नवीन समाचार, देहरादून, 23 अक्टूबर 2026 (Ashvini Vaishnav-Rishikesh-Karnaprayag)। केंद्रीय रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव (Ashwini Vaishnaw) ने उत्तराखंड की 125 किलोमीटर लंबी ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल परियोजना (Rishikesh-Karnaprayag Railway Project) की प्रगति की सराहना करते हुए इसे हिमालय के कठिन भूभाग में निर्माण कौशल का उत्कृष्ट उदाहरण और उत्तराखंड के भविष्य की जीवनरेखा बताया है। गुरुवार को सामाजिक माध्यम एक्स (X) पर साझा संदेश में उन्होंने कहा कि परियोजना की लगभग 83 प्रतिशत लंबाई सुरंगों से होकर गुजरेगी। इस रेल लाइन से गढ़वाल क्षेत्र की रेल संपर्क सुविधा बढ़ने के साथ चारधाम यात्रा, पर्यटन और स्थानीय आर्थिक गतिविधियों को भी लाभ मिलने की अपेक्षा है। आप यह संबंधित वीडियो भी जरूर देखना चाहेंगे :
प्राप्त जानकारी के अनुसार रेल मंत्री ने अपने संदेश में 125 किलोमीटर लंबाई, 12 स्टेशनों और 83 प्रतिशत सुरंगों का उल्लेख किया। परियोजना में देहरादून, टिहरी गढ़वाल, पौड़ी गढ़वाल, रुद्रप्रयाग और चमोली जनपदों के क्षेत्र शामिल हैं। रेल संपर्क विकसित होने से देवप्रयाग और कर्णप्रयाग जैसे धार्मिक एवं पर्यटन स्थलों तक पहुंच आसान होगी। परियोजना का निर्माण रेल विकास निगम लिमिटेड (Rail Vikas Nigam Limited—RVNL) कर रहा है। आप यह पूर्व संबंधित समाचार भी जरूर पढ़ना चाहेंगे : उत्तराखंड में रेल परियोजनाओं पर नई पहल, कर्णप्रयाग से बागेश्वर तक रेल विस्तार, एस्केप टनल का सड़क के रूप में उपयोग और पहली बार देखा जा रहा अल्मोड़ा तक रेल का सपना…
16 मुख्य सुरंगें और 12 निकास सुरंगें, कठिन पहाड़ी भूभाग में निर्माण
परियोजना की सबसे बड़ी विशेषता इसका विस्तृत सुरंग तंत्र है। इसमें 16 मुख्य रेल सुरंगों की कुल लंबाई लगभग 104 किलोमीटर है। इनके अतिरिक्त आपातकाल में सुरक्षित निकासी के लिए 12 निकास सुरंगें बनाई जा रही हैं, जिनकी कुल लंबाई लगभग 98 किलोमीटर है। परियोजना में प्रमुख और छोटे पुलों का निर्माण भी शामिल है। आप यह पूर्व संबंधित समाचार भी जरूर पढ़ना चाहेंगे : उत्तराखंड मे 510 किमी रेल लाइन विस्तार की चार बड़ी परियोजनाओं को तेजी देने की तैयारी, राज्य सरकार और रेलवे बोर्ड के बीच बनी सहमति
हालिया उपलब्ध परियोजना विवरण के अनुसार लगभग 101 किलोमीटर मुख्य सुरंगों और 95 किलोमीटर से अधिक निकास सुरंगों की खुदाई पूरी हो चुकी है। 16 मुख्य सुरंगों में से 13 और 12 निकास सुरंगों में से 10 में दोनों ओर से खुदाई के मिलने की स्थिति हासिल हो चुकी है। हालांकि शेष हिस्सों में निर्माण कार्य जारी है।
रेल मंत्री ने बताया कि परियोजना के अधिकांश खंडों में काम काफी आगे बढ़ चुका है, लेकिन टी-1 और टी-5 सुरंगों में विशेष चुनौतियां बनी हुई हैं।
11 किलोमीटर लंबी सुरंग सबसे चुनौतीपूर्ण
अश्विनी वैष्णव के अनुसार लगभग 11 किलोमीटर लंबी टी-1 सुरंग परियोजना के सबसे कठिन हिस्सों में से एक है। यहां की भूवैज्ञानिक परिस्थितियां जटिल हैं और आसपास आबादी भी है। ऐसे क्षेत्र में जमीन को स्थिर रखने के लिए सूक्ष्म आधार खंभों (Micropiles) का उपयोग किया जा रहा है।
हिमालय की भूगर्भीय संरचना युवा वलित पर्वतों (Young Fold Mountains) जैसी है। यहां कई स्थानों पर चट्टानों और मिट्टी की प्रकृति ऐसी है कि सुरंग की खुदाई के बाद आसपास का भूभाग अंदर की ओर दबाव डाल सकता है। इससे सुरंग की जगह कम होने और उसकी संरचना पर अतिरिक्त दबाव पड़ने का खतरा रहता है।
मंत्री ने बताया कि इन परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए सुरंग खोदने वाली मशीनों के डिजाइन में विशेष बदलाव किये गये। मशीन के काटने वाले अग्रभाग, बाहरी सुरक्षा आवरण और सुरंग की भीतरी दीवारों पर खंडवार अस्तर लगाने वाली व्यवस्था में सुधार किया गया। इसके साथ ही मशीन की संचालन प्रणाली को इस तरह तैयार किया गया कि उसे अधिक घूर्णन बल (Torque) और धक्का देने की क्षमता (Thrust) मिल सके।
इन बदलावों के कारण कठिन भूभाग में भी मशीनों से सुरंग निर्माण करने में सहायता मिली है।
चारधाम यात्रा और सामरिक संपर्क के लिए महत्वपूर्ण
ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल लाइन का उद्देश्य केवल रेल यातायात बढ़ाना नहीं, बल्कि गढ़वाल हिमालय के कई क्षेत्रों को देश के रेल नेटवर्क से जोड़ना भी है। परियोजना पूरी होने पर कर्णप्रयाग, रुद्रप्रयाग और इनके आसपास के क्षेत्रों तक पहुंचने में सुविधा मिलने की अपेक्षा है। इससे केदारनाथ और बदरीनाथ जाने वाले यात्रियों को भी रेल मार्ग से आगे की यात्रा के लिए बेहतर संपर्क मिल सकेगा।
