उत्तराखंड के 26 साल : अर्थव्यवस्था ने लगाई लंबी छलांग, लेकिन पहाड़ों में पलायन, रोजगार और बुनियादी सुविधाओं की चुनौती बरकरार

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डॉ. नवीन जोशी @ नवीन समाचार, नैनीताल, 8 नवंबर 2026 (26 Years of UK-Developement-Challenges)। उत्तराखंड (Uttarakhand) 9 नवंबर 2026 को अपने गठन के 26 वर्ष पूरे कर रहा है। 9 नवंबर 2000 को उत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh) से अलग होकर अस्तित्व में आए इस हिमालयी राज्य ने इन वर्षों में अपनी अर्थव्यवस्था, बजट, प्रति व्यक्ति आय, सड़क संपर्क, पर्यटन, उद्योग और बुनियादी ढांचे के विस्तार के मामले में लंबी यात्रा तय की है। 
कभी सीमित संसाधनों और छोटे बजट वाले नए राज्य के रूप में शुरू हुआ उत्तराखंड आज 4.27 लाख करोड़ रुपये से अधिक की अनुमानित अर्थव्यवस्था और 1.19 लाख करोड़ रुपये से अधिक के बजट के साथ देश के तेजी से बढ़ते राज्यों में अपनी जगह बना रहा है।
(26 Years of UK-Developement-Challenges) उत्तराखंड की अर्थव्यवस्था में 71 फीसदी हिस्सेदारी 3 मैदानी जिलों की, 26 साल  में बहुत पीछे छूटे पहाड़ी जिले - पहाड़ से मैदान तकलेकिन राज्य की विकास यात्रा का दूसरा पहलू भी है। पहाड़ों से पलायन, खाली होते गांव, स्थानीय स्तर पर पर्याप्त रोजगार का अभाव, स्वास्थ्य और शिक्षा सुविधाओं में क्षेत्रीय असमानता, आपदाओं का बढ़ता आर्थिक नुकसान, भ्रष्टाचार का बरकरार बोलबाला और पर्यटन पर बढ़ता पर्यावरणीय दबाव ऐसे सवाल हैं, जिनका समाधान अभी बाकी है। इसलिए उत्तराखंड के 26 वर्षों का आकलन केवल बढ़ते बजट और अर्थव्यवस्था के आंकड़ों से नहीं, बल्कि इस कसौटी पर भी होना चाहिए कि विकास का लाभ दूरस्थ गांवों और आम पहाड़ी परिवारों तक कितना पहुंचा है।

बजट और अर्थव्यवस्था में 26-27 गुना से अधिक का विस्तार

राज्य गठन के बाद उत्तराखंड के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपनी आर्थिक और प्रशासनिक व्यवस्था खड़ी करने की थी। मई 2001 में राज्य की पहली सरकार के वित्त मंत्री डॉ. रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ (Dr. Ramesh Pokhriyal ‘Nishank’) ने राज्य का पहला बजट प्रस्तुत किया था। तब वित्तीय वर्ष 2001-02 में राज्य का बजट लगभग 4,506 करोड़ रुपये था।
लेकिन वर्ष 2026-27 के मूल बजट में यह बढ़कर 1,11,703.21 करोड़ रुपये हो गया। इसके बाद 7,844.18 करोड़ रुपये का अनुपूरक बजट प्रस्तुत किए जाने से कुल बजट का आकार 1,19,547.39 करोड़ रुपये पहुंच गया है। इस तरह शुरुआती बजट की तुलना में वर्तमान बजट का आकार 26 गुने से अधिक हो चुका है।  
यहां एक अंतर समझना जरूरी है। 1,11,703 करोड़ रुपये वर्ष 2026-27 का मूल बजट है, जबकि 1,19,547 करोड़ रुपये अनुपूरक बजट सहित कुल बजट का आकार है। इसलिए दोनों आंकड़े अलग-अलग संदर्भों में सही हैं।

