उत्तराखंड के भारत के पहले स्वदेशी पर्सनल फ्लाइंग व्हीकल-उड़ने वाली कार बनाने वाले रवि ने 12वीं में ही जता दिए थे इरादे…

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नवीन समाचार, अल्मोड़ा, 7 अगस्त 2026 (Indias First Indigenous Flying Car)। अब वह दिन अधिक दूर नहीं जब कार सड़क पर जाम में नहीं फंसेगी, वरन हवा में उड़ेगी। न पेट्रोल की कीमतें बढ़ने से कोई फर्क पड़ेगा न उसमें ऐथेनॉल की मात्रा के बढ़ाने की कोई चिंता। विशेषकर पहाड़ों पर सड़कों पर भूस्खलन जैसी कोई समस्या भी रास्ता नहीं रोक पाएगी। उत्तराखंड की एक एक प्रतिभा ने अपनी बनायी हुई उड़ने वाली कार का उड़ने का परीक्षण करके दिखाया है, जिसकी पूरे देश में चर्चा हो रही है, क्योंकि इसे देश की पहली उड़ने वाली कार कहा जा रहा है।

इस समाचार में आगे हम बताएंगे कि उड़ने वाली यह कार किसने बनायी है। वह कहां के रहने वाले हैं। यह कार किस गति से उड़ती है। किस ईंधन से उड़ती है और कितनी लाभदायक है।

इससे पहले पढ़ें कि कैसे रवि टम्टा ने जब नैनीताल के राजकीय इंटर कॉलेज में पढ़ने के दौरान चलते हुए मोबाइल रिचार्ज करने वाला डाइनेमो युक्त जूता बनाया था, तब हमारे द्वारा लिया गया उसका साक्षात्कार एवं संबंधित समाचार:

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12वीं के छात्र ने जूते में बनाया डायनेमो, 500 रुपये में तैयार हो जाएगा उपकरण

7b7e9 niralauttarakhandअल्मोड़ा के रवि टम्टा नैनीताल के राजकीय इंटर कालेज में महज 12वीं के छात्र हैं। पिता एक साधारण से मोटर मैकेनिक। पिता की देखा-देखी गाड़ियों के कल-पुजरे को तोड़ते-जोड़ते उन्होंने एक ऐसा कारनामा कर दिखाया जो बड़े-बड़ों को दांतों तले उंगुली दबाने को मजबूर कर दे। पिछले महीने नैनीताल में बर्फबारी के दौरान बिजली क्या गुल हुई, रवि के दिमाग की बत्ती जल उठी। उन्होंने जूतों में एक ऐसा ‘डायनेमो’ फिट कर दिखाया जिससे चलते-फिरते बिजली पैदा हो सकती है।

इस बिजली से मोबाइल को रिचार्ज किया जा सकता है तो 20 वाट का सीएफएल भी रोशन हो सकता है। पांव तले बने इस छोटे से पावर हाउस की बिजली को बैटरी में स्टोर कर जरूरत के अनुसार इस्तेमाल भी किया जा सकता है। वह कहता है, मैं दुनिया को ऐसा कुछ देना चाहता हूं जिसके बारे में अब तक किसी ने सोचा तक न हो। पेश है रवि टम्टा से बातचीत के अंश :

सुना है आपने कोई नई खोज की है। क्या खोज की है, विस्तार से बताएं ?

