इतिहास के झरोखे से: 11 मई 1855 को नैनीताल में कुदरत का वह कहर, जब आसमान से बरसे थे क्रिकेट की गेंद से बड़े ओले

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नवीन समाचार, नैनीताल, 11 मई 2026 (History-Hailstones in Nainital in 1855)। यद्यपि आधुनिक युग ‘ग्लोबल वार्मिंग’ (Global Warming) और जलवायु परिवर्तन (Climate Change) के कारण चरम मौसमी घटनाओं (Extreme Weather Events) का गवाह बन रहा है, जिसमें कभी अत्यधिक सूखा, कभी अत्यधिक गर्मी और कभी अत्यधिक सर्दी का मौसम देखा जाता है, लेकिन इतिहास में भी ऐसी घटनाएं रिकॉर्ड होती रही हैं, जो आज भी रूह कंपा देती हैं। आज से ठीक 171 वर्ष पूर्व, 11 मई 1855 को सरोवर नगरी नैनीताल (Nainital) में एक ऐसी ऐतिहासिक और भयावह ओलावृष्टि (Hailstorm) की घटना हुई थी, जिसे ओलों के आकार, वजन और तीव्रता की दृष्टि से दुनिया की सबसे भीषण घटनाओं में गिना जाता है।

उस दिन प्रकृति ने यहाँ ऐसा भयावह स्वरूप दिखाया कि पूरा शहर दहल उठा और नैनी झील (Naini Lake) का दृश्य किसी युद्ध के मैदान जैसा प्रतीत होने लगा था। वर्ष 1856 में ‘बॉम्बे ज्योग्राफिकल सोसाइटी’ (Bombay Geographical Society) द्वारा प्रकाशित विवरण के अनुसार, ‘उस अभागे दिन की शुरुआत से ही मौसम का मिजाज असामान्य था। यद्यपि सुबह शांत और सर्द थी, किंतु दोपहर होते-होते मौसम थका देने वाली गर्मी में परिवर्तित हो गया। शाम को करीब छह बजे, जब लोग अपने दैनिक कार्यों से निवृत्त हो रहे थे, अचानक उत्तर और उत्तर-पूर्व दिशा से काले-घने बादलों का हुजूम उमड़ा। कुछ ही क्षणों में बादलों की भीषण गर्जना और बिजली की चकाचौंध के साथ हल्की वर्षा प्रारंभ हुई।’

“आकाश से अखरोटों से भरे बोरे उड़ेलने” जैसा दृश्य

(History-Hailstones in Nainital in 1855)
प्रतीकात्मक चित्र

प्रत्यक्षदर्शियों ने उस भयावह मंजर को “आकाश से अखरोटों से भरे बोरे उड़ेलने” जैसी स्थिति बताया। ओलावृष्टि की शुरुआत यद्यपि कबूतर के अंडे जितने ओलों से हुई, किंतु पलक झपकते ही वे क्रिकेट की गेंद (Cricket Ball) से भी बड़े आकार में परिवर्तित हो गए। अचंभित अंग्रेज अधिकारी हतप्रभ खड़े थे, जबकि भयभीत स्थानीय जनता ईश्वर को पुकारते हुए सुरक्षित स्थानों की ओर भागने लगी। यह कोई भ्रम नहीं था, बल्कि एक बड़ी प्राकृतिक आपदा थी।

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क्रिकेट की गेंद से बड़े: कुछ ओलों का वजन डेढ़ पाउंड तक

ओलावृष्टि के इस असाधारण रूप को देखकर वैज्ञानिक और अंग्रेज अधिकारी तत्काल ओलों को तौलने और मापने में जुट गए। परिणामों ने सभी को स्तब्ध कर दिया। जहां कुछ ओलों का वजन 6 से 10 तोला तक था, वहीं कुछ ओले डेढ़ पाउंड (लगभग 680 ग्राम या आधा सेर) से भी अधिक भारी पाए गए। उनकी परिधि 9 से 13 इंच तक मापी गई। यद्यपि नैनीताल में गर्मियों में ओलावृष्टि सामान्य थी, किंतु सर डब्ल्यू. रिचर्ड्स के दस वर्षों के अभिलेखों में इतने विशाल ओलों का कोई उल्लेख नहीं मिलता था।

