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उत्तराखंड भाजपा में फिर तेज हुई अंदरूनी सियासत, क्या धामी नेतृत्व के खिलाफ सक्रिय हैं बलूनी-त्रिवेंद्र खेमे?

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नवीन समाचार, देहरादून, 27 मई 2026 (Baluni-Trivendra Factions Against Dhami)। उत्तराखंड (Uttarakhand) भाजपा (BJP) में लंबे समय से भीतर-भीतर चल रही राजनीतिक खींचतान एक बार फिर सतह पर आती दिखाई दे रही है। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन (Nitin Naveen) के प्रस्तावित उत्तराखंड दौरे से ठीक पहले गदरपुर (Gadarpur) में विधायक अरविंद पांडे (Arvind Pandey) के आवास पर वरिष्ठ नेताओं की लगातार बढ़ती आवाजाही ने पार्टी के अंदर शक्ति संघर्ष और संभावित नेतृत्व समीकरणों को लेकर नई चर्चाओं को जन्म दे दिया है।

राजनीतिक हलकों में यह सवाल फिर उठने लगा है कि क्या गढ़वाल सांसद अनिल बलूनी (Anil Baluni) और पूर्व मुख्यमंत्री व हरिद्वार सांसद त्रिवेंद्र सिंह रावत (Trivendra Singh Rawat) मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी (Pushkar Singh Dhami) के समानांतर राजनीतिक शक्ति केंद्र के रूप में सक्रिय हैं।

Baluni-Trivendra Factions Against Dhami आज गूलरभोज आवास पर भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय मीडिया प्रभारी एवं मुख्य  प्रवक्ता, गढ़वाल से माननीय सांसद श्री अनिल बलूनी जी के साथ ...हाल के दिनों में भाजपा के राष्ट्रीय मीडिया प्रभारी एवं राज्यसभा सांसद अनिल बलूनी और पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत अलग-अलग समय पर गदरपुर पहुंचकर अरविंद पांडे से मिले हैं। इन मुलाकातों की तस्वीरें सार्वजनिक होने के बाद यह चर्चा और तेज हो गई है कि भाजपा के भीतर अब भी अलग-अलग खेमे सक्रिय हैं और 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले राजनीतिक स्थिति को लेकर अंदरखाने हलचल बनी हुई है।

त्रिवेंद्र काल से शुरू हुई थीं नेतृत्व की चर्चाएं

राजनीतिक सूत्रों की मानें तो अनिल बलूनी लंबे समय से उत्तराखंड की सत्ता और नेतृत्व राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका की इच्छा रखते रहे हैं। कहा जाता है कि त्रिवेंद्र सिंह रावत के मुख्यमंत्री रहते ही बलूनी की इसी कारण प्रभाव और सक्रियता तेजी से बढ़ने लगी थी।

विशेष बात यह रही कि त्रिवेंद्र सरकार के कार्यकाल में भाजपा ने राज्य के इतिहास में पहली बार लोकसभा की सभी पांच सीटें जीती थीं। निकाय चुनावों और त्रिस्तरीय पंचायत चुनावों में भी सत्तारूढ़ भाजपा का प्रदर्शन उल्लेखनीय रहा था। इसके बावजूद अनिल बलूनी के भाजपा के राष्ट्रीय मीडिया प्रमुख रहने के कारण प्रभाव के बावजूद एक राष्ट्रीय मीडिया चैनल द्वारा त्रिवेंद्र रावत को देश का “सबसे फिसड्डी मुख्यमंत्री” बताए जाने की चर्चा राजनीतिक गलियारों में लंबे समय तक होती रही।

राजनीतिक हलकों में दबी जुबान यह भी कहा जाता रहा कि त्रिवेंद्र रावत की कुर्सी जाने की परिस्थितियों के पीछे बलूनी की रणनीतिक भूमिका रही थी। हालांकि इसकी कभी आधिकारिक पुष्टि नहीं हो पाई।

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बलूनी को मुख्यमंत्री बनाने की चर्चा और बदला घटनाक्रम

राजनीतिक सूत्रों के अनुसार त्रिवेंद्र रावत के हटने के बाद केंद्रीय नेतृत्व ने एक समय अनिल बलूनी को राज्य की कमान सौंपने पर गंभीरता से विचार किया था। यहां तक कहा गया कि बलूनी के नेतृत्व को लेकर किसी प्रकार की असहजता न रहे, इसके लिए त्रिवेंद्र रावत को स्वयं बलूनी के आवास भेजा गया था।

