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पहली बार उत्तराखंड के सीएम ने ‘इस’ मौके पर बधाई दे कर मारा ‘मास्टर स्ट्रोक’

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उत्तराखंड राज्य कहने को देवभूमि कहा जाता है,अलबत्ता यह अलग बात है कि यहाँ सप्ताह के दिन विशेष को एक धर्म विशेष को अवकाश देने जैसे तुष्टिकरण के कदम तो कथित ‘धर्मनिरपेक्ष’ सरकार द्वारा उठाये जाते रहे हैं, परन्तु पहली बार राज्य के किसी मुख्यमंत्री ने राज्य वासियों को हिंदू नर्व वर्ष विक्रमी संवत के मौके पर बाकायदा कार्ड छपवाकर नये वर्ष की बधाई देने की पहल की है।

संवत्सर फल

उल्लेखनीय है कि इससे पूर्व राज्य के मुख्यमंत्री वर्ष में केवल एक बार दीपावली के मौके पर ही इस तरह से बधाई देते रहे हैं। लेकिन इस हिंदू नव वर्ष के मौके पर राज्य की त्रिवेंद्र रावत सरकार ने जिस तरह राज्य के गणमान्य जनों को बधाई दी है, उसे सरकार के ‘मास्टर स्ट्रोक’ के रूप में देखा जा रहा है। उल्लेखनीय है कि इस वर्ष अभी हाल में होली पर केवल एक दिन का ही अवकाश मिलने और कई त्योहारों की छुट्टियों में कटौती किये जाने से सरकार के प्रति लोगों में नाराजगी देखी गयी थी।

क्योंकि राज्य में निकाय चुनाव सिर पर हैं, और जिस तरह मौजूदा दौर में छोटे चुनावों को भी खासकर भाजपा की जीत-हार से तथा 2019 की संभावनाओं के तौर पर जोड़कर देखा जा रहा है, ऐसे में सत्तारूढ़ दल पर इस चुनाव में जीत दर्ज करने का बड़ा दबाव है। गौरतलब है कि बीते वर्षों में केवल भाजपा ही निकाय चुनावों में अध्यक्ष व मेयर पदों के अलावा सभासदों-पार्षदों के प्रत्याशियों को भी टिकट देती रही है, जबकि कांग्रेस केवल अध्यक्ष पद पर ही टिकट देती है।

सभासदों-पार्षदों को पार्टी का टिकट देने का नफा-नुकसान यह होता है कि हर वार्ड के समस्त मतदाता भाजपा व अन्य में बंट जाते हैं। यह भी होता है कि यदि किसी वार्ड में 10 सभासद या पार्षद के प्रत्याशी खड़े होते हैं तो भाजपा के एक प्रत्याशी के अलावा अन्य 9 प्रत्याशियों के वोट एक तरह से भाजपा के खिलाफ माने जाते हैं, तथा इनमें से कोई भी निर्दलीय प्रत्याशी जीतता है तो उसे विपक्षी व खासकर कांग्रेस का मान लिया जाता है। इसके साथ ही कई बार शेष नौ सभासदों को वोट देने वाले मतदाताओं के अध्यक्ष या मेयर के पद के लिए भी विरोधी उम्मीदवारों को वोट देने की संभावना बढ़ जाती है। इसलिए इस बार भाजपा सभासदों-पार्षदों को पार्टी टिकट न देने पर भी विचार कर रही है।
ऐसे में मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत द्वारा हिंदू नव वर्ष की बधाइयां देने को निकाय चुनावों से जोड़कर, मतदाताओं से जुड़ने के प्रयासों के तौर पर देखा जा रहा है।

॥ॐ॥ 🙏🙏इस उम्मीद व आशाओं के साथ कि हमारी हर सुबह नव वर्ष की तरह आशाओं व उम्मीदों के नए सूरज और हर शाम अभीष्टों व सफलताओं के नए चाँद के साथ आये.. हम आगे बढ़ने के साथ अपनी समृद्ध परंपराओं की जड़ों से भी जुड़े रहें… और अपना भारतीय नव वर्ष-संवत्सर भी मनाएं..

