पतंजलि आयुर्वेद और दिव्य फार्मेसी से जुड़े 31.21 करोड़ रुपये के ठगी मामले में हाईकोर्ट की सख्ती, 23 वर्ष पुराने हल्द्वानी के हत्या-लूट मामले के चारों आरोपित बरी

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नवीन समाचार, नैनीताल, 31 अगस्त 2026 (Nainital High Court News 31 Aug 2026)। उत्तराखंड (Uttarakhand) उच्च न्यायालय (High Court) ने पतंजलि आयुर्वेद लिमिटेड (Patanjali Ayurved Limited) और दिव्य फार्मेसी (Divya Pharmacy) से जुड़े बहुचर्चित ठगी मामले में हरिद्वार (Haridwar) की निचली अदालत के रवैये पर कड़ी नाराजगी जताई है। न्यायिक अनुशासन का पालन न करने पर टिप्पणी करते हुए न्यायालय ने धोखाधड़ी से जुड़े मामले में 31.21 करोड़ रुपये की फ्रीज (Freeze) की गई राशि के निस्तारण से संबंधित आवेदन पर दो सप्ताह के भीतर अंतिम निर्णय सुनाने के निर्देश दिए हैं।

Nainital High Court News 31 Aug 2026उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति राकेश थपलियाल (Justice Rakesh Thapliyal) की एकलपीठ (Single Bench) ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) के स्पष्ट आदेश के बावजूद मामले का निस्तारण टालना न्यायिक अनुशासन के अनुरूप नहीं है। न्यायालय ने हरिद्वार की निचली अदालत को दंड प्रक्रिया संहिता (Code of Criminal Procedure-CRPC) की धारा 451 के तहत दाखिल आवेदनों पर निर्धारित अवधि में निर्णय देने के निर्देश दिए हैं।

जून 2022 में दर्ज हुआ था मामला

मामला जून 2022 का है, जब पतंजलि के प्रतिनिधि रमण पंवार (Raman Panwar) की शिकायत पर कनखल थाना (Kankhal Police Station) में मुख्य आरोपी राकेश मेहरा (Rakesh Mehra) और अन्य के खिलाफ प्रथम सूचना रिपोर्ट (First Information Report-FIR) दर्ज की गई थी।

जांच एजेंसी (Investigating Agency) ने मामले की जांच के दौरान राकेश मेहरा और उनकी बेटियों के बैंक खातों में जमा 31.21 करोड़ रुपये की राशि को फ्रीज कर दिया था।

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पीड़ित पक्ष ने फ्रीज की गई राशि को मुक्त कराने के लिए निचली अदालत में आवेदन दाखिल किया था। इस संबंध में सर्वोच्च न्यायालय ने छह मई 2025 को निचली अदालत को कानून के अनुसार आवेदन का निस्तारण करने का स्पष्ट आदेश दिया था।

सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के बावजूद टलता रहा निर्णय

इसके बावजूद 22 जुलाई 2026 को हरिद्वार की निचली अदालत ने यह कहते हुए निर्णय टाल दिया कि उच्च न्यायालय द्वारा प्रशासनिक स्तर पर उससे कुछ टिप्पणियां मांगी गई हैं।

इस आदेश को उच्च न्यायालय में चुनौती दी गई। न्यायमूर्ति राकेश थपलियाल ने 24 अगस्त 2026 को सुनवाई के दौरान स्पष्ट कहा कि सर्वोच्च न्यायालय देश की सर्वोच्च अदालत है और प्रशासनिक पत्राचार का आधार लेकर उसके आदेश का पालन न करना न्यायिक अनुशासन का गंभीर उल्लंघन है।

उच्च न्यायालय ने आरोपी पक्ष की उन दलीलों को भी खारिज कर दिया, जिनमें निचली अदालत के न्यायाधीश पर पक्षपात का आरोप लगाते हुए मामले को दूसरी अदालत में स्थानांतरित करने की मांग की गई थी।

याचिकाओं का निस्तारण करते हुए उच्च न्यायालय ने हरिद्वार के न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वितीय (Judicial Magistrate Second) को निर्देश दिया कि आदेश की प्रति प्राप्त होने के दो सप्ताह के भीतर, 15 जुलाई 2026 को पूरी हो चुकी सुनवाई के आधार पर दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 451 के अंतर्गत दाखिल आवेदनों पर अंतिम निर्णय सुनाया जाए।

वर्ष 2003 के हल्द्वानी हत्या और लूट मामले में हाईकोर्ट ने चारों आरोपितों को बरी किया, ठोस साक्ष्य नहीं मिलने पर फैसला

उत्तराखंड (Uttarakhand) उच्च न्यायालय (High Court) ने वर्ष 2003 में हल्द्वानी (Haldwani) में मुरादाबाद (Moradabad) के एक कैसेट व्यापारी के कर्मचारी की हत्या और लूट के मामले में चार आरोपियों को बरी कर दिया है। न्यायालय ने निचली अदालत के फैसले के खिलाफ दायर अपीलों पर विस्तृत सुनवाई के बाद आरोपियों के विरुद्ध ठोस साक्ष्य नहीं होने के आधार पर उन्हें दोषमुक्त कर दिया।

मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति रवींद्र मैठाणी (Justice Ravindra Maithani) और न्यायमूर्ति सिद्धार्थ साह (Justice Siddharth Sah) की खंडपीठ (Division Bench) ने की।

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मामले के अनुसार वर्ष 2003 में हल्द्वानी में मुरादाबाद के एक कैसेट व्यापारी के कर्मचारी राज (Raj) की हत्या कर दी गई थी। उसका शव कैनाल (Canal) में पड़ा मिला था, जबकि उसके एक साथी को घायल कर 47 हजार 500 रुपये की नकदी और कैसेट लूट लिए गए थे।

मामले में कोतवाली (Kotwali) में मुकदमा दर्ज किया गया था। जांच के बाद अनिल (Anil), इमरान (Imran), वासिब (Wasib) और पप्पू (Pappu) को गिरफ्तार कर जेल भेजा गया।

जिला अदालत ने सुनाई थी अलग-अलग सजा

मामला जिला अदालत (District Court) पहुंचने पर अनिल और इमरान को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई थी, जबकि वासिब और पप्पू को एक वर्ष की सजा दी गई थी।

आरोपियों ने जिला अदालत के इस फैसले को उच्च न्यायालय में अपील (Appeal) दाखिल कर चुनौती दी थी। उनका कहना था कि वे निर्दोष हैं और उनके विरुद्ध कोई ठोस साक्ष्य उपलब्ध नहीं है।

मामला आगे सर्वोच्च न्यायालय तक भी पहुंचा, जिसके बाद सर्वोच्च न्यायालय ने मामले को दोबारा सुनवाई के लिए उच्च न्यायालय को भेज दिया था। उच्च न्यायालय ने मामले की विस्तृत सुनवाई के बाद चारों आरोपियों के विरुद्ध दोष सिद्ध करने के लिए पर्याप्त और ठोस साक्ष्य नहीं पाए। इसके आधार पर न्यायालय ने सभी चारों आरोपियों को बरी कर दिया।

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