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‘जिंदगी लंबी नहीं बड़ी होनी चाहिए…’ 29 की उम्र के महामानव श्रीदेव सुमन को उनके बलिदान दिवस 25 जुलाई पर नमन

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डॉ.नवीन जोशी @ नवीन समाचार, नैनीताल, 25 जुलाई 2026 (Shri Dev Suman-Great Works in Just 29)। उत्तराखंड के नैनीताल जनपद में अनैतिक गतिविधियों के विरुद्ध चलाए जा रहे अभियान के तहत कोत। श्रीदेव सुमन उत्तराखंड की धरती के एक ऐसे महान अमर बलिदानी, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी सपूत का नाम है, जो एक लेखक, पत्रकार और जननायक ही नहीं टिहरी की ऐतिहासिक क्रांति के महानायक व महामानव भी थे।

Shri Dev Suman-Great Works in Just 29 श्री देव सुमन जी की जीवन गाथा” यह वीर है उस पुण्य भूमि का, जिसको मानसखंड , केदारखंड, उत्तराखंड कहा जाता है, स्वतंत्रता संग्रामी श्री देव सुमन ...‘जिंदगी लंबी नहीं बड़ी होनी चाहिए’, यह उक्ति सुमन जी ने मात्र 29 वर्ष की अल्पायु में ही अपने देश के लिए बलिदान होने के साथ सार्थक की। 1930 में मात्र 14 वर्ष की किशोरावस्था में ‘नमक सत्याग्रह’ में भाग लेने से लेकर उनकी छोटी सी जीवन यात्रा के जितने आयाम हैं, उसकी मिसाल स्वामी विवेकानंद और हिंदी साहित्य के पितामह कहे जाने वाले भारतेंदु हरिश्चंद सहित कुछ ही महामनीशियों में मिलती है।

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स्वाधीनता-हितरधीता से दूं झुका जगदीश को, मां के पदों में सुमन सा रख दूं समर्पण शीश को।’ जैसे शब्दों से स्वयं को ‘बोलेंदा बद्री’ यानी बोलते हुए बद्रीनाथ यानी ईश्वर बताने वाले महादंभी टिहरी नरेश की राहशाही को अपना बलिदान देकर हमेशा के लिए समाप्त करने वाले सुमन (मूल नाम श्रीदत्त बड़ोनी, जन्म टिहरी गढ़वाल जिले की बमुण्ड पट्टी के ग्राम जौल में 12 मई, 1915) ने मात्र 1937 में मात्र 22 वर्ष की उम्र में ‘सुमन सौरभ’ नाम से अपनी कविताओं का संग्रह प्रकाशित कर दिया था।

लेखक और पत्रकार के रूप में भी छोड़ी अमिट पहचान

श्रीदेव सुमन केवल आंदोलनकारी ही नहीं, बल्कि प्रतिभाशाली साहित्यकार और पत्रकार भी थे। उन्होंने साहित्य रत्न, साहित्य भूषण, प्रभाकर, विशारद जैसी परीक्षाएं भी उत्तीर्ण कीं। इसी दौरान वे पत्रकारिता के प्रति आकर्षित हुये और भाई परमानंद के अखबार ’हिन्दू’ में और आगे ’धर्म राज्य’ नाम के पत्र में कार्य किया। इसी दौरान उन्होंने वर्धा स्थित राष्ट्र भाषा प्रचार कार्यालय में भी काम किया और यहां काका कालेलकर, विष्णु पराडकर व लक्ष्मीधर बाजपेई आदि स्वनामधन्य पत्रकारों के सम्पर्क में आये। उन्होंने एक पत्रकार के रूप में इलाहाबाद में ’राष्ट्र मत’ नामक समाचार पत्र में सहकारी सम्पादक के रुप में भी कार्य किया।
वे ‘हिन्दी साहित्य सम्मेलन’ के भी सक्रिय कार्यकर्ता रहेे। उन्होंने गढ़ देश सेवा संघ, हिमालय सेवा संघ, हिमालय प्रांतीय देशी राज्य प्रजा परिषद, हिमालय राष्ट्रीय शिक्षा परिषद आदि संस्थाओं की स्थापना भी की। लैंसडाउन से गढ़वाल के तत्कालीन प्रमुख कांग्रेसी नेता भक्तदर्शन तथा भैरव दत्त धूलिया द्वारा ब्रिटिश गढ़वाल तथा टिहरी रियासत दोनों में राजनैतिक, सामाजिक, साहित्यिक चेतना फैलाने का कार्य करने वाले 1939 से प्रकाशित ‘कर्मभूमि’ पत्र के सम्पादक मंडल से जुड़कर उन्होंने कई विचारपूर्ण लेख लिखे और बनारस में हिमालय राष्ट्रीय शिक्षा परिषद की स्थापना कर ’हिमांचल’ नाम की पुस्तक छपवाकर रियासत में बंटवाई। यहीं से वह रियासत के अधिकारियों की नजर में आये और रियासत द्वारा इनके भाषण देने और सभा करने पर रोक लगा दी गई।