नैनी झील पर गोले दागने जैसा मंजर, बंदर की मृत्यु

इस प्रलयंकारी ओलावृष्टि का प्रभाव विनाशकारी रहा:

  • तबाही: पेड़ों की छाल उखड़ गई, बाग-बगीचे जुते हुए खेतों में परिवर्तित हो गए और घरों की छतें उड़ गईं। पक्षी बड़ी संख्या में मारे गए।

  • नैनी झील: झील का दृश्य ऐसा लग रहा था मानो उस पर तोपों से लगातार गोले दागे जा रहे हों। ओलों के गिरने से उठने वाले पानी के फव्वारे झील को अशांत और खौफनाक बना रहे थे।

  • जन-हानि: यद्यपि कोई जनहानि नहीं हुई, किंतु एक बंदर की मृत्यु हो गई और तीन मनुष्य गंभीर रूप से घायल होकर गिर पड़े।

1697 में इंग्लैंड की ऐतिहासिक ओलावृष्टि से तुलना

इस असाधारण घटना की तुलना वर्ष 1697 में इंग्लैंड (England) के हर्टफोर्डशायर (Hertfordshire) में हुई ऐतिहासिक ओलावृष्टि से की गई, जहां ओले घुटनों तक जमा हो गए थे।

यद्यपि नैनीताल में 18 सितंबर 1880 का विनाशकारी भूस्खलन अधिक बहुचर्चित है, जिसमें 151 लोग काल-कवलित हुए थे, किंतु 11 मई 1855 की ओलावृष्टि नैनीताल के मौसम-विज्ञान के इतिहास में एक बड़ी घटना के रूप में सदैव याद की जाएगी। उल्लेखनीय है कि नगर में ऐसी ही भीषण ओलावृष्टि की घटना वर्ष 2000 के आसपास भी हुई थी जब बोर्ड परीक्षाओं की कापियां जांची जा रही थीं। तब ज्योलीकोट तक कई चीड़ के पेड़ों की मोटी छाल उखड़ गयी थी। लोगों को मार्ग अवरुद्ध हो जाने से भवाली से नैनीताल तक पैदल आना पड़ा था।

1856 में बॉम्बे ज्योग्राफिकल सोसाइटी द्वारा प्रकाशित रिपोर्ट में इस प्रकार किया गया था उस घटना का विवरण

11 मई 1855 को नैनीताल पर एक ऐसी ओलावृष्टि हुई, जो ओलों के आकार, भार और संख्या की दृष्टि से संभवतः संसार में अब तक की सबसे भीषण थी। पिछले कई दिनों से मौसम का एक विशेष क्रम चल रहा था — शांत और ठंडी सुबहें, गर्म और थका देने वाली दोपहरें, तथा उत्तर से चलने वाली तीखी हवा के साथ ठंडी शामें और रातें। बैरोमीटर ऊँचा था और आर्द्रतामापी यंत्र वातावरण की अत्यधिक शुष्कता बता रहा था। 10 तारीख को शाम 4 बजे शुष्क-बल्ब थर्मामीटर 86°F तापमान दिखा रहा था, जबकि 11 तारीख को उसी समय और स्थान पर वह केवल 62°F था।

पहले दिन शुष्क और आर्द्र बल्ब में 15 डिग्री का अंतर था, जो अगले दिन घटकर मात्र 4 डिग्री रह गया। तूफ़ान वाले दिन की शुरुआत में उत्तर और उत्तर-पूर्व से बादल घिरने लगे थे; बाद में दक्षिण और दक्षिण-पश्चिम से भी बादल आए और उनसे मिल गए। शाम लगभग 6 बजे हल्की बारिश हुई, बादलों की भीषण गर्जना के साथ इस अभागे स्थान पर बिजली गरजने लगी। ऐसा लग रहा था जैसे आकाश से अनगिनत बोरे भरकर अखरोट उड़ेले जा रहे हों। वैज्ञानिक समझ गए कि ओले पड़ने वाले हैं — और देखते ही देखते वे पड़ने लगे।

