आसमान की ओर देखिये, वहां नजर आ रहा है यह खूबसूरत नजारा

नैनीताल, 5 अक्टूबर 2018। इन दिनों नैनीताल सहित पर्वतीय क्षेत्रों से दूधिया रोशनी की तरह आकाशगंगा का बेहद खूबसूरत नजारा दिखाई दे रहा है। आकाशगंगा शाम होने के बाद दक्षिण-पश्चिम दिशा में सैगिटेरियस यानी धनु राशि के तारामंडल के पास नजर आ रही है। खास बात यह भी है कि शनि, प्लूटो व मंगल ग्रह … Read more

उत्तराखंडी लालों का कमाल : हरिमोहन ने मैजिक पजल्स में बनाया वर्ल्‍ड रिकॉर्ड

मैथमेटेशियन हरिमोहन ने मैजिक पजल्स में बनाया वर्ल्‍ड रिकॉर्ड, जानिए क्‍या है खासनवीन समाचार. कपकोट (बागेश्वर), 22 अप्रैल 2019। कपकोट के ऐठाण गांव के शिक्षक हरिमोहन सिंह ऐठानी ने गणित में दो और रिकार्ड बनाए हैं। हस्तलिखित मैजिक पजल्स में वर्ल्‍ड रिकॉर्ड बनाया है। उन्होंने 1260 घंटे में अलग-अलग श्रेणी के 48000 मैजिक पजल्स लिख डाले। 450 चार्ट पेपर्स में 13 किलो की किताब भी बना डाली है। केरल बुक ऑफ रिकॉर्ड ने उन्हें 2019 का वर्ल्‍ड रिकॉर्ड का तथा पुडुचेरी बुक ऑफ रिकॉर्ड संस्था ने नेशनल रिकॉर्ड का प्रमाण पत्र दिया है। यह प्रमाण पत्र एक जटिल अंतरारष्ट्रीय गणितीय सिद्धांत को 15 दिन में हल करने के लिए दिया गया है, जो कि संख्या सिद्धांत से संबंधित है। संस्था ने उन्हें 18 अप्रैल को यह रिकार्ड प्रदान किया है। हाल ही में इस गणितीय सिद्धांत का एक अंतरराष्ट्रीय जर्नल भी प्रकाशित हो चुका है। शिक्षक हरिमोहन ऐठानी ने अपनी उपलब्धि पर बताया कि अनुसलझे और जटिल गणितीय सिद्धांतों का हल खोजना, गणित के सूत्र, शार्ट ट्रिक और रिजनिंग अध्ययन मेरा शौक है।

हरिमोहन की अब तक कि उपलब्धियां :

लिम्का नेशनल रिकॉर्ड 2014
लिम्का वल्र्ड रिकॉर्ड 2015
इंटरनेशनल वंडर बुक ऑफ रिकॉर्ड 2015
वर्ल्‍ड रिकॉर्ड ऑफ यूनिवर्सल रिकॉर्ड फोरम 2015
वर्ल्‍ड रिकॉर्ड इंडिया वर्ल्‍ड रिकॉर्ड 2015
तेलगु बुक ऑफ रिकार्ड द्वारा राष्ट्रीय स्पेशल जूरी अवार्ड 2015
इंटरनेशनल ऑनलाइन वर्ल्‍ड रिकॉर्ड 2015
मैथ जीनियस वर्ल्‍ड रिकॉर्ड 2016
एवेरेस्ट वर्ल्‍ड रिकॉर्ड 2016
इंटरनेशनल मेगास्टार वर्ल्‍ड रिकॉर्ड 2017
असम बुक ऑफ वर्ल्‍ड रिकॉर्ड 2018
कलाम बुक ऑफ वर्ल्‍ड रिकॉर्ड 2018
केरला बुक ऑफ वर्ल्‍ड रिकॉर्ड 2019
पांडिचेरी बुक ऑफ रिकॉर्ड 2019

