हिमालय रियल एस्टेट नहीं है: नेपाल की तबाही के बाद ग्लेशियर झीलों का खतरा बढ़ा, पहाड़ों में सुरंगों और फोर-लेन परियोजनाओं पर वैज्ञानिकों की चेतावनी

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नवीन समाचार, देहरादून, 29 अगस्त 2026 (Threat From Glacial Lakes in Himalayas)। उत्तराखंड (UTTARAKHAND) समेत पूरे हिमालयी क्षेत्र (Himalayan Region) के लिए नेपाल (Nepal) में आई विनाशकारी बाढ़ और भूस्खलन की तबाही ने एक गंभीर चेतावनी पैदा कर दी है। नेपाल में 538 से अधिक लोगों की मौत और करीब 1,500 लोगों के लापता होने के बीच विशेषज्ञों ने तेजी से बढ़ रही ग्लेशियर झीलों (Glacial Lakes), पिघलते हिमनदों (Glaciers) और हिमालय की बदलती भूगर्भीय परिस्थितियों को लेकर चिंता जताई है।

वैज्ञानिकों का मानना है कि हिमालय को केवल विकास परियोजनाओं और निर्माण गतिविधियों के क्षेत्र के रूप में नहीं देखा जा सकता तथा पहाड़ों में सुरंगों (Tunnels), फोर-लेन सड़कों (Four-Lane Roads) और बड़े निर्माण कार्यों से पहले पर्यावरणीय एवं भूगर्भीय जोखिमों का गंभीर वैज्ञानिक आकलन जरूरी है।

Threat From Glacial Lakes in Himalayas हिमाचल पर मंडरा रहा है बड़ा खतरा! ग्लेशियर झीलें मचा सकती हैं तबाही,  विशेषज्ञों ने जताई आशंकानेपाल और तिब्बत (Tibet) के हिमालयी क्षेत्रों में तेजी से आकार ले रही हिमनद झीलें पूरे उत्तर भारत (North India) के लिए संभावित प्राकृतिक खतरे के रूप में सामने आ रही हैं। इन झीलों के प्राकृतिक बांध टूटने की स्थिति में पानी, बर्फ और मलबे का भारी सैलाब अचानक नीचे की घाटियों में पहुंच सकता है। इस घटना को हिमनद झील विस्फोट बाढ़ यानी ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (Glacial Lake Outburst Flood-GLOF) कहा जाता है। इसका असर नेपाल से सटे उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों के साथ उत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh) और बिहार (Bihar) के मैदानी इलाकों तक पहुंचने की आशंका जताई जा रही है।

हिंदूकुश हिमालय में 47 खतरनाक ग्लेशियर झीलें

इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट (International Centre for Integrated Mountain Development-ICIMOD) और संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (United Nations Development Programme-UNDP) के आकलन के अनुसार हिंदूकुश हिमालय (Hindu Kush Himalaya) क्षेत्र में 47 ऐसी हिमनद झीलें चिन्हित की गई हैं, जिन्हें अत्यधिक संवेदनशील और खतरनाक माना गया है।

इनमें से 25 झीलें नेपाल में, 21 तिब्बत में और एक भारत (India) में स्थित है। भौगोलिक बनावट के अनुसार 42 झीलें कोशी नदी बेसिन (Koshi Basin), तीन गंडकी नदी बेसिन (Gandaki Basin) और दो कर्णाली नदी बेसिन (Karnali Basin) में आती हैं।

इसका अर्थ है कि अधिकांश खतरनाक झीलें उन नदी तंत्रों से जुड़ी हैं, जिनका प्रभाव सीधे नेपाल और भारत के विशाल आबादी वाले मैदानी क्षेत्रों तक पहुंचता है।

उत्तराखंड की 13 ग्लेशियर झीलें संवेदनशील सूची में

नेपाल की आपदा के बाद उत्तराखंड की ग्लेशियर झीलों को लेकर भी चिंता बढ़ गई है। राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (National Disaster Management Authority-NDMA) ने वर्ष 2024 में देशभर की करीब 200 ग्लेशियर झीलों की सूची जारी की थी।

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इन झीलों को संवेदनशील और अति संवेदनशील श्रेणियों में रखा गया था। उत्तराखंड की 13 ग्लेशियर झीलें भी इस सूची में शामिल हैं।