जवाहरलाल नेहरू तक पहुंचाई टिहरी की जनता की आवाज

इतनी छोटी सी उम्र में ही उन्होंने दिल्ली में कुछ मित्रों के सहयोग से ‘देवनागरी महाविद्यालय’ की स्थापना की और साहित्य के क्षेत्र में अनेक उल्लेखनीय कार्य किये। 1937 में उन्होंने दिल्ली में ’गढ़देश-सेवा-संघ’ की स्थापना की जो बाद में ’हिमालय सेवा संघ’ के नाम से विख्यात हुआ। इसके बाद ही 1938 में वह गढ़वाल भ्रमण पर आये और श्रीनगर में आयोजित जिला राजनैतिक सम्मेलन में शामिल हुये, तथा इस अवसर पर उन्होंने जवाहर लाल नेहरु को अपने ओजस्वी भाषण से गढ़वाल राज्य की दुर्दशा से परिचित कराया, तथा खुद का मुरीद भी बना दिया।
यहीं से उन्होंने ‘जिला गढ़वाल’ और ‘राज्य गढ़वाल’ की एकता का नारा बुलंद किया। साथ ही पूरी तरह से सार्वजनिक जीवन में आते हुए 23 जनवरी, 1939 को देहरादून में स्थापित ‘टिहरी राज्य प्रजा मंडल’ के संयोजक मंत्री चुने गये। इसी माह उन्होंने जवाहर लाल नेहरु की अध्यक्षता में ‘अखिल भारतीय देशी राज्य लोक परिषद’ के लुधियाना अधिवेशन में उन्होंने टिहरी और अन्य हिमालयी रियासतों की समस्या को राष्ट्रीय स्तर पर पहंुचाया। हिमालय सेवा संघ के द्वारा उन्होंने ‘हिमालय प्रांतीय देशी राज्य प्रजा परिषद’ का गठन किया और उसके द्वारा पर्वतीय राज्यों में जागृति और चेतना लाने का काम किया।