सभी मित्रों को हिन्दू नव वर्ष, नव समवत्सर, गुड़ी पड़वा, चैत्र शुक्ल प्रतिपदा विक्रमी संवत 2075, ब्रह्मा जी द्वारा सृष्टि की रचना करने, प्रभु श्री राम के राज्याभिषेक एवं कलयुग के शुरू होने सहित अनेक विशिष्टताओं युक्त दिन की सुख,शान्ति एवं समृध्दि की मंगलकामनाओं सहित अग्रिम शुभकामनाएं.. भगवान आपको और आपके पूरे परिवार को हमेशा सुख, शांति, समृद्धि व ख़ुशी प्रदान करें, आपकी सभी मनोकामनाएं इस वर्ष पूर्ण होवें… 🙏💐.🙏💐.🙏💐.🙏💐.॥ॐ॥ 💐💐🌷🌹🥀🌻🌼🌸🌺🌿🍀

उत्तराखंड राज्य कहने को देवभूमि कहा जाता है, परन्तु यहाँ

-रचयिता के.सी.पंत ‘किसन’
सेवानिवृत्त अध्यापक, हरि निवास, सुखताल, नैनीताल।

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नव वर्ष सुहृद प्रिय मंगलमय,
हो राष्ट्र सबल सुजन निर्भय।
मनसा वाचा मति हों सहृदय,
कर्मणा हताश्रय के आश्रय।।
चहुं दिशि प्रवाह सुख शांति मलय,
घर घर ऐसा हो अरुणोदय।
हो शक्ति पुंज भारत जय-जय,
सुख शांति जगत में, युद्ध न भय।।
चहुंमुखी प्रगति धन धान्य धरा,
हर हृदय स्नेहिल प्रेम भरा।
दलगत मतभेद भुला सारा,
रक्षा हित देश की सदा खड़ा।।
आतंक और नक़सलवाद जाल,
क्योंकर अपने ये हुये ब्याल।
कर आत्मनिरीक्षण किसन आज,
निर्माण राष्ट्र श्रम कोटि हाथ।।
संगठित स्वस्थ हो यह समाज,
है चाह किसन शुभ बने काज।
प्रभु यही प्रार्थना यही साध,
साकार स्वप्न हो राम राज।।

‘काले-मैकालों’ का नया साल सबको मुबारक हो यारो !

KC Pant

भारत में अंग्रेजी शिक्षा के प्रवर्तक ‘लॉर्ड मैकाले’ ने कभी अपने पिता को पत्र लिखा था-‘आप आस्वस्त रहें, हमें भारत को छोड़ना भी पड़े तो हम यहां ऐसे काले अंग्रेजों को छोड़ जाएंगे, जो अपनी सभ्यता, संस्कृति, स्वाभिमान और शर्म तक भले छोड़ दें पर अंग्रेजियत नहीं छोड़ेंगे… इसकी जड़ें बहुत गहरी हो चुकी हैं।” जब अंग्रेज भारत छोड़कर गए तो मैकाले को पता नहीं था कि जो काले अंग्रेज, भारत में रहेंगे वे धर्म व संस्कृति के ठेकेदार बन देश को लूटने में बढ़-चढ़ कर भाग भी लेंगे। शायद भारत की ऐसी हालत देख लॉर्ड विलियम वेंटिंग के जमाने में पकड़े गए ठग पिण्डारियों की रूह भी कॉंप रही होगी। इस आंग्ल नव वर्ष पर महाकवि तुलसी की एक चौपाई “बिछुड़त एक प्राण हर लेहीं, मिलत एक दारुण दु:ख देहीं”  के साथ यादों के इन्हीं गलियारों से निकली है केसी पंत ‘किसन” सेवानिवृत्त अध्यापक, हरी निवास, सूखाताल, नैनीताल की यह कविता-