इनमें से पांच झीलों को आपदा के लिहाज से अति संवेदनशील श्रेणी में रखा गया है। इनमें चार झीलें नेपाल सीमा से सटे पिथौरागढ़ (Pithoragarh) जनपद में हैं, जबकि एक वसुधारा ग्लेशियर झील (Vasudhara Glacier Lake) चमोली (Chamoli) जनपद में स्थित है।

तीन संवेदनशील झीलों का वैज्ञानिक सर्वेक्षण पूरा

उत्तराखंड की संवेदनशील झीलों में से अब तक तीन का प्राथमिक वैज्ञानिक सर्वेक्षण पूरा किया जा चुका है।

उत्तराखंड के सचिव, आपदा प्रबंधन एवं पुनर्वास (Secretary Disaster Management and Rehabilitation) विनोद कुमार सुमन (Vinod Kumar Suman) के अनुसार पहले चरण में चमोली की वसुधारा ग्लेशियर झील का सर्वेक्षण किया गया था। इसके बाद पिथौरागढ़ की दो ग्लेशियर झीलों का भी सर्वेक्षण पूरा कर लिया गया।

बाकी दो अति संवेदनशील झीलों का सर्वेक्षण मई में प्रस्तावित था, लेकिन उस समय झीलों के जमे होने के कारण सर्वेक्षण नहीं हो सका। अब बर्फ पिघलने के बाद सितंबर में इनका सर्वेक्षण कराने का प्रयास किया जा रहा है।

विनोद कुमार सुमन के अनुसार राज्य की सभी ग्लेशियर झीलों की नियमित निगरानी की जा रही है और फिलहाल तत्काल चिंता जैसी स्थिति नहीं है। प्राथमिक सर्वेक्षण के आधार पर झीलों की निगरानी और सुरक्षा उपायों को और मजबूत किया जाएगा।

मौसम के बदलते ट्रेंड से बढ़ रहा खतरा

विशेषज्ञों के अनुसार मौसम और जलवायु (Climate Change) के बदलते ट्रेंड के कारण हिमालयी क्षेत्रों की ग्लेशियर झीलें लगातार अधिक संवेदनशील होती जा रही हैं।

भूस्खलन (Landslide) अथवा हिमस्खलन (Avalanche) की स्थिति में बड़ी मात्रा में बर्फ और मलबा झीलों में पहुंच सकता है। इससे पानी का दबाव अचानक बढ़ने और प्राकृतिक बांध टूटने का खतरा पैदा हो सकता है।

ऐसी घटना होने पर नीचे की घाटियों में अचानक भारी बाढ़ आ सकती है। इसी खतरे को देखते हुए केंद्र सरकार ने राज्यों को ग्लेशियर झीलों की विशेष निगरानी करने और संभावित आपदाओं से निपटने के लिए सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करने को कहा है।

अलकनंदा बेसिन में 219 हैंगिंग ग्लेशियर

उत्तराखंड के अलकनंदा बेसिन (Alaknanda Basin) में 219 हैंगिंग ग्लेशियर (Hanging Glaciers) चिन्हित किए गए हैं। ये लगभग 71.7 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैले हुए हैं।

वैज्ञानिक आकलन के अनुसार इनमें करीब 2.39 घन किलोमीटर बर्फ का अनुमानित भंडार मौजूद है। इनकी औसत ढलान 33.6 डिग्री बताई गई है।

अधिक ढलान होने के कारण इन ग्लेशियरों से बर्फ के बड़े हिस्से टूटने का खतरा बना रहता है। इससे हिमस्खलन हो सकता है और नदियों का प्रवाह रुक सकता है।

किसी नदी के अस्थायी रूप से रुकने के बाद उसके पीछे पानी जमा होने और बाद में अचानक अवरोध टूटने की स्थिति में विनाशकारी बाढ़ आने का खतरा भी पैदा हो सकता है।

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पिथौरागढ़ में महाकाली नदी से विशेष खतरा