राज्य की अर्थव्यवस्था का आकार भी इस अवधि में तेजी से बढ़ा है। वर्ष 2001-02 में प्रचलित कीमतों पर सकल राज्य घरेलू उत्पाद (Gross State Domestic Product-GSDP) लगभग 15,826 करोड़ रुपये था। वर्ष 2026-27 के बजट अनुमान में यह बढ़कर 4,27,716 करोड़ रुपये आंका गया है। यानी राज्य की अर्थव्यवस्था का आकार शुरुआती वर्षों की तुलना में लगभग 27 गुना हो चुका है। हालांकि, यह वृद्धि प्रचलित कीमतों पर है, जिसमें वस्तुओं और सेवाओं के उत्पादन के साथ महंगाई का प्रभाव भी शामिल रहता है। इसे वास्तविक उत्पादन वृद्धि के बराबर नहीं माना जाना चाहिए।
उल्लेखनीय है कि वित्तीय वर्ष 2020-21 में राज्य का बजट लगभग 53,526 करोड़ रुपये था। पांच-छह वर्षों में इसका बढ़कर अनुपूरक बजट सहित 1.19 लाख करोड़ रुपये से अधिक यानी लगभग दोगुना होना राज्य की बढ़ती वित्तीय गतिविधियों और विकास योजनाओं के विस्तार को दर्शाता है। लेकिन बजट का बड़ा होना तभी वास्तविक उपलब्धि बनेगा, जब धन का उपयोग समय पर और प्रभावी ढंग से हो तथा उसका लाभ राज्य के सभी क्षेत्रों तक पहुंचे।

प्रति व्यक्ति आय में राष्ट्रीय औसत और पड़ोसी राज्य हिमांचल व उत्तर प्रदेश से भी आगे निकला उत्तराखंड 

उत्तराखंड की आर्थिक प्रगति का एक महत्वपूर्ण संकेत प्रति व्यक्ति आय में हुई वृद्धि है। वर्ष 2001-02 में राज्य की प्रति व्यक्ति आय लगभग 15,285 रुपये थी। राज्य के आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 के अनुसार, वर्ष 2025-26 में प्रति व्यक्ति आय का अनुमान 2,73,921 रुपये तक पहुंच गया है। यह पिछले वर्षों की तुलना में बड़ी वृद्धि है।
राज्य सरकार की ओर से जारी आंकड़ों में राष्ट्रीय औसत प्रति व्यक्ति आय लगभग 2.12 लाख रुपये और हिमाचल प्रदेश (Himachal Pradesh) की प्रति व्यक्ति आय लगभग 2.57 लाख रुपये बताई गई है। इसके अतिरिक्त उत्तराखंड के पूर्ववर्ती राज्य उत्तर प्रदेश की प्रति व्यक्ति आय आर्थिक सर्वेक्षण और हालिया सरकारी बजट के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार वित्तीय वर्ष 2024-25 में ₹1,09,844 रही और वर्ष 2025-26 के लिए इसके बढ़कर लगभग ₹1,20,000 तक पहुँचने का अनुमान लगाया गया है। इस प्रकार प्रति व्यक्ति आय में उत्तराखंड ने उत्तर प्रदेश को पीछे कर दिया है।
इन तुलनाओं में उत्तराखंड आगे दिखाई देता है। हालांकि, प्रति व्यक्ति आय औसत आर्थिक उत्पादन का संकेतक है, इसका अर्थ यह नहीं है कि राज्य के प्रत्येक नागरिक की वास्तविक आमदनी इतनी हो गई है। पहाड़ और मैदान, ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों तथा अलग-अलग आय वर्गों के बीच अंतर अब भी बना हुआ है।

सड़क, रेल और संपर्क सुविधाओं का विस्तार

राज्य गठन के समय उत्तराखंड के अनेक पर्वतीय गांव सड़क संपर्क से दूर थे। दुर्गम भौगोलिक परिस्थितियों के कारण लोगों को स्वास्थ्य, शिक्षा, बाजार और प्रशासनिक सेवाओं तक पहुंचने में कठिनाई होती थी। पिछले 26 वर्षों में सड़क नेटवर्क का विस्तार इस दिशा में महत्वपूर्ण बदलाव रहा है।
लोक निर्माण विभाग के 2026-31 के मास्टर प्लान के अनुसार, वर्ष 2000 में राज्य में लगभग 15,470 किलोमीटर सड़क नेटवर्क था, जो वर्ष 2025 तक बढ़कर करीब 42,157 किलोमीटर हो गया। इसी अवधि में सड़क से जुड़े गांवों की संख्या 10,048 से बढ़कर 14,027 हो गई। यानी लगभग 3,979 अतिरिक्त गांव सड़क संपर्क से जुड़े।

रेल संपर्क में कुमाऊँ की उपेक्षा !

