थानीय विलुप्ति का अर्थ है कि संबंधित प्रजाति अब इस विशेष क्षेत्र में नहीं मिल रही है; इसका अर्थ यह नहीं है कि वह पूरी दुनिया से विलुप्त हो गई है।

भागीचंद्र सिंह टाकुली के अनुसार, मल्ला दानपुर के लोगों के लिए आजीविका के प्रमुख साधन सीमित होते जा रहे हैं। इनमें भांग की खेती, उच्च हिमालयी बुग्यालों से कीड़ा जड़ी का संग्रह और पर्यटकों एवं पदयात्रियों की सहायता करना शामिल है। उन्होंने कीड़ा जड़ी की उपलब्धता में भी तेजी से कमी आने की बात कही।

ये अवलोकन केवल पर्यावरणीय क्षरण की ओर संकेत नहीं करते, बल्कि स्थानीय अर्थव्यवस्था और सांस्कृतिक विरासत पर पड़ने वाले प्रभावों को भी सामने लाते हैं। वन, वन्यजीव और औषधीय वनस्पतियां स्थानीय समुदायों की आजीविका तथा पारंपरिक ज्ञान का अभिन्न हिस्सा हैं। इनके क्षरण से प्रकृति और समाज, दोनों प्रभावित होते हैं।

हालांकि, इन क्षेत्रीय अनुभवों के आधार पर व्यापक वैज्ञानिक निष्कर्ष निकालने के लिए नियमित वन्यजीव सर्वेक्षण, वनस्पति अध्ययन और दीर्घकालिक निगरानी की आवश्यकता होगी। स्थानीय बुजुर्गों का ज्ञान ऐसे अध्ययनों के लिए महत्त्वपूर्ण आधार प्रदान कर सकता है।

पारिस्थितिकी पर्यटन की संभावनाएं और प्रबंधन की कमियां

पिंडारी परिदृश्य में पारिस्थितिकी पर्यटन, प्रकृति शिक्षा, पक्षी अवलोकन और साहसिक पर्यटन की व्यापक संभावनाएं हैं। वर्तमान में अधिकांश पर्यटक और पदयात्री पिंडारी हिमनद के जीरो पॉइंट तक ही जाते हैं, जबकि इस क्षेत्र में अनेक ऐसे स्थल हैं जो प्राकृतिक सौंदर्य और जैव विविधता की दृष्टि से विशेष महत्त्व रखते हैं।

इन स्थलों की पहचान, संरक्षण और सुव्यवस्थित विकास के लिए स्थानीय पारिस्थितिकी पर्यटन समितियों को सक्रिय भूमिका दी जा सकती है। ऐसी समितियों का संचालन न्यायसंगत और सतत सिद्धांतों पर आधारित होना चाहिए, जिससे पर्यटन से होने वाली आय का उचित वितरण हो और प्राकृतिक संसाधनों पर अनावश्यक दबाव न पड़े।

पर्यटन विभाग ने खाती से जीरो पॉइंट के बीच वर्षा से बचाव के लिए शेड, इग्लू के आकार की झोपड़ियां, दृश्यावलोकन स्थल और स्थायी शौचालय जैसी सुविधाएं विकसित की हैं। लेकिन लेखकों के अवलोकन के अनुसार, उचित रखरखाव के अभाव में अधिकांश वर्षा-आश्रय और शौचालय जर्जर हो चुके हैं और उपयोग के योग्य नहीं रह गए हैं।

अल्पाइन घास के मैदानों में बनाए गए कुछ दृश्यावलोकन स्थल और वर्षा-आश्रय अधूरे हैं। कुछ स्थानों का चयन भी उचित ढंग से नहीं किया गया है। इससे संवेदनशील बुग्यालों को नुकसान पहुंचा है, मिट्टी का कटाव बढ़ा है और वनस्पतियों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है।

यह स्थिति विकास कार्यों की योजना और उनके क्रियान्वयन के बीच समन्वय की आवश्यकता को रेखांकित करती है। प्रकृति का सौंदर्य दिखाने के लिए बनाई गई सुविधाएं यदि उसी प्रकृति को नुकसान पहुंचाने लगें, तो उनके उद्देश्य पर पुनर्विचार करना आवश्यक हो जाता है।

लेखकों ने यह भी पाया कि पदयात्रा मार्ग के किनारे लगे अनेक सूचना-पट्टों पर पुरानी, अनावश्यक या भ्रामक जानकारी अंकित है। इसके स्थान पर पर्यटकों को स्पष्ट और उपयोगी जानकारी उपलब्ध कराई जानी चाहिए। इसमें संपूर्ण परिदृश्य का रूपरेखा मानचित्र, निर्धारित मार्ग, पर्यावरण संरक्षण संबंधी निर्देश और क्या करें तथा क्या न करें जैसी जानकारी शामिल होनी चाहिए।

