पत्नी का व्यवहार सामान्य वैवाहिक कलह से आगे जाकर बनता है मानसिक क्रूरता का आधार: उत्तराखंड हाईकोर्ट ने तलाक बरकरार रखा

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नवीन समाचार, नैनीताल, 20 सितंबर 2026 (Wifes Conduct Going to Mental Cruelty)। उत्तराखंड (Uttarakhand) उच्च न्यायालय (High Court) ने तलाक के एक मामले में देहरादून (Dehradun) के पारिवारिक न्यायालय (Family Court) के फैसले को बरकरार रखते हुए पत्नी की पहली अपील खारिज कर दी है। न्यायालय ने माना कि पत्नी का व्यवहार सामान्य वैवाहिक कलह की सीमा से आगे जाकर मानसिक क्रूरता (Mental Cruelty) की श्रेणी में आता है। इस मामले में पति-पत्नी दोनों वकालत के पेशे से जुड़े हैं। न्यायालय ने पति को नाबालिग बेटी की देखभाल और पढ़ाई के लिए 70 लाख रुपये तथा पत्नी को स्थायी गुजारा-भत्ता (Permanent Alimony) के रूप में 40 लाख रुपये देने का भी निर्देश दिया है।

Wifes Conduct Going to Mental Cruelty, Family Disputes-on Small Issues (Liv-in Partner Lovers in Haldwani) (HighCourt Landmark Decision-Husband Wife Dispute) (Nainital-Woman cut the veins of both her wristsमुख्य न्यायाधीश (Chief Justice) मनोज कुमार गुप्ता (Manoj Kumar Gupta) और न्यायमूर्ति (Justice) सुभाष उपाध्याय (Subhash Upadhyay) की खंडपीठ (Division Bench) ने देहरादून के पारिवारिक न्यायालय द्वारा 5 अप्रैल 2024 को पारित तलाक के आदेश को चुनौती देने वाली पत्नी की पहली अपील खारिज कर दी।

2016 से अलग रह रहे हैं पति-पत्नी

दंपति का विवाह 3 मार्च 2014 को हुआ था और सितंबर 2015 में उनकी बेटी का जन्म हुआ। इसके बाद अप्रैल 2016 से दोनों अलग रहने लगे। नवंबर 2016 में पति ने हिंदू विवाह अधिनियम (Hindu Marriage Act) के तहत क्रूरता और परित्याग के आधार पर तलाक की याचिका दायर की थी। पारिवारिक न्यायालय ने वर्ष 2024 में तलाक मंजूर कर दिया था, जिसके बाद पत्नी ने उच्च न्यायालय में इस फैसले को चुनौती दी।

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मामले की सुनवाई के दौरान न्यायालय ने पत्नी के व्यवहार से संबंधित उन आरोपों पर विचार किया, जिनमें कहा गया था कि पत्नी ने पति, उसके माता-पिता, रिश्तेदारों, सहकर्मियों और वरिष्ठ अधिकारियों के साथ गलत व्यवहार किया।

पति का आरोप था कि पत्नी उस पर अपनी कॉर्पोरेट वकालत (Corporate Legal Practice) छोड़कर चंडीगढ़ जाने के लिए बार-बार दबाव डालती थी। इसके अलावा वह पति की चिकित्सकीय जांच (Medical Examination) कराने पर जोर देती थी और पति तथा उनकी बेटी को सास-ससुर से दूर करने का प्रयास करती थी।

पति ने स्वयं को गवाह के रूप में पेश करने के अलावा अपने माता-पिता और एक वकील को भी अपने समर्थन में गवाह बनाया, जबकि पत्नी की ओर से वह स्वयं ही एकमात्र गवाह थी।

सहकर्मियों और परिचितों के सामने अपमान का मामला

खंडपीठ ने पत्नी की उस दलील को खारिज कर दिया कि पति की ओर से लगाए गए आरोप केवल वैचारिक मतभेद और सामान्य वैवाहिक जीवन में होने वाले छोटे-मोटे विवादों को दर्शाते हैं।

उच्च न्यायालय ने कहा कि सहकर्मियों और परिचितों के सामने बार-बार अपमानित किए जाने से जीवनसाथी की गरिमा और मानसिक स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है। न्यायालय ने विशेष रूप से इस तथ्य को भी ध्यान में रखा कि दोनों पक्ष कानूनी पेशे से जुड़े हैं।

बेंच ने माना कि पत्नी का व्यवहार सामान्य वैवाहिक कलह की सीमा को पार कर गया था और यह मानसिक क्रूरता की श्रेणी में आता है।

बेटी और पत्नी के लिए देने होंगे 1.10 करोड़ रुपये

उच्च न्यायालय ने पति को नाबालिग बेटी की देखभाल और पढ़ाई-लिखाई के लिए 70 लाख रुपये देने का निर्देश दिया। इसके अलावा पत्नी को स्थायी गुजारा-भत्ता के रूप में 40 लाख रुपये देने को कहा गया है। इस प्रकार दोनों मदों में कुल 1.10 करोड़ रुपये देने का निर्देश है।

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न्यायालय ने तलाक के आदेश को बरकरार रखते हुए नाबालिग बेटी की देखभाल उसकी मां को सौंप दी और पति को बेटी से मिलने के अधिकार भी दिए।

सुलह के कई प्रयास नहीं हुए सफल

खंडपीठ ने कहा कि दोनों पक्ष वर्ष 2016 से न्यायिक विवाद में हैं और लगभग एक दशक से अलग रह रहे हैं। पारिवारिक न्यायालय, उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) में सुलह (Settlement) के कई प्रयास किए गए, लेकिन वे सफल नहीं हुए।

इन परिस्थितियों को देखते हुए उच्च न्यायालय ने देहरादून के पारिवारिक न्यायालय द्वारा वर्ष 2024 में दिए गए तलाक के आदेश को बरकरार रखा और पत्नी की पहली अपील खारिज कर दी।

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