यह भी पढ़ें : हल किया 381 साल पुराना 1 करोड़ इनाम का सवाल

harimohan aithaniउत्तराखंड के बागेश्वर जिले की कपकोट तहसील के ग्राम ऐठाण निवासी एक शिक्षक ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर 381 वर्षों से अनसुलझे एक गणितीय प्रश्न को हल कर लिया है। एक करोड़ डालर के इस सवाल का शिक्षक की ओर से खोजा गया जवाब ‘अंतर्राष्ट्रीय जर्नल एमआईईआर जर्नल ऑफ एजुकेशनल स्टडीज’ के जून-जुलाई अंक में भी प्रकाशित हुआ है। इस अंक का पहला शोध हरिमोहन का ही है। उनकी इस उपलब्धि पर पूर्व राष्ट्रपति डा. एपीजे कलाम को समर्पित ‘कलाम बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड’ की ओर से प्रमाण पत्र भेजा गया है। इसमें अनसुलझे प्रश्न को 15 दिन के भीतर बूझने की सराहना की है।

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राष्ट्रीय स्तर के लिए चयनित हुआ उद्घोषक, कवि हेमंत बिष्ट का गीत

Hemant Bisht
गीतकार हेमंत बिष्ट को सम्मानित करते मुख्यमंत्री।

नैनीताल, 7 सितम्बर 2018। नगर के राष्ट्रपति पुरस्कार से पुरस्कृत शिक्षक, उद्घोषक एवं कवि हेमंत बिष्ट के लिखे एवं अपर सचिव रणवीर सिंह चौहान द्वारा गाये गये गीत ‘स्वस्थ देश स्वच्छ देश अपना बनाना है, सही पोषण देश रोशन करके दिखाना है’ को राष्ट्रीय स्तर पर पोषण अभियान के लिए चुन लिया गया है। शुक्रवार को देहरादून में मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने महिला सशक्तीकरण एवं बाल विकास विभाग उत्तराखंड के लिए तैयार इस गीत को एक कार्यक्रम में लांच किया एवं गीतकार एवं गायक दोनों को सम्मानित किया। उल्लेखनीय है कि बिष्ट इससे पूर्व उत्तराखंड राज्य गीत के अलावा मतदान संचेतना, कई खेल-उल्लास गीत तथा उत्तराखंड की पाठ्य पुस्तकों के लिए गीत-कविताएं आदि लिख चुके हैं। कक्षा चार की पुस्तक बुरांश में ‘नैनीताल की सैर’, कई फिल्मों, एल्बमों तथा नाटकों में भी उनके गीत लोकप्रिय रहे हैं। जबकि रणवीर चौहान का पूर्व में गाया गया ‘नैनीताल सिटी एंथम’ खासा लोकप्रिय रहा। श्री बिष्ट ने बताया कि उनके गीत को राष्ट्रीय स्तर पर चुने जाने की घोषणा मंच से भारत सरकार के संयुक्त सचिव डा. राकेश ने की।

सुनें गीत : 

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हंसाएंगे, रुलायेंगे, चेहरे पर कई भाव लायेंगे बच्चों की प्रतिभा के ये प्रदर्शन

आँखें नम कर देगा काव्या का यह नृत्य गीत : नैनी झील के पार्श्व में बिटिया काव्या का साथियों सहित शास्त्रीय नृत्य- कत्थक प्रसिद्ध कुमाउनी लोकगीत-लोकनृत्य : बेड़ू पाको बारों मासा ‘Twinkle twinkle’ to ‘Papa Jaldi ghar aana…..’ कूड़ा कचरा साफ करेंगे बापू हम

भारत के इतिहास पर एक बड़ी ऐतिहासिक धारणा हुई खारिज, मिला महाभारतकालीन रथ व शवागार

Bagpat 6विश्वभर की सबसे प्राचीन हिंदू सभ्यता का एक और बड़ा सबूत मिल गया है। सिंधु घाटी सभ्यता की ही कमोबेश समकालीन, उत्खनक वैज्ञानिकों के अनुसार करीब 5000 वर्ष पुरानी महाभारतकालीन सभ्यता के सबूत महाभारत की ही धरती, महाभारत काल में पांडवों के मांगे 5 गांवों में शामिल उत्तर प्रदेश के बागपत जिले के सिनौली गांव में मिले हैं। यहां आर्कियॉलजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (एएसआई) द्वारा की गयी खुदाई में पहली बार भारत में रथ मिले हैं, जिनसे पूर्व की आर्यों के दौर में भारत में रथों का उपयोग न होने की ऐतिहासिक धारणा खारिज हो गयी है। रथों में तांबे की पट्टियों एवं कीलों का प्रयोग मिला है, इससे इस रथ के ताम्रकालीन दौर के होने और उत्खनन स्थल के महाभारत की धरती पर होने तथा प्राप्त सबूतों के करीब 5000 वर्ष पुराने यानी लगभग 1800 से 2000 ईसा पूर्व के होने के सबूतों के साथ इस सभ्यता के महाभारतकालीन होने की पूरी संभावना व्यक्त की जा रही है।