यह जानकारी खाती के प्रवेश बिंदु और खाती, द्वाली तथा फुरकिया स्थित विश्रामगृहों में उपलब्ध कराई जानी चाहिए। विश्रामगृहों और उनके आसपास के परिसरों का बेहतर रखरखाव तथा संपूर्ण पर्यटक अनुभव का व्यावसायिक प्रबंधन भी आवश्यक है।

इसके साथ ही मुख्य पदयात्रा मार्ग की पर्यावरणीय वहन क्षमता का वैज्ञानिक आकलन किया जाना चाहिए। इसके आधार पर यह तय किया जा सकता है कि संवेदनशील पर्यावरण को नुकसान पहुंचाए बिना कितने पर्यटकों की आवाजाही संभव है। उपयुक्त वैकल्पिक मार्गों की पहचान कर पर्यटकों को वहां जाने के लिए प्रोत्साहित करने से मुख्य मार्ग पर दबाव कम किया जा सकता है।

पर्यटन का उद्देश्य केवल अधिक पर्यटकों को किसी स्थान तक पहुंचाना नहीं होना चाहिए। इसका उद्देश्य प्रकृति का अनुभव उपलब्ध कराना, स्थानीय समुदायों को आर्थिक लाभ देना और प्राकृतिक संसाधनों को दीर्घकालिक क्षति से बचाना होना चाहिए।

स्थानीय संस्कृति का संरक्षण और सामुदायिक पहल

पिंडारी परिदृश्य की सांस्कृतिक विरासत को सुरक्षित रखने के लिए गंभीर और निरंतर प्रयासों की आवश्यकता है। स्थानीय समुदायों का पारंपरिक ज्ञान, सामाजिक अनुशासन, प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग की पद्धतियां और सांस्कृतिक परंपराएं इस क्षेत्र की पहचान का महत्त्वपूर्ण हिस्सा हैं।

लेखकों के अनुसार, क्षेत्र के कुछ गांवों में बेरोजगारी और निराशा से जूझ रहे युवाओं के बीच शराब की लत तथा तात्कालिक नकद आय प्राप्त करने के अनुचित उपायों की प्रवृत्ति बढ़ने की चिंता सामने आई। ऐसी परिस्थितियों में केवल पर्यावरण संरक्षण की अपील पर्याप्त नहीं होगी। युवाओं के लिए सम्मानजनक रोजगार और स्थानीय संसाधनों पर आधारित आजीविका के विकल्प भी विकसित करने होंगे।

इस संदर्भ में जटोली गांव और वाछम क्षेत्र के महिला स्वयं सहायता समूह की पहल उल्लेखनीय है। समूह ने शराब के सेवन और बिक्री पर प्रतिबंध लगाने के साथ गांव के रास्तों और घरों के आसपास प्लास्टिक के रैपर तथा बोतलें फेंकने की समस्या को जुर्माने के माध्यम से नियंत्रित किया है।

यह उदाहरण दिखाता है कि स्थानीय समुदाय जब अपनी सांस्कृतिक गरिमा, सामाजिक अनुशासन और पर्यावरण की रक्षा के लिए संगठित होते हैं, तो सकारात्मक बदलाव संभव हो सकता है। ऐसी पहलों को प्रोत्साहित कर पिंडारी परिदृश्य के अन्य गांवों तक भी पहुंचाया जाना चाहिए।

लेखकों ने स्थानीय युवाओं के लिए प्रकृति शिक्षा शिविर, वन्यजीव संरक्षण जागरूकता, पर्यावरणीय उत्तरदायित्व से संबंधित प्रशिक्षण और हरित कौशल विकास कार्यक्रम शुरू करने का सुझाव दिया है। इनसे पर्यावरण अनुकूल रोजगार के अवसर भी विकसित किए जा सकते हैं।

स्थानीय युवाओं और विद्यार्थियों को अपने ही क्षेत्र की प्राकृतिक विरासत के अध्ययन और संरक्षण के लिए प्रोत्साहित करना भी आवश्यक है। इस उद्देश्य से लेखकों ने प्रवेश चौकी पर लिए जाने वाले प्रवेश शुल्क से उन्हें छूट देने का सुझाव दिया है, ताकि वे अपने क्षेत्र की प्रकृति को समझने और उसके संरक्षण में भागीदारी निभाने के लिए प्रेरित हों।