विशेषज्ञों के अनुसार तिब्बत की संवेदनशील झीलों से उत्तराखंड को हर स्थिति में सीधा नुकसान नहीं होगा, लेकिन नेपाल से निकलने वाली महाकाली नदी (Mahakali River), जिसे काली नदी (Kali River) भी कहा जाता है, पिथौरागढ़ और आसपास के सीमावर्ती क्षेत्रों के लिए गंभीर जोखिम पैदा कर सकती है।

नेपाल के मुगु क्षेत्र (Mugu Region) की हिमनदी झील और काली नदी बेसिन की झीलों को बेहद संवेदनशील माना गया है।

इन क्षेत्रों में किसी ग्लेशियर झील के प्राकृतिक बांध के टूटने या बड़े हिमस्खलन की स्थिति में नदी में अचानक जलप्रवाह बढ़ सकता है। इसका असर सीमावर्ती गांवों, सड़कों, पुलों और नदी घाटियों के आसपास रहने वाली आबादी पर पड़ सकता है।

हिंदूकुश हिमालय में 63,700 से अधिक ग्लेशियर

ICIMOD के मार्च 2026 के आंकड़ों के अनुसार पूरे हिंदूकुश हिमालय क्षेत्र में 63,700 से अधिक ग्लेशियर मौजूद हैं। ये लगभग 55,782 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैले हुए हैं।

आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2000 के बाद इस क्षेत्र में बर्फ पिघलने की रफ्तार दोगुनी हो चुकी है। तेजी से पिघलते ग्लेशियरों के कारण नई हिमनद झीलों के बनने और पहले से मौजूद झीलों के आकार बढ़ने की संभावना भी बढ़ रही है।

भूवैज्ञानिकों का मानना है कि अलकनंदा और भागीरथी (Bhagirathi) घाटियों में स्थित ग्लेशियर झीलों और हैंगिंग ग्लेशियरों की 24 घंटे सैटेलाइट मॉनिटरिंग (Satellite Monitoring) जरूरी है।

समय रहते किसी झील के जलस्तर, प्राकृतिक बांध या ग्लेशियर में हो रहे असामान्य बदलाव का पता लगने पर निचले क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को पहले से चेतावनी देकर संभावित जनहानि और नुकसान कम किया जा सकता है।

हिमालय में विकास परियोजनाओं पर वैज्ञानिक दृष्टिकोण जरूरी

नेपाल की विनाशकारी आपदा और हिमालयी क्षेत्रों में बढ़ते ग्लेशियर जोखिमों के बीच विशेषज्ञों ने पहाड़ों में विकास परियोजनाओं की प्रकृति पर भी गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता बताई है।

हिमालय एक अत्यंत संवेदनशील और लगातार बदलने वाला पर्वतीय क्षेत्र है। ऐसे में सुरंगों, फोर-लेन सड़कों, बड़े बांधों और अन्य निर्माण परियोजनाओं के दौरान केवल आर्थिक विकास और निर्माण की आवश्यकता को आधार बनाना पर्याप्त नहीं माना जा सकता।

विशेषज्ञों का मानना है कि प्रत्येक बड़ी परियोजना से पहले स्थानीय भूगर्भीय परिस्थितियों, नदी तंत्र, ढलानों की स्थिरता, ग्लेशियरों, भूस्खलन संभावित क्षेत्रों और पर्यावरणीय क्षमता का वैज्ञानिक अध्ययन होना चाहिए।

नेपाल की त्रासदी ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा किया है कि हिमालय में विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन किस प्रकार बनाया जाए। सड़क संपर्क और बुनियादी सुविधाओं का विस्तार जरूरी है, लेकिन हिमालय की प्राकृतिक सीमाओं और उसकी संवेदनशील भूगर्भीय संरचना को नजरअंदाज करने का असर केवल पहाड़ों तक सीमित नहीं रहेगा।

उत्तराखंड जैसे हिमालयी राज्यों में होने वाली घटनाओं का प्रभाव नदियों के माध्यम से उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे विशाल मैदानी क्षेत्रों तक पहुंच सकता है। इसलिए वैज्ञानिकों की चेतावनी साफ है कि हिमालय को केवल निर्माण और व्यावसायिक विस्तार के लिए उपलब्ध जमीन के रूप में नहीं, बल्कि एक संवेदनशील प्राकृतिक तंत्र के रूप में समझकर विकास की दिशा तय करनी होगी।

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