नवीन समाचार, चमोली, 29 सितंबर 2026 (Why Conch Shell not Blown at Badrinath)। उत्तराखंड (Uttarakhand) के चमोली (Chamoli) जनपद स्थित उत्तराखंड के चार धाम में से एक बद्रीनाथ धाम (Badrinath Dham) में शंख पूजा में रखा जाता है, लेकिन उसे बजाने की परंपरा नहीं है। यह विषय इन दिनों इसलिए चर्चा में है क्योंकि बद्रीनाथ में हाल में आयोजित एक सांस्कृतिक कार्यक्रम में तेज संगीत और डीजे को लेकर विवाद के बीच पर्यटन एवं धर्मस्व मंत्री सतपाल महाराज ने शंख न बजाने की अलग वजह बताई, जिसके बाद बद्रीनाथ के पूर्व धर्माधिकारी भुवन चंद्र उनियाल ने इसके पीछे धार्मिक और पौराणिक मान्यता समझाई।
बद्रीनाथ में शंख क्यों नहीं बजाया जाता?
बद्रीनाथ के पूर्व धर्माधिकारी भुवन चंद्र उनियाल के अनुसार, बद्रीनाथ धाम में भगवान विष्णु साक्षात विराजमान माने जाते हैं। इसलिए वहां भगवान का आह्वान करने की आवश्यकता नहीं मानी जाती। उनके अनुसार शंखनाद को भगवान के आह्वान से जोड़ा जाता है और इसी मान्यता के कारण बद्रीनाथ मंदिर में शंख नहीं बजाया जाता।
इसका अर्थ यह नहीं है कि बद्रीनाथ में शंख का कोई धार्मिक महत्व नहीं है। उनियाल के अनुसार शंख यहाँ पूजा में रखा जाता है और उसकी पूजा भी होती है, लेकिन शंखनाद नहीं किया जाता। यानी प्रतिबंध शंख रखने या उसकी पूजा करने पर नहीं, बल्कि मंदिर की विशिष्ट पूजा-पद्धति में उसे बजाने की परंपरा नहीं होने से जुड़ा है।
तुलसी और शंखचूड़ की कथा से भी जुड़ी है मान्यता
पूर्व धर्माधिकारी ने इसके पीछे तुलसी और शंखचूड़ से जुड़ी पौराणिक मान्यता का भी उल्लेख किया।
मान्यता के अनुसार वृंदा अर्थात तुलसी का विवाह शंखचूड़ से हुआ था। शंखचूड़ की मृत्यु के बाद उसका संबंध शंख से जोड़ा जाता है। बद्रीनाथ में माता तुलसी को लक्ष्मी स्वरूप माना जाता है। इसी धार्मिक मान्यता के आधार पर बद्रीनाथ में शंख को पूजा में रखने, लेकिन उसका नाद नहीं करने की परंपरा की व्याख्या की जाती है।
यह ध्यान रखना जरूरी है कि यह धार्मिक मान्यता और परंपरा की व्याख्या है; इसे वैज्ञानिक तथ्य की तरह नहीं, बल्कि बद्रीनाथ की पूजा-पद्धति से जुड़ी मान्यता के रूप में समझना चाहिए।
फिर सतपाल महाराज ने क्या कहा था?
पर्यटन एवं धर्मस्व मंत्री सतपाल महाराज ने सोमवार को बद्रीनाथ में शंख नहीं बजाने के संबंध में अलग व्याख्या दी थी। उनके अनुसार मंदिर में पूजा के दौरान शंख का उपयोग नहीं किया जाता क्योंकि शंख को हड्डी से बना माना जाता है और पूजा में हड्डी के इस्तेमाल से परहेज किया जाता है। उन्होंने यह भी कहा था कि मंदिर के बाहर शंख बजाया जाता है।
महाराज के इस बयान पर उत्तराखंड चारधाम तीर्थ पुरोहित महापंचायत के महासचिव बृजेश सती ने आपत्ति जताई। उन्होंने शंख को जानवर की हड्डी से बना बताए जाने पर सवाल उठाया और कहा कि सनातन परंपरा में धार्मिक अनुष्ठानों एवं शुभ अवसरों पर शंख बजाने की परंपरा रही है। यह आपत्ति बृजेश सती की ओर से व्यक्त की गई है।
इस तरह वर्तमान विवाद में दो अलग-अलग व्याख्याएं सामने आई हैं—पूर्व धर्माधिकारी ने इसे भगवान के साक्षात विराजमान होने और आह्वान की आवश्यकता न होने से जोड़ा है, जबकि मंत्री ने शंख की बनावट और पूजा में हड्डी के उपयोग से जुड़ी मान्यता का उल्लेख किया।
क्या बद्रीनाथ में संगीत भी नहीं बजाया जाता?
यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है। शंखनाद की परंपरा और संगीत परंपरा को एक ही बात नहीं माना गया है।
सतपाल महाराज के बयान के अनुसार बद्रीनाथ में संगीत पूरी तरह प्रतिबंधित नहीं है। बद्रीनाथ के कपाट खुलने और बंद होने के अवसर पर सैन्य बैगपाइप बैंड की प्रस्तुति होती रही है। उर्वशी पीठ में भी गायन और संगीत कार्यक्रमों का उल्लेख किया गया है। माणा गांव में विवाह समारोहों में ढोल-दमाऊ बजाने की परंपरा भी बताई गई है।
मामला अभी क्यों गरमाया?
इस पूरी चर्चा की पृष्ठभूमि में 19 और 20 सितंबर को बद्रीनाथ के टूरिस्ट अराइवल प्लाजा में हुआ देवभूमि कल्चरल फेस्टिवल-2026 है। भारतीय सेना और चमोली जिला प्रशासन ने ऑपरेशन सद्भावना के तहत आयोजित इस कार्यक्रम की थीम ‘हमारी विरासत, हमारा भविष्य’ थी। कार्यक्रम के दौरान तेज संगीत, डीजे और लोगों के नृत्य के वीडियो सामने आने के बाद धार्मिक संगठनों ने आपत्ति जताई।
चारधाम तीर्थ पुरोहित महापंचायत और ज्योतिर्मठ से जुड़े संतों की ओर से कार्यक्रम के स्वरूप को लेकर धार्मिक मर्यादा का प्रश्न उठाया गया। वहीं चमोली जिला प्रशासन ने कहा कि सरकारी स्टॉल प्रशासन की ओर से लगाए गए थे, जबकि सांस्कृतिक कार्यक्रम और उनकी प्रस्तुतियों का चयन सेना की ओर से किया गया था। प्रशासन ने सोशल मीडिया पर प्रसारित सामग्री के आधार पर बिना तथ्य जांचे निष्कर्ष नहीं निकालने की अपील भी की।
चमोली डीएम ने भी मांगा जवाब
विवाद के बाद चमोली के जिलाधिकारी गौरव कुमार ने गढ़वाल स्काउट के कमांडिंग ऑफिसर को नोटिस जारी कर कार्यक्रम के आयोजन और उसमें लाउड म्यूजिक सिस्टम के इस्तेमाल के संबंध में जवाब मांगा। नोटिस में बद्रीनाथ को धार्मिक आस्था का केंद्र बताते हुए कार्यक्रम के औचित्य और अनुमति से संबंधित जानकारी मांगी गई।
असल सवाल क्या है?
बद्रीनाथ में शंख न बजाने की परंपरा को लेकर सामने आई जानकारी से यह स्पष्ट होता है कि शंख का मंदिर में होना और शंख बजाने की परंपरा—दो अलग बातें हैं। पूर्व धर्माधिकारी की व्याख्या के अनुसार इसका संबंध बद्रीनाथ में भगवान के साक्षात विराजमान होने और आह्वान की आवश्यकता न होने से है। इसके साथ तुलसी-शंखचूड़ की पौराणिक मान्यता भी जोड़ी जाती है।
वहीं हालिया विवाद ने एक दूसरा प्रश्न भी सामने ला दिया है—बद्रीनाथ जैसे प्रमुख तीर्थस्थल के आसपास आयोजित सांस्कृतिक कार्यक्रमों का स्वरूप और ध्वनि-स्तर किस प्रकार निर्धारित होना चाहिए? इस पर धार्मिक संगठनों, प्रशासन और आयोजकों की अलग-अलग बातें सामने आई हैं। उपलब्ध सामग्री के आधार पर इसे धार्मिक परंपरा, सांस्कृतिक आयोजन और प्रशासनिक अनुमति—तीनों के संदर्भ में देखा जाना चाहिए।
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डॉ.नवीन जोशी, पिछले 20 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय, ‘कुमाऊँ विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में पीएचडी की डिग्री प्राप्त पहले और वर्ष 2015 से उत्तराखंड सरकार से मान्यता प्राप्त पत्रकार हैं। 15 लाख से अधिक नए उपयोक्ताओं के द्वारा 150 मिलियन यानी 1.5 करोड़ से अधिक बार पढी गई आपकी अपनी पसंदीदा व भरोसेमंद समाचार वेबसाइट ‘नवीन समाचार’ के संपादक हैं, साथ ही राष्ट्रीय सहारा, हिन्दुस्थान समाचार आदि समाचार पत्र एवं समाचार एजेंसियों से भी जुड़े हैं। देश के पत्रकारों के सबसे बड़े संगठन ‘नेशनल यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट्स (इंडिया) उत्तराखंड’ के उत्तराखंड प्रदेश के प्रदेश महामंत्री भी हैं और उत्तराखंड के मान्यता प्राप्त राज्य आंदोलनकारी भी हैं। डॉ. जोशी के बारे में विस्तार से पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।
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