रेल संपर्क के क्षेत्र में ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल परियोजना (Rishikesh-Karnaprayag Railway Project) महत्वपूर्ण है। इसके पूरा होने से गढ़वाल के पर्वतीय क्षेत्रों तक रेल पहुंचने की दिशा में बड़ा बदलाव संभव है। दिल्ली-देहरादून आर्थिक गलियारा (Delhi-Dehradun Economic Corridor), चारधाम सड़क परियोजना (Char Dham Road Project) जैसी योजनाएं भी राज्य की संपर्क व्यवस्था और आर्थिक गतिविधियों को प्रभावित कर सकती हैं। इस दिशा में उत्तराखंड का कुमाऊँ मंडल काफी पीछे और उपेक्षित लगता है।
टनकपुर-बागेश्वर रेल परियोजना आजादी के बाद से कुमाऊँ में धरातल पर एक इंच रेल लाइन आगे बढ़ी नजर नहीं आती है। यह भी है कि बन रही परियोजनाओं का वास्तविक लाभ भी तभी व्यापक होगा, जब इनके साथ स्थानीय बाजार, सार्वजनिक परिवहन, सुरक्षित सड़कें और पर्यावरणीय संतुलन भी सुनिश्चित किया जाए।

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पर्यटन बना अर्थव्यवस्था और रोजगार का बड़ा आधार

उत्तराखंड की पहचान धार्मिक, प्राकृतिक और साहसिक पर्यटन से जुड़ी है। चारधाम यात्रा, हरिद्वार और ऋषिकेश, नैनीताल, मसूरी, औली, मुनस्यारी, चोपता, कौसानी, टिहरी झील और कॉर्बेट जैसे स्थलों ने पर्यटन को राज्य की अर्थव्यवस्था का प्रमुख आधार बनाया है।
बदरीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री की चारधाम यात्रा का लाभ केवल मंदिरों तक सीमित नहीं रहता। यात्रा मार्ग के होटल, धर्मशालाएं, होमस्टे, भोजनालय, टैक्सी और बस संचालक, स्थानीय दुकानदार, घोड़ा-खच्चर संचालक, डंडी-कंडी सेवा देने वाले और स्थानीय गाइड इससे आजीविका प्राप्त करते हैं। यात्रियों का खर्च रास्ते के छोटे कस्बों और गांवों तक आर्थिक गतिविधियां पहुंचाता है।
वर्ष 2026 में चारधाम यात्रा में 62.5 लाख से अधिक श्रद्धालुओं के पहुंचने का आंकड़ा उपलब्ध कराया गया है। इस सीजन में केदारनाथ धाम (Kedarnath Dham) में ही 19 लाख से अधिक श्रद्धालुओं के पहुंचने की जानकारी दी गई है। इतनी बड़ी संख्या में यात्रियों का पहुंचना धार्मिक पर्यटन की आर्थिक क्षमता को दर्शाता है। हालांकि, यात्रियों की संख्या के साथ यात्रा मार्गों पर यातायात, ठहरने की व्यवस्था, कचरा प्रबंधन, जल उपलब्धता और पर्यावरण संरक्षण की चुनौतियां भी बढ़ती हैं।
राज्य सरकार के अनुसार, वर्ष 2025 में उत्तराखंड में छह करोड़ से अधिक पर्यटक पहुंचे थे। इनमें धार्मिक यात्रियों के साथ अन्य पर्यटन स्थलों पर आने वाले पर्यटक भी शामिल हैं।  
पर्यटन का एक महत्वपूर्ण उदाहरण रामनगर स्थित कॉर्बेट टाइगर रिजर्व (Jim Corbett Tiger Reserve) भी है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार वित्तीय वर्ष 2024-25 में यहां डे-विजिट, रात्रि विश्राम और संग्रहालयों सहित कुल 4,59,395 पर्यटक पहुंचे। इन गतिविधियों से पार्क प्रशासन को लगभग 29.80 करोड़ रुपये का राजस्व प्राप्त हुआ।
वित्तीय वर्ष 2023-24 में पर्यटकों की संख्या 3,44,655 और राजस्व 23.29 करोड़ रुपये था। यह पार्क प्रशासन की आय है, कॉर्बेट क्षेत्र में पर्यटन से होने वाली कुल कमाई नहीं। पर्यटकों के होटल, भोजन, परिवहन और अन्य सेवाओं पर खर्च का लाभ आसपास के कारोबारियों को भी मिलता है।

