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विश्लेषण : वामपंथियों से ‘जान का खतरा’ मोदी नहीं राहुल या सोनिया को है !

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वामपंथियों का वह पत्र जिसमें राजीव गाँधी हत्याकांड की पुनरावृत्ति करने की बात कही गयी है..

अनिल मिश्र।
षड्यंत्र के तहत किए गए किसी हमले का शिकार यदि प्रधानमंत्री मोदी होते हैं तो देश पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा? सभी जानते हैं कि भारत में कोहराम मच जाएगा और उसके बाद होने वाले आम चुनाव अनैतिहासिक मतदान और अद्वितीय ध्रुवीकरण की इबारत लिखेंगे। ऐसी स्थिति में नक्सली, माओवादी या अन्य चरमपंथी-देशद्रोही ताकतें भाजपा के विजय रथ को रोक सकें, यह कल्पना ही आधारहीन है। निश्चित रूप से पुणे पुलिस द्वारा माओवादी रोमा विल्सन के घर से बरामद पत्र की विवेचना और व्याख्या में कोई न कोई चूक जरूर हो रही है।
माओवादियों और नक्सलियों की साजिश को समझने के लिए हमें यह याद रखना होगा कि भारत में वामपंथ का जनाधार लगभग नगण्य है। देश में 90 फीसद लोकसभा और विधानसभा सीटों पर जमानत बचाना तो दूर, वामपंथी उम्मीदवार नोटा को मिले मतों से भी कम वोट प्राप्त करते हैं। इसलिए यह तो स्पष्ट है कि आगामी चुनावों में प्रधानमंत्री मोदी की अनुपस्थिति का लाभ वाम दलों को कतई नहीं मिलेगा। एक और महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि हिंसक-अहिंसक वामपंथी संगठनों के मूल में विचारधारा की अहमियत ज्यादा होती है और वह हिंसा या अहिंसक प्रयोजनों से अन्य संगठनों की विचारधारा पर ही हमला करते हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो घटना के प्राथमिक प्रभावों के अतिरिक्त वह द्वितीयक प्रभावों की अधिक फिक्र करते हैं। अर्बन नक्सल द्वारा विगत वर्षों में असहिष्णुता, ‘नॉट इन माई नेम’ और ‘बागों में बहार है’ जैसे नैरेटिव इसी दृष्टिकोण से गढ़े गए।
इसी प्रकार हिंसक माओवादी और नक्सल गिरोह हमेशा अशिक्षित और पिछड़े इलाकों में-जहां लोगों को बरगलाना आसान होता है-वहां अपनी जड़ें जमाकर हिंसक साजिशें रचते हैं। जबकि वह अपनी जघन्य हिंसाओं को भी छद्म पर गढ़ी हुई नक्सल बौद्धिकता के सहारे न्यायसंगत सिद्ध करने का कोई मौका नहीं चूकते। इसके लिए वह समाज में उपस्थित मतभेदों जैसे जातिगत, धार्मिक, क्षेत्रवाद एवं वर्ग विभेद को बुरी तरह नकारात्मकता से भर कर समूहों को उकसाते और भ्रमित करते हैं। इससे यह भी साफ हो जाता है कि दोनों ही प्रकार के वामपंथी संगठन व्यक्ति के बजाय व्यवस्था पर चोट करने वाली साजिशों को ही तरजीह देंगे। मतलब, मोदी की हत्या से यदि भाजपा का जनाधार समाप्त हो जाए तो नक्सली इसे तुरंत अंजाम देने में जुट जाएंगे।
लेकिन धरातल पर स्थिति इसके उलट है और नरेंद्र मोदी के जीवन पर पड़ने वाली किसी भी आंच से भाजपा नुकसान के बजाय लाभ की स्थिति में होगी। रोमा विल्सन के घर से मिले नक्सली पत्र में भी इसी की पुष्टि होती है। पत्र में सभी सदस्यों की तरफ भाजपा के बढ़ते कद पर चिंता जाहिर की गई है।
भाजपा की प्रचंड लहर को रोकने के लिए ‘राजीव गांधी हत्याकांड जैसी योजना’ का जिक्र है। मगर यह कहीं स्पष्ट नहीं होता कि इसका संबंध प्रधानमंत्री मोदी से है। तार्किक दृष्टि से विचारें तो भाजपा के रथ को रोकने के लिए किसकी बलि ली जा सकती है? वह, जिसकी हत्या से भावुक हुई जनता भाजपा के विरुद्ध वोट कर सके। या सहानुभूति स्वरूप मृत नेता की पार्टी के पक्ष में मतदान करे। राष्ट्रीय स्तर पर अभी भी सिर्फ काँग्रेस ही एकमात्र दल है, जो पूरे देश में चुनाव लड़ सकता है। भावनाओं को भुनाकर, उसे वोट बैंक में तब्दील करके काँग्रेस ही भाजपा को केंद्र में दुबारा सरकार बनाने से रोक सकती है। इस दृष्टिकोण से राहुल या सोनिया चरमपंथियों के निशाने पर सबसे पहले होंगे। इनके साथ किसी अनहोनी के घटित होने पर काँग्रेस पार्टी पूरे देश में लोगों की सहानुभूति बटोर सकती है।
एक और महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि राहुल या सोनिया गांधी पर होने वाले किसी भी हमले के लिए प्रथम दृष्टया हिंदूवादी संगठनों या संघ को निशाना बनाए जाने के कारण नक्सली सीधे तौर पर संदेह के घेरे में नहीं आएंगे। देश के एक बड़े वर्ग में हिंदूवादियों के लिए घृणा और गुस्से का माहौल तैयार होगा, जिससे भाजपा और मोदी के लगातार बढ़ रहे रथ को रोकना आसान हो सकेगा। गौरतलब है कि ऐसी किसी घटना की जांच पूरी होने और उस पर निर्णय आने तक लोकसभा चुनाव पूर्ण हो चुके होंगे। बाद में किसी को भी सजा हो, भाजपा के विजय रथ को रोकने का लेफ्ट चरमपंथियों का संकल्प तब तक पूरा हो चुका होगा।
विश्वासघात और षड्यंत्र की जिस विचारधारा से वाम चरमपंथी संगठन काम करते हैं, उसे दृष्टिगत रखते हुए यह अंदाजा कि वह सीधे मोदी को निशाना बनाने की कोशिश करेंगे, तर्कसंगत नहीं लगता। महाराष्ट्र एटीएस, आईबी और एनआईए को इस मामले की गहराई में जाकर तथ्यों को दुबारा जांचना चाहिए। अन्यथा नक्सलियों-माओवादियों द्वारा अंजाम दी गयी कोई कुटिल हिंसक वारदात पूरे देश का माहौल बिगाड़ सकती है। पत्र में वर्णित बातों की पुर्नव्याख्या और नए सिरे से विवेचना सुरक्षा व खुफिया एजेंसियों के लिए एक चुनौती है, जिस पर यथासंभव यथाशीघ्र काम शुरू होना चाहिए।