प्रमुख निष्कर्ष और आवश्यक कार्ययोजना

अक्टूबर 2026 की यात्रा के दौरान सामने आए अवलोकनों के आधार पर पिंडारी परिदृश्य के संरक्षण और विकास के लिए कुछ प्रमुख निष्कर्ष निकलते हैं।

पहला, प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण स्थानीय आजीविका से अलग नहीं किया जा सकता। वन्यजीवों, औषधीय पौधों और अन्य प्राकृतिक संसाधनों में गिरावट का प्रभाव ग्रामीण परिवारों की आय, पारंपरिक ज्ञान और सांस्कृतिक विरासत पर भी पड़ता है। इसलिए संरक्षण योजनाओं में स्थानीय लोगों की जरूरतों को केंद्रीय स्थान देना आवश्यक है।

दूसरा, मानव-वन्यजीव संघर्ष का समाधान समन्वित दृष्टिकोण से करना होगा। फसलों और पशुधन को होने वाली क्षति रोकने, मुआवजे की प्रक्रिया को सरल बनाने, वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास सुरक्षित रखने और ग्रामीणों की समस्याओं का समय पर समाधान करने के लिए प्रभावी व्यवस्था विकसित की जानी चाहिए।

तीसरा, स्थानीय आजीविका के विकल्पों को मजबूत करना जरूरी है। वैज्ञानिक मधुमक्खी पालन, शहद प्रसंस्करण, स्थानीय कृषि उत्पाद, मशरूम उत्पादन और प्रकृति आधारित पर्यटन को प्रशिक्षण, तकनीकी सहायता तथा बाजार से जोड़कर रोजगार के अवसर बढ़ाए जा सकते हैं। इससे प्राकृतिक संसाधनों पर अनियंत्रित निर्भरता भी कम हो सकती है।

चौथा, पर्यटन सुविधाओं का विकास पर्यावरणीय मानकों के अनुरूप होना चाहिए। जर्जर शौचालयों और वर्षा-आश्रयों की मरम्मत, अनुपयुक्त निर्माणों की समीक्षा, सूचना-पट्टों का सुधार और पर्यावरणीय वहन क्षमता का वैज्ञानिक आकलन प्राथमिकता में शामिल होने चाहिए। किसी भी नई सुविधा का निर्माण संवेदनशील बुग्यालों और प्राकृतिक आवासों पर उसके संभावित प्रभाव का आकलन करने के बाद ही किया जाना चाहिए।

पांचवां, स्थानीय संस्कृति और पारंपरिक ज्ञान को संरक्षण योजनाओं में स्थान मिलना चाहिए। बुजुर्गों के अनुभव, स्थानीय वनस्पतियों और वन्यजीवों के बारे में उनका ज्ञान तथा सामुदायिक समूहों की सफल पहलें वैज्ञानिक अध्ययन और नीतिगत निर्णयों में उपयोगी हो सकती हैं।

आप यह भी पढ़ना चाहेंगे :  नैना पीक से दिखती हैं हिमालय की 365 किमी लंबी पर्वत श्रृंखलाएं, फिर भी 95 प्रतिशत पर्यटक नहीं देख पाते ये अनमोल नजारे

छठा, स्थानीय समुदायों को निर्णय प्रक्रिया और पर्यटन से होने वाले लाभ में उचित भागीदारी मिलनी चाहिए। पारिस्थितिकी पर्यटन समितियों, महिला स्वयं सहायता समूहों और स्थानीय युवाओं को योजनाओं के निर्माण तथा संचालन में शामिल करना आवश्यक है। इससे संरक्षण के प्रति सामुदायिक जिम्मेदारी और स्थानीय अर्थव्यवस्था, दोनों मजबूत हो सकते हैं।

इन निष्कर्षों को प्रभावी बनाने के लिए वन विभाग, पर्यटन विभाग, लोक निर्माण विभाग, स्थानीय प्रशासन, शोध संस्थानों और ग्रामीण समुदायों के बीच समन्वित कार्ययोजना तैयार की जानी चाहिए। इस योजना में जिम्मेदारियों का स्पष्ट निर्धारण, समयबद्ध क्रियान्वयन, नियमित निगरानी और परिणामों का मूल्यांकन शामिल होना चाहिए।

निष्कर्ष: संरक्षण और विकास के बीच संतुलन ही भविष्य का आधार

पिंडारी परिदृश्य का भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि हम इसके प्राकृतिक संसाधनों, स्थानीय संस्कृति और ग्रामीण आजीविका के बीच किस प्रकार संतुलन स्थापित करते हैं। यहां के हिमनद, पर्वत चोटियां, वन, बुग्याल और वन्यजीव जितने महत्त्वपूर्ण हैं, उतना ही महत्त्व उन समुदायों का भी है जिन्होंने पीढ़ियों से इस भूमि के साथ अपना संबंध बनाए रखा है।