26 वर्षों में नैनीताल का पर्यटन मॉल रोड से गांवों तक पहुंचा

उत्तराखंड के नैनीताल जनपद में राज्य गठन के बाद पर्यटन का दायरा नैनीताल नगर और मॉल रोड से आगे बढ़कर भीमताल, नौकुचियाताल, भवाली, पंगोट, रामगढ़, मुक्तेश्वर और कैंची धाम तक पहुंचा है। धार्मिक, ग्रामीण और साहसिक पर्यटन के विस्तार से होमस्टे, स्थानीय उत्पादों तथा स्वरोजगार के नए अवसर बने हैं।
जनपद में वर्ष 2025 में 13.11 लाख से अधिक पर्यटक पहुंचे, जबकि जनवरी से अगस्त 2026 तक ही यह संख्या 12.12 लाख से अधिक रही। हालांकि ये आंकड़े जनपद स्तर के हैं, जबकि वर्ष 2001 में नैनीताल नगर में लगभग 3.6 लाख पर्यटकों के पहुँचने के आँकड़े उपलब्ध हैं।
जनपद में ग्रामीण पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए ‘विरासत परियोजना’ के तहत 60 पारंपरिक घरों को महिला स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से ‘बाखली’ ब्रांड के अंतर्गत होमस्टे के रूप में विकसित करने की योजना बनाई गई है। साथ ही कैंची धाम में बढ़ती श्रद्धालुओं की संख्या से धार्मिक पर्यटन को विस्तार मिला है, वहीं भीमताल और नौकुचियाताल में नौकायन व पैराग्लाइडिंग, पंगोट में पक्षी अवलोकन तथा मुक्तेश्वर क्षेत्र में प्रकृति पर्यटन आकर्षण बढ़ा रहे हैं।
दूसरी ओर, पर्यटकों की बढ़ती संख्या से नैनीताल में यातायात, पार्किंग, झीलों के प्रदूषण और पर्यावरण पर दबाव की चुनौतियां भी सामने आई हैं। ऐसे में पर्यटन विकास के साथ स्थानीय लोगों की आय, रोजगार और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाना जरूरी है। 

होमस्टे और स्थानीय उत्पादों से गांवों में रोजगार की संभावना

पर्वतीय क्षेत्रों में पर्यटन का सबसे बड़ा अवसर यह है कि पर्यटक केवल बड़े पर्यटन स्थलों तक सीमित न रहें, बल्कि आसपास के गांवों में भी ठहरें। होमस्टे (Homestay) इस दिशा में उपयोगी माध्यम बन रहे हैं और बन सकते हैं। ग्रामीण परिवार अपने घरों के कमरे पर्यटकों को उपलब्ध कराकर आय प्राप्त कर सकते हैं। इसके साथ स्थानीय भोजन, जैविक उत्पाद, हस्तशिल्प, लोक संस्कृति और गांव आधारित भ्रमण की मांग भी बढ़ सकती है।
औली, चोपता, मुनस्यारी, कौसानी, पिथौरागढ़, टिहरी झील और दूसरे प्राकृतिक पर्यटन स्थलों में होमस्टे, टैक्सी, स्थानीय गाइड और साहसिक पर्यटन से जुड़े कारोबार के अवसर हैं। राज्य सरकार के अनुसार, होमस्टे योजना और स्थानीय उत्पादों को बढ़ावा देने के प्रयासों के साथ वर्ष 2025 तक पर्यटन क्षेत्र में निवेश और गतिविधियों का विस्तार हुआ है।  
हाउस ऑफ हिमालयाज (House of Himalayas) ब्रांड के माध्यम से राज्य के स्थानीय उत्पादों को व्यापक बाजार तक पहुंचाने की कोशिश भी की जा रही है। मंडुवा, झंगोरा, पहाड़ी दालें, शहद, मसाले, हस्तशिल्प और पारंपरिक उत्पादों को बेहतर विपणन और प्रसंस्करण सुविधाएं मिलें तो ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत किया जा सकता है। लेकिन इसके लिए उत्पादों का नियमित संग्रह, गुणवत्ता नियंत्रण, पैकेजिंग, परिवहन और बाजार तक पहुंच सुनिश्चित करना आवश्यक है।