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यह भी जानें : दुनिया की सबसे पुरानी सभ्यताओं के अब तक मिले 10 सबूत 
मौसमी कारणों से समाप्त हुई थी सिन्धु घाटी सभ्यता 

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28 मई को 10 हजार महिलाओं के लिये ‘पैडमैन’ बनेगी उत्तराखंड सरकार, जानें क्यों…?

राज्यमंत्री रेखा आर्य ने गुरुवार को पत्रकार वार्ता कर बताया कि 28 मई को ‘मेनस्ट्रूअल हाइजीन डे’ (मासिक धर्म स्वच्छता दिवस) है। इस दिन कार्यक्रमों के  माध्यम से महिलाओं और किशोरियों में सेनेटरी नैपकिन के प्रति जागरूकता फैलाई जाएगी। जिलों में बालिका इंटर कॉलेज में कार्यक्रम कराने की कोशिश रहेगी। अगर स्कूल बंद रहेंगे तो सार्वजनिक स्थलों पर कार्यक्रम कराए जाएंगे। सेनेट्री नेपकीन के साथ एक छाता भी महिलाओं और बेटियों को दिया जाएगा, और ‘बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ’ का संदेश भी दिया जाएगा।

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जानिए, कितनी लंबी हैं आपकी चहेती ऐक्ट्रेस

हमें शायद ही कभी बॉलिवुड ऐक्ट्रेसेस को सामने से देखने का मौका मिलता है। ऐसे में यह जानना मजेदार होगा कि स्क्रीन पर दिखने वाली आपकी चहेती ऐक्ट्रेस रियल लाइफ में कितनी लंबी हैं। डॉ. नवीन जोशी @ नवीन समाचार‘डॉ.नवीन जोशी, वर्ष 2015 से उत्तराखंड सरकार से मान्यता प्राप्त पत्रकार, ‘कुमाऊँ विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में … Read more

बिना सूचना राजभवन रोड पर दोपहिया वाहनों के लिए वन-वे व्यवस्था लागू कर माल रोड पर स्वयं दबाव बढ़वा रही नैनीताल पुलिस, नाराजगी…

नैनीताल, 27 अगस्त 2018। नैनीताल पुलिस ने सोमवार सुबह 8 बजे से राजभवन-कलक्ट्रेट रोड पर दोपहिया वाहनों के लिए भी वन-वे यातायात व्यवस्थाा लागू करा दी। गौरतलब है कि इसकी कोई भी ‘विशिष्ट सूचना’ न ही जनपद के एसएसपी द्वारा सोशल मीडिया में वायरल मैसेज में की गयी है, न एएसपी द्वारा एक दिन पूर्व … Read more

एडीएम हरबीर सिंह ने संभाला जिला विकास प्राधिकरण सचिव पद का अतिरिक्त कार्यभार

नैनीताल, 9 2018। जनपद के अपर जिलाधिकारी हरबीर सिंह ने शुक्रवार को नैनीताल जिला विकास प्राधिकरण के सचिव पद का अतिरिक्त कार्यभार संभाल लिया। वे दिन में प्राधिकरण के कार्यालय पहुंचे और कामकाज निपटाया। इस मौके पर उन्होंने कहा कि प्राधिकरण के सचिव के रूप में मिले दायित्व का ईमानदारी से निर्वाह किया जाएगा। उल्लेखनीय है कि श्री सिंह इससे पूर्व जनवरी माह से दो बार इस पद का दायित्व पहले भी संभाल चुके हैं, किंतु तत्कालीन नाटकीय परिस्थितियों में वे इस पद पर कार्य आगे बढ़ा नहीं पाए। अब उच्च न्यायालय के आदेश के बाद उम्मीद की जा रही है कि उनका कार्यकाल ‘निशंक’ होगा।

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पद्मावत समीक्षा : बेउसूल, बेईमान, वहशी और बदज़ात मुस्लिम किरदार के लिए देखें फिल्म

