EnglishInternational Phonetic Alphabet – SILInternational Phonetic Alphabet – X-SAMPASystem input methodCTRL+MOther languagesAbronAcoliадыгэбзэAfrikaansअहिराणीajagbeBatak AngkolaአማርኛOboloالعربيةঅসমীয়াаварتۆرکجهᬩᬮᬶɓasaáBatak Tobawawleбеларускаябеларуская (тарашкевіца)Bariروچ کپتین بلوچیभोजपुरीभोजपुरीẸdoItaŋikomBamanankanবাংলাབོད་ཡིག།bòo pìkkàbèromबोड़ोBatak DairiBatak MandailingSahap Simalunguncakap KaroBatak Alas-KluetbuluburaብሊንMə̀dʉ̂mbɑ̀нохчийнchinook wawaᏣᎳᎩکوردیAnufɔЧăвашлаDanskDagbaniдарганdendiDeutschDagaareThuɔŋjäŋKirdkîडोगरीDuáláÈʋegbeefịkẹkpeyeΕλληνικάEnglishEsperantoفارسیmfantseFulfuldeSuomiFøroysktFonpoor’íŋ belé’ŋInternational Phonetic AlphabetGaगोंयची कोंकणी / Gõychi Konknni𐌲𐌿𐍄𐌹𐍃𐌺𐌰 𐍂𐌰𐌶𐌳𐌰ગુજરાતીfarefareHausaעבריתहिन्दीछत्तीसगढ़ी𑢹𑣉𑣉HoHrvatskiհայերենibibioBahasa IndonesiaIgboIgalaгӀалгӀайÍslenskaawainAbꞌxubꞌal PoptiꞌJawaꦗꦮქართული ენაTaqbaylit / ⵜⴰⵇⴱⴰⵢⵍⵉⵜJjuадыгэбзэ (къэбэрдеибзэ)KabɩyɛTyapkɛ́nyáŋGĩkũyũҚазақшаភាសាខ្មែរಕನ್ನಡ한국어kanuriKrioकॉशुर / 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“कुत्तों को घर ले जाइए”खंडपीठ में कौन-कौन, और किस तरह का प्रकरण7 नवंबर 2025 के आदेश की निगरानी, सार्वजनिक स्थानों से हटाने के निर्देशनगर निगम, पशु-अधिकार समूह और “डॉग फीडर्स” पर भी सवाल“मानव सुरक्षा बनाम पशु सुरक्षा” नहीं, समाधान नीति और व्यवस्था मेंआगे क्या होगाTags (SC on Attacks by Stray Dogs) :Like this:Related-सार्वजनिक स्थानों पर कुत्तों को नियमित रूप से खाना खिलाने वाले लोगों की जवाबदेही भी तय की जा सकती हैनवीन समाचार, नई दिल्ली, 13 जनवरी 2026 (SC on Attacks by Stray Dogs)। देशभर में बढ़ते आवारा कुत्तों के काटने (डॉग बाइट—Dog Bite) की घटनाओं पर सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India) ने कड़ा रुख अपनाते हुए कहा है कि यदि कुत्तों के हमले से किसी बच्चे या बुजुर्ग की मृत्यु होती है या गंभीर चोट पहुंचती है तो राज्य सरकार को भारी मुआवजा देना पड़ सकता है।यह भी पढ़ें : एम्स ऋषिकेश में चमोली के दंपति ने नौ दिन के मृत नवजात का देहदान किया, चिकित्सा शोध को मिला मानवता का बड़ा योगदान न्यायालय ने यह भी संकेत दिया कि केवल नगर निकाय (Municipal Bodies) ही नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्थानों पर कुत्तों को नियमित रूप से खाना खिलाने वाले लोगों की जवाबदेही भी तय की जा सकती है। यह टिप्पणी इसलिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि यह मामला केवल पशु कल्याण तक सीमित नहीं, बल्कि जन सुरक्षा, स्वास्थ्य नीति, नगर प्रशासन की जिम्मेदारी और कानून-व्यवस्था से सीधे जुड़ता है।सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणी, “कुत्तों को घर ले जाइए”सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति विक्रम नाथ (Justice Vikram Nath) ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि किसी को कुत्तों से इतना प्रेम है कि वे उन्हें सड़क पर भोजन देते हैं, तो उन्हें अपने घर में रखें। न्यायालय का यह कहना था कि सड़कों पर भटकते कुत्तों के कारण आम लोगों में भय का वातावरण बनता है और हमला होने पर गंभीर परिणाम सामने आते हैं।