नया साल ये नाजिर ये हाजिर है यारो, है गैरत ये गुमसुम शहर पुरसॉं वालो।
मुबालगा नहीं, ये ना बोहतान यारो, हकीकत जो देखा, बयॉं है वो यारो।।
नये साल का जश्न दीवाने देखो, ये तारीख पहली के परवाने देखो।
बेहया बेअदब ये नकलनवीस देखो, कबीले ये ‘काले-मैकालों” के देखो।।
ये घोटाले सरदार सालार देखो, ये मजमा हुम्करानों का मखमूर देखो।
जरा इन रकीबों के औसाफ देखो, नफासत, बंदर नंग नीलाम देखो।।
ये पार्टी में चौबंद चमचों को देखो, थी काकाकशी, आज गुलछर्रे देखो।
‘इनामी पदम” जानी बदारी देखो, गिरह गॉंठ दस्तक ये दिल्ली तक देखो।।
ये उस्ताद नायाब उस्तादी देखो, ये मक्कार नक्काल तालीमी देखो।
सरकार कुमुक भाई मौसेरे देखो, ये तारीख में दर्ज तकदीरी देखो।।
हरियाली हजामत कारोबार देखो, सफाई में जुटते चिरागी ये देखो।
ये गारदगरी झील गारद भी देखो, ये रिश्वत रिसाला की किस्में भी देखो।।
सितारा बुलंद डाकू सरकारी देखो, पुलिसिया सलाम ठाट बंगलों में देखो।
गैर सरकारी डाकू की किस्मत भी देखो, सर पे डंडे पुलिस डेरा कैदखाना देखो।।
दरिया चंबल के वीरान बीहड़ वो देखो, सियासी ये अब इन डकैतों को देखो।
ये ‘जिन सवार” मजहबी ये खुदगर्ज देखो, फितूरी ये मकबूल महफूज देखो।।
मुशायरा, कवि गोष्ठी के बुनकर भी देखो, ये हाकी की मजलिस, फोतेदार देखो।
ये ड्रामा की डफली, डफालची भी देखो, कमाई है गफ्फा, ये गालिब भी देखो।।
ये पुतला जलाते वतनपरस्त देखो, वतनफरोश बेखौफ मंडराते देखो।
ये चौकी पुलिस गश्त सुस्ती भी देखो, जमैयत में गुत्थम, ये जमहूरी देखो।।
साहबा वो फलादी को क्लबों में देखो, ‘किसन” संग हसीना हरफगीर देखो।
खबरगीर नामानिगारों को देखो, है पहचान गुम, जोड़ी असली ये देखो।।
शराब और शबाब, जरा मुड़के भी देखो, चूल्हे जलते कभी ऐसे घर भी तो देखो।
ये बेआब बेहाल वतनी भी देखो, दुआ देंगे ये सब, खबर लेके देखो।
तोबा लत ये बुरी जरा हट के भी देखो, ये ईमान अब और बिगड़ा न देखो।
खुदा का फजल, उसकी फैयाजी देखो, उसकी रहमत दुआगोई खुशहाली देखो।।

कठिन शब्दार्थ: नाजिर-निरीक्षक, गैरत-शर्म, पुरसॉं-खोज-खबर लेने वाला, मुबालगा-अतिशयोक्ति, बोहतान-झूठा अभियोग, मखनूर-नशे में चूर, औसाफ-खूबियां, रकीबों-प्रेमिका के दूसरे प्रेमी, नफासत-निर्मलता, बदर-दरवाजा, नंग-इज्जत, जानिबदारी-पक्षपात, गारदगरी-लूट खसोट, गारद-पुलिस की टुकड़ी, जिन सवार-गुस्सैल, मकबूल-मान्य, महफूज-सुरक्षित, फितरी-शरारती, वतनफरोश-देश द्रोही, जमैयत-विधान या संसद, जमहूरी-प्रजातंत्र, हरफगीर-बात की खाल निकालने वाला, फजल-कृपा, फैयाजी-उदारता, रहमत-करुणा, दुआगोई-दुआ।