उद्योग, निवेश और ऊर्जा के क्षेत्र में बढ़ते अवसर

राज्य गठन के बाद हरिद्वार, ऊधमसिंह नगर और देहरादून के मैदानी क्षेत्रों में औद्योगिक गतिविधियों का विस्तार हुआ। सिडकुल (State Infrastructure and Industrial Development Corporation of Uttarakhand Limited-SIDCUL) जैसे औद्योगिक क्षेत्रों ने विनिर्माण, फार्मा, ऑटोमोबाइल और अन्य उद्योगों को स्थान दिया। इससे रोजगार और राज्य के राजस्व में योगदान बढ़ा है।
राज्य सरकार के अनुसार, वैश्विक निवेशक सम्मेलन (Global Investors Summit) में 3.56 लाख करोड़ रुपये से अधिक के निवेश समझौते हुए थे, जिनमें से एक लाख करोड़ रुपये से अधिक के निवेश धरातल पर उतारे जा चुके हैं। यह सरकार की ओर से प्रस्तुत आंकड़ा है। निवेश समझौतों और वास्तविक निवेश में अंतर होता है, इसलिए रोजगार और उत्पादन के वास्तविक आंकड़ों से ही इनके प्रभाव का आकलन किया जाना चाहिए। हालांकि यह भी आरोप हैं कि राज्य सरकार ने इन आंकड़ों में सामान्य तौर पर लगने वाले चक्की और मेडिकल स्टोर स्थापित करने जैसे निजी उद्यमों को भी जोड़ दिया है।
ऊर्जा के क्षेत्र में भी उत्तराखंड की प्राकृतिक क्षमता महत्वपूर्ण है। जलविद्युत परियोजनाओं के साथ सौर ऊर्जा का विस्तार हुआ है। राज्य सरकार के अनुसार, सौर ऊर्जा उत्पादन क्षमता एक गीगावाट से अधिक हो चुकी है और 42 हजार से अधिक घरों में सौर छत प्रणालियां स्थापित की गई हैं। लेकिन जलविद्युत परियोजनाओं के निर्माण में भूस्खलन, नदी पारिस्थितिकी, स्थानीय विस्थापन और आपदा जोखिम जैसे पहलुओं का ध्यान रखना भी जरूरी है।

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खेल, महिला सशक्तीकरण और सामाजिक योजनाएं

उत्तराखंड ने खेलों के क्षेत्र में भी अपनी पहचान मजबूत करने की कोशिश की है। वर्ष 2025 में राज्य में राष्ट्रीय खेलों (National Games) का आयोजन हुआ। राज्य सरकार के अनुसार, इन खेलों में उत्तराखंड के खिलाड़ियों ने 103 पदक जीते। इससे खेल सुविधाओं, प्रशिक्षण और खेल पर्यटन को बढ़ावा देने की संभावनाएं बनी हैं।
महिलाओं को सरकारी नौकरियों में 30 प्रतिशत क्षैतिज आरक्षण देने की व्यवस्था भी राज्य की प्रमुख नीतिगत पहलों में शामिल है। इसके साथ स्वयं सहायता समूहों और ग्रामीण आजीविका योजनाओं के माध्यम से महिलाओं को आर्थिक गतिविधियों से जोड़ने का प्रयास किया गया है। मुख्यमंत्री के अनुसार, राज्य में तीन लाख से अधिक महिलाएं लखपति दीदी (Lakhpati Didi) बन चुकी हैं। इस उपलब्धि का स्थायी महत्व तभी होगा, जब महिलाओं की आय नियमित हो और उन्हें बाजार, प्रशिक्षण, ऋण तथा उत्पादों के विपणन की बेहतर सुविधाएं मिलें।
राज्य में समान नागरिक संहिता (Uniform Civil Code-UCC) 27 जनवरी 2025 से लागू की गई। उत्तराखंड देश का पहला राज्य बना जिसने स्वतंत्रता के बाद इस कानून को लागू किया। इसके अतिरिक्त नकल विरोधी कानून, धर्मांतरण विरोधी कानून और भूमि संबंधी कानूनों में बदलाव भी राज्य सरकार के प्रमुख निर्णयों में शामिल हैं। इन कानूनों के प्रभाव का आकलन उनके क्रियान्वयन, नागरिकों के अधिकारों और न्यायिक परीक्षण के आधार पर किया जाना चाहिए।

राज्य सरकार के अनुसार, पिछले पांच वर्षों में 35 हजार से अधिक युवाओं को सरकारी नौकरियां दी गई हैं। भर्ती परीक्षाओं में अनियमितताओं को रोकने के लिए सख्त नकल विरोधी कानून भी लागू किया गया है। यह रोजगार के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण पहल है, लेकिन राज्य के युवाओं की बड़ी संख्या के लिए सरकारी नौकरी ही एकमात्र विकल्प नहीं हो सकती। निजी क्षेत्र, स्थानीय उद्योग, कृषि आधारित उद्यम, पर्यटन और सेवा क्षेत्र में स्थायी रोजगार पैदा करना भी उतना ही जरूरी है।
 