बताया जाता है कि त्रिवेंद्र रावत बलूनी से मुलाकात करने भी गए, लेकिन लौटने के बाद उन्होंने केंद्रीय नेतृत्व के समक्ष अपनी शंकाएं और राजनीतिक आशंकाएं व्यक्त कर दीं। इसके बाद परिस्थितियां तेजी से बदलीं और जल्दबाजी में तीरथ सिंह रावत (Tirath Singh Rawat) को मुख्यमंत्री बनाया गया। बाद में पार्टी ने अपेक्षाकृत युवा चेहरे के रूप में पुष्कर सिंह धामी को मुख्यमंत्री की जिम्मेदारी सौंपकर राजनीतिक संतुलन साधने का प्रयास किया।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इसके बावजूद राज्य भाजपा में शक्ति संतुलन की राजनीति पूरी तरह समाप्त नहीं हुई। समय-समय पर बलूनी और त्रिवेंद्र रावत को राज्य सरकार की दिशा से अलग राजनीतिक संकेत देते हुए देखा जाता रहा है।

अरविंद पांडे प्रकरण ने फिर बढ़ाई असहजता

छविभाजपा विधायक अरविंद पांडे पिछले कई महीनों से अपनी बयानबाजी और राज्य सरकार व पुलिस प्रशासन पर सार्वजनिक सवाल उठाने को लेकर चर्चा में रहे हैं। अवैध खनन, भूमि अतिक्रमण और कथित भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों पर उनके बयान कई बार पार्टी नेतृत्व के लिए असहज स्थिति पैदा कर चुके हैं। यहां तक कि उन्होंने नार्को टेस्ट तक की मांग कर दी थी, जिससे सरकार और पुलिस प्रशासन दोनों दबाव में दिखाई दिए।

Imageजनवरी 2026 में भी यह चर्चा सामने आई थी कि अनिल बलूनी, त्रिवेंद्र सिंह रावत और मदन कौशिक (Madan Kaushik) गदरपुर जाकर अरविंद पांडे के समर्थन में शक्ति प्रदर्शन कर सकते हैं, हालांकि अंतिम समय में कार्यक्रम टल गया था। उस समय भी इसे भाजपा के भीतर बढ़ती दूरी और असंतोष का संकेत माना गया था।

सूत्रों के अनुसार अरविंद पांडे स्वयं कई विधायकों के “गुप्त समर्थन” का दावा करते रहे हैं। यही कारण है कि पार्टी नेतृत्व इस पूरे प्रकरण को केवल व्यक्तिगत नाराजगी मानकर नजरअंदाज करने की स्थिति में नहीं दिख रहा।

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राष्ट्रीय अध्यक्ष के दौरे से पहले डैमेज कंट्रोल की कोशिश

इधर भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन 28 से 30 मई तक उत्तराखंड दौरे पर रहेंगे। उनके दौरे से पहले मुख्यमंत्री आवास पर एक महत्वपूर्ण बैठक प्रस्तावित बताई जा रही है, जिसमें मुख्यमंत्री धामी, प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट (Mahendra Bhatt), अनिल बलूनी, त्रिवेंद्र सिंह रावत और संगठन महामंत्री अजय कुमार (Ajay Kumar) के शामिल होने की संभावना है।

राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि इस बैठक का मुख्य उद्देश्य पार्टी के भीतर चल रही नाराजगी और शक्ति संघर्ष की चर्चाओं को नियंत्रित करना तथा राष्ट्रीय नेतृत्व के सामने एकजुटता का संदेश देना हो सकता है। हालांकि प्रदेश भाजपा अध्यक्ष महेंद्र भट्ट लगातार पार्टी में किसी भी प्रकार की गुटबाजी से इनकार करते रहे हैं, लेकिन लगातार हो रही रणनीतिक मुलाकातें यह संकेत अवश्य दे रही हैं कि उत्तराखंड भाजपा में सब कुछ पूरी तरह सामान्य नहीं है।

2027 चुनाव से पहले बढ़ सकता है दबाव

विशेषज्ञों का मानना है कि 2027 विधानसभा चुनाव जैसे-जैसे नजदीक आएंगे, भाजपा के भीतर नेतृत्व, संगठन और शक्ति संतुलन को लेकर दबाव और बढ़ सकता है। मुख्यमंत्री धामी फिलहाल केंद्रीय नेतृत्व के भरोसेमंद चेहरे माने जा रहे हैं, लेकिन समानांतर राजनीतिक सक्रियताएं यह संकेत देती हैं कि पार्टी के भीतर भविष्य की राजनीति को लेकर कई स्तरों पर मंथन जारी है।

अब सबकी निगाहें नितिन नवीन के दौरे और भाजपा नेतृत्व के अगले राजनीतिक संकेतों पर टिकी हुई हैं। इस समाचार को लेकर आपके क्या विचार हैं। अपनी राय नीचे कमेन्ट बॉक्स में अवश्य साझा करें। पाठकों से आग्रह है कि इस समाचार से संबंधित अपनी राय और विचार नीचे दिए गए कमेन्ट बॉक्स में अवश्य साझा करें।

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