रेल मंत्री ने परियोजना का सामरिक महत्व भी रेखांकित किया। उन्होंने बताया कि रेल लाइन का अंतिम स्टेशन कर्णप्रयाग भारत-चीन सीमा से लगभग 123 किलोमीटर दूर है। इस दृष्टि से यह परियोजना सीमावर्ती पर्वतीय क्षेत्रों की ओर संपर्क बेहतर बनाने वाली महत्वपूर्ण आधारभूत संरचना का हिस्सा है।
परियोजना से स्थानीय लोगों को आवागमन की सुविधा, पर्यटन गतिविधियों में विस्तार और निर्माण से जुड़े रोजगार के अवसर मिलने की भी अपेक्षा है। हालांकि अंतिम लाभ परियोजना के पूरा होने, रेल सेवाएं शुरू होने और उनके संचालन की व्यवस्था पर निर्भर करेगा।
दिसंबर 2029 तक परियोजना पूरी करने का लक्ष्य
हालिया समाचार रिपोर्टों के अनुसार पूरी ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल परियोजना को दिसंबर 2029 तक पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है। इससे पहले चरण में ब्यासी तक रेल सेवा शुरू करने के लिए जून 2028 का लक्ष्य बताया गया है। परियोजना में सुरंगों, पुलों, स्टेशनों और रेल पटरियों सहित विभिन्न कार्यों को पूरा किया जाना है।
निर्माण के दौरान सबसे बड़ी चुनौतियों में कठिन भूगर्भीय स्थितियां, सुरंगों के भीतर मिट्टी और चट्टानों का दबाव तथा दुर्गम क्षेत्रों तक निर्माण सामग्री पहुंचाना शामिल हैं। इन परिस्थितियों के कारण समय-सीमा को लेकर निर्माण की प्रगति पर नजर रखना महत्वपूर्ण होगा।
भारत में ही बनने लगीं बड़ी सुरंग खोदने वाली मशीनें
रेल मंत्री ने एक अलग संदेश में सुरंग खोदने वाली मशीनों (Tunnel Boring Machines—TBMs) के देश में निर्माण की बढ़ती क्षमता का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि पहले बड़ी सुरंग खोदने वाली मशीनों के लिए विदेशी आपूर्तिकर्ताओं पर निर्भरता अधिक थी, लेकिन अब भारत में ही इस क्षेत्र का निर्माण तंत्र विकसित हो रहा है।
मंत्री के अनुसार आठ मीटर व्यास वाली मशीनों का भारत में निर्माण हो रहा है और 15 मीटर व्यास वाली मशीनों के निर्माण की क्षमता भी विकसित की जा रही है। उन्होंने 16 मीटर से अधिक व्यास वाली मशीनों के देश में निर्माण की दिशा में आगे बढ़ने की बात कही। तमिलनाडु में स्थित मशीन निर्माण केंद्र सहित घरेलू विनिर्माण क्षमता के विकास को उन्होंने आत्मनिर्भर भारत की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया।
ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल परियोजना में विकसित की जा रही सुरंग निर्माण तकनीक और देश में मशीन निर्माण की बढ़ती क्षमता से भविष्य की बड़ी रेल, सड़क और अन्य आधारभूत संरचना परियोजनाओं को भी लाभ मिल सकता है।
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डॉ.नवीन जोशी, पिछले 20 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय, ‘कुमाऊँ विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में पीएचडी की डिग्री प्राप्त पहले और वर्ष 2015 से उत्तराखंड सरकार से मान्यता प्राप्त पत्रकार हैं। 15 लाख से अधिक नए उपयोक्ताओं के द्वारा 150 मिलियन यानी 1.5 करोड़ से अधिक बार पढी गई आपकी अपनी पसंदीदा व भरोसेमंद समाचार वेबसाइट ‘नवीन समाचार’ के संपादक हैं, साथ ही राष्ट्रीय सहारा, हिन्दुस्थान समाचार आदि समाचार पत्र एवं समाचार एजेंसियों से भी जुड़े हैं। देश के पत्रकारों के सबसे बड़े संगठन ‘नेशनल यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट्स (इंडिया) उत्तराखंड’ के उत्तराखंड प्रदेश के प्रदेश महामंत्री भी हैं और उत्तराखंड के मान्यता प्राप्त राज्य आंदोलनकारी भी हैं। डॉ. जोशी के बारे में विस्तार से पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।
नवीन समाचार’ विश्व प्रसिद्ध पर्यटन नगरी नैनीताल से जून 2009 से इंटरननेट-वेब मीडिया पर सक्रिय, उत्तराखंड का सबसे पुराना ऑनलाइन पत्रकारिता में सक्रिय समूह है। यह उत्तराखंड शासन से मान्यता प्राप्त रहा, अलेक्सा रैंकिंग के अनुसार उत्तराखंड के समाचार पोर्टलों में अग्रणी, गूगल सर्च पर उत्तराखंड के सर्वश्रेष्ठ, भरोसेमंद समाचार पोर्टल के रूप में अग्रणी, समाचारों को नवीन दृष्टिकोण से प्रस्तुत करने वाला ऑनलाइन समाचार पोर्टल भी है।














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