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हल्द्वानी जेल में हुई बंदी की मौत की मजिस्ट्रीयल जांच के आदेश

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डॉ. नवीन जोशी @ नवीन समाचार, नैनीताल, 31 जुलाई 2021। नैनीताल के डीएम धीराज गर्ब्याल ने हल्द्वानी उपकारागार में निरूद्ध विचाराधीन बंदी इरशाद पुत्र इश्क बली निवासी अहमदाबाद बिलासपुर जिला रामपुर की 11 जुलाई 2021 को डॉ. सुशीला तिवारी चिकित्सालय हल्द्वानी में मृत्यु की मजिस्ट्रीयल जांच के आदेश दिए हैं। जांच के लिए सिटी मजिस्ट्रेट हल्द्वानी को जांच अधिकारी नामित किया गया है।

जानकारी देते हुए सिटी मजिस्ट्रेट ने कहा कि इस घटना के संबंध में कोई भी प्रमाण या साक्ष्य किसी भी कार्य दिवस में उसी कार्यालय सिटी मजिस्ट्रेट कार्यालय में उपस्थित होकर साक्ष्य प्रस्तुत कर सकते हैं। अन्य ताज़ा नवीन समाचार पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।

यह भी पढ़ें : हल्द्वानी जेल में एक और कैदी की मौत के मामले में हत्या का मुकदमा दर्ज

-इससे पहले एक मामले में उत्तराखंड उच्च न्यायालय दे चुका है कड़े आदेश
नवीन समाचार, हल्द्वानी, 26 जुलाई 2021। हल्द्वानी जेल में एक बंदी प्रवेश कुमार की मौत के मामले में उत्तराखंड उच्च न्यायालय से सीबीआई जांच एवं नैनीताल की एसएसपी, हल्द्वानी के सीओ व आरोपित बंदी रक्षकों के स्थानांतरण के आदेशों के बीच यहां के एक और बंदी की मौत हो गई। अब इस मामले में पुलिस ने मृतक के परिजनों की शिकायत पर कोई देरी नहीं लगाई है। गत 11 जुलाई को एसटीएच में इलाज के दौरान हुई बंदी इरशाद की मौत के मामले में पुलिस ने उसके पिता की तहरीर पर अज्ञात बंदियों और बंदीरक्षकों के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज कर लिया है। मामले में मृतक के पिता का आरोप है कि उसके बेटे को बंदियों और बंदीरक्षकों ने मिलकर मार डाला है। बीमारी की कहानी गढ़ी गई है।

प्राप्त जानकारी के अनुसार यूपी के रामपुर जिले के अहमदाबाद बिलासपुर निवासी इरशाद (55) को रुद्रपुर पुलिस ने धारा 307, 504, 506 के तहत गत 25 मई को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया था। 11 जुलाई को उसकी एसटीएच में इलाज के दौरान मौत हो गई थी। इरशाद के पिता इशाक बली ने एसएसपी को पत्र भेजकर आरोप लगाया कि वह नौ जुलाई को बेटे से मिलने के लिए जेल गए थे। उस समय ड्यूटी पर तैनात सिपाही ने उसे मिलने नहीं दिया और डांटकर भगा दिया। 12 जुलाई को फोन कर सूचना मिली कि 11 जुलाई को एसटीएच में उनके बेटे की मौत हो गई है। लिहाजा उसका आरोप है कि इससे पहले उसके बेटे की बीमारी की जानकारी जेल प्रशासन ने नहीं दी थी। बेटे की हत्या जेल में करने के बाद बीमारी की झूठी कहानी गढ़ी गई है। मौत के मामले में कोई कागज नहीं मिला है। इस मामले में कोतवाली पुलिस ने धारा 302 के तहत अज्ञात बंदीरक्षकों और बंदियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लिया।

उधर, जेल अधीक्षक सतीश सुखीजा ने बताया कि बंदी इरशाद टीबी रोग से ग्रसित था। बंदीरक्षकों ने तबियत खराब होने पर उसे 10 जुलाई को एसटीएच में भर्ती कराया गया। अगले दिन उपचार के दौरान उसकी मौत हो गई। मेडिकल चौकी पुलिस ने दो डॉक्टरों के पैनल से वीडियोग्राफी के बीच उसका पोस्टमार्टम कराया था। मारपीट करने का सवाल ही नहीं उठता है। (डॉ.नवीन जोशी) अन्य ताज़ा नवीन समाचार पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।