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वर्तमान में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सर्वाधिक प्रचलित कलेंडर को ‘ग्रेगोरियन कलैंडर’ कहा जाता है। इसकी शुरूआत यूनान में प्रचलित ‘ओलम्पियद कलेंडर’ से हुई। रोम नगर की प्रतिष्ठा के दिन से यह कलेंडर ‘रोमन कलेंडर’ कहलाने लगा। इस पारंपरिक रोमन कलेंडर का नव वर्ष भारतीय हिन्दू नववर्ष के चैत्र माह के आस-पास ही मार्च माह से शुरू होता था, जिसमें 304 दिन का वर्ष माना जाता था। इसका पहला माह मार्टियस-Martius (31 दिन), दूसरा अप्रिलिस-Aprilis (30 दिन), तीसरा मेयस-Maius (31 दिन), चौथा लूनियस-Iunius (30 दिन) पांचवां क्विनटिलिस-Quintilis (31 दिन), छठा सेक्सिटिलिस-Sextilis (30 दिन), में 7वां सेप्टेम्बर-September (30 दिन), 8वाँ  ऑक्टोबर- October (31 दिन), 9वाँ नवम्बर-November (30 दिन) और 10वाँ दिसंबर-December (31 दिन) थे। इन नामों में आखिरी चार महीनों के नामों की भारतीय अंकों संस्कृत के सप्तम, अष्टम, नवम और दशम से साम्यता रोमांचित करने के साथ ही भारत की तत्कालीन समृद्ध ज्ञान परंपरा की की ओर इशारा करती है। बाद में इसके शुरू में 29 दिन के Ianuarius (वर्तमान जनवरी) और 28 दिन  के Februarius  (वर्तमान फरवरी) को जोड़ा गया आगे 46 ईशा पूर्व में प्रसिद्ध रोमन सम्राट जूलियस सीजर ने इसमें सुधार कर ‘जूलियन कलेंडर’ तैयार किया, जिसके एक वर्ष में 12 माह और 365 दिन तय किये गए। तब इस कलेंडर का सातवाँ माह लूनियस और आठवां माह क्विनटिलिस ही था, जिसे बाद में उनके सम्मान में उनके नाम पर ही जुलाई और उनके भतीजे व रोम के अगले सम्राट औगस्टस के नाम के आधार पर ‘अगस्त’ किया गया। 1582 में 13वें पोप ग्रेगरी ने उस दौर में प्रचलित  के एक वर्ष में 0.002% का संसोधन कर इस कलेंडर को तैयार किया था। तभी से इसे ‘ग्रेगोरियन कलैंडर’ कहा जाता है। उन्होंने  इस कलेंडर में ईसवी सन् की गणना ईसा मसीह के जन्म से तीन वर्ष बाद से की गयी। ईसा के जन्म के बाद ही जनवरी को पहला मास माना गया।

बावजूद भारत में अंतरराष्ट्रीय अंक 1,2,3… आदि की तरह भारत सरकार ने 1957 में इसी ग्रेगरियन कलेंडर को स्वीकार किया, और भारतीय लोगों की भावनाओं का ध्यान में रखते हुए चैत्र माह से शुरू होने उज्जयिनी सम्राट महाराज विक्रम के विक्रमी संवत यानी हिन्दू नववर्ष को भी खानापूर्ति के लिये साथ में स्वीकार किया।

समय की शुद्ध गणना नहीं, 1752 में करने पड़े 12 दिन गायब, अब भी आता है हर वर्ष 1 पल का अंतर

वर्ष 1752 का रोचक इतिहास, जब 2 सितम्बर के अगले दिन सीधे आया 14 सितम्बर
वर्ष 1752 का रोचक इतिहास, जब 2 सितम्बर के अगले दिन सीधे आया 14 सितम्बर

क्या हम जानते हैं भारतीय समय गणना दुनिया में सर्वश्रेष्ठ और आधुनिक वैज्ञानिक गणना से कहीं अधिक बेहतर है। वर्तमान में दुनिया में मान्य अंग्रेजी ग्रेगेरियन कलेंडर में लगातार कुछ अंतराल में घड़ियों के समय को पीछे करना पड़ता है। वर्ष 1752 के सितंबर माह में तो 11 दिन यानी करीब एक पखवाड़ा ही कलेंडर से गायब करने पड़े थे, और दो सितंबर के बाद सीधे 14 सितंबर की तिथि आ गई थी, यानी सितंबर 1752 के तीन, चार, पांच से लेकर 13 तक की तिथियों का कोई ऐतिहासिक अस्तित्व ही नहीं है। इसके उलट भारतीय समय गणना एक-एक सेंकेंड का सटीक हिसाब रखती है। यहां तक कि यह भी बताया गया है कि सृष्टि की शुरुआत कब हुई।

