नवीन समाचार, नैनीताल, 23 अगस्त 2026 (8 People Fall Ill Eating Wild Plants)। उत्तराखंड (UTTARAKHAND) के नैनीताल (NAINITAL) में बिना सही पहचान के जंगली वनस्पति (Wild Plant) को सब्जी समझकर खाना एक परिवार के आठ लोगों पर भारी पड़ गया। वनस्पति विज्ञानी के द्वारा बताई गई संबंधित वनस्पति की पहचान के बारे में अधिक जानने के लिए यहाँ क्लिक करें।
मल्लीताल (Mallital) के लेकव्यू कॉटेज क्षेत्र (Lakeview Cottage Area) में जंगल से लाई गई वनस्पति को ‘जरंग’ नाम की आम तौर पर पकौड़े बनाकर खाई जाने वाली वनस्पति समझकर उसके पकौड़े खाने के कुछ ही देर बाद आठों की तबीयत बिगड़ गई और उन्हें उल्टी, पेट में मरोड़, चक्कर तथा नशे जैसी शिकायतें होने लगीं। सभी को बीडी पांडे जिला चिकित्सालय (B.D. Pandey District Hospital) की इमरजेंसी में भर्ती कराया गया, जहां उपचार के बाद अधिकांश की हालत स्थिर बताई गई है।

अस्पताल से मिली जानकारी के अनुसार बीमार होने वालों में 90 वर्षीय महेश चंद्र साह, 83 वर्षीय सुरेंद्र लाल साह, 58 वर्षीय अनिल साह, 52 वर्षीय विक्रम साह, 46 वर्षीय कविता साह, 33 वर्षीय अनंता ठुलघरिया, 33 वर्षीय अक्षय कुमार और 23 वर्षीय मनीषा शामिल हैं। घटना ने एक बार फिर जंगल से मिलने वाली वनस्पतियों को बिना विशेषज्ञ पहचान के खाने के जोखिम को सामने ला दिया है।
जरंग समझकर बनाए पकौड़े, खाने के बाद बिगड़ी तबीयत
परिजनों के अनुसार जंगल से लाई गई वनस्पति को जरंग समझकर उसके पकौड़े बनाए गए और परिवार के सदस्यों ने उनका सेवन किया। कुछ ही देर बाद सभी को नशा महसूस होने लगा और इसके बाद उल्टी, पेट में मरोड़ और चक्कर आने जैसी शिकायतें शुरू हो गईं। बताया जा रहा है कि आम तौर पर लोग इस संबंधित वनस्पति के पत्तों को खाने में प्रयोग करते हैं, लेकिन प्रभावित परिवार ने तनों का भी पकौड़ों में उपयोग कर लिया था। प्रभावित परिवार अच्छी परिस्थितियों वाला परिवार है। उन्होंने शौक से इस वनस्पति के पकौड़े बनाये थे।
तबीयत बिगड़ने पर परिजन सभी को तत्काल बीडी पांडे जिला चिकित्सालय की इमरजेंसी में लेकर पहुंचे। चिकित्सकों ने मरीजों से पूछताछ की तो उन्होंने पकौड़े खाने की जानकारी दी। अस्पताल में चिकित्सकों ने संभावित विषाक्तता (Toxicity) को देखते हुए उपचार शुरू किया।
90 साल के बुजुर्ग से लेकर 23 वर्षीय युवती तक प्रभावित
इस मामले में एक ही परिवार के आठ लोग प्रभावित हुए हैं। इनमें सबसे अधिक उम्र 90 वर्षीय महेश चंद्र साह की है, जबकि 23 वर्षीय मनीषा सबसे कम उम्र की हैं। इस तरह एक ही परिवार में अलग-अलग आयु वर्ग के लोगों को जहरीली वनस्पति के सेवन का असर झेलना पड़ा।
अस्पताल से मिली जानकारी के अनुसार कुछ मरीजों में नशे का प्रभाव अधिक था और उन्हें चिकित्सकीय निगरानी में रखा गया। उपलब्ध जानकारी में सभी मरीजों की स्थिति खतरे से बाहर बताए जाने की बात भी सामने आई है।
चिकित्सकों ने दिया उपचार