वनों को सुरक्षित रखे बिना वन्यजीवों का संरक्षण कठिन है। स्थानीय लोगों की आजीविका की अनदेखी करके उनसे प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण की अपेक्षा करना भी उचित नहीं होगा। इसी प्रकार, पर्यटन का अनियंत्रित विस्तार आर्थिक अवसरों के साथ पर्यावरणीय संकट भी पैदा कर सकता है। इसलिए विकास योजनाओं में वैज्ञानिक अध्ययन, पारंपरिक ज्ञान, स्थानीय समुदायों की भागीदारी और पर्यावरणीय सीमाओं को समान महत्त्व देना आवश्यक है।

लेखकों ने अंत में एक सारगर्भित चेतावनी दी है। यदि समय रहते पिंडारी परिदृश्य की प्रकृति और संस्कृति को बचाने के लिए समुचित कदम नहीं उठाए गए, तो इसका भविष्य उस मुर्गी जैसा हो सकता है जो सोने के अंडे देती थी, लेकिन लालची मालिक ने अधिक लाभ के लालच में उसे ही नष्ट कर दिया।

यह रूपक हमें याद दिलाता है कि प्रकृति हमें अपार संपदा देती है, लेकिन उसका असीमित दोहन अंततः उसी संपदा को समाप्त कर सकता है। अल्पकालिक आर्थिक लाभ के लिए प्राकृतिक संसाधनों को नुकसान पहुंचाना भविष्य की पीढ़ियों के अधिकारों और अवसरों को भी सीमित करता है।

पिंडारी परिदृश्य की वास्तविक समृद्धि केवल उसके हिमनदों, पर्वत चोटियों, वनों और बुग्यालों में नहीं, बल्कि स्थानीय लोगों के ज्ञान, संस्कृति और जीवन-पद्धति में भी निहित है। इस विरासत को सुरक्षित रखना केवल एक पर्यटन स्थल का संरक्षण नहीं, बल्कि हिमालय की जीवंत प्राकृतिक और सांस्कृतिक धरोहर तथा आने वाली पीढ़ियों के भविष्य की रक्षा करना है। यही पिंडारी परिदृश्य के लिए टिकाऊ और उत्तरदायी विकास का वास्तविक मार्ग है।

चार दशक में डेढ़ किमी पीछे खिसक गया पिंडारी ग्लेशियर

  • यूसैक देहरादून, कुमाऊं विवि, नैनीताल व आईआईएसईआर, कोलकाता का संयुक्त अध्ययन 
  • अध्ययन में रिमोट सेंसिंग के माध्यम से ग्लेशियर की 1976 से 2014 तक की तुलना की गई

कुमाऊं का जाना-माना पिंडारी ग्लेशियर बीते चार दशक में डेढ़ किलोमीटर पीछे चला गया है। पिंडारी ग्लेशियर गंगा की सबसे बड़ी सहायक नदी अलकनंदा की भी सहायक नदीं पिंडर का उदगम स्थल है। उत्तराखंड अंतरिक्ष उपयोग केंद्र देहरादून, इंडियन इंस्टीटय़ूट ऑफ साइंस एजुकेशन एंड रिसर्च कोलकाता और कुमाऊं विविद्यालय नैनीताल के संयुक्त अध्ययन में यह बात सामने आई है। यह संयुक्त अध्ययन ‘‘रिमोट सेंसिंग एंड एन्वायरमेंट’ वैज्ञानिक शोध पत्रिका में प्रकाशित हुआ है।

अध्ययन में रिमोट सेंसिंग के माध्यम से 1976 से 2014 तक के आंकड़ों की तुलना की गई। अध्ययन में जियो पोजीशनिंग सिस्टम (जीपीएस) को आर्डिनेट का उपयोग कर पता लगाया गया कि 2014 में ग्लेशियर की बर्फ का अग्रभाग कहां तक था, यही नहीं सव्रे ऑफ इंडिया के पुराने भौगोलिक नक्शों व समय समय पर लिए उपग्रह मानचित्रों का उपयोग भी किया गया। अध्ययन में विभिन्न वर्षो में ग्लेशियर की स्थिति व उसके बर्फीले क्षेत्र की स्थिति को भी चिह्नित किया गया। अध्ययन से पता चला कि चार दशक में ग्लेशियर 1569.01 मीटर पीछे खिसक गया है।