मैने केवल 500 रुपये खर्च कर जूते में ऐसा प्रबंध किया है कि इससे चलते-फिरते बिजली पैदा की जा सकती है। जूते में स्प्रिंग, घूमती हुई गति से बिजली पैदा करने वाले डायनेमो और चुंबकों को इस तरह लगाया है कि स्प्रिंग चलते समय कदमों से बनने वाले दबाव से डायनेमो को करीब 50 चक्कर घुमा देता है। दो चुंबकों के उत्तरी ध्रुवों को साथ रखकर उनके एक -दूसरे से दूर जाने के गुण का लाभ लेते हुए डायनेमो को पांच-छह अतिरिक्त चक्कर की अधिक गति देने का प्रयोग किया है।

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इस तरह एक किमी चलने से इतनी बिजली बन जाती है कि मोबाइल फोन रिचार्ज हो सके। जूते में पैदा हुई बिजली को स्टोर करने के लिए रिचार्जेबल बैटरी भी है। इससे बिजली का प्रयोग बाद में किया जा सकता है।

आपकी यह खोज कितनी उपयोगी हो सकती है ?

हमारे जीवन में बिजली की खपत बढ़ी है। बिजली आपूर्ति के लिए गैर परंपरागत ऊर्जा श्रोतों की लगातार तलाश है। देश में हर व्यक्ति बहुत चलता है। गरीब पेट भरने और अमीर मोटापा रोकने के लिए काफी चलते हैं। ऐसे में मेरा प्रयोग बेहद लाभप्रद हो सकता है।

आपको इस खोज का विचार कहां से आया। आपने कितने समय में इसे कर दिखाया ?

करीब एक माह पहले नैनीताल में बर्फ गिरी थी। इस दौरान तीन दिन बिजली गायब रही। मेरा मोबाइल डिस्चार्ज हो गया। मैंने सोचा कि जब गाड़ियों में चलते-फिरते बिजली पैदा कर रोशनी और मोबाइल रिचार्ज किया जा सकता है तो पैदल चलने से बिजली पैदा हो सकती है। करीब एक माह के प्रयास से मेरा प्रयोग सफल हो गया। गांवों में महीनों बिजली गायब रहती है। पहाड़ों पर लोगों को बहुत पैदल चलना पड़ता है। मेरे बनाए जूतों से लोग जरूरत की बिजली बना सकते हैं।

अपनी पारिवारिक पृष्ठभूमि के बारे में कुछ बताएं ?

मैं मूलत: अल्मोड़ा जनपद के काफलीखान का रहने वाला हूं। वहां मेरे पिता श्री हरीश चंद्र टम्टा का ऑटो गैराज है। बचपन से पिता के साथ गैराज में हाथ बंटाता हूं। मेरे पिता ने ऑटोमोबाइल से आईटीआई किया है। वे अक्सर नये प्रयोग करते रहते हैं। उन्हीं की देखा-देखी मैं भी नई-नर्इ खोजों के बारे में सोचता रहता हूं। मैं तीन भाई-बहनों में सबसे छोटा हूं। बड़े भाई पॉलीटेक्निक से डिप्लोमा कर रहे हैं। बड़ी बहन का विवाह हो चुका है। नैनीताल में चाचा के साथ रहकर मेजर राजेश अधिकारी राजकीय इंटर कालेज में 12वीं में पढ़ रहा हूं।

और भी नई खोज करने की योजना है ?

2008 से मैं वाहनों को दुर्घटनाओं से बचाने के प्रयोग पर कार्य कर रहा हूं। इसे मैं प्रायोगिक तौर पर कागज पर साबित कर भी चुका हूं। किसी वाहन पर इसे प्रदर्शित करने के लिए काफी बड़ी धनराशि चाहिए। मैंने ‘घोंघे’ से प्रेरणा ली है। वह दो नाजुक सींग सरीखे अंगों से रास्ते का अनुमान लगाता है और पतली सींक पर नहीं गिरता। मेरी खोजयुक्त गाड़ी के टायरों में ऐसा प्रबंध होगा कि वे कीचड़ या पथरीली सड़कों पर नहीं फिसलेगी। प्रयोग की सफलता तक मैं अधिक खुलासा नहीं कर सकता।

मैं ऐसी प्रविधि भी विकसित करने की राह पर भी हूं जिससे जीवन में काफी कुछ सीख चुके मृत व्यक्तियों के मस्तिष्क को बच्चों में प्रतिस्थापित किया जा सकेगा। इससे बच्चे उस व्यक्ति के बराबर ज्ञानयुक्त होंगे। आगे उनके जीवन में मस्तिष्क लगातार सीखता रहेगा। इस प्रकार मानव मस्तिष्क समृद्ध होता चला जाएगा। मुझे पता चला है कि रोबोट में कुछ इस तरह का प्रयोग किया जा चुका है पर मेरा प्रयोग मनुष्यों में होगा।

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आपको ऐसी नई खोजों की प्रेरणा कहां से मिलती है, कौन मदद करते हैं ?