जायसी के पद्मावत से संबंध सिर्फ किरदारों के नाम तक जौहर फिल्म में आखिर तक नहीं है राजपूतों के संघर्ष और त्याग को भी नहीं दर्शाती है फ़िल्म नहीं पचते कई दृश्य, युद्ध दृश्यों में भी कामचलाऊपन  बहुत बड़े विषय को जल्दीबाजी में उत्पाद बनाने की भंसाली की जिद लगती है फिल्म इस एक दशक … Read more

खुल गया जसपुर में मिले डायनासोर के कंकाल का राज

पिछले वर्ष 19 नवंबर 2017 को तराई पश्चिमी वन प्रभाग के अंतर्गत जसपुर के बिजली घर में स्टोर की सफाई के दौरान मिले डायनासोर की तरह दिखने वाले कंकाल की गुत्थी सुलझ गई है। वन्य जीव संस्थान देहरादून ने कंकाल की डीएनए जांच के बाद उसके बिल्ली प्रजाति का होने की पुष्टि की है। उल्लेखनीय … Read more

गूगल ने चिपको आन्दोलन पर डूडल बनाकर बढाया उत्तराखंड का मान

चिपको से रहा है उत्तराखण्ड की महिलाओं के आन्दोलन का इतिहास

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गौरा देवी

महिलाएं उत्तराखंड की दैनिक काम-काज से लेकर हर क्षेत्र में धूरी हैं। कदाचित वह पुरुषों के नौकरी हेतु पलायन के बाद पूरे पहाड़ का बोझ अपने ऊपर ढोती हैं। विश्व विख्यात चि‍पको आंदोलन और शराब विरोधी आंदोलनों से उनका आन्दोलनों का इतिहास रहा है। वनों को बचाने हेतु रैणी गांव की एक साधारण परंतु असाधारण साहस वाली महिला ‘गौरा देवी ने 21 मार्च 1974 को अपने गांव के पुरुषों की अनपुस्थिति में जिस सूझबूझ व साहस का परि‍चय दिया, वह चिपको आंदोलन के रूप में इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों में अंकित होने के साथ ही अन्य महिलाओं के लिए प्रेरणा स्रोत बन गया। जब उन्होंने व विभाग के कर्मचारि‍यों ने पेड़ों को काटने का वि‍रोध किया और न मानने पर वो तकरीबन 30 अन्य महिलाओं के साथ पेड़ों पर चि‍पक गई जिससे पेड़ काटने वालों को उल्टे पैर वापस जाना पड़ा। इस घटना के बाद 1975 में गोपेश्‍वर व 1978 में बद्रीनाथ समेत अनेक क्षेत्रों में महिलाओं ने वि‍रोध कर जंगलों को काटने से बचाया।