विकास के आंकड़ों के बीच सबसे बड़ी चुनौती: पहाड़ों से पलायन

उत्तराखंड के गठन का एक प्रमुख उद्देश्य पर्वतीय क्षेत्रों का विकास और वहां के लोगों को अपने घरों के पास रोजगार तथा बेहतर सुविधाएं उपलब्ध कराना था। लेकिन 26 वर्ष बाद भी यह लक्ष्य पूरी तरह हासिल नहीं हो पाया है, यह कड़वी सच्चाई है। राज्य के अनेक गांवों में आबादी घट रही है और कई गांव पूरी तरह खाली हो चुके हैं।

राज्य के ग्रामीण विकास एवं पलायन निवारण आयोग तथा अन्य सरकारी आंकड़ों के आधार पर वर्ष 2026 में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार, उत्तराखंड में पूरी तरह खाली हो चुके गांवों की संख्या लगभग 1,768 से 1,792 के बीच है। अलग-अलग आंकड़ों में अंतर का कारण गणना की अवधि और गांवों के वर्गीकरण का तरीका है। वर्ष 2011 की जनगणना में 1,048 गांव निर्जन दर्ज थे। इसके बाद के वर्षों में भी सैकड़ों गांव खाली हुए।
पलायन के पीछे रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, पेयजल और खेती से जुड़ी समस्याएं प्रमुख कारण हैं। पहाड़ों में खेती की लागत बढ़ना, जंगली जानवरों से फसलों को नुकसान, सिंचाई की कमी और उत्पादों को बाजार तक पहुंचाने में कठिनाई ने ग्रामीण आजीविका को प्रभावित किया है।
संयुक्त राष्ट्र (United Nations) की फरवरी 2026 में प्रकाशित एक रिपोर्ट ने भी उत्तराखंड के पर्वतीय गांवों से पलायन के पीछे कमजोर आजीविका, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं तथा जलवायु परिवर्तन से बढ़ती चुनौतियों को प्रमुख कारण बताया है।
यही उत्तराखंड के विकास की सबसे बड़ी विडंबना है कि एक ओर राज्य की अर्थव्यवस्था का आकार बढ़ रहा है, दूसरी ओर पहाड़ के अनेक गांवों में घरों पर ताले लग रहे हैं। राज्य के विकास का वास्तविक मूल्यांकन इस बात से होगा कि पलायन करने वाले परिवार वापस लौटने के लिए कितने आश्वस्त हो पाते हैं।

रोजगार में वृद्धि के बावजूद युवाओं के सामने चुनौती

राज्य सरकार ने पिछले पांच वर्षों में 35 हजार से अधिक सरकारी नौकरियां देने की बात कही है। लेकिन सरकारी नौकरियों की संख्या राज्य के सभी बेरोजगार युवाओं की जरूरतों को पूरा नहीं कर सकती। निजी क्षेत्र में स्थायी और बेहतर वेतन वाले रोजगार का विस्तार अभी भी बड़ी चुनौती है।
मार्च 2026 में जारी राज्य आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार, वर्ष 2024-25 में राज्य की आर्थिक विकास दर 7.23 प्रतिशत रही। इसी अवधि में श्रमबल भागीदारी दर 60.1 प्रतिशत से बढ़कर 64.4 प्रतिशत हुई। बहुआयामी गरीबी सूचकांक (Multidimensional Poverty Index) भी 2021-22 के 9.7 प्रतिशत से घटकर 2024-25 में 6.92 प्रतिशत रह गया। ये आंकड़े सकारात्मक बदलाव दर्शाते हैं, लेकिन रोजगार की गुणवत्ता, नियमित आय और युवाओं के लिए स्थानीय अवसरों का प्रश्न अब भी बना हुआ है।
विशेष रूप से पहाड़ी जिलों में रोजगार के अवसर सीमित होने से युवा देहरादून, हल्द्वानी, ऋषिकेश, हरिद्वार और राज्य से बाहर के शहरों की ओर जा रहे हैं। पर्यटन और होमस्टे से रोजगार के अवसर तो बन रहे हैं, लेकिन वे पूरे वर्ष नियमित आय देने में अभी सक्षम नहीं हैं। स्थानीय स्तर पर कृषि प्रसंस्करण, फल-सब्जी आधारित उद्योग, जड़ी-बूटी, हस्तशिल्प और सूचना प्रौद्योगिकी जैसे क्षेत्रों में अधिक काम किए जाने की आवश्यकता है।

