दिव्यांग कोटे से MBBS सीट पाने पहुंचे अभ्यर्थियों की जांच में खुली पोल? 40–50% दृष्टिबाधिता बताने वाले पढ़ गए सभी अक्षर

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नवीन समाचार, देहरादून, 13 अक्टूबर 2026 (MBBS Disability Quota Seats Exposed)। उत्तराखंड (Uttarakhand) की राजधानी देहरादून (Dehradun) स्थित दून मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल (Doon Medical College and Hospital) में एमबीबीएस (MBBS) की दिव्यांग श्रेणी की सीटों के लिए पात्रता जांच के दौरान दिव्यांगता प्रमाणपत्रों में दर्ज दावों और चिकित्सकीय जांच के नतीजों में अंतर सामने आया है। राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (National Medical Commission-NMC) से नामित मेडिकल बोर्ड ने विभिन्न राज्यों से पहुंचे 18 अभ्यर्थियों की जांच की। इनमें से 13 अभ्यर्थी निर्धारित मानकों के अनुसार पात्र पाए गए, जबकि चार अभ्यर्थी जांच में पात्र नहीं पाए गए। एक अन्य अभ्यर्थी हड्डी रोग विभाग में जांच के लिए नहीं पहुंचा।

(MBBS Disability Quota Seats Exposed) उत्तराखंड में MBBS दाखिले वाले 370 संदिग्ध उम्मीदवार जांच के घेरे में, एक  हफ्ते में मांगी रिपोर्ट, Uttarakhand Hindi News - Hindustanसबसे उल्लेखनीय मामला दृष्टिबाधिता का दावा करने वाले अभ्यर्थियों का रहा। स्वयं को 40 से 50 प्रतिशत तक दृष्टिबाधित बताने वाले तीन अभ्यर्थी नेत्र रोग विभाग की जांच में फिट पाए गए। चिकित्सकों के अनुसार, वे सभी अक्षर आसानी से पढ़ गए और मशीनों से की गई जांच में भी उनके दावे के अनुरूप दिव्यांगता की पुष्टि नहीं हुई।

40 से 50 प्रतिशत दृष्टिबाधिता का दावा, जांच में पढ़ गए सभी अक्षर

दून मेडिकल कॉलेज के नेत्र रोग विभाग में जांच के दौरान उत्तराखंड के दो छात्रों और बिहार की एक छात्रा के दावों की जांच की गई। इन अभ्यर्थियों ने अपने प्रमाणपत्रों में 40 से 50 प्रतिशत तक दृष्टिबाधिता होने की बात कही थी।

चिकित्सकों के अनुसार, जांच के दौरान तीनों अभ्यर्थी सभी अक्षर आसानी से पढ़ गए। उपकरणों से परीक्षण किए जाने पर भी उनके दावों के अनुरूप दृष्टिबाधिता की पुष्टि नहीं हुई। इस आधार पर उन्हें संबंधित दिव्यांग श्रेणी के लिए पात्र नहीं पाया गया।

इस मामले में महत्वपूर्ण सवाल यह है कि प्रमाणपत्र जारी करने के समय किए गए परीक्षणों और मेडिकल बोर्ड की जांच के परिणामों में अंतर क्यों सामने आया। हालांकि, केवल इस अंतर के आधार पर यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि किसी अभ्यर्थी ने जानबूझकर गलत जानकारी दी थी।

महाराष्ट्र की छात्रा ने बताई 40 प्रतिशत दिव्यांगता, जांच में 12 प्रतिशत

हड्डी रोग (Orthopaedics) विभाग में महाराष्ट्र से आई एक छात्रा ने अपने पैरों में 40 प्रतिशत दिव्यांगता होने का दावा किया था। मेडिकल बोर्ड की जांच में उसकी दिव्यांगता 12 प्रतिशत पाई गई। इस प्रकार जांच में दर्ज प्रतिशत उसके प्रमाणपत्र में बताए गए प्रतिशत से कम था।

इसी विभाग में उत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh) से आई एक अन्य छात्रा ने 45 प्रतिशत दिव्यांगता होने की जानकारी दी थी। उपलब्ध विवरण के अनुसार, उसकी जांच में सब ठीक पाया गया, लेकिन बाद में वह अनुपस्थित हो गई। ऑर्थो विभाग में एक अभ्यर्थी जांच के लिए पहुंचा ही नहीं।

रिपोर्ट के अनुसार, कुछ अभ्यर्थी सख्ती से पूछताछ किए जाने के बाद चले गए और दोबारा जांच के लिए नहीं लौटे। हालांकि, उनके जांच छोड़कर जाने के कारणों की विस्तृत जानकारी उपलब्ध नहीं है।

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एमएस की अध्यक्षता में गठित हुआ मेडिकल बोर्ड

दून मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल में चिकित्सा अधीक्षक (Medical Superintendent-MS) डॉ. आरएस बिष्ट (Dr. R.S. Bisht) की अध्यक्षता में मेडिकल बोर्ड बनाया गया था। इसमें डॉ. विवेकानंद सत्यवली, डॉ. अनिल जोशी, डॉ. शांति पांडेय और डॉ. नितिन शर्मा शामिल थे।

उत्तराखंड के अतिरिक्त उत्तर प्रदेश, बिहार और महाराष्ट्र सहित विभिन्न राज्यों से कुल 18 अभ्यर्थी जांच कराने पहुंचे थे। जांच का उद्देश्य एमबीबीएस में दिव्यांग श्रेणी के अंतर्गत प्रवेश के लिए उनकी पात्रता का आकलन करना था। जांच में पात्र पाए गए अभ्यर्थियों के प्रमाणपत्र प्रवेश संबंधी पोर्टल पर अपलोड कर दिए गए हैं।

दिव्यांग प्रमाणपत्र जारी करने की प्रक्रिया पर उठे सवाल

एमबीबीएस की अखिल भारतीय कोटा (All India Quota) और राज्य कोटा (State Quota) की काउंसलिंग में दिव्यांग श्रेणी का लाभ लेने के लिए निर्धारित पात्रता और चिकित्सकीय मानकों को पूरा करना आवश्यक है। ऐसे में प्रमाणपत्र में दर्ज दिव्यांगता और मेडिकल बोर्ड के परीक्षण में सामने आए परिणामों के बीच अंतर होने से प्रमाणपत्र जारी करने की प्रक्रिया की विश्वसनीयता को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है।

इस मामले में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि संबंधित अभ्यर्थियों के प्रमाणपत्र किन चिकित्सकीय परीक्षणों के आधार पर जारी किए गए थे और क्या अलग-अलग परीक्षणों के परिणामों में अंतर आने के पीछे कोई चिकित्सकीय कारण था। उपलब्ध जानकारी से प्रमाणपत्र जारी करने वाले संस्थानों की ओर से किसी अनियमितता की पुष्टि नहीं होती है।

दिव्यांगता का आकलन निर्धारित चिकित्सकीय मानकों के अनुसार किया जाना चाहिए। साथ ही, किसी अभ्यर्थी की पात्रता पर निर्णय केवल एक सामान्य निरीक्षण के आधार पर नहीं, बल्कि संबंधित श्रेणी के लागू मानकों और आवश्यक परीक्षणों के आधार पर किया जाना चाहिए।

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