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इतिहास का अध्ययन एवं खोज इसलिए आवश्यक है क्योंकि अनुभव हमें भविष्य में गलतियां दोहराने से बचा सकता है। अनुभव के आधार पर ही ऐतिहासिक घटनाओं को सही और गलत ठहराया जाता है। यदि वर्तमान के अनुभव बताते हों कि इतिहास में किसी घटना या व्यवस्था को इसलिए गलत या आपराधिक समझा गया क्योंकि सिद्धांत ही अव्यवहारिक थे, तो ऐसे सिद्धांतों, नियमन को मिटा देना ही इतिहास से लिया गया सही सबक है। यह एक सतत प्रक्रिया है, जो हर देश-काल में अपनाई जाती है। भारत में भी राजशाही से जनतंत्र और लोकतंत्र से पारदर्शी एवं निरपेक्ष व्यवस्था की स्थापना के पथ पर भी बहुत से अनुभवजनित बदलाव मील के पत्थर की तरह टिके खड़े हैं। कार्यपालिका- व्यवस्थापिका, संविधान और चुनाव-सभी को इस सुधार से गुजरना पड़ता है। कभी भावी आवश्यकताओं के लिए तो कभी पुरानी त्रुटियों को दुरुस्त करने के लिए इस प्रकार के सुधार आवश्यक हो जाते हैं।

 
भारतीय लोकतंत्र ने 1975 से 77 के मध्य जिस संकट का सामना किया, जिस बलात अन्याय को सहा है, उसके निशान चार दशक बाद भी देश और हमारी व्यवस्थाओं में मौजूद हैं। सत्ता की लालसा ने लोकतंत्र के इस काले अध्याय में वह सब कुछ लिखा और मिटाया, जिससे सत्ता का अतिक्रमण न्यायोचित बताया जा सके। वह दौर संविधान में अतार्किक, अप्रामाणिक, अन्यायपूर्ण और ‘आपराधिक’ बदलावों का था।
 