इस तरह देखा जाए तो हर साल पिंडारी ग्लेशियर 51.23 मीटर पीछे खिसक रहा है। यह भी पता चला कि 199 से 2014 तक ग्लेशियर के सिकुड़ने की सालाना दर 1976 से 1994 से अधिक रही। रिपोर्ट में हिमालय के अन्य ग्लेशियरों के अध्ययन की जरूरत रेखांकित की गई है। उत्तराखंड अंतरिक्ष उपयोग केंद्र के वैज्ञानिक गजेंद्र सिंह रावत का कहना है कि हालांकि अध्ययन दल ने ग्लेशियर के मास बैलेंस का विश्लेषण नहीं किया लेकिन अध्ययन में स्थानीय बुजुगरे की जानकारी व रिमोट सेंसिंग के आंकड़ों के जरिए जमीनी सच्चाई का पता लगाया गया।

अध्ययन में यह भी पाया गया कि ग्लेशियर के आस पास की छोटी धाराएं भी ग्लेशियरों की सिकुड़ने की दर को तेज कर रही हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि पिंडारी और अन्य हिमालयी ग्लेशियरों के सिकुड़ने के पीछे ग्लोबल वार्मिग और जलवायु परिवर्तन है। नतीजतन देश की हिमालयी सदानीरा नदियों के पानी में कमी आ सकती है। यही नहीं इसके कारण ग्लेशियल लेक भी बन सकती है जो कि केदारनाथ आपदा जैसी आपदा का सबब बन सकती है।

1906 से 2010 तक 3.08 किमी पीछे खिसक गया था पिंडारी ग्लेशियर

इंडियन इंस्टीटय़ूट ऑफ साइस एजुकेशन एंड रिसर्च पुणो के 2016 के एक पुराने अध्ययन में भी बताया गया था कि 1850 से 2010 तक पिंडारी समेत हिमालय व कराकोरम के 43 ग्लेशियरों की लंबाई घटी है। इस दौरान ये इलाका 1.5 डिग्री सेल्सियस गर्म भी हो गया। लघु हिम युग के बाद ग्लेशियर लगातार सिकुड़ रहे हैं। अध्ययन के मुताबिक 1906 से 2010 तक पिंडारी ग्लेशियर 3.08 किलोमीटर पीछे खिसक गया था। इस तरह देखा जाए तो 104 साल में पिंडारी ग्लेशियर हर साल 30 मीटर की दर से पीछे खिसकता रहा है। वैज्ञानिकों का मानना है कि ग्लेशियर र्थमामीटर की तरह होते हैं। जैसे-जैसे तापमान बढ़ता है, वे सिकुड़ते जाते हैं।

आँकड़े न होने से परेशानी

नैनीताल। यूं हिमालय में स्थित ग्लेशियरों के पिघलने के दावे भी पूर्व से ही किये जा रहे हैं, परंतु सच्चाई है कि यह बातें आंकड़ों के बिना हो रही हैं। प्रदेश के मौसम विज्ञान केंद्र के निदेशक डा. आनंद शर्मा भी यह स्वीकार करते हैं । लिहाजा इस दिशा में गहन शोध और कम से कम आंकड़े एकत्र कर डाटा बेस तैयार करने की मौसम विज्ञानी आवश्यकता जताते रहे हैं। इधर कुमाऊं विवि द्वारा देश-प्रदेश का पहला सेंटर फार क्लाइमेट चेंज वर्चुअल मोड में इसी वर्ष स्थापना कर चुका है, जिससे आगे डाटा बेस तैयार करने की उम्मीद की जा रही है।

पाठकों से आग्रह है कि इस समाचार से संबंधित अपनी राय और विचार नीचे दिए गए कमेन्ट बॉक्स में अवश्य साझा करें।

नैनीताल में क्लिक करके नैनीताल जनपद में हाल के दिनों में हुई अन्य सभी महत्वपूर्ण घटनाओं से जुड़ी पूरी रिपोर्ट पढ़ी जा सकती हैं। इसी तरह पिथौरागढ़ के समाचार, अल्मोड़ा के समाचार, बागेश्वर के समाचार, चंपावत के समाचार, ऊधमसिंह नगर  के समाचार, देहरादून के समाचार, उत्तरकाशी के समाचार, पौड़ी के समाचार, टिहरी जनपद के समाचार, चमोली के समाचार, रुद्रप्रयाग के समाचार, हरिद्वार के समाचार और उत्तराखंड से संबंधित अन्य समाचार भी पढ़ सकते हैं। 