पहले कुछ चमकीले, कबूतर के अंडे जितने बड़े ओले गिरे; फिर और अधिक, और और भी बड़े। अचंभित अंग्रेज़ हतप्रभ खड़े थे और घबराए हुए भारतीय “हे भगवान! हे परमेश्वर!” पुकार रहे थे — और तभी क्रिकेट की गेंद से भी बड़े ओलों की बौछार हो गई। क्या यह भ्रम था? तुरंत बाहर दौड़कर एक ओला उठाना और तराज़ू व मापने की फ़ीता मँगाना — यह सब पलभर में हो गया। पूरे स्थान पर इन विशालकाय ओलों को तौला और नापा जाने लगा। कुछ का वज़न 6 तोला था, कुछ का 8, कुछ का 10; और एक-दो का वज़न डेढ़ पाउंड से भी अधिक था, जिनकी परिधि 9 से 13 इंच तक थी।

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मनुष्य और पशु सभी आश्रय की ओर भागे। बाग-बगीचे जुते हुए खेतों जैसे हो गए। हरियाली के केवल कुछ टुकड़े बचे रहे। झील का दृश्य ऐसा था मानो उस पर निरंतर तोपों से गोले दागे जा रहे हों या असंख्य व्हेल मछलियाँ उसमें विहार कर रही हों। अनवरत पानी के फव्वारे ओलों के गिरने से उठ रहे थे। बोलने की कोशिश करते, पर पड़ोसी सुन नहीं सकता था। तो बस बैठे रहे और विश्वकर्मा तथा बृहस्पति के वज्र की कल्पना करते रहे। जो लोग पहले बैलों के ओलों से मारे जाने की बात पर संशयपूर्वक मुस्करा देते, वे अब स्वयं ऐसी कहानियाँ सुनाएंगे। यद्यपि यहां कोई बैल नहीं मरा, एक बंदर अवश्य मर गया और तीन मनुष्य गिर पड़े।

पक्षी मारे गए, पेड़ों की छाल उधड़ गई, और घरों की छतें उड़ गईं। ऐसा था 11 मई का वह तूफ़ान — जो नैनीताल के मौसम-विज्ञान के इतिहास में एक युगांतकारी घटना बन गया। यद्यपि गर्मी के मौसम में ओलावृष्टि यहाँ सामान्य है, किंतु सर डब्ल्यू. रिचर्ड्स के दस वर्षों के रिकॉर्ड में कभी उल्लेखनीय आकार के ओले नहीं पड़े थे — सिवाय एक बार के, जब वे मात्र 2½ इंच परिधि के थे। कबूतर और बटेर के अंडे जितने बड़े ओले दुनिया के विभिन्न भागों में पड़ते रहे हैं। किंतु सबसे भीषण दर्ज तूफ़ान — जिससे नैनीताल की इस घटना की तुलना की जा सकती है — 1697 में हर्टफ़ोर्डशायर (इंग्लैंड) में आया था, जिसका उल्लेख उस वर्ष के फ़िलॉसॉफ़िकल ट्रांज़ैक्शन्स में है।

उस विवरण में लिखा है: मैं अपने छोटे से बगीचे में टहल रहा था — लगभग 30 गज़ चौड़ा — और बाहर निकलने से पहले ही ओले घुटनों तक आ गए। घर में घुसने से पहले ही वे घर के आर-पार हो गए… वे सब कुछ समुद्र की तरह बहाते चले गए, लकड़ी की चीज़ें नावों की तरह तैरने लगीं। नगर के अधिकांश भाग ने यह विपदा झेली। ओलों की परिधि 1 से 14 इंच तक थी।

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आज भी, जब नैनीताल में भीषण ओलावृष्टि होती है, तो यह ऐतिहासिक घटना स्थानीय लोककथाओं और अभिलेखों के माध्यम से जीवित हो उठती है, जो हमें प्रकृति की असीम शक्ति और अनिश्चितता का स्मरण कराती है। क्या ऐतिहासिक चरम मौसमी घटनाओं और वर्तमान ‘ग्लोबल वार्मिंग’ के बीच कोई सीधा संबंध है, या प्रकृति का यह रूप सदैव ही अप्रत्याशित रहा है? इस ऐतिहासिक समाचार को लेकर आपके क्या विचार हैं। अपनी राय नीचे कमेन्ट बॉक्स में अवश्य साझा करें।

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