नवीन समाचार, देहरादून, 25 अक्टूबर 2026 (Reservation Dispute in Jaunsar Region)। उत्तराखंड (Uttarakhand) में जौनसार-बावर (Jaunsar-Bawar) क्षेत्र के अनुसूचित जनजाति (Scheduled Tribe—ST) प्रमाणपत्रों की पात्रता को लेकर विवाद एक बार फिर चर्चा में है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की अध्यक्षता में हुई राज्य मंत्रिमंडल की बैठक में संवैधानिक सूची में दर्ज ‘जन्नासरी’ नाम को संशोधित कर ‘जौनसारी’ कराने के लिए केंद्र सरकार को संस्तुति भेजने का निर्णय लिए जाने के बाद अधिवक्ता एवं सामाजिक कार्यकर्ता विकेश नेगी ने नए प्रमाणपत्र जारी करने पर रोक लगाने और पहले जारी प्रमाणपत्रों की जाँच कराने की माँग की है।

नेगी का कहना है कि केंद्र सरकार के निर्णय तक जौनसार क्षेत्र में नए अनुसूचित जनजाति प्रमाणपत्र जारी नहीं किए जाने चाहिए। उन्होंने राज्य सरकार और देहरादून के जिला प्रशासन से उन प्रमाणपत्रों की भी जाँच कराने की माँग की है, जिनके बारे में उनका आरोप है कि वे पात्रता के बिना जारी किए गए और उनके आधार पर अनुसूचित जनजाति आरक्षण का लाभ लिया गया।
मंत्रिमंडल ने नाम संशोधन के लिए केंद्र को संस्तुति का निर्णय लिया
राज्य मंत्रिमंडल की वर्तमान संस्तुति का संबंध अनुसूचित जनजाति की संवैधानिक सूची में दर्ज नाम की वर्तनी को ‘जन्नासरी’ से ‘जौनसारी’ कराने से है। इस निर्णय के बाद केंद्र सरकार के स्तर पर आगे की प्रक्रिया होनी है। राज्य मंत्रिमंडल की संस्तुति अपने आप में संवैधानिक सूची में अंतिम संशोधन नहीं है और न ही इससे पहले जारी प्रमाणपत्र स्वतः निरस्त होते हैं।
संविधान के अनुच्छेद 342 के अंतर्गत अनुसूचित जनजातियों की सूची निर्धारित करने की व्यवस्था है। किसी राज्य के संबंध में किन समुदायों को अनुसूचित जनजाति माना जाएगा, यह संवैधानिक अधिसूचना से तय होता है। सूची में किसी समुदाय का नाम जोड़ने, हटाने या उसमें संशोधन की प्रक्रिया केवल राज्य सरकार के निर्णय से पूरी नहीं होती। इसके लिए केंद्र और संसद के स्तर पर निर्धारित संवैधानिक प्रक्रिया का पालन आवश्यक है।
नेगी का आरोप—अपात्र लोगों ने आरक्षण का लाभ लिया
अधिवक्ता विकेश सिंह नेगी का आरोप है कि जौनसार-बावर में अनुसूचित जनजाति प्रमाणपत्र जारी करने के संबंध में पूर्ववर्ती सरकारों के निर्णयों के कारण कुछ ऐसे लोगों ने भी आरक्षण का लाभ लिया, जो उनके अनुसार इसके पात्र नहीं थे। उनका कहना है कि इससे क्षेत्र के कोल्टा और बजगी समुदायों के पात्र लोगों के हित प्रभावित हुए हैं।
नेगी ने जौनसार क्षेत्र के ब्राह्मण, खस और क्षत्रिय समुदायों के उन लोगों के प्रमाणपत्रों की जाँच कराने की माँग की है, जिनकी पात्रता पर उन्होंने प्रश्न उठाए हैं। उनका कहना है कि 28 नवंबर 2000 के बाद जारी किए गए अनुसूचित जनजाति प्रमाणपत्रों की भी जाँच होनी चाहिए और नियमों के विरुद्ध जारी पाए जाने वाले प्रमाणपत्रों को निरस्त किया जाना चाहिए।
ये नेगी की ओर से लगाए गए आरोप और उनकी माँगें हैं। किसी व्यक्ति या समुदाय की पात्रता का अंतिम निर्धारण संबंधित अभिलेखों, लागू संवैधानिक प्रावधानों और सक्षम प्राधिकारी की जाँच के आधार पर ही किया जा सकता है।
1967 के राष्ट्रपति आदेश और संसदीय अभिलेखों का हवाला
नेगी ने अपने पक्ष में वर्ष 1967 के राष्ट्रपति आदेश तथा लोकुर समिति और संसदीय समिति से संबंधित अभिलेखों का हवाला दिया है। उनका तर्क है कि जौनसार में अनुसूचित जनजाति का लाभ केवल क्षेत्र में निवास के आधार पर नहीं, बल्कि संबंधित समुदाय की पात्रता के अनुसार दिया जाना चाहिए। इसी आधार पर उन्होंने प्रमाणपत्र जारी करने की प्रक्रिया की समीक्षा की माँग की है।