आज के अन्य एवं अधिक पढ़े जा रहे उत्तराखंड के नवीनतम अपडेट्स-‘नवीन समाचार’ पर पढ़ें। हमारे व्हाट्सएप चैनल से, फेसबुक ग्रुप से, गूगल न्यूज से, एक्स से, थ्रेड्स चैनल से और डेलीहंट से जुड़ें। अमेजॉन पर सर्वाधिक छूटों के साथ खरीददारी करने के लिए यहां क्लिक करें। यदि आपको लगता है कि ‘नवीन समाचार’ अच्छा कार्य कर रहा है तो हमें यहाँ क्लिक करके सहयोग करें..।

Tags (Challenges Regarding Pindari Glacier) :

Challenges Regarding Pindari Glacier, Challenges Regarding Pindari Glacier, Challenges Regarding Pindari Glacier, Challenges Regarding Pindari Glacier, Challenges Regarding Pindari Glacier, Challenges Regarding Pindari Glacier, Challenges Regarding Pindari Glacier, Challenges Regarding Pindari Glacier, Challenges Regarding Pindari Glacier, Challenges Regarding Pindari Glacier, Challenges Regarding Pindari Glacier, Challenges Regarding Pindari Glacier, Challenges Regarding Pindari Glacier, Challenges Regarding Pindari Glacier, Challenges Regarding Pindari Glacier, Challenges Regarding Pindari Glacier, Challenges Regarding Pindari Glacier, Challenges Regarding Pindari Glacier, Challenges Regarding

Pindari Glacier, Pindari Glacier, Pindari Glacier Uttarakhand, Bageshwar News, Uttarakhand Himalayas, Nanda Devi Biosphere Reserve, Sunderdhunga Glacier, Kafni Glacier, Himalayan Wildlife, Himalayan Medicinal Plants, Uttarakhand Eco Tourism, Climate Change Himalayas, Glacier Retreat, Human Wildlife Conflict, Himalayan Conservation, Uttarakhand Tourism, Pindari Glacier Conservation and Tourism in Uttarakhand, Environmental Challenges in Pindari Glacier Region, Pindari Glacier Retreat Due to Climate Change, Sustainable Eco Tourism in Bageshwar Uttarakhand, Pindari Kafni and Sunderdhunga Glacier Trek Guide, Human Wildlife Conflict in Malla Danpur Villages, Declining Medicinal Plants in the Himalayas,

Livelihood Opportunities for Local Communities in Pindari Valley, Nanda Devi Biosphere Reserve Conservation Challenges, Sustainable Tourism and Biodiversity Conservation in Uttarakhand, Pindari Glacier Environmental Study October 2026, How to Reach Pindari Glacier from Bageshwar, Climate Change Impact on Himalayan Glaciers, Community Based Eco Tourism in Uttarakhand, Protecting Himalayan Culture and Natural Heritage, Hashtags: #NavinSamachar #PindariGlacier #Uttarakhand #Bageshwar #Himalayas #ClimateChange #GlacierRetreat #EcoTourism #NandaDeviBiosphereReserve #WildlifeConservation #HimalayanBiodiversity #SustainableTourism #UttarakhandTourism #EnvironmentalConservation #HimalayanCulture

आप यह भी पढ़ना चाहेंगे :  रेखा आर्य और गिरधारी लाल साहू का पूरा विवाद, कैसे हुई दोनों की शादी, फिर बीच में बहन बनकर आई कथित पत्नी सहित साहू के पुराने आपराधिक मामलों से लेकर कथित ऑडियो और संपत्ति विवाद तक पूरी जानकारी

यह भी पढ़ें : दिल्ली-एनसीआर की धुंध से एक माह पीछे खिसका ‘हिमालय दर्शन’ !

नवीन जोशी, नैनीताल। सामान्यतया पर्वतीय क्षेत्रों में बरसात निपटने के बाद शरद-हेमंत ऋतु के सितम्बर से अच्छी धूप खिलने के साथ नगाधिराज हिमालय के दर्शन होने लगते हैं, और देर से देर पिछले वर्षों में अक्टूबर प्रथम सप्ताह तक हिमालय के बहुत सुंदरता के दीदार हो जाते हैं। यही पहाड़ों की सैर का वर्ष में सबसे बेहतर समय भी होता है, इस मौसम में पर्वतों के वास्तविक सौंदर्य के प्रेमी सैलानी खासकर ऊंची चोटियों से हिमालय को देखने के लिए बड़ी संख्या में पहाड़ों की और उमड़ पड़ते हैं।

किंतु इस वर्ष हिमालय दर्शन एक माह से अधिक पीछे खिसक गया है। इस वर्ष पहली बार 10 नवंबर को हिमालय के दर्शन हुए हैं। आज 11 नवंबर को भी हिमालय के दर्शन हुए, अलबत्ता दोपहर बाद बादलों ने हिमालय को अपने आगोश में छुपा लिया। एक माह देरी से हो रहे हिमालय दर्शन को दिल्ली-एनसीआर में छायी धुंध को कारण माना जा रहा है।