इमरजेंसी के दिनों में ही चुनाव सुधारों के नाम पर आरएफसीए कानून में बदलाव कर ऐसी सभी संस्थाओं, उपक्रमों और कंपनियों को विदेशी करार कर दिया गया, जिनमें एक फीसद भी विदेशी निवेश शामिल था। जिनकी अपनी कोई शाखा या अनुषांगिक इकाई भारत से बाहर स्थापित थी। ऐसा सिर्फ इसलिए किया गया था क्योंकि तत्कालीन इंदिरा सरकार ने देश की समस्त सरकारी और निजी संस्थाओं पर एक प्रकार से कब्जा कर लिया था। उसे पता था कि भारत की कोई भी इकाई विपक्ष को चुनाव में खड़े होने के लिए आर्थिक मदद नहीं दे सकेगी। मगर, जानते-बूझते लोकतंत्र का गला घोंट रही इंदिरा को यह भी बखूबी मालूम था कि निरंकुश और स्वार्थी सरकार के विरुद्ध व्यापक असंतोष के परिणामस्वरूप अगणित भारतीय संस्थाएं विपक्ष की सहायता के लिए व्याकुल हैं और वह अपनी विदेशों में स्थित शाखाओं से विपक्ष की मदद जरूर करेंगी। असंतोष और जनाक्रोश पर जारी असंख्य असंवैधानिक निषेधों की श्रृंखला में एक और संविधान संशोधन किया गया। तत्कालीन ‘अमर्यादित’ सरकार ने आरएफसीए  कानून में बदलाव कर विदेशी चंदे की परिभाषा को अपने अनुरूप बना दिया, जिससे भारत की कोई भी शक्ति परोक्ष रूप से भी तत्कालीन अलोकतांत्रिक सरकार के विरुद्ध आवाज न उठा सके।
 
पिछले सप्ताह संसद ने आरएफसीए कानून की उस धारा को मिटा दिया। इसे लेकर देश की मीडिया में व्यापक विरोध भी देखने को मिला, जो लोकतांत्रिक देश में सचमुच आश्चर्यजनक है। देश भर की मीडिया बार-बार यही कहती देखी जा रही है कि भाजपा-कांग्रेस ने सुप्रीम कोर्ट से बचने के लिए इस कानून में गुपचुप संशोधन कर लिया और इस कानूनी बदलाव के परिणामस्वरूप अब 1976 से अभी तक के राजनीतिक चंदे की जांच नहीं कि जाएगी। सच तो यह है कि यह मीडिया का बहुत ही हास्यास्पद दृष्टिकोण है और इस प्रकार की अतार्किक, खोज और शोधरहित रिपोर्टिंग से आने वाले दिनों में पत्रकारिता की विवेकशक्ति पर गंभीर सवाल खड़े होंगे।
 
क्या वर्तमान सरकार ने 1976 से राजनीतिक दलों को मिले चंदे की जांच रोकने के लिए कोई विशिष्ट कानून बनाया है? नहीं ! पिछले सप्ताह एक धारा को रद्द किया गया है, जो आपातकाल के दौरान निजी लाभ के लिए खड़ी की गई थी। यदि यह सही नहीं है तो मीडिया देश को बताए कि आखिर चंदे की देशी-विदेशी के आधार पर जांच के लिए वर्ष 1976 को ही क्यों चुना गया? यह अवधि स्वातंत्रोपरांत 1947 से क्यों नहीं मानी गई? आरएफसीए कानून की गलत व्याख्या 1976 में की गई थी, जिसे एक पिछड़े-विकासशील देश ने चार दशक बाद दुरुस्त किया है।
 
चुनाव सुधारों को लेकर शुचिता और पारदर्शिता का रोना रोने वाले जनता को यह नहीं बता सके कि खतरनाक नकदी राजनीतिक चंदे को खत्म करने के लिए भी आरएफसीए कानून में संशोधन अनिवार्य हो गया था। चार दशक के बाद, आज देश की कंपनियां दुनिया भर में परचम लहरा रही हैं। उन कंपनियों के अपने हित, अधिकार और स्वतंत्रता है। किसी कंपनी में दो-चार-10 फीसद विदेशी निवेश होने या उसकी विदेश में शाखा-अनुषांगिक इकाई होने के कारण उसे लोकतंत्र के महापर्व से अलग किया जाना निश्चित तौर पर एक अन्याय है। किसी कंपनी या संस्था का विकास और उद्भव यदि उसे राष्ट्र की मुख्यधारा से अलग करता हो तो ऐसे कानून और व्यवस्था को एक विकासोन्मुख राष्ट्र के लिए किसी भी प्रकार से तार्किक और प्रोत्साहन देने वाला नहीं कहा जा सकता। न ही यह लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा करता है।
 