मेरे पिता मेरे प्रेरणा श्रोत हैं। स्कूल में भौतिकी के प्रवक्ता श्याम दत्त चौधरी से भी मदद मिलती है। मैं रात्रि में केवल तीन-चार घंटे ही सोता हूं। स्कूल के अलावा हर रोज दो घंटे होमवर्क आदि के बाद मेरा पूरा समय अपनी खोजों के बारे में सोचने में ही जाता है। कई बार रात में सोते हुए सपने में भी मैं स्वयं को कुछ नया करते हुए पाता हूं। इस कारण हाईस्कूल बोर्ड परीक्षा में मैं केवल 55 फीसद अंक ही प्राप्त कर पाया।

भविष्य में क्या बनना चाहते हैं, सरकार से कोई अपेक्षा ?

मैं भविष्य में कुछ नया करना चाहता हूं। पिता का ऑटो गैराज अच्छा चलता है। मुझ पर पैसे कमाने की जिम्मेदारी नहीं है। मैं नौकरी नहीं करना चाहता। मेरा लक्ष्य दुनिया को कुछ नया देना है। अपनी सोच को वहां पहुंचाना चाहता हूं जहां कोई न पहुंचा हो। कोई जूते बनाने वाली कंपनी मेरी बिजली बनाने वाली खोज को आगे बढ़ाए तो ठीक, वरना मैं अपनी ऐसी जूता फैक्टरी खोलने पर विचार कर सकता हूं। सरकार से भी मेरी इस खोज के बाबत कोई अपेक्षा नहीं है। वाहनों को दुर्घटना से बचाने वाली खोज में लाखों रुपये की जरूरत पड़ेगी। उसमें कोई मदद करे तो जरूर स्वीकार करूंगा।

अब बात रवि की उड़ने वाली कार की

अल्मोड़ा (Almora) के एक युवा नवप्रवर्तक ने भारत में व्यक्तिगत हवाई परिवहन (Personal Air Mobility) की दिशा में महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल करने का दावा किया है। जागेश्वर (Jageshwar) के निकट काफलीखान (Kaflikhan) गांव निवासी रवि टम्टा (Ravi Tamta) ने अपने स्टार्टअप हापिडा स्काई प्राइवेट लिमिटेड (Hapida Sky Private Limited) के माध्यम से विकसित एकल-सीटर पूर्णतः विद्युत चालित पर्सनल फ्लाइंग व्हीकल (Personal Flying Vehicle) के प्रोटोटाइप का सफल प्रारंभिक परीक्षण करने का दावा किया है। यदि यह तकनीक आगे सभी तकनीकी और नियामकीय परीक्षणों में सफल रहती है तो यह पर्वतीय क्षेत्रों में परिवहन, आपदा प्रबंधन और चिकित्सा आपातकालीन सेवाओं के लिए नई संभावनाएं खोल सकती है।

Indias First Indigenous Flying Car पहाड़ के रवि का कमाल, देश की पहली फ्लाइंग कार का सफल परीक्षण करके दिया बड़ा  संदेश | Devbhoomi Dialogueप्राप्त जानकारी के अनुसार रवि टम्टा ने अपने प्रोटोटाइप का नाम HAPIDA SKYNeX रखा है। यह वाहन पूरी तरह बैटरी आधारित ईवीटीओएल (eVTOL) तकनीक पर आधारित है, अर्थात यह किसी लंबे रनवे के बिना सीधे ऊपर उठकर उड़ान भर सकता है। इसका उद्देश्य सुरक्षित, किफायती और पर्यावरण अनुकूल व्यक्तिगत हवाई परिवहन को विकसित करना है। इस तकनीक से शून्य उत्सर्जन (Zero Emission) के साथ यात्रा संभव होने का दावा किया गया है।