वरिष्ठ अधिवक्ता (Senior Advocate) मेनका गुरुस्वामी (Menaka Guruswamy) ने इसे “भावनात्मक मुद्दा” बताते हुए दलील रखी, जिस पर न्यायालय ने कहा कि भावनाएं केवल कुत्तों के लिए ही क्यों दिखाई देती हैं। इस बहस ने एक बड़ा प्रश्न खड़ा कर दिया—क्या आवारा पशुओं के अधिकारों और आम नागरिकों की सुरक्षा में संतुलन अब तक सही तरीके से बन पाया है?खंडपीठ में कौन-कौन, और किस तरह का प्रकरण यह सुनवाई आवारा कुत्तों से जुड़ी सुओ मोटो याचिका (स्वप्रेरित मामला—Suo Motu Petition) के संदर्भ में हो रही थी। इस प्रकरण की सुनवाई न्यायमूर्ति विक्रम नाथ, न्यायमूर्ति संदीप मेहता (Justice Sandeep Mehta) और न्यायमूर्ति एन. वी. अंजारिया (Justice N V Anjaria) की खंडपीठ (Bench—पीठ) कर रही थी।न्यायमूर्ति संदीप मेहता ने भी प्रश्न किया कि जब 9 वर्ष के बच्चे पर कुत्ते हमला करते हैं तो जिम्मेदारी किसकी होगी। न्यायालय के अनुसार यदि कोई कुत्ता किसी की निगरानी में है, तो उसे “पालतू” (Pet Dog) मानकर विधिक जिम्मेदारी और लाइसेंस व्यवस्था लागू होनी चाहिए।7 नवंबर 2025 के आदेश की निगरानी, सार्वजनिक स्थानों से हटाने के निर्देशसर्वोच्च न्यायालय ने पहले 7 नवंबर 2025 को यह निर्देश दिया था कि शिक्षण संस्थानों (Educational Institutions), चिकित्सालयों (Hospitals), बस अड्डों (Bus Stands), खेल परिसर (Sports Complexes) और रेलवे स्टेशनों (Railway Stations) जैसे सार्वजनिक स्थानों से आवारा कुत्तों को हटाया जाए। न्यायालय की पीठ अब इसी आदेश के अनुपालन (Compliance) की निगरानी कर रही है।‘नवीन समाचार’ की ओर से पाठकों से विशेष अपील:3 जून 2009 से संचालित उत्तराखंड का सबसे पुराना डिजिटल प्लेटफॉर्म ‘नवीन समाचार’ अपने आरंभ से ही उत्तराखंड और देश-दुनिया की सटीक, निष्पक्ष और जनहित से जुड़ी खबरें आप तक पहुँचाने का प्रयास करता आ रहा है। हिंदी में विशिष्ट लेखन शैली हमारी पहचान है। हमारा उद्देश्य केवल समाचार देना नहीं, बल्कि समाज की वास्तविक आवाज को मजबूती से सामने लाना, स्थानीय मुद्दों को प्रमुखता देना और हिंदी पत्रकारिता को जीवित रखना है। हमारे प्रत्येक समाचार एक लाख से अधिक लोगों तक और हर दिन लगभग 10 लाख बार पहुंचते हैं। आज के समय में स्वतंत्र और निर्भीक पत्रकारिता को बनाए रखना आसान नहीं है। डिजिटल मंच पर समाचारों के संग्रह, लेखन, संपादन, तकनीकी संचालन और फील्ड रिपोर्टिंग में निरंतर आर्थिक संसाधनों की आवश्यकता होती है। ‘नवीन समाचार’ किसी बड़े कॉर्पोरेट या राजनीतिक दबाव से मुक्त रहकर कार्य करता है, इसलिए इसकी मजबूती सीधे-सीधे पाठकों के सहयोग से जुड़ी है। ‘नवीन समाचार’ अपने सम्मानित पाठकों, व्यापारियों, संस्थानों, सामाजिक संगठनों और उद्यमियों से विनम्र अपील करता है कि वे विज्ञापन के माध्यम से हमें आर्थिक सहयोग प्रदान करें। आपका दिया गया विज्ञापन न केवल आपके व्यवसाय या संस्थान को व्यापक पाठक वर्ग तक पहुँचाएगा, बल्कि स्वतंत्र पत्रकारिता को भी सशक्त बनाएगा। अग्रिम धन्यवाद। न्यायालय ने यह भी कहा था कि पकड़े गये कुत्तों का टीकाकरण (Vaccination), नसबंदी (Sterilisation) और एबीसी नियम (Animal Birth Control Rules—ABC Rules) की प्रक्रिया के बाद उन्हें उन्हीं स्थानों पर वापस नहीं छोड़ा जाएगा। हालांकि, कुछ पशु-अधिकार संगठनों ने इसमें संशोधन की मांग की है और कहा है कि कुत्तों को उसी क्षेत्र में लौटाना जरूरी है। ऐसे में प्रशासन के सामने चुनौती यह है कि जन सुरक्षा, पशु कल्याण और न्यायालय के निर्देश—तीनों का संतुलन कैसे बने?