उत्तराखंड से अंतरराष्ट्रीय ‘जिहादी ड्रग’ नेटवर्क का बड़ा खुलासा, देहरादून की फैक्ट्री में बन रहा था ₹182 करोड़ का कैप्टागन

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नवीन समाचार, देहरादून, 18 मई 2026 (Doon-International Jihadi Drug Network)। उत्तराखंड (UTTARAKHAND) की राजधानी देहरादून (DEHRADUN) से अंतरराष्ट्रीय मादक पदार्थ तस्करी के एक ऐसे नेटवर्क का अनावरण हुआ है, जिसने भारत की सुरक्षा एजेंसियों के साथ वैश्विक ड्रग नियंत्रण एजेंसियों को भी सतर्क कर दिया है। नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (NCB) ने ‘ऑपरेशन रेजपिल’ (Operation RAGEPILL) के तहत पहली बार भारत में प्रतिबंधित और अत्यंत खतरनाक मादक पदार्थ ‘कैप्टागन’ (Captagon) की 227.7 किलोग्राम खेप बरामद की है, जिसकी अंतरराष्ट्रीय अवैध बाजार में अनुमानित कीमत लगभग 182 करोड़ रुपये आंकी गई है।

(Doon-International Jihadi Drug Network) उत्तराखंड में 'जिहादी ड्रग' की हाईटेक लैब, रोज 50000 कमा रहा था मालिक,  227KG कैप्टागॉन को लेकर हुए बड़े खुलासे | NCB operation razepil uttarakhand  secret captagon drug Factory ...जांच में सामने आया है कि इस कथित ‘जिहादी ड्रग’ का निर्माण देहरादून के सहसपुर स्थित ‘ग्रीन हर्बल’ फैक्ट्री में किया जा रहा था, जबकि इसकी आपूर्ति सऊदी अरब सहित मध्य-पूर्व के देशों तक की जानी थी। यह मामला केवल उत्तराखंड या भारत तक सीमित नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय नार्को-आतंकवाद, हवाला नेटवर्क और वैश्विक ड्रग सिंडिकेट से जुड़ा गंभीर सुरक्षा प्रकरण माना जा रहा है।

पहली बार भारत में पकड़ा गया ‘कैप्टागन’, जिसे कहा जाता है ‘जिहादी ड्रग’

कैप्टागन एक सिंथेटिक उत्तेजक मादक पदार्थ है, जिसमें मुख्य रूप से फेनेटाइलीन (Fenethylline) और एम्फेटामाइन जैसे रसायन पाए जाते हैं। इसे 1960 के दशक में चिकित्सीय उपयोग के लिए विकसित किया गया था, लेकिन अत्यधिक लत और दुरुपयोग की आशंका के कारण बाद में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिबंधित कर दिया गया। वर्तमान में अवैध बाजारों में मिलने वाली अधिकांश कैप्टागन गोलियां गुप्त प्रयोगशालाओं में तैयार की जाती हैं, जिनमें एम्फेटामाइन, मेथामफेटामाइन, कैफीन और अन्य सिंथेटिक रसायनों का मिश्रण होता है।

अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों के अनुसार इस ड्रग का उपयोग मध्य-पूर्व के संघर्ष क्षेत्रों में सक्रिय आतंकवादी संगठनों और सशस्त्र गिरोहों द्वारा किया जाता रहा है। सुरक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि यह मादक पदार्थ सेवन करने वाले व्यक्ति में भय और थकान की अनुभूति को कम कर अत्यधिक उत्तेजना उत्पन्न करता है। इसी कारण इसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ‘जिहादी ड्रग’ के नाम से भी जाना जाता है।

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विदेशी खुफिया सूचना से खुला अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क

एनसीबी को एक विदेशी ड्रग कानून प्रवर्तन एजेंसी से सूचना मिली थी कि भारत का उपयोग कैप्टागन तस्करी के ट्रांजिट हब के रूप में किया जा रहा है। इसके बाद एजेंसी ने नई दिल्ली के नेब सराय क्षेत्र में एक मकान की पहचान की। 11 मई 2026 को वहां तलाशी के दौरान चपाती कटिंग मशीन में छिपाकर रखी गई लगभग 31.5 किलोग्राम कैप्टागन टैबलेट बरामद की गई, जिसे जेद्दा (Jeddah), सऊदी अरब भेजा जाना था।

जांच में सामने आया कि गिरफ्तार सीरियाई नागरिक 15 नवंबर 2024 को पर्यटक वीजा पर भारत आया था, लेकिन जनवरी 2025 में वीजा समाप्त होने के बाद भी अवैध रूप से भारत में रह रहा था। पूछताछ में उसने खुलासा किया कि कैप्टागन टैबलेट देहरादून की ‘ग्रीन हर्बल’ फैक्ट्री में तैयार की गयी थीं।

मुंद्रा बंदरगाह से 196.2 किलोग्राम कैप्टागन पाउडर बरामद

जांच के आधार पर 14 मई को गुजरात के मुंद्रा कंटेनर फैसिलिटेशन स्टेशन में एक कंटेनर की तलाशी ली गयी। यह कंटेनर भेड़ की ऊन बताकर सीरिया से आयात किया गया था। तलाशी में तीन बैगों में छिपाकर रखे गये 196.2 किलोग्राम कैप्टागन पाउडर बरामद किया गया। इस प्रकार कुल 227.7 किलोग्राम कैप्टागन टैबलेट और पाउडर जब्त किया गया।

एनसीबी के अनुसार यह खेप मुख्य रूप से सऊदी अरब और अन्य खाड़ी देशों में भेजी जानी थी, जहां कैप्टागन का अवैध उपयोग गंभीर सामाजिक और सुरक्षा चुनौती बन चुका है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में इस खेप की कीमत लगभग 182 करोड़ रुपये आंकी गई है।