पश्चिमी दुनिया से प्रचलित हुए मौजूदा ग्रेगोरियन कलेंडर में समय की गणना के अनुसार हमेशा काफी अशुद्धियाँ प्रकाश में आती रहीं। इसलिए समय-समय पर इसमें कई संसोधन किये जाते रहे। रोमन सम्राट जूलियस सीजर के बाद छठी शताब्दी मे डायोनिसियस ने इसमें फिर संशोधन किये, बावजूद इनमें भारतीय गणनाओं के अनुसार प्रति वर्ष 27 पल, 55 विपल का अन्तर पड़ता ही रहा। सन् 1752 में यह अन्तर बढ़ते-बढ़ते 11 दिन का हो गया। तब पोप ग्रेगरी ने आज्ञा निकाली कि इस वर्ष 2 सितम्बर के पश्चात ठीक अगले दिन यानी 3 सितम्बर को 14 सितम्बर कहा जाय और जो ईस्वी सन् 4 की संख्या से विभाजित हो, वह ‘लीप इयर’ कहा जाये और उसका फरवरी मास 29 दिन का हो। वर्ष का प्रारम्भ 25 मार्च के स्थान पर 1 जनवरी से माना जाय। इस आज्ञा को इटली, डेनमार्क, हॉलैण्ड ने उसी वर्ष स्वीेकार कर दिया। जर्मनी और स्विजरलैण्ड ने सन् 1759 में, इग्लैण्ड ने सन् 1859 में, प्रशिया ने सन् 1835 में, आयरलैण्ड ने सन् 1839 में और रूस ने सन् 1849 में इसे स्वीकार किया। इतना संशोधन होने पर भी इस ईस्वी सन् में सूर्य की गति के अनुसार प्रतिवर्ष एक पल का अन्तर पड़ता है। सामान्य दृष्टि से यह बहुत थोड़ा अन्तर है, पर गणित के लिये यह एक बड़ी भूल है। 3600 वर्षों के बाद यही अन्तर 1 दिन का हो जायेगा और 36,000 वर्षों के बाद 10 दिन का और इस प्रकार यह अन्तर चालू रहा तो किसी दिन जून का महीना वर्तमान दिसंबर-जनवरी के शीत काल में पड़ने लगेगा। इसके इतर भारत के परंपरागत विक्रमी सम्वत् में आज तक कोई अंतर नही पड़ा और न आगे पड़ने की सम्भावना है। अतएव यह आवश्यकता भी महसूस की जा रही है कि विशुद्ध वैज्ञानिक दृष्टिकोण युक्त विक्रमी संवत को भारत का राष्ट्रीय सम्वत् विक्रम सम्वत् घोषित किया जाए। उज्जैन के समय से दिन के समय का निर्धारण हो। घंटा, मिनट, सेकेंड के स्थान पर होरा, बिहोरा, प्रति बिहोरा रखे जाएं। 6 बजे के स्थान पर ‘इष्टकल’ शब्द का प्रयोग हो दिन का प्रारम्भ वर्तमान 7 बजे को 1 मानकर हो और 12 बजे दिन तथा 12 बजे रात्रि की समाप्ति मानी जाय।

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दुनियां के अलग-अलग कलेंडर

अलबत्ता दुनिया भर में तमाम कलेंडर प्रचलित हैं, और हर कैलेंडर का नया साल अलग-अलग होता है। एक मोटे अनुमान के अनुसार अकेले भारत में ही करीब 50 कलेंडर (पंचाग) हैं, और इनमें से कई का नया साल अलग-अलग दिनों पर होता है। एक जनवरी को मनाया जाने वाला नव वर्ष ग्रेगोरियन कलेंडर पर आधारित है, जिसकी शुरूआत रोमन कलेंडर से हुई, जिसका नव वर्ष एक मार्च से शुरू होता है।ईसाइयों का एक अन्य पंथ ईस्टर्न आर्थोडाक्स चर्च तथा इसके अनुयायी ग्रेगरियन कैलेंडर को मान्यता न देकर पारंपरिक रोमन कैलेंडर को ही मानते हैं। इस कैलेंडर की मान्यता के अनुसार जार्जिया, रूस, यरूशलम, सर्बिया आदि में 14 जनवरी को नववर्ष मनाया जाता है।