अस्पताल के वरिष्ठ फिजिशियन डॉ. एमएस दुग्ताल (Dr. M.S. Dugtal) के अनुसार मरीजों को आपातकालीन वार्ड (Emergency Ward) में भर्ती कर आवश्यक उपचार और तरल पदार्थ दिए गए। वहीं दूसरी चिकित्सकीय जानकारी में कुछ मरीजों के अधिक नशे की स्थिति में होने और उपचार जारी रहने की बात कही गई है। उपचार के बाद अब 90 वर्षीय महेश चंद्र साह व 83 वर्षीय सुरेंद्र लाल साह की स्थिति ही थोड़ी खराब बतायी गयी है। उन्हें याद करने में समस्या आ रही है। अन्य की स्थिति में काफी सुधार है।
विशेषज्ञ ने बताया वनस्पति में विषैले तत्व
वनस्पति विज्ञान विभाग के प्रोफेसर ललित तिवारी (Prof. Lalit Tiwari) के अनुसार संबंधित पौधे को वैज्ञानिक भाषा में फाइटोलेका एसीनोसा (Phytolacca acinosa) या हिमालयन पोकबेरी (Himalayan Pokeberry) बताया गया है। उनके अनुसार पौधे की पत्तियों और तनों में सैपोनिन तथा फाइटोलेको टॉक्सिन (Phytolacco Toxin) जैसे रासायनिक यौगिक पाए जाते हैं।
उनके अनुसार यदि ऐसी वनस्पति की सही पहचान किए बिना या उचित तरीके से तैयार किए बिना सेवन किया जाए तो इससे पाचन तंत्र पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है और शरीर में पानी की कमी सहित गंभीर स्वास्थ्य जोखिम पैदा हो सकते हैं।
हालांकि, उपलब्ध जानकारी के दूसरे हिस्से में चिकित्सकीय जांच के आधार पर गलती से धतूरे (Datura) का सेवन किए जाने की बात भी सामने आई है। इसलिए संबंधित पौधे की वास्तविक पहचान और विषाक्तता का अंतिम चिकित्सकीय निष्कर्ष विशेषज्ञ जांच के बाद ही स्पष्ट माना जाना चाहिए।
जंगल की वनस्पतियों की पहचान में सावधानी जरूरी
इस घटना से यह स्पष्ट होता है कि किसी भी जंगली पौधे या वनस्पति को स्थानीय नाम के आधार पर पहचान लेना जोखिम भरा हो सकता है। अलग-अलग क्षेत्रों में एक ही या मिलते-जुलते स्थानीय नाम अलग वनस्पतियों के लिए इस्तेमाल किए जा सकते हैं। ऐसे में केवल स्थानीय पहचान या देखने में समानता के आधार पर किसी वनस्पति को भोजन के रूप में इस्तेमाल करना खतरनाक हो सकता है।
चिकित्सकों और विशेषज्ञों की सलाह के अनुसार जंगल से मिलने वाली किसी भी जंगली सब्जी, पत्ते या पौधे का सेवन उसकी सही पहचान और सुरक्षित उपयोग की पूरी जानकारी के बिना नहीं किया जाना चाहिए।
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डॉ.नवीन जोशी, पिछले 20 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय, ‘कुमाऊँ विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में पीएचडी की डिग्री प्राप्त पहले और वर्ष 2015 से उत्तराखंड सरकार से मान्यता प्राप्त पत्रकार हैं। 15 लाख से अधिक नए उपयोक्ताओं के द्वारा 150 मिलियन यानी 1.5 करोड़ से अधिक बार पढी गई आपकी अपनी पसंदीदा व भरोसेमंद समाचार वेबसाइट ‘नवीन समाचार’ के संपादक हैं, साथ ही राष्ट्रीय सहारा, हिन्दुस्थान समाचार आदि समाचार पत्र एवं समाचार एजेंसियों से भी जुड़े हैं। देश के पत्रकारों के सबसे बड़े संगठन ‘नेशनल यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट्स (इंडिया) उत्तराखंड’ के उत्तराखंड प्रदेश के प्रदेश महामंत्री भी हैं और उत्तराखंड के मान्यता प्राप्त राज्य आंदोलनकारी भी हैं। डॉ. जोशी के बारे में विस्तार से पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।
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