देहरादून की फैक्ट्री में चल रही थी हाईटेक ड्रग लैब

सीरियाई नागरिक से पूछताछ के बाद एनसीबी ने 16 मई की रात देहरादून के सहसपुर स्थित ‘ग्रीन हर्बल’ फैक्ट्री में छापेमारी की। यहां टैबलेट निर्माण यूनिट, ग्रैनुलेशन मशीन, कैप्सूल फिलिंग मशीन, कोटिंग यूनिट, सीलिंग और ब्लिस्टर पैकेजिंग मशीन सहित अत्याधुनिक उपकरण मिले। साथ ही भारी मात्रा में रसायन, कच्चा माल, कैप्सूल और पैकेजिंग सामग्री भी बरामद हुई।

जांच में सामने आया कि फैक्ट्री मालिक परिसर को कैप्टागन निर्माण के लिए प्रतिदिन लगभग 50 हजार रुपये किराये पर उपलब्ध कराता था। एनसीबी के अनुसार फैक्ट्री मालिक पहले भी दो अन्य मादक पदार्थ प्रकरणों में जांच के दायरे में रह चुका है।

नकली दवा से अंतरराष्ट्रीय ड्रग सिंडिकेट तक

यह फैक्ट्री पहले भी विवादों में रह चुकी है। छह दिसंबर 2024 को उत्तराखंड पुलिस ने यहां नकली दवाओं के निर्माण का अनावरण किया था। कार्रवाई के बाद परिसर सील किया गया, लेकिन बाद में न्यायालय के आदेश पर इसे दोबारा खोल दिया गया। अब एनसीबी की जांच में यह सामने आया है कि उसी परिसर को हाईटेक ड्रग लैब में बदलकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिबंधित मादक पदार्थ तैयार किये जा रहे थे।

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गृह मंत्री अमित शाह ने कहा- भारत को ट्रांजिट रूट बनाने वालों पर होगी सख्त कार्रवाई

₹182 करोड़ की 'जिहादी ड्रग' कैप्टागॉन भारत में पहली बार जब्त होता है बेहद  खतरनाक विवेकानंद से जानें- इसका मिडिल ईस्ट कनेक्शन और कैसे पड़ा ये ...केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह ने ‘ऑपरेशन रेजपिल’ को बड़ी सफलता बताते हुए एनसीबी की टीम को बधाई दी। उन्होंने कहा कि भारत में पहली बार कैप्टागन की जब्ती हुई है और यह मोदी सरकार की ‘नशामुक्त भारत’ तथा ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति का उदाहरण है। उन्होंने स्पष्ट कहा कि भारत में आने वाली या देश को ट्रांजिट रूट के रूप में उपयोग कर बाहर भेजी जाने वाली प्रत्येक ग्राम ड्रग के विरुद्ध सख्त कार्रवाई की जाएगी।

उत्तराखंड से अंतरराष्ट्रीय अपराध तक बढ़ते खतरे का संकेत

विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला उत्तराखंड जैसे अपेक्षाकृत शांत राज्य में अंतरराष्ट्रीय संगठित अपराध नेटवर्क की बढ़ती पहुंच का गंभीर संकेत है। जिस प्रकार विदेशी नागरिक, हवाला नेटवर्क, फर्जी आयात दस्तावेज, कंटेनर लॉजिस्टिक्स और स्थानीय फैक्ट्री ढांचे का उपयोग किया गया, वह संगठित अंतरराष्ट्रीय ड्रग सिंडिकेट की सुनियोजित रणनीति को दर्शाता है।

भारत में हाल के वर्षों में अंतरराष्ट्रीय मादक पदार्थ नेटवर्क द्वारा समुद्री बंदरगाहों और कंटेनर आधारित व्यापार मार्गों के दुरुपयोग के कई मामले सामने आये हैं। हाल ही में मुंबई में इक्वाडोर से आये कंटेनर में 349 किलोग्राम उच्च गुणवत्ता वाली कोकीन बरामद की गयी थी। अब कैप्टागन मामले ने यह स्पष्ट किया है कि भारत को ट्रांजिट हब बनाने के प्रयास तेजी से बढ़ रहे हैं।

हवाला, लॉजिस्टिक्स और वैश्विक नेटवर्क की जांच जारी

एनसीबी अब इस पूरे नेटवर्क के वित्तीय स्रोत, हवाला लिंक, लॉजिस्टिक्स सुविधा प्रदाताओं, अंतरराष्ट्रीय रिसीवरों और अन्य सहयोगियों की जांच कर रही है। एजेंसी का कहना है कि यह नेटवर्क केवल ड्रग तस्करी तक सीमित नहीं, बल्कि संभावित नार्को-आतंकवाद और सीमा पार अपराध तंत्र से भी जुड़ा हो सकता है।

विशेषज्ञों के अनुसार यदि समय रहते इस नेटवर्क का पर्दाफाश नहीं होता, तो उत्तराखंड स्थित यह फैक्ट्री मध्य-पूर्व और दक्षिण एशिया के बीच बड़े सिंथेटिक ड्रग आपूर्ति केंद्र के रूप में विकसित हो सकती थी। इस कार्रवाई ने एक बार फिर स्पष्ट किया है कि आधुनिक अंतरराष्ट्रीय अपराध अब सीमाओं से परे तकनीक, व्यापार और लॉजिस्टिक्स नेटवर्क का उपयोग कर रहे हैं, जिनसे निपटने के लिए वैश्विक स्तर पर समन्वित कार्रवाई की आवश्यकता है।

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