इस विवाद में ऐतिहासिक अभिलेखों के साथ वर्तमान में लागू संवैधानिक सूची और सरकारी निर्देशों को देखना भी आवश्यक है। किसी पुराने समिति-प्रतिवेदन में दर्ज टिप्पणी और संविधान के अंतर्गत लागू अनुसूचित जनजाति सूची का कानूनी प्रभाव समान नहीं होता। इसलिए प्रमाणपत्रों की वैधता पर निर्णय लेते समय संबंधित दस्तावेजों की पूरी पृष्ठभूमि और वर्तमान कानूनी स्थिति का परीक्षण जरूरी होगा।
उच्च न्यायालय में भी उठ चुका है पात्रता का प्रश्न
जौनसार-बावर में अनुसूचित जनजाति प्रमाणपत्र जारी करने के मानदंडों को लेकर उत्तराखंड उच्च न्यायालय में भी प्रश्न उठ चुके हैं। न्यायालय में इस बात पर स्पष्टीकरण माँगा गया कि प्रमाणपत्र जारी करने के लिए केवल क्षेत्र में निवास को आधार बनाया जा रहा है या आवेदक की अधिसूचित समुदाय से संबंधित पहचान की भी जाँच की जाती है।
न्यायालय में उठे इस प्रश्न का संबंध प्रमाणपत्र जारी करने की प्रक्रिया और पात्रता के निर्धारण से है। हालाँकि, किसी न्यायिक आदेश के आधार पर सभी पुराने प्रमाणपत्रों को स्वतः अवैध मानने से पहले आदेश का वास्तविक दायरा और उसमें दिए गए निर्देश देखना आवश्यक है।
नेगी की प्रमुख माँगें
अधिवक्ता विकेश सिंह नेगी ने मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी और देहरादून जिला प्रशासन से माँग की है कि केंद्र सरकार के स्तर पर नाम संशोधन पर निर्णय होने तक जौनसार क्षेत्र में नए अनुसूचित जनजाति प्रमाणपत्र जारी न किए जाएँ। उन्होंने पहले जारी प्रमाणपत्रों की जाँच कराने तथा नियमों के विरुद्ध पाए जाने वाले प्रमाणपत्रों को निरस्त करने की भी माँग की है।
नेगी ने कहा है कि आवश्यकता पड़ने पर वह इस विषय को लेकर न्यायालय की शरण भी लेंगे।
संपादकीय टिप्पणी: राज्य मंत्रिमंडल की ओर से नाम संशोधन की संस्तुति और प्रमाणपत्रों की पात्रता का प्रश्न कानूनी रूप से अलग हैं। नए प्रमाणपत्रों पर रोक या पुराने प्रमाणपत्रों को निरस्त करने के लिए लागू नियमों, सक्षम प्राधिकारी की शक्तियों और न्यायालय के प्रभावी आदेशों को देखना होगा। जाँच में पात्र लोगों के अधिकार सुरक्षित रखते हुए अपात्रता के प्रत्येक मामले का नियमानुसार निर्णय किया जाना आवश्यक है।
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डॉ.नवीन जोशी, पिछले 20 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय, ‘कुमाऊँ विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में पीएचडी की डिग्री प्राप्त पहले और वर्ष 2015 से उत्तराखंड सरकार से मान्यता प्राप्त पत्रकार हैं। 15 लाख से अधिक नए उपयोक्ताओं के द्वारा 150 मिलियन यानी 1.5 करोड़ से अधिक बार पढी गई आपकी अपनी पसंदीदा व भरोसेमंद समाचार वेबसाइट ‘नवीन समाचार’ के संपादक हैं, साथ ही राष्ट्रीय सहारा, हिन्दुस्थान समाचार आदि समाचार पत्र एवं समाचार एजेंसियों से भी जुड़े हैं। देश के पत्रकारों के सबसे बड़े संगठन ‘नेशनल यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट्स (इंडिया) उत्तराखंड’ के उत्तराखंड प्रदेश के प्रदेश महामंत्री भी हैं और उत्तराखंड के मान्यता प्राप्त राज्य आंदोलनकारी भी हैं। डॉ. जोशी के बारे में विस्तार से पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।
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