बकौल गिर्दा, यह रहा चिपको-वनान्दोलन का प्रभाव

‘हम भोले-भाले पहाड़ियों को हमेशा ही सबने छला है। पहले दूसरे छलते थे, और अब अपने छल रहे हैं। हमने देश-दुनिया के अनूठे ‘चिपको आन्दोलन’ वाला वनान्दोलन लड़ा, इसमें हमें कहने को जीत मिली, लेकिन सच्चाई कुछ और थी।’ गिर्दा को वनान्दोलन के परिणामस्वरूप पूरे देश के लिए बने वन अधिनियम से जनता के हक-हकूकों पर और अधिक पाबंदियां आयद कर दिए जाने की गहरी टीस थी। 1972 से शुरू हुऐ पहाड़ के एक छोटे से भूभाग का वन आंदोलन, चिपको जैसे विश्व प्रसिद्ध आंदोलन के साथ ही पूरे देश के लिए वन अधिनियम 1980 का प्रणेता भी रहा। लेकिन यह सफलता भी आंदोलनकारियों की विफलता बन गई। दरअसल शासन सत्ता ने आंदोलनकारियों के कंधे का इस्तेमाल कर अपने हक-हुकूक के लिए आंदोलन में साथ दे रहे पहाड़वासियों से उल्टे उनके हक-हुकूक और बुरी तरह छीन लिऐ थे, और आंदोलनकारियों को अपने ही लोगों के बीच गुनाहगार की तरह खड़ा कर दिया था। आंदोलन में अगली पंक्ति में रहे गिर्दा को आखिरी दिनों में यह टीस बहुत कष्ट पहुंचाती थी। उनके अनुसार ‘1972 में वनांदोलन शुरू होने के पीछे लोगों की मंशा अपने हक-हुकूकों को बेहतरी से प्राप्त करने की थी। यह वनों से जीवन-यापन के लिए अधिकार लेने की लड़ाई थी। सरकार स्टार पेपर मिल सहारनपुर को कौड़ियों के भाव यहां की वन संपदा लुटा रही थी। इसके खिलाफ आंदोलन हुआ, लेकिन जो वन अधिनियम मिला, उसने स्थितियों को और अधिक बदतर कर दिया। इससे जनभावनाऐं साकार नहीं हुईं। वरन, जनता की स्थिति बद से बदतर हो गई। तत्कालीन पतरौलशाही के खिलाफ जो आक्रोष था, वह आज भी है। औपनिवेषिक व्यवस्था ने ‘जन’ के जंगल के साथ ‘जल’ भी हड़प लिया। वन अधिनियम से वनों का कटना नहीं रुका, उल्टे वन विभाग का उपक्रम-वन निगम और बिल्डर वनों को वेदर्दी से काटने लगे। साथ ही ग्रामीण भी परिस्थितियों के वशीभूत ऐसा करने को मजबूर हो गऐ। अधिनियम का पालन करते हुए वह अपनी भूमि के निजी पेड़ों तक को नहीं काट सकते है। उन्हें हक-हुकूक के नाम पर गिनी चुनी लकड़ी लेने के लिए भी मीलों दूर जाना पड़ता है। इससे उनका अपने वनों से आत्मीयता का रिस्ता खत्म हो गया है। वन जैसे उनके दुश्मन हो गऐ, जिनसे उन्हें पूर्व की तरह अपनी व्यक्तिगत जरूरतों की चीजें तो मिलती नहीं, उल्टे वन्यजीव उनकी फसलों और उन्हें नुकसान पहुंचा जाते हैं। इसलिऐ अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए ग्रामीण महिलाऐं वनाधिकारियों की नजरों से बचने के फेर में बड़े पेड़ों की टहनियों को काटने की बजाय छोटे पेड़ों को जल्द काट गट्ठर बना उनके निसान तक छुपा देती हैं। इससे वनों की नई पौध पैदा ही नहीं हो रही। पेड़-पौधों का चक्र समाप्त हो गया है। अब लोग गांव में अपना नया घर बनाना तो दूर उनकी मरम्मत तक नहीं कर सकते। लोगों का न अपने निकट के पत्थरों, न लकड़ी की ‘दुंदार’, न ‘बांस’ और न छत के लिऐ चौड़े ‘पाथरों’ पर ही हक रह गया है। पास के श्रोत का पानी भी ग्रामीण गांव में अपनी मर्जी से नहीं ला सकते। अधिनियम ने गांवों के सामूहिक गौचरों, पनघटों आदि से भी ग्रामीणों का हक समाप्त करने का शडयंत्र कर दिया। उनके चीड़ के बगेटों से जलने वाले आफर, हल, जुऐ, नहड़, दनेले बनाने की ग्रामीण काष्ठशालायें, पहाड़ के तांबे के जैसे परंपरागत कारोबार बंद हो गऐ। लोग वनों से झाड़ू, रस्सी को ‘बाबीला’ घास तक अनुमति बिना नहीं ला सकते। यहां तक कि पहाड़ की चिकित्सा व्यवस्था का मजबूत आधार रहे वैद्यों के औषधालय भी जड़ी बूटियों के दोहन पर लगी रोक के कारण बंद हो गऐ। दूसरी ओर वन, पानी, खनिज के रूप में धरती का सोना बाहर के लोग ले जा रहे हैं, और गांव के असली मालिक देखते ही रह जा रहे हैं। गिर्दा वन अधिनियम के नाम पर पहाड़ के विकास को बाधित करने से भी अत्यधिक चिंतित थे। उनका मानना था कि विकास की राह में अधिनियम के नाम पर जो अवरोध खड़े किऐ जाते हैं उनमें वास्तविक अड़चन की बजाय छल व प्रपंच अधिक होता है। जिस सड़क के निर्माण से राजनीतिक हित न सध रहे हों, वहां अधिनियम का अड़ंगा लगा दिया जाता है।