वहीँ इस्लाम धर्म के कैलेंडर को हिजरी साल के नाम से जाना जाता है। इसका नव वर्ष मोहर्रम माह के पहले दिन होता है। हिजरी कैलेंडर कर्बला की लड़ाई के पहले ही निर्धारित कर लिया गया था। मोहर्रम के दसवें दिन को ‘आशूरा’ के रूप में जाना जाता है। इसी दिन पैगम्बर मोहम्मद के नवासे इमाम हुसैन बगदाद के निकट कर्बला में शहीद हुए थे।हिजरी कैलेंडर के बारे में एक दिलचस्प बात है कि इसमें चंद्रमा की घटती-बढ़ती चाल के अनुसार दिनों का संयोजन नहीं किया गया है। लिहाजा इसके महीने हर साल करीब 10 दिन पीछे खिसकते रहते हैं। इसी तरह प्राचीन सभ्यताओं के देश चीन का कलेंडर भी चंद्र गणना पर आधारित है। इसका नया साल 21 जनवरी से 21 फरवरी के बीच पड़ता है। चीनी वर्ष के नाम चीनी ज्योतिष में वर्णित 12 राशियों की तरह 12 जानवरों के नाम पर रखे गए हैं।

भारत भी कलेंडरों अर्थात पंचाग के मामले में कम समृद्ध नहीं हैं। वर्तमान में देश में विक्रम संवत, शक संवत, हिजरी संवत, फसली संवत, बांग्ला संवत, बौद्ध संवत, जैन संवत, खालसा संवत, तमिल संवत, मलयालम संवत, तेलुगु संवत आदि तमाम कलेंडर प्रचलित हैं। इनमें से हर एक के अपने अलग-अलग नववर्ष होते हैं। देश में सर्वाधिक प्रचलित संवत विक्रम और शक संवत है। माना जाता है कि विक्रम संवत गुप्त सम्राट विक्रमादित्य ने उज्जयिनी में शकों को पराजित करने की याद में शुरू किया था। यह संवत 58 ईसा पूर्व शुरू हुआ था। विक्रम संवत चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से शुरू होता है। इसी समय चैत्र नवरात्र का प्रारंभ होता है। चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के दिन उत्तर भारत के अलावा गुड़ी पड़वा और उगादी के रूप में भारत के विभिन्न हिस्सों में नववर्ष मनाया जाता है। सिंधी लोग इसी दिन चेटीचंड के रूप में नववर्ष मनाते हैं। वहीँ शक सवंत को शालीवाहन शक संवत के रूप में भी जाना जाता है। माना जाता है कि इसे शक सम्राट कनिष्क ने 78 ई. में शुरू किया था। स्वतंत्रता के बाद भारत सरकार ने इसी शक संवत में मामूली फेरबदल करते हुए इसे राष्ट्रीय संवत के रूप में अपना लिया। राष्ट्रीय संवत का नववर्ष 22 मार्च को होता है जबकि लीप ईयर में यह 21 मार्च होता है।

‘समय’ पर भारत का समृद्ध ज्ञान :