आरएफसीए कानून में संशोधन के अवसर पर देश की मीडिया को जिस सबसे महत्वपूर्ण तथ्य पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए था, अतार्किक विरोध की धुन में उसने उस तथ्य को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया। विदेशी चंदे की परिभाषा बदले जाने के उपरांत यह गंभीर प्रश्न भी खड़ा होता है कि 1976 में उक्त कानून के पास हो जाने के बाद से 2014 तक देश के राजनीतिक दलों ने इस प्रकार से प्राप्त धन को कैसे खपाया और दर्शाया होगा? यह स्वयं में एक बहुत बड़ा भ्रष्टाचार हो जाएगा, जिसमें भारत के राजनीतिक दलों के साथ ही असंख्य उद्योग, कारोबारी और संस्थाएं 1976 के उस काले कानून के कारण अपराधी की श्रेणी में खड़े हो जाएंगे। जबकि तथ्य यह है कि देश के चुनाव में यहाँ की कंपनियों और संस्थाओं का शामिल होना कोई अपराध नहीं है। यदि सच में कुछ गलत है तो वह इन संस्थाओं से चंदा लेकर उस धनराशि को बेनामी बताना है। आरएफसीए कानून में सुधार के माध्यम से केंद्र ने इस दिखावे और झूठ को खत्म कर दिया है।
 
नई व्यवस्था में बांड के माध्यम से चंदा देने वाले की पहचान उजागर नहीं होने बावजूद दानकर्ता की बैलेंसशीट में वह राशि स्पष्ट दिखाई देगी। सबसे महत्वपूर्ण यह है कि बैंकिंग बांड के लिए दानकर्ता को केवाईसी की जिम्मेदारी पूरी करनी होगी। मतलब दानकर्ता की जांच धनराशि अदा करते समय ही हो जाएगी। साथ ही उक्त राशि का भारतीय होना भी मौके पर ही सुनिश्चित हो जाएगा। राजनीतिक दल अब सिर्फ अपने आधिकारिक बैंक खातों के माध्यम से ही बैंकिंग बांड और चेक से चंदे का लाभ ले सकेंगे, जिसका अर्थ हुआ की छोटी-छोटी राशि की फर्जी रसीदों के माध्यम से राजनीति में अनैतिक धन की आमद का सिलसिला काफी हद तक कम हो जाएगा। हालांकि हर व्यवस्था में एक चूक भी छिपी होती है और इसी कारण इन सुधारों में भी आगे कई संशोधन देखने को मिलेंगे।
 
मीडिया ने संसद में आरएफसीए कानून में संशोधन के दौरान बिल के विरोध की अनुपस्थिति को बार-बार रेखांकित किया मगर कहीं भी इसकी पड़ताल नहीं कि गई कि बजट में ₹ 2000 से अधिक राशि के लिए डिजिटल लेनदेन अनिवार्य किए जाने के कारण देश भर की पार्टियां फर्जी रसीद काटने की आदत से निजात को उचित मान कर चुप रहीं। जबकि आपातकाल के काले अध्याय को लिखने वाली कांग्रेस के लिए इस बिल का विरोध करना लोकतंत्र के उस भयावह दौर को पुनः स्मृत कराने जैसा था। संसद में चुप्पी साधने के बाद बाहर वोटबैंक की राजनीति के लिए जनता को गुमराह करने वाला विरोध कुछ दलों ने किया- जिसे नवोदित मीडिया से बहुत सहानुभूति भी मिली-मगर ऐसी पार्टियों के प्रवक्ता भी सार्वजनिक मंच पर संसद में अपनी चुप्पी के लिए तार्किक उत्तर नहीं दे पाने के कारण जन का विश्वास नहीं जीत सके। सिर्फ अव्यवहारिक सिद्धांतों वाले वामदलों ने ही संसद में बिल का विरोध किया, जो स्वयं एक दौर में चीन से पेंशन लेने के लिए बदनाम रहे हैं! यह मामला संसद तक में उठ चुका है। दुर्भाग्यवश उस दौर की सरकारों ने इस गंभीर वित्तीय नियमितता की जांच नहीं कराई, जो लोकतंत्र के लिए किसी दुर्भाग्य से कम नहीं है।
 
