सुप्रीम कोर्ट ने बनभूलपुरा हिंसा के 2 आरोपितों की डिफॉल्ट जमानत रद्द की, कहा-हाईकोर्ट ने तथ्यों-विधिक प्रावधानों को समझने में गंभीर त्रुटि की है..

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नवीन समाचार, नयी दिल्ली, 5 मई 2026 (Supreme Court Hard on UK High Court)। उत्तराखंड के बहुचर्चित बनभूलपुरा हिंसा कांड (Banbhoolpura Violence Case) में कानूनी प्रक्रिया ने नया मोड़ ले लिया है। देश की शीर्ष अदालत (Supreme Court) ने इस मामले के 2 मुख्य आरोपितों को मिली ‘डिफॉल्ट बेल’ को रद्द करते हुए उन्हें दो सप्ताह के भीतर आत्मसमर्पण करने का कड़ा आदेश दिया है। उच्चतम न्यायालय ने उत्तराखंड हाईकोर्ट (Uttarakhand High Court) के उस आदेश को पूरी तरह निरस्त कर दिया है, जिसके तहत आरोपित जावेद सिद्दीकी और अरशद अयूब को जमानत प्रदान की गई थी।

(Supreme Court Hard on UK High Court)
हल्द्वानी दंगे के दानव पुलिस गिरफ्त में।

न्यायालय ने अपने निर्णय में स्पष्ट किया कि हाईकोर्ट ने इस मामले में तथ्यों और विधिक प्रावधानों को समझने में गंभीर त्रुटि की है। सुप्रीम कोर्ट ने जांच एजेंसी की कार्यप्रणाली पर हाईकोर्ट द्वारा उठाए गए सुस्ती के सवालों को भी खारिज कर दिया।

हाईकोर्ट के निर्णय में ‘गंभीर त्रुटि’, सुप्रीम कोर्ट ने गिनाए तथ्य

सुप्रीम कोर्ट ने रेखांकित किया कि मामले की गंभीरता को देखते हुए जांच एजेंसी अत्यंत सक्रियता से कार्य कर रही थी। रिकॉर्ड के विश्लेषण के उपरांत शीर्ष अदालत ने पाया कि 90 दिनों की अवधि के भीतर पुलिस ने 65 गवाहों के बयान दर्ज किए थे। इसके विपरीत, हाईकोर्ट ने अपने आदेश में इसे मात्र 12 गवाहों तक सीमित मानकर जांच को सुस्त बताया था, जो कि तथ्यात्मक रूप से गलत पाया गया।

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यूएपीए (UAPA) के तहत दर्ज है मामला

विदित हो कि यह पूरा प्रकरण 8 फरवरी 2024 को हल्द्वानी के बनभूलपुरा थाना क्षेत्र में हुई भीषण हिंसा, आगजनी और सार्वजनिक संपत्ति के विनाश से संबंधित है। इस उपद्रव के दौरान पुलिस स्टेशन को निशाना बनाया गया था और पुलिसकर्मियों पर प्राणघातक हमले हुए थे। मामले की गंभीरता के दृष्टिगत आरोपितों के विरुद्ध यूएपीए (UAPA) जैसी कठोर धाराओं में मुकदमा दर्ज किया गया है।

क्यों रद्द हुई जमानत?

अदालत ने जमानत रद्द करने के पीछे प्रमुख विधिक तर्क दिए हैं:

  • समय की पाबंदी: आरोपितों ने समय रहते निचली अदालत के निर्णयों को चुनौती नहीं दी और काफी विलंब से हाईकोर्ट की शरण ली।

  • चार्जशीट दाखिल: जब तक आरोपित हाईकोर्ट पहुँचे, तब तक पुलिस जांच पूर्ण कर चार्जशीट (Charge Sheet) दाखिल कर चुकी थी। कानूनी प्रावधानों के अनुसार, चार्जशीट दाखिल होने के उपरांत ‘डिफॉल्ट जमानत’ का अधिकार स्वतः समाप्त हो जाता है।

दो सप्ताह में करना होगा सरेंडर

सुप्रीम कोर्ट ने दोनों आरोपितों को निर्देश दिया है कि वे दो सप्ताह (14 दिन) के भीतर संबंधित ट्रायल कोर्ट के समक्ष आत्मसमर्पण (Surrender) करें। हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया है कि आरोपित नियमित जमानत (Regular Bail) के लिए नवीन आवेदन करने हेतु स्वतंत्र हैं, जिस पर गुण-दोष के आधार पर विचार किया जाएगा।

इस निर्णय को उत्तराखंड की धामी सरकार के लिए एक बड़ी विधिक जीत माना जा रहा है। शासन का पक्ष था कि हिंसा के मुख्य सूत्रधारों का बाहर रहना कानून-व्यवस्था और जांच की गोपनीयता के लिए चुनौती बन सकता है।

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क्या ‘डिफॉल्ट जमानत’ के तकनीकी आधार पर गंभीर अपराधों के आरोपितों को मिलने वाली राहत न्याय व्यवस्था में सुधार की आवश्यकता को इंगित करती है?

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