यह भी पढ़ें : हल्द्वानी जेल में महिला सहित 14 एचआईवी पॉजिटिव

नवीन समाचार, हल्द्वानी, 21 जुलाई 2021। हल्द्वानी उप कारागार में 14 कैदियों के एचआईवी संक्रमित पाए जाने से हड़कंप मच गया है। इन एचआईवी संक्रमित कैदियों में एक महिला कैदी भी शामिल है। कैदियों की स्वास्थ्य जांच में यह खुलासा होने के बाद एचआइवी संक्रमित पाये गए कैदियों को एंटी रेट्रो वायरल थेरेपी से एचआईवी का उपचार करने के साथ उन्हें रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के लिए दूध व अंडा आदि पौष्टिक भोजन दिया जा रहा है, तथा उन्हें सावधानी के साथ इलाज करने के लिए प्रेरित किया जा रहा है।

उप कारागार हल्द्वानी के अधीक्षक सतीश कुमार सुखीजा ने बताया कि कैदियों के एचआइवी संक्रमित पाये जाने की पुष्टि की है। उन्होंने बताया जेल आठ लोग पूर्व से एचआईवी पॉजिटिव हैं, जबकि इस वर्ष 20 मई को कराई गई जांच में 5 कैदी पॉजिटिव मिले थे। इधर इस माह गत 6 जुलाई को कराई गई जांच में एक महिला एचआईवी पॉजिटिव पाई गई है। उन्होंने बताया कि जेल में आने पर खासकर टीबी के मरीजों की नियमतः एचआईवी जांच कराई जाती है। और उन्हें अच्छा भोजन दिया जाता है।

बताया गया है कि एचआईवी संक्रमित पाई गई महिला मूलतः पश्चिम बंगाल की है, और सैक्स वर्कर के तौर पर पकड़े जाने के बाद जेल में आई है। वह पहले से एचआईवी संक्रमित बताई जा रही है, लेकिन उसने इसकी जानकारी नियमतः जेल प्रशासन को नहीं दी। सैक्स वर्कर के रूप में कितने अन्य लोगों को वह संक्रमित कर चुकी होगी, यह एक अलग सवाल है। (डॉ.नवीन जोशी) अन्य ताज़ा नवीन समाचार पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।

यह भी पढ़ें : बेहद खतरनाक हो सकता है किसी भी और का रक्त चढ़ाना

-रक्त मे 90 दिन पूर्व से हो रही केवल पांच बीमारियों की जांच ही है संभव
-स्वयं का अथवा नियमित स्वैच्छिक रक्तदाताओं से रक्त लेना ही सर्वाधिक सुरक्षित
-स्वैच्छिक रक्तदान ही नहीं हर 90 दिन में नियमित स्वैच्छिक रक्तदान है जरूरी
नवीन जोशी, नैनीताल। जी हां, मनुष्य को बेहद जरूरी होने पर ही किसी दूसरे का रक्त चढ़ाना चाहिए। देश-प्रदेश में अभी तक चढ़ाए जाने वाले रक्त में 90 दिन से पुरानी और केवल पांच बीमारियों की ही जांच की व्यवस्था उपलब्ध है। यानी यदि रक्तदान करने वाले व्यक्ति को यदि 90 दिन से कम अवधि में किसी बीमारी का संक्रमण हुआ है तो रोगी को चढ़ाए जाने वाला रक्त भी उस बीमारी से संक्रमित हो सकता है। इस समस्या से बचाव के दो तरीके हैं। यदि संभव हो तो रक्त चढ़ाने की किसी संभावित स्थिति का पहले से पता हो तो स्वयं का रक्त भी 15 दिन पूर्व रक्त बैंक में जमा कराया जा सकता है। दूसरा तरीका नियमित रूप से स्वैच्छिक रक्तदाताओं के रक्त को लेना है। इसके लिए लोगों को नियमित रूप से रक्तदान के लिए प्रेरित किया जा रहा है। राज्य में कहीं-कहीं अब 15 दिन पुरानी बीमारियों का भी पता लगाने की व्यवस्था भी की जा रही है। लेकिन यह व्यवस्था भी केवल पांच बीमारियों-एचआईवी, हेपेटाइटिस बी, हेपेटाइटिस सी, मलेरिया तथा यौन गुप्त रोग संबंधी सिपलिस बीमारियों के लिए ही है।