यह भी पढ़ें : नैनी झील में नौकायन के दौरान महिला ने झील में छलांग लगाई, नाव चालकों की सतर्कता से बची जाननगर निगम, पशु-अधिकार समूह और “डॉग फीडर्स” पर भी सवालसुनवाई में वरिष्ठ अधिवक्ता अरविंद दातार (Arvind Datar) ने न्यायालय के पूर्व आदेश का समर्थन करते हुए कहा कि संस्थागत परिसरों में आवारा कुत्तों का “कानूनी अधिकार” नहीं है। दूसरी ओर पशु-कल्याण पक्ष ने तर्क दिया कि कुत्ते पर्यावरण संतुलन में भूमिका निभाते हैं और वे चूहों को नियंत्रित करते हैं।यहां एक और व्यावहारिक समस्या सामने आई—देश में आवारा कुत्तों की वास्तविक गणना (Census) और प्रमाणिक आंकड़े क्या हैं? इस पर न्यायालय ने बिना सर्वेक्षण के पेश की जा रही संख्याओं को अवास्तविक माना। इससे स्पष्ट है कि नीति निर्माण में आंकड़ा-आधारित निर्णय (Data Driven Policy) की जरूरत अब पहले से अधिक है।“मानव सुरक्षा बनाम पशु सुरक्षा” नहीं, समाधान नीति और व्यवस्था मेंइस पूरे प्रकरण का सामाजिक असर व्यापक है। आवारा कुत्तों के हमले में चोटिल होने वालों को चिकित्सकीय व्यय, मानसिक आघात, बच्चों में डर, और बुजुर्गों में असुरक्षा जैसी स्थितियों का सामना करना पड़ता है। वहीं नगर निकायों की भूमिका पर भी सवाल उठते हैं—क्या कुत्तों को पकड़ने, नसबंदी, टीकाकरण और पुनर्वास के लिए पर्याप्त केन्द्र (ABC Centres) उपलब्ध हैं? क्या बजट और मानव संसाधन पर्याप्त हैं?न्यायालय की टिप्पणी इसी दिशा में संकेत करती है कि यदि सिस्टम विफल होता है तो राज्य को वित्तीय और प्रशासनिक जवाबदेही निभानी पड़ेगी। ऐसे में यह मामला केवल न्यायालय की टिप्पणी नहीं, बल्कि नीतिगत चेतावनी बन गया है।आगे क्या होगामामले की अगली सुनवाई 20 जनवरी 2026 को दोपहर 2 बजे तय की गई है। उम्मीद है कि इस बीच राज्य सरकारें, नगर निकाय और संबंधित विभाग अनुपालन रिपोर्ट और व्यावहारिक कार्ययोजना प्रस्तुत करेंगे।यह भी पढ़ें : किसान सुखवंत सिंह प्रकरण में उधम सिंह नगर पुलिस पर बड़ी कार्रवाई, आईटीआई कोतवाली प्रभारी सहित 2 उप निरीक्षक निलंबित और 10 पुलिसकर्मी लाइन हाजिरपाठकों से आग्रह है कि इस समाचार से संबंधित अपनी राय और विचार नीचे दिए गए कमेन्ट बॉक्स में अवश्य साझा करें।नैनीताल जनपद में हाल के दिनों में हुई अन्य महत्वपूर्ण घटनाओं से जुड़ी पूरी रिपोर्ट यहाँ क्लिक करके पढ़ी जा सकती है। इसी तरह पिथौरागढ़ के समाचारों के लिए यहाँ👉, अल्मोड़ा के समाचारों के लिए यहाँ👉, बागेश्वर के समाचारों के लिए यहाँ👉, चंपावत के समाचारों के लिए यहाँ👉, ऊधमसिंह नगर के समाचारों के लिए यहाँ👉, देहरादून के समाचारों के लिए यहाँ👉, उत्तरकाशी के समाचारों के लिए यहाँ👉, पौड़ी के समाचारों के लिए यहाँ👉, टिहरी जनपद के समाचारों के लिए यहाँ👉, चमोली के समाचारों के लिए यहाँ👉, रुद्रप्रयाग के समाचारों 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