पर्यावरण-रक्षा के लिए “चिपको आंदोलन”

(26 मार्च 2018) 45 वर्ष पूर्व 1973 में (तत्‍कालीन उत्‍तर प्रदेश) वर्तमान में उत्तराखंड राज्य के पर्वतीय अंचल के गढ़वाल मंडल में चिपको आंदोलन की शुरुआत हुई थी.चिपको आन्दोलन एक पर्यावरण-रक्षा का आन्दोलन रहा..दरअसल तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने जंगल की जमीन को खेल का सामान बनाने वाली एक कंपनी को देने का फैसला कर लिया था.. ग्रामीणों ने वृक्षों की कटाई का विरोध करने के लिए इस आंदोलन की रूपरेखा तय की..वे राज्य के वन विभाग के ठेकेदारों द्वारा वनों की कटाई का विरोध कर रहे थे और उन पर अपना परम्परागत अधिकार भी जता रहे थे..पेड़ों के कटान के इस फैसले का विरोध करने के लिए ग्रामीण विशेष रूप से महिलाएं पेड़ों के चारों तरफ घेरा बनाकर उससे चिपक जाती थीं.. इससे पेड़ों को काटना मुश्किल हो गया..
स्‍थानीय महिलाओं की अगुआई में शुरू हुए इस आंदोलन का प्रसार चंडी प्रसाद भट्ट और उनके एनजीओ “दशौली ग्राम स्वराज्य संघ” ने भी किया..व इस महान कार्य में विद्वान गांधीवादी विचारक सुंदरलाल बहुगुणा ने इस आंदोलन को दिशा दी और उन्‍होंने तत्‍कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से पेड़ों की कटाई रोकने का आदेश देने की अपील की.. उसका नतीजा यह हुआ कि केंद्र की कांग्रेसनीत इंदिरा गांधी सरकार ने 15 वर्षों के लिए पेड़ों की कटाई को बैन कर दिया.. धूम सिंह नेगी, बचनी देवी, गौरा देवी और सुदेशा देवी इस आंदोलन से जुड़ी प्रमुख हस्तियां थीं..केवल उपरोक्त वर्णित नाम ही नही वरन गाँव के गाँव इस आंदोलन में अपनी उपस्थिति दर्ज करवाने लगे..इस शांत विरोध आंदोलन की सफलता के बाद यह आंदोलन देश के अन्‍य हिस्‍सों में भी फैलने लगा..
‘चिपको आन्दोलन’ का उदघोष रहा…
“क्या हैं जंगल के उपकार, मिट्टी, पानी और बयार।
मिट्टी, पानी और बयार, जिन्दा रहने के आधार।”
 सन १९८७ में इस आन्दोलन को सम्यक जीविका पुरस्कार (Right Livelihood Award) से भी सम्मानित किया गया..
कुलमिलाकर पर्यावरण की रक्षा के लिए जब रैणि गाँव उत्तराखंड की पाँचवी कक्षा तक पढ़ी गौरा देवी की भूमिका इतिहास में दर्ज हो सकती है तो पढ़ा लिखा समाज कब जागेगा..क्योंकि आज की स्थितियाँ 1973 में शुरू हुए चिपको आंदोलन से भी कठिन हो गई हैं..लोग जननायक तो चाहते हैं पर करना कुछ नही चाहते..इसलिए वनों के विलुप्त होने में पढ़े-लिखे समाज को ही ज्यादा जिम्मेदार कहा जायेगा..पेड़ों की उपलब्धता में विश्व में 180 देशों में हुए सर्वे में भारत 177 वें स्थान पर आसीन है..सरकारों को भी वनों ,वनाश्रितों के हितों को सुरक्षित करने के लिए कड़े कानून बनाने चाहिए..अन्यथा महंगाई,भ्रष्टाचार के मुद्दे भी गौण हो जाएंगे क्योंकि जनजीवन के लिए अतिआवश्यक तत्व ऑक्सीजन की भारी कमी हो जाएगी…
-संजय नागपाल नैनीताल

यह भी पढ़ें : गूगल ने पंडित नैन सिंह पर डूडल बना बढ़ाया देश के साथ उत्तराखंड का मान