स्वास्थ्य और शिक्षा में मैदान-पहाड़ की दूरी

उत्तराखंड में शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं का विस्तार हुआ है। नए विद्यालय, महाविद्यालय, तकनीकी संस्थान और चिकित्सालय स्थापित हुए हैं। एम्स ऋषिकेश (All India Institute of Medical Sciences, Rishikesh) जैसे संस्थानों ने चिकित्सा सेवाओं को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दी है। लेकिन दूरस्थ पर्वतीय क्षेत्रों में विशेषज्ञ चिकित्सकों, शिक्षकों और अन्य कर्मचारियों की उपलब्धता अब भी चुनौती है।
कई पर्वतीय क्षेत्रों में गंभीर बीमारी की स्थिति में मरीजों को जिला मुख्यालय या मैदानी शहरों तक पहुंचाना पड़ता है। गर्भवती महिलाओं, बुजुर्गों और दुर्घटना में घायल लोगों के लिए समय पर चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराना आज भी कठिन है। इसी तरह विद्यालयों में विद्यार्थियों की घटती संख्या और शिक्षकों की उपलब्धता का प्रश्न भी महत्वपूर्ण है।
बजट में शिक्षा के लिए वर्ष 2026-27 में कुल व्यय का 15.9 प्रतिशत आवंटित किया गया है, जो राज्यों के औसत 14.5 प्रतिशत से अधिक है। लेकिन स्वास्थ्य के लिए 5.9 प्रतिशत आवंटन राज्यों के औसत 6.2 प्रतिशत से कम है। इससे स्पष्ट है कि स्वास्थ्य क्षेत्र में संसाधनों के विस्तार की जरूरत बनी हुई है।

आपदाओं और पर्यावरणीय दबाव के बीच विकास का रास्ता

उत्तराखंड की भौगोलिक स्थिति उसे प्राकृतिक आपदाओं के प्रति संवेदनशील बनाती है। वर्षा, भूस्खलन, बादल फटना, बाढ़ और हिमस्खलन जैसी घटनाएं हर वर्ष जनजीवन और अर्थव्यवस्था को प्रभावित करती हैं। सड़क, पुल, पेयजल योजनाएं, बिजली व्यवस्था, मकान और कृषि भूमि को नुकसान पहुंचता है।
वर्ष 2025 की प्राकृतिक आपदाओं के बाद राज्य सरकार की ओर से तैयार आपदा पश्चात आवश्यकता आकलन (Post Disaster Needs Assessment-PDNA) के अनुसार, आपदाओं का अनुमानित आर्थिक प्रभाव 15,103.5 करोड़ रुपये रहा। इसमें प्रत्यक्ष क्षति 3,792.4 करोड़ रुपये और आर्थिक नुकसान 312.2 करोड़ रुपये आंका गया। पुनर्निर्माण, पुनर्वास और सुधार के लिए लगभग 10,999 करोड़ रुपये की आवश्यकता बताई गई। बुनियादी ढांचे को सबसे अधिक नुकसान हुआ।
इसलिए राज्य के सामने चुनौती केवल सड़कें, बांध, सुरंगें और पर्यटन सुविधाएं बनाने की नहीं है, बल्कि उन्हें हिमालय की संवेदनशीलता के अनुरूप सुरक्षित और टिकाऊ बनाने की भी है। अनियंत्रित निर्माण, पहाड़ों की कटाई, नदियों के किनारे बढ़ती गतिविधियां और पर्यटन स्थलों पर क्षमता से अधिक भीड़ भविष्य के लिए गंभीर जोखिम पैदा कर सकती है।
चारधाम यात्रा और पर्यटन से आय बढ़ना जरूरी है, लेकिन पर्यावरणीय क्षमता से अधिक यात्रियों का दबाव स्थानीय जल स्रोतों, कचरा प्रबंधन और यातायात व्यवस्था पर असर डाल सकता है। विकास की योजनाओं में वैज्ञानिक अध्ययन, स्थानीय समुदायों की भागीदारी और आपदा जोखिम का आकलन अनिवार्य होना चाहिए।

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26 वर्षों की उपलब्धियों के बाद अब किस दिशा में बढ़े उत्तराखंड?