श्रीमद्भागवत् के तृतीय सर्ग के एकादश अध्याय के अनुसार-सृष्टि का सबसे सूक्ष्मतम अंश परमाणु होता है, दो परमाणु मिलकर एक अणु बनाते है। तीन अणुओं के मिलने से एक ‘त्रसरेणु’ तथा तीन त्रसरेणु को पार करने में सूर्य को जितना समय लगता है उसे ‘त्रुटि’ कहते है। त्रुटि का सौ गुना काल ‘बेध’ कहलाता है। तीन बेध का एक ‘लव’ होता है। तीन लव से एक ‘निमेष’ तीन निमेष से लव का ‘क्षण’ पाँच क्षण का एक ‘लघु’ तथा 15 लघु की एक ‘नाड़िका’ दो नाड़िकाओं का एक ‘मुहूर्त’ होता है। छः या सात नाड़िकाएँ मिलकर ‘प्रहर’ बनाती है। यह प्रहर ‘याम’ कहलाता है, जो मनुष्य के दिन-रात का चौथा भाग होता है। चार-चार प्रहर के दिन-रात होते है। 15 दिन-रात का एक ‘पक्ष’ होता है। यह ‘कृष्ण-पक्ष’ एवं ‘शुक्ल पक्ष’ यानी दो प्रकार का होता है। दो पक्षों का एक ‘मास’ होता है। दो मास की एक ‘ऋतु’ होती है। छः मास अर्थात तीन ऋतुओं का एक ‘अयन’ होता है। यह अयन ‘उत्तरायण’ एवं ‘दक्षिणायन’ यानी दो प्रकार का होता है। दो अयन मिलकर एक ‘वर्ष’ बनाते हैैं। इसके अलावा ‘विष्णु पुराण द्वितीय अंश’ में वर्णित प्राचीन भारतीय काल-गणना के अनुसार ‘15 निमेष की एक काष्ठ, 30 काष्ठ की एक कला, 30 कला का एक मुहूर्त एवं 30 मुहूर्त का एक सम्पूर्ण दिन-रात्रि बनता है। सूर्याेदय से लेकर तीन मुहूर्त की गति के काल को प्रातः काल कहते है। यह सम्पूर्ण दिन का पाँचवा भाग होता है। इस प्रकार प्रातः काल के तीन मुहूर्त का समय सग्ङव कहलाता है तथा संग्ङवकाल के तीन मुहूर्त का मध्याह्न होता है। अपराह्न के बीतने पर सायंकाल आता है।’ समय ज्ञात करने के लिए भारत में सदियों पूर्व जल घड़ी का प्रयोग किया जाता था। जिसके लिए तांबे के बर्तन में छेद कर दिया जाता था, जिसमें सोने की 4 अंगुल लम्बी सलाई से बर्तन के पैंदे में छेद कर दिया जाता था तथा जब वह पूरी तरह भर जाता, जल में डूब जाता, उतने समय को एक नाड़िका कहा जाता था। जबकि वर्तमान मानव सभ्यता 1500-1300 ईसवी पूर्व मिश्र में सूर्य घड़ी का और सन् 1325 में मिश्र में ही पहली घड़ी का अविष्कारकर पाई। कहने की जरूरत नहीं कि जब शेष विश्व के लोग दिन, रात, मास, तक के नाम नही जानते थे, भारतीय मनीषियों ने काल गणना के सुक्ष्म रूप से लेकर ब्रह्माण्ड से प्रलय तक की दीर्घतम गणना कर ली थी। समय गणना में सौर मण्डल को 360 अंशों में बाँटा गया और फिर इन 360 अंशों को 30-30 अंशों की बारह राशियाँ समय गणना के लिए तीन शब्द घंटा, मिनट, सेकेेड प्रचलित है। जिन्हें संस्कृत भाषा में ‘अहोरात्र’ के नाम से जाना जाता है। अहोरात्र का अर्थ-दिन-रात से है। जबकि घंटे के लिए ‘होरा’, मिनट के लिए ‘निमेज’ तथा सेकेंड के लिए ‘अनिमेष’ शब्द का प्रयोग किया गया है। एक अहोरात्र का मान 60 घड़ी या 24 घंटे होता है। दिनों का नाम सौर मण्डल मे स्थित ग्रहोें के आधार पर रखा गया, जो उनकी गति से निर्धारित होता है। सूर्य सौर मंडल का मुख्य ग्रह है, इसलिए प्रथम दिन रविवार कहलाता था इसी प्रकार मंगल, बुध, गुरू, शुक्र, व शनिवार निर्धारित होते है। चार सप्ताह को मिलाकर एक मास, बारह महीनों को मिलाकर एक वर्ष बनता है। भारत में मासों (माह) का नामकरण चन्द्रमा के बारह भ्रमण अवधि वृत्तों पर आधारित है, जो यूरोपीय मासों की अपेक्षा कई अधिक वैज्ञानिक है। प्रत्येक मास की पूर्णिमा तिथि को चन्द्रमा जिस नक्षत्र का भोग करता है उसी के अनुसार उस मास का नाम पड़ जाता है जैसे-चैत्र मास की पूर्णिमा के दिन चन्द्रमा ‘चित्रा’ नक्षत्र में रहता हैं अतः उस मास का नाम पड़ गया ‘चैत्र’ इसी प्रकार शेष ग्यारह मासो की पूर्णिमा तिथि को चन्द्रमा क्रमशः विशाखा, ज्येष्ठा, पूर्वाषाढ़ा श्रावण, पूर्वभाद्रपद अश्विनी, कृतिका, मृगशिरा, पुण्य, मघा, तथा पूर्वाफाल्गुनी में स्थित होता है। अतः इन मासों का नाम- चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ, आषाढ़ श्रावण, भाद्रपद, अश्विनि, कार्तिक, मार्गाशीर्ष, पौष, माघ तथा फाल्गुन पड़े। अग्नि पुराण के अनुसार-60 सम्वत्सर का पहला मण्डल समाप्त हो जाने के पश्चात अलग मण्डल पुनः इन्ही नामों से जाना जाता है।