सुरक्षित एवं असुरक्षित रक्त की इस पहेली को समझने से पहले जान लें कि रक्तदाता पांच तरह के होते हैं। पहला, व्यवसायिक तौर पर रक्तदान जो कि 1999 से प्रतिबंधित है। दूसरा, रोगी के परिजनों के द्वारा। इसे सुरक्षित नहीं माना जाता। क्योंकि अधिकांशतया अपने परिजनों को बचाने के लिए लोग अपनी बीमारियों व अन्य समस्याओं को छुपाकर रक्तदान कर देते हैं। तीसरे, स्वयं रक्तदाता। ऐसे सीमित रक्तदाता कई बार अपने एक माह बाद होने वाली किसी ऑपरेशन जैसी स्थितियों के लिए 15 दिन पहले ही स्वयं का रक्त, रक्तबैंक में सुरक्षित रखवा सकते हैं। यह तरीका रक्त लेने का सबसे सुरक्षित तरीका बताया जाता है। इसके अलावा जो स्वैच्छिक रक्तदाताओं वाले पांचवे तरीके का सर्वाधिक प्रचार-प्रसार किया जाता है, इस वर्ग के रक्तदाताओं के भी पहले रक्तदान से मिले रक्त को चढ़ाने में भी कभी बड़ी समस्या आ सकती है।

उत्तराखंड रक्त संचरण परिषद के राज्य नोडल प्रभारी एवं एनएसएस के पूर्व राज्य संपर्क अधिकारी डा. आनंद सिंह उनियाल ने बताया कि देश-प्रदेश में अब तक 90 दिन से (कुछ गिने-चुने केंद्रों में 15 दिन) पुरानी पांच बीमारियों- एचआईवी, हेपेटाइटिस बी, हेपेटाइटिस सी, मलेरिया तथा यौन गुप्त रोग संबंधी सिपलिस के टेस्ट ही उपलब्ध हैं। हमारे रक्त में मौजूद लाल रक्त कणिकाओं (आरबीसी) की उम्र 120 दिन की ही होती है। यानी हर 120 दिन में हमारे शरीर की आरबीसी मरती जाती हैं, और नया खून भी साथ-साथ बनता चला जाता है। इसीलिए हर व्यक्ति को 90 दिन में रक्तदान की सलाह दी जाती है। हर रक्तदान के दौरान रक्त की उपरोक्त पांच बीमारियों के लिए आवश्यक रूप से जांच होती है, लिहाजा पहली बार किसी व्यक्ति द्वारा दिए जाने वाले रक्त से बेशक उसकी नई बीमारियों का पता न चल पाए, लेकिन नियमित रूप से हर 90 दिन में रक्तदान करते जाने से उस व्यक्ति के इन बीमारियों से रहित होने की संभावना बढ़ जाती है। डा. उनियाल ने कहा कि इसीलिए अब स्वैच्छिक रक्तदान की जगह नियमित स्वैच्छिक रक्तदान करने का आह्वान किया जा रहा है। लिए लोगों को रक्तदान के प्रति ज्ञान देकर इस स्लोगन के साथ जागरूक किया जा रहा है कि रक्तदान से पहले रक्त का ज्ञान जरूरी है। यदि लोग रक्त व रक्तदान के प्रति ज्ञान रखने लगें तो इस समस्या का समाधान हो सकता है। अन्य ताज़ा नवीन समाचार पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।

नवीन समाचार
‘नवीन समाचार’ विश्व प्रसिद्ध पर्यटन नगरी नैनीताल से ‘मन कही’ के रूप में जनवरी 2010 से इंटरननेट-वेब मीडिया पर सक्रिय, उत्तराखंड का सबसे पुराना ऑनलाइन पत्रकारिता में सक्रिय समूह है। यह उत्तराखंड शासन से मान्यता प्राप्त, अलेक्सा रैंकिंग के अनुसार उत्तराखंड के समाचार पोर्टलों में अग्रणी, गूगल सर्च पर उत्तराखंड के सर्वश्रेष्ठ, भरोसेमंद समाचार पोर्टल के रूप में अग्रणी, समाचारों को नवीन दृष्टिकोण से प्रस्तुत करने वाला ऑनलाइन समाचार पोर्टल भी है।
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