गौरतलब है कि पहाड़ों और खासकर हिमालय में बरसात के बाद आसमान के साफ होने के बाद अक्टूबर-नवंबर के महीनों में, जब मैदानी क्षेत्रों में सर्दियों का कोहरा छाने लगता है, यहां आसमान साफ हो जाता है। पूर्व में हुई बरसात के कारण इन दिनों पहाड़ों का वातावरण साफ भी रहता है, इसलिए इस दौरान यहाँ से सैकड़ों किमी दूर हल्द्वानी, नानकमत्ता, बहेड़ी व काशीपुर, मुरादाबाद तक के मैदानों तथा हिमालय की चोटियों से प्रदेश के गढ़वाल व कुमाऊं अंचलों के साथ ही पड़ोसी राष्ट्र नेपाल की हिमालय की चोटियों को एक नजर में एकाकार होते देखने का भी अनूठा अनुभव प्राप्त होता है।

साथ ही गढ़वाल की पोरबंदी, केदारनाथ, कर्छकुंड से लेकर चौखंभा, नीलकंठ, कामेत, गौरी पर्वत, हाथी पर्वत, नंदाघुंटी, त्रिशूल, मैकतोली (त्रिशूल ईस्ट), प्रख्यात पिंडारी व सुंदरढूंगा ग्लेशियर, नंदा देवी, नंदाकोट, राजरम्भा, लास्पाधूरा, रालाम्पा, नौल्पू व पंचाचूली होते हुऐ नेपाल की एपी नेम्फा की एक, दो व तीन सहित कई अन्य चोटियों की 365 किमी से अधिक लंबी पर्वत श्रृंखला को बेहद करीब से देखा जा सकता है। सरोवरनगरी नैनीताल में हिमालय दर्शन तथा नैना पीक, स्नो व्यू व टिपिन टॉप की चोटियों से हिमालय पर्वत की श्रृंखलाओं का सुंदर नजारा लेने के लिए सैलानी आते हैं, और इनसे यहां के युवाओं को अच्छा रोजगार भी मिल जाता है। किंतु इस वर्ष ऐसा नहीं हुआ।

अक्टूबर पहले सप्ताह की जगह नवंबर के दूसरे सप्ताह से हिमालय के दर्शन होने प्रारंभ हुए हैं। इस पर हिमालय दर्शन स्थल पर सैलानियों को दूरबीन से हिमालय के दर्शन कराने वाले युवा निखिल जोशी व पंकज वर्मा आदि मायूस हैं। पंकज ने कहा कि पहली बार हिमालय दर्शन एक माह पीछे खिसक गया है। वहीं निखिल को आशंका है कि ऐसा दिल्ली-एनसीआर में इस वर्ष ऐतिहासिक तौर पर पहली बार इस मौसम में धुंध छाने का असर हो सकता है। बीते एक माह हिमालय पर भी धुंध छायी रही। इस कारण बंगाली सीजन बेकार गया।

इधर दो-तीन दिन पूर्व केदारनाथ व मुन्स्यारी क्षेत्रों में हिमालय पर बर्फवारी होने के बाद आसमान रात्रि में साफ हुआ। इसके बाद ही बृहस्पतिवार की रात्रि पहली बार इस मौसम में पाला पड़ा, और इसी रात्रि नगर में बारापत्थर के पास रामनगर डिपो की एक रोडवेज बस पाले में फिसलने से सड़क पर पलटी। और इसके बाद ही शुक्रवार को इस मौसम में पहली बार हिमालय के दर्शन हुए। नगर में आ रहे गुजराती सैलानियों ने इनका आनंद उठाया। आगे उम्मीद की जा सकती है कि हिमालय के दीदार होते रहेंगे।

ठंड पर भारी ग्लोबलवार्मिंग, हिमालय पर बर्फ का टोटा

-बढ़ती ठंड के बीच नगाधिराज बता रहा मौसम की हकीकत, मीथेन सुलगा रही पहाड़ों को
डॉ.नवीन जोशी, नैनीताल। देश-प्रदेश सहित समूचे दक्षिणी गोलार्ध से आ रही कंपकंपाती ठंड की खबरों के बीच यह खबर हैरान करने वाली है। भारत ही नहीं एशिया के मौसम की असली तस्वीर बयां करने वाला नगाधिराज हिमालय मौसम की असली कहानी बयां करने को मानो छटपटा रहा है। बीते वर्षों में सर्दियों में भी कम बर्फवारी होने के कारण इन दिनों श्वेत-धवल बर्फ से लकदक रहने वाला हिमालय स्याह पड़ा हुआ है।