इस प्रकार देखा जाए तो भारतीय संस्कृति सबसे प्राचीन तथा इसकी काल गणना अत्यन्त सूक्ष्म है। जबकि वर्तमान समय में लोक प्रचलित-‘‘ग्रेगोरियन कलैंडर’’ को वर्तमान स्वरूप 1752 ई॰ में ‘पोप ग्रेगरी’ ने दिया था। तभी से इसे ‘ग्रेगरियन कलैंडर’ कहा जाता है। इसके पहले इसमें समय-समय में संशोधन होते रहे। ईसा के जन्म के बाद ही जनवरी को पहला मास माना गया, जबकि इसके पूर्व ईस्वी कलैंडर भी मार्च से प्रारम्भ होता था जो भारतीय चैत्र के समकालीन था। ग्रेगोरियन कलेंडर में आज भी सितम्बर (7वां) अक्टूबर (8वाँ) आदि नाम वैसे ही हैं, जब कि वे अब नवें तथा दसवें माह हैं।

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मेरा जन्म 26 नवंबर 1972 को हुआ था। मैं नैनीताल, भारत में मूलतः एक पत्रकार हूँ। वर्तमान में मार्च 2010 से राष्ट्रीय हिन्दी दैनिक समाचार पत्र-राष्ट्रीय सहारा में ब्यूरो चीफ के रूप में कार्य कर रहा हूँ। इससे पहले मैं पांच साल के लिए दैनिक जागरण के लिए काम कर चुका हूँ। कुमाऊँ विश्वविद्यालय के पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग से ‘नए मीडिया’ विषय पर शोधरत हूँ। फोटोग्राफ़ी मेरा शौक है। मैं NIKON COOLPIX P530 और अडोब फोटोशॉप 7.0 के साथ फोटोग्राफी कर रहा हूँ। फोटोग्राफी मेरे लिए दुनियां की खूबसूरती को अपनी ओर से चिरस्थाई बनाने का बहुत छोटा सा प्रयास है। एक फोटो पत्रकार के रूप में मेरी तस्वीरों को नैनीताल राजभवन सहित विभिन्न प्रदर्शनियों में प्रस्तुत किया गया, तथा उत्तराखंड की राज्यपाल श्रीमती मार्गरेट अलवा द्वारा सम्मानित किया गया है। कुछ चित्रों को राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार भी प्राप्त हो चुके हैं। गूगल अर्थ पर चित्र उपलब्ध कराने वाली पैनोरामियो साइट पर मेरी प्रोफाइल को 18.85 Lacs से भी अधिक हिट्स प्राप्त हैं।पत्रकारिता और फोटोग्राफी के अलावा मुझे कवितायेँ लिखना पसंद है। काव्य क्षेत्र में मैंने नवीन जोशी “नवेन्दु” के रूप में अपनी पहचान बनाई है। मैंने बहुत सी कुमाउनी कवितायेँ लिखी हैं, कुमाउनी भाषा में मेरा काव्य संकलन उघड़ी आंखोंक स्वींड़ प्रकाशित हो चुका है, जो कि पुस्तक के के साथ ही डिजिटल (PDF) फार्मेट पर भी उपलब्ध होने वाली कुमाउनी की पहली पुस्तक है। मेरी यह पुस्तक गूगल एप्स पर भी उपलब्ध है। ’ यहां है एक पत्रकार, लेखक, कवि एवं छाया चित्रकार के रूप में मेरी रचनात्मकता, लेख, आलेख, छायाचित्र, कविताएं, हिंदी-कुमाउनी के ब्लॉग आदि कार्यों का पूरा समग्र। मेरी कोशिश है कि यहां नैनीताल, कुमाऊं, उत्तराखंड और वृहद संदर्भ में देश की विरासत, संस्कृति, इतिहास और वर्तमान को समग्र रूप में संग्रहीत करने की….। मेरे दिल में बसता है, मेरा नैनीताल, मेरा कुमाऊं और मेरा उत्तराखंड

One thought on “पहली बार उत्तराखंड के सीएम ने ‘इस’ मौके पर बधाई दे कर मारा ‘मास्टर स्ट्रोक’

  • October 11, 2017 at 2:02 AM
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    you might have an excellent blog right here! would you prefer to make some invite posts on my weblog?

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