  • ‘विक्टोरिया पदक’ व ‘कम्पेनियन इंडियन एम्पायर अवार्ड-सीआईएम’ जैसे अनेक पुरस्कारों से सम्मानित प्रथम भारतीय थे नैन सिंह 
  • गूगल ने उन्हें बताया है, ‘उनके द्वारा नापे गए पर्वतों (हिमालय) की तरह अडिग विश्वास वाला व्यक्ति’
  • अनपढ़ होते हुए भी स्कूल खोलने व शिक्षक के रूप में कार्य करने पर मिली थी ‘पंडित’ की पदवी
  • अपने बराबर कदमों से चलकर और कंठी माला पर कदमों को गिनकर नापे थे हिमालय पर स्थित ‘एशिया की पीठ’ और बनाए थे मानचित्र

नवीन जोशी, नैनीताल। दुनिया का सबसे बड़ा खोज इंजन यूं हर खास मौके पर एक नया डूडल बनाने के लिए भी विख्यात है। किंतु आज 21 अक्टूबर को उसने जो डूडल बनाया है उसे देश के साथ खासकर उत्तराखंड वासियों का सिर गर्व से ऊंचा हो गया है, और वे दीपावली-भैया दूज पपर गूगल से मिले इस खास तोहफे को शायद कभी न भुला पाएं। यह तोहफा है गूगल द्वारा आज के दिन के लिये बनाया गया डूडल, जिसमें हाथ में कंठी माला पकड़े एक व्यक्ति को हिमालय के खूबसूरत पहाड़ों व नदी को सलाम करते हुए दिखाया गया है। गूगल पर अपना मनपसंद विषय खोजने वाली पूरी दुनिया आज इस शख्श के बारे में जानने को उत्सुक है। गूगल ने उन्हें ‘उनके द्वारा नापे गए पर्वतों (हिमालय) की तरह अडिग विश्वास वाला व्यक्ति’ बताया है। उत्तराखंड के लिये गर्व करने वाली बात यह है कि यह शख्श महान अन्वेषक, सर्वेक्षक और मानचित्रकार, हिमालय पुत्र पंडित नैन सिंह रावत हैं, और देश के गिने-चुने व्यक्तियों में शुमार और उत्तराखंड के ऐसे पहले व्यक्ति हो गए हैं, जिनके 187वें जन्मदिन पर गूगल ने आज उन पर खास डूडल बनाया है।

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प्रसिद्ध वैष्णो देवी शक्तिपीठ सदृश रामायण-महाभारतकालीन द्रोणगिरि वैष्णवी शक्तिपीठ दूनागिरि

डॉ. नवीन जोशी @ नवीन समाचार, नैनीताल, 9 अक्टूबर 2021। हिमालय की गोद में बसे आध्यात्मिक महिमा से मंडित और नैसर्गिक प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर दूनागिरि शक्तिपीठ का अपार महात्म्य है। आइए आज हम आपको इस शक्तिपीठ के दर्शनों को लिए चलते हैं। दूनागिरि पहुंचने के लिए अल्मोड़ा से 65 किमी, रानीखेत से 38 किमी … Read more

कुमाऊं में 16वीं शताब्दी से लिखे व मंचित किये जा रहे हैं नाटक

-बताया-चंदवंश के राजा रूद्रचंद देव द्वारा संस्कृत के दो नाटकों की रचना व मंचन -नैनीताल के रंगमंच पर वृहद शोध की जरूरत उत्तराखंड के कुमाऊं मंडल एवं मंडल मुख्यालय नैनीताल में रंगमंच की गौरवशाली परंपरा रही है। सोलहवीं शताब्दी में कुमाऊं में चंदवंश के राज्य में राजा रूद्रचंद देव द्वारा संस्कृत के दो नाटकों की … Read more

Hindi Samagra : दुनिया में पौने दो अरब लोगों की भाषा बनने के साथ विश्वभाषा बनने की राह पर चल पड़ी है हिंदी…

-बाजार, क्रिकेट, फिल्मों और इंटरनेट की वजह से बढ़ा है उपयोग डॉ. नवीन जोशी @ नवीन समाचार, नैनीताल, 14 सितंबर 2023 (Hindi Samagra)। दुनिया में 50 करोड़ लोग हिंदी भाषा बोलते हैं, और दुनिया में हिंदी भाषी चौथे नंबर पर हैं। वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार करीब सवा सौ करोड़ की जनसंख्या के भारत … Read more