अत्याचार के विरुद्ध संघर्ष और ऐतिहासिक आमरण अनशन

अगस्त 1942 में ‘भारत छोड़ो आन्दोलन’ प्रारम्भ होते ही उन्हें टिहरी आते समय 29 अगस्त 1942 को देवप्रयाग में गिरफ्तार कर लिया गया और 10 दिन मुनि की रेती जेल में रखने के बाद 6 सितम्बर को पहले ढाई महीने के लिए देहरादून जेल और फिर 15 महीने के लिए आगरा सेंट्रल जेल भेज दिया गया। 19 नवम्बर 1943 को आगरा जेल से रिहा होने के बाद वे फिर टिहरी में बढ़ रहे राजशाही के अत्याचारों के खिलाफ जनता के अधिकारों को लेकर अपनी आवाज बुलंद करने लगे।
इस दौरान उन्होंने कहा था, ‘मैं अपने शरीर के कण-कण को नष्ट हो जाने दूंगा लेकिन टिहरी के नागरिक अधिकारों को कुचलने नहीं दूंगा।’ इन शब्दों के आशंकित टिहरी दरबार ने उन्हें 27 दिसम्बर 1943 को करीब डेढ़ माह में ही पुनः चम्बाखाल में गिरफ्तार कर लिया और 30 दिसम्बर को टिहरी जेल भिजवा दिया गया, जहां 209 दिन नारकीय जीवन बिताने के बाद उनका शव ही बाहर आ सका।
इस दौरान स्वयं पर दायर मुकदमे में अपनी पैरवी स्वयं करते हुए उन्होंने लिखित बयान दिया था, ‘मैं इस बात को स्वीकार करता हूं कि मैं जहां अपने भारत देश के लिये पूर्ण स्वाधीनता के ध्येय में विश्वास करता हूं। वहां टिहरी राज्य में मेरा और प्रजामंडल का उद्देश्य वैध व शांतिपूर्ण उपायों से श्री महाराजा की छत्रछाया में उत्तरदायी शासन प्राप्त करना और सेवा के साधन द्वारा राज्य की सामाजिक, आर्थिक तथा सब प्रकार की उन्नति करना है, हां मैंने प्रजा की भावना के विरुद्ध काले कानूनों और कार्यों की अवश्य आलोचना की है और मैं इसे प्रजा का जन्मसिद्ध अधिकार समझता हूं।’
बावजूद उन्होंने 31 जनवरी 1944 को दो साल का कारावास और 200 रुपये जुर्माना लगाकर उन्हें सजायाफ्ता मुजरिम बना दिया गया। शासन ने बौखलाकर उन्हें काल कोठरी में ठूंसकर भारी हथकड़ी व बेड़ियों में कस दिया। इस दुर्व्यवहार से खीझकर इन्होंने 29 फरवरी से 21 दिन का उपवास प्रारम्भ किया। इस दौरान उन्हें बेंतों की सजा भी मिली। इस पर उन्होंने 3 मई 1944 से राजशाही के खिलाफ जेल में ही 84 दिन की ऐतिहासिक भूख हड़ताल-आमरण अनशन शुरु कर दिया।
इस बीच उन पर कई पाशविक अत्याचार किये गये, उनके मनोबल को डिगाने की कोशिश की, लेकिन वह अपने विरोध पर कायम रहे। उनके अनशन से उद्विग्न जनता को भरमाने के लिए रियासत ने उनका अनशन समाप्त करने की अफवाह भी फैलाई और उन्हें 4 अगस्त को महाराजा के जन्मदिन पर इन्हें रिहा करने की पेशकश भी की, लेकिन सुमन ने इसे ठुकराते हुए कहा, ‘क्या मैंने अपनी रिहाई के लिये यह कदम उठाया है ? ऐसा मायाजाल डालकर आप मुझे विचलित नहीं कर सकते। अगर प्रजामण्डल को रजिस्टर्ड किये बिना मुझे रिहा कर दिया गया तो मैं फिर भी अपना अनशन जारी रखूंगा।’

25 जुलाई 1944 को अमर हो गए श्रीदेव सुमन

तमाम उत्पीड़न, उचित उपचार न दिये जाने व लंबे उपवास के कारण 24 जुलाई की रात से ही उन्हें बेहोशी आने लगी और 25 जुलाई 1944 को शाम करीब चार बजे इस अमर सेनानी ने अपने देश व अपने आदर्शों की रक्षा के लिये अपने प्राणों की आहुति दे दी। इसी रात को जेल प्रशासन ने उनकी लाश को एक कम्बल में लपेट कर भागीरथी और भिलंगना नदियों के संगम से नीचे तेज प्रवाह में जल समाधि दे दी।

बलिदान ने बदल दिया टिहरी का इतिहास

लेकिन उनकी शहादत व्यर्थ नहीं गयी। अपने जीते जी न सही, अपनी शहादत के बाद वे अपना मकसद पूरा कर गये। उनकी शहादत का जनता पर इतना गहरा प्रभाव पड़ा कि उनके बलिदान का अर्घ्य पाकर टिहरी राज्य में आंदोलन और तेज हो गया। जनता ने राजशाही के खिलाफ खुला विद्रोह कर दिया। इसके फलस्वरूप टिहरी रियासत को प्रजामंडल को वैधानिक करार देने को मजबूर होना पड़ा।
मई 1947 में प्रजामंडल का प्रथम अधिवेशन हुआ। 1948 में जनता ने देवप्रयाग, कीर्तिनगर और टिहरी पर अधिकार कर लिया और प्रजामंडल का मंत्रिपरिषद गठित हुआ। इसके बाद 1 अगस्त 1949 को टिहरी गढ़वाल राज्य का भारतीय गणराज्य में विलय हो गया। अब जबकि पुराने टिहरी शहर की जेल और काल कोठरी तो बांध में डूब गयी है, पर नई टिहरी की जेल में उन्हें बांधने वाली हथकड़ी व बेड़ियां अब भी मौजूद हैं, अलबत्ता सुमन और टिहरी की जनता उन हथकड़ियों व बेड़ियों की कैद से हमेशा के लिए आजाद हैं।

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