उत्तराखंड ने इन 26 वर्षों में अपनी अलग आर्थिक और प्रशासनिक पहचान बनाई है। राज्य का बजट 4,506 करोड़ रुपये से बढ़कर अनुपूरक बजट सहित 1.19 लाख करोड़ रुपये से अधिक हो गया है। अर्थव्यवस्था 15,826 करोड़ रुपये से बढ़कर 4.27 लाख करोड़ रुपये से अधिक के अनुमानित आकार तक पहुंची है। प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि हुई है, सड़क नेटवर्क विस्तृत हुआ है, पर्यटन और उद्योगों को विस्तार मिला है और राज्य ने राष्ट्रीय स्तर पर कई नीतिगत पहल भी की हैं।
लेकिन राज्य गठन के आंदोलन के पीछे केवल एक अलग विधानसभा, सचिवालय या राजधानी की मांग नहीं थी। इसके पीछे पहाड़ के लोगों की आकांक्षा थी कि उन्हें अपने क्षेत्र में रोजगार मिले, बच्चों को अच्छी शिक्षा मिले, बीमार होने पर समय पर उपचार मिले, गांवों में सड़क और पानी पहुंचे तथा उन्हें रोजी-रोटी के लिए अपना घर छोड़कर दूर न जाना पड़े।
इसलिए अगले 26 वर्षों के लिए उत्तराखंड की प्राथमिकताएं भी स्पष्ट होनी चाहिए:

  • पर्वतीय जिलों में स्थानीय संसाधनों पर आधारित स्थायी रोजगार और उद्योग विकसित हों।
  • खाली होते गांवों में सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा, पेयजल और इंटरनेट जैसी बुनियादी सुविधाएं पहुंचें।
  • कृषि, बागवानी, पशुपालन और स्थानीय उत्पादों के प्रसंस्करण तथा विपणन की मजबूत व्यवस्था बने।
  • पर्यटन को केवल यात्रियों की संख्या से नहीं, बल्कि स्थानीय लोगों की आय और पर्यावरणीय संतुलन से भी मापा जाए।
  • स्वास्थ्य और शिक्षा सेवाओं में दूरस्थ पर्वतीय क्षेत्रों को प्राथमिकता मिले।
  • सड़क, रेल, जलविद्युत और अन्य बड़ी परियोजनाएं हिमालय की पर्यावरणीय संवेदनशीलता और आपदा जोखिम को ध्यान में रखकर बनाई जाएं।
  • सरकारी योजनाओं और निवेश समझौतों के साथ वास्तविक रोजगार, स्थानीय आय और गांवों में हुए बदलाव का सार्वजनिक आकलन हो।

26 साल का उत्तराखंड: उपलब्धियों का उत्सव, अधूरे सपनों को पूरा करने का संकल्प

9 नवंबर 2000 को जब उत्तराखंड अलग राज्य बना था, तब इसके सामने संसाधनों की कमी, सीमित आर्थिक आधार और दुर्गम भौगोलिक परिस्थितियों जैसी अनेक चुनौतियां थीं। आज 26 वर्ष बाद राज्य ने आर्थिक विकास, बजट, पर्यटन, उद्योग, सड़क और सामाजिक योजनाओं के क्षेत्र में उल्लेखनीय विस्तार किया है। इन उपलब्धियों को कम करके नहीं आंका जा सकता।
लेकिन उत्तराखंड की असली सफलता तब होगी, जब देहरादून, हरिद्वार और ऊधमसिंह नगर के साथ पिथौरागढ़, चमोली, उत्तरकाशी, बागेश्वर, चंपावत, अल्मोड़ा और पौड़ी के दूरस्थ गांवों में भी विकास का समान प्रभाव दिखाई दे। जब गांवों से पलायन मजबूरी न रहे, युवा अपने क्षेत्र में सम्मानजनक रोजगार पा सकें और लोगों को बुनियादी सुविधाओं के लिए लंबी दूरी तय न करनी पड़े।
राज्य ने 26 वर्षों में आर्थिक रूप से लंबी छलांग लगाई है। अब जरूरत इस विकास को पहाड़ के अंतिम गांव और अंतिम परिवार तक पहुंचाने की है। यही राज्य आंदोलन के सपनों के प्रति सच्ची प्रतिबद्धता और उत्तराखंड के अगले विकास अध्याय की सबसे बड़ी कसौटी होगी।

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