दस वर्षों की मेहनत के बाद मिला पहला परिणाम

रवि टम्टा ने बताया कि वह लगभग दस वर्षों से इस परियोजना पर कार्य कर रहे थे। प्रारंभिक परीक्षण के दौरान उन्होंने सीमित उड़ान भरकर तकनीक का प्रदर्शन किया। उनका कहना है कि सड़क मार्ग से लगभग 90 मिनट में पूरी होने वाली उनकी जिला मुख्यालय से अपने गांव की लगभग 40 किलोमीटर की दूरी इस वाहन से लगभग 12 मिनट में तय की जा सकती है। हालांकि उन्होंने स्पष्ट किया कि अभी यह केवल प्रोटोटाइप चरण में है और व्यावसायिक उपयोग से पहले विभिन्न तकनीकी परीक्षणों तथा नियामकीय स्वीकृतियों की आवश्यकता होगी।

पहाड़ों की समस्याओं का समाधान बनने की क्षमता

रवि टम्टा के अनुसार इस परियोजना का मूल उद्देश्य केवल उड़ने वाला वाहन बनाना नहीं, बल्कि पर्वतीय क्षेत्रों की वास्तविक समस्याओं का समाधान खोजना है। सड़क अवरुद्ध होने, चिकित्सा आपातकाल, भूस्खलन, बाढ़ अथवा अन्य आपदाओं के समय ऐसे वाहन राहत सामग्री, चिकित्सकीय सहायता और आपातकालीन सेवाएं तेजी से पहुंचाने में उपयोगी हो सकते हैं। विशेषज्ञ भी मानते हैं कि हिमालयी राज्यों की भौगोलिक परिस्थितियां ऐसी तकनीकों के परीक्षण और उपयोग के लिए उपयुक्त हो सकती हैं।

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पहले भी कर चुके हैं कई उपयोगी नवाचार

रवि टम्टा इससे पहले भी कई नवाचारों के कारण चर्चा में रह चुके हैं। इनमें तेज ईवी चार्जर, मोबाइल चार्ज करने वाले जूते, जंगल की आग बुझाने का पोर्टेबल उपकरण तथा बुजुर्गों के लिए स्मार्ट बांस की छड़ी जैसे प्रयोग शामिल हैं। उनका कहना है कि उनका प्रयास हमेशा पहाड़ों की चुनौतियों का स्थानीय समाधान विकसित करना रहा है।

अभी व्यावसायिक उपयोग से पहले कई चरण शेष

हालांकि इस उपलब्धि को महत्वपूर्ण माना जा रहा है, लेकिन यह वाहन अभी प्रारंभिक प्रोटोटाइप अवस्था में है। इसके व्यापक उपयोग से पहले विस्तृत परीक्षण, सुरक्षा मानकों का सत्यापन और संबंधित नियामकीय संस्थाओं से अनुमति आवश्यक होगी। इसके बाद ही इसे व्यावसायिक अथवा सार्वजनिक उपयोग के लिए विकसित किया जा सकेगा।

उत्तराखंड जैसे पर्वतीय राज्य में यदि ऐसी स्वदेशी तकनीक सफल होती है तो यह परिवहन, पर्यटन, चिकित्सा सेवाओं और आपदा प्रबंधन के क्षेत्र में महत्वपूर्ण परिवर्तन ला सकती है। साथ ही यह भारतीय नवाचार क्षमता और स्टार्टअप पारिस्थितिकी तंत्र को भी नई पहचान दिलाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

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