उसकी रौनक बेहद फीकी पड़ी हुई है। नैनीताल के निकट हिमालय दर्शन से हिमालय का नजारा ले रहे सैलानियों के साथ ही पुराने गाइड भी हिमालय की बदसूरती को देखकर आहत महसूस कर रहे हैं। वैज्ञानिक ग्लोबल वार्मिंग को इसका कारण बता रहे हैं।

मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार ग्लोबलवार्मिंग पहाड़ों और मैदानों के मौसम को सर्दियों व गर्मियों में दो तरह से प्रभावित कर रहा है। ग्लोबलवार्मिंग व प्रदूषण के कारण धरती के वायुमंडल में मौजूद पौल्यूटेंट्स यानी प्रदूषण के कारक धूल, धुंवा, ग्रीन हाउस गैसों के सूक्ष्म प्रदूषित कण (एरोसोल) तथा नाइट्रोजन डाई ऑक्साइड , कार्बन डाई आक्साइड, सल्फर डाई आक्साइड, जल वाष्प तथा ब्लैक कार्बन के कण धरती के ऊपर ढक्कन जैसा (कैपिंग इफेक्ट) प्रभाव उत्पन्न कर देते हैं। गर्मियों में दिनों में दिन के अधिक घंटे धूप पड़ने के कारण वायुमंडल में मौजूद गर्मी धरती से परावर्तित होकर इस ढक्कन से बाहर नहीं जा पाती, जिस कारण धरती की गर्मी बढ़ जाती है,

जबकि इसके उलट सर्दियों में यही ढक्कन सूर्य की रोशनी को धरती पर नहीं आने देता, साथ ही दिन में कम घंटे धूप पड़ती है, इसलिये धरती गर्म नहीं होने पाती, परिणामस्वरूप मैदानों में कोहरा छा जाता है, और पहाड़ आम तौर पर धूप से गुलजार रहते हैं। इसका परिणाम है कि पहाड़ों पर लगातार सर्दियों के दिनों में बर्फवारी में कमी देखने को मिल रही है। दूसरी ओर एरीज द्वारा ही किये गये एक अध्ययन में पहाड़ों पर मीथेन की मात्रा 2.5 पीपीएम (पार्ट पर मालीक्यूल) तक पाई गई है, जबकि वायुमंडल में मीथेन की मात्रा का विश्व औसत 1.8 से 1.9 पीपीएम है। मौसम वैज्ञानिकों का अनुमान है कि मीथेन की यह बढ़ी हुई मात्रा पहाड़ों पर गर्मी बढ़ाने का बड़ा कारण हो सकती है।

इधर नैनीताल के हिमालय दर्शन से नेपाल की नेम्फा से लेकर प्रदेश के गढ़वाल मंडल के केदारनाथ तक की करीब 365 किमी लंबी हिमालय की पर्वत श्रृंखला का अटूट नजारा बेहद खूबसूरती से नजर आता है, लेकिन हिमालय दर्शन से सैलानियों को दूरबीन की मदद से दशकों से हिमालय नजदीक से दिखा रहे लोग हतप्रभ हैं कि बीते वर्षों में हिमालय की छटा लगातार फीकी पड़ रही है। केवल चोटियों पर ही बर्फ नजर आती है, और शेष हिस्सा काला पड़ा नजर आता है, और बीते वर्षों में इसमें लगातार बढ़ोत्तरी देखी जा रही है। यदि ऐसा है तो यह खतरनाक संकेत हैं। इसके दूरगामी दुष्परिणाम हो सकते हैं।

For Hot Deals in Amazon, Click Here:
In Association with Amazon.in

हिमालय पर्वत की सुन्दर तस्वीरों के लिए इस लाइन को क्लिक करें ….

राज्य के सभी प्रमुख समाचार पोर्टलों में प्रकाशित आज-अभी तक के समाचार पढ़ने के लिए क्लिक करें इस लाइन को…

नियमित रूप से नैनीताल, कुमाऊं, उत्तराखंड के समाचार अपने फोन पर प्राप्त करना चाहते हैं तो हमारे टेलीग्राम ग्रुप में इस लिंक https://t.me/joinchat/NgtSoxbnPOLCH8bVufyiGQ से एवं ह्वाट्सएप ग्रुप से इस लिंक https://chat.whatsapp.com/ECouFBsgQEl5z5oH7FVYCO पर क्लिक करके जुड़ें।

Leave a Reply