भारतीय जनप्रतिनिधि कानून में पारदर्शिता और शुचिता के लिए आरएफसीए बिल में संशोधन एक महत्वपूर्ण निर्णय है, जो मीडिया की एकतरफा रिपोर्टिंग के कारण जनमानस तक सही अर्थों में नहीं पहुंच सका। भविष्य के शोध और अनुभव निश्चित तौर पर आज के दौर की मीडिया को इसके लिए दोषी ठहराएंगे। अगली पीढ़ी का भारत और शोधार्थी मीडिया की इस पूर्वाग्रही रिपोर्टिंग को यदि उसे अविवेकी करार दे तो इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं होगी। और, यदि एफडीआई को चुनावों से दूर ही रखना है तो चुनाव आयोग देश की मीडिया को इसमें कोई छूट क्यों दे? इस आधार पर भारत के वह सभी समाचार पत्र और न्यूज चैनल भी चुनाव प्रक्रिया से अलग कर दिए जाने चाहिए, जिनमें एक फीसद भी विदेशी निवेश शामिल है।
♦ अनिल मिश्र ‘कामिल’
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मेरा जन्म 26 नवंबर 1972 को हुआ था। मैं नैनीताल, भारत में मूलतः एक पत्रकार हूँ। वर्तमान में मार्च 2010 से राष्ट्रीय हिन्दी दैनिक समाचार पत्र-राष्ट्रीय सहारा में ब्यूरो चीफ के रूप में कार्य कर रहा हूँ। इससे पहले मैं पांच साल के लिए दैनिक जागरण के लिए काम कर चुका हूँ। कुमाऊँ विश्वविद्यालय के पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग से ‘नए मीडिया’ विषय पर शोधरत हूँ। फोटोग्राफ़ी मेरा शौक है। मैं NIKON COOLPIX P530 और अडोब फोटोशॉप 7.0 के साथ फोटोग्राफी कर रहा हूँ। फोटोग्राफी मेरे लिए दुनियां की खूबसूरती को अपनी ओर से चिरस्थाई बनाने का बहुत छोटा सा प्रयास है। एक फोटो पत्रकार के रूप में मेरी तस्वीरों को नैनीताल राजभवन सहित विभिन्न प्रदर्शनियों में प्रस्तुत किया गया, तथा उत्तराखंड की राज्यपाल श्रीमती मार्गरेट अलवा द्वारा सम्मानित किया गया है। कुछ चित्रों को राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार भी प्राप्त हो चुके हैं। गूगल अर्थ पर चित्र उपलब्ध कराने वाली पैनोरामियो साइट पर मेरी प्रोफाइल को 18.85 Lacs से भी अधिक हिट्स प्राप्त हैं।पत्रकारिता और फोटोग्राफी के अलावा मुझे कवितायेँ लिखना पसंद है। काव्य क्षेत्र में मैंने नवीन जोशी “नवेन्दु” के रूप में अपनी पहचान बनाई है। मैंने बहुत सी कुमाउनी कवितायेँ लिखी हैं, कुमाउनी भाषा में मेरा काव्य संकलन उघड़ी आंखोंक स्वींड़ प्रकाशित हो चुका है, जो कि पुस्तक के के साथ ही डिजिटल (PDF) फार्मेट पर भी उपलब्ध होने वाली कुमाउनी की पहली पुस्तक है। मेरी यह पुस्तक गूगल एप्स पर भी उपलब्ध है। ’ यहां है एक पत्रकार, लेखक, कवि एवं छाया चित्रकार के रूप में मेरी रचनात्मकता, लेख, आलेख, छायाचित्र, कविताएं, हिंदी-कुमाउनी के ब्लॉग आदि कार्यों का पूरा समग्र। मेरी कोशिश है कि यहां नैनीताल, कुमाऊं, उत्तराखंड और वृहद संदर्भ में देश की विरासत, संस्कृति, इतिहास और वर्तमान को समग्र रूप में संग्रहीत करने की….। मेरे दिल में बसता है, मेरा नैनीताल, मेरा कुमाऊं और मेरा उत्तराखंड

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