नवीन समाचार, देहरादून, 4 सितंबर 2026 (CBI Probe on Uttarakhand Police Fraud)। उत्तराखंड (Uttarakhand) की राजधानी देहरादून (Dehradun) से जुड़े एक गंभीर मामले में वर्ष 2020 की कथित चरस बरामदगी (Charas Recovery) और पुलिस कार्रवाई अब केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) की जांच के दायरे में आ गई है। हाईकोर्ट (High Court) के आदेश के बाद CBI की भ्रष्टाचार निरोधक शाखा (Anti-Corruption Branch-ACB), देहरादून ने करीब छह वर्ष पुराने मामले में केस दर्ज कर जांच शुरू कर दी है, जिसमें पुलिसकर्मियों पर फर्जी बरामदगी, मारपीट, दस्तावेजों में हेरफेर और CCTV फुटेज जैसे महत्वपूर्ण सबूत मिटाने के आरोप हैं।
मामले में वर्ष 2020 में ढाबा मालिक (Dhaba Owner) अनिल शर्मा (Anil Sharma) को 97.70 ग्राम चरस के साथ गिरफ्तार किए जाने का दावा किया गया था। अब जांच का मुख्य सवाल यह है कि चरस वास्तव में अनिल शर्मा से बरामद हुई थी या पुलिस कार्रवाई के दौरान बरामदगी की प्रक्रिया को लेकर गंभीर अनियमितताएं हुईं। 3 सितंबर 2026 को CBI ने इस संबंध में केलाखेड़ा थाने (Kelakheda Police Station) से जुड़े मामले में कार्रवाई दर्ज कर जांच आगे बढ़ाई है।
फर्जी बरामदगी से लेकर CCTV फुटेज मिटाने तक गंभीर आरोप
यह मामला केवल कथित चरस बरामदगी तक सीमित नहीं है। शिकायतकर्ता की ओर से पुलिस की पूरी कार्रवाई पर सवाल उठाए गए हैं। आरोप है कि पुलिसकर्मी ढाबे पर पहुंचे, वहां एक कर्मचारी के साथ मारपीट की, मोबाइल फोन छीना और अनिल शर्मा को जबरन अपने साथ ले गए।
इसके बाद पुलिस द्वारा 97.70 ग्राम चरस बरामद दिखाकर उनके खिलाफ स्वापक औषधि और मन:प्रभावी पदार्थ अधिनियम (NDPS Act) के तहत अभियोग दर्ज करने का आरोप लगाया गया।
शिकायत के अनुसार अगले दिन पुलिसकर्मी दोबारा ढाबे पर पहुंचे और वहां लगे CCTV कैमरों (CCTV Cameras) की फुटेज डिलीट कर दी गई। ढाबे के रजिस्टर (Register) के कुछ पन्ने फाड़े जाने के आरोप भी सामने आए हैं। इस कारण मामले में इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों (Electronic Evidence) और दस्तावेजी रिकॉर्ड की भूमिका भी जांच का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गई है।
शुरुआती CBI जांच में पुलिस की कार्रवाई पर उठे थे सवाल
मामले की प्रारंभिक जांच (Preliminary Enquiry) के दौरान CBI को ऐसे तथ्य मिलने का दावा किया गया, जिनसे पुलिस द्वारा बताई गई बरामदगी की कहानी पर सवाल खड़े हुए। जांच रिपोर्ट में यह सामने आने का दावा किया गया कि अनिल शर्मा से मौके पर चरस बरामद नहीं हुई थी और बरामदगी पुलिस चौकी (Police Outpost) पर दिखाई गई।
जनरल डायरी (General Diary-GD) और अन्य पुलिस दस्तावेजों में भी कथित हेरफेर के आरोप सामने आए। CCTV फुटेज को लेकर भी यह आरोप है कि घटना से जुड़े महत्वपूर्ण इलेक्ट्रॉनिक सबूतों को जानबूझकर मिटाया गया।
वर्ष 2020 में हाईकोर्ट के हस्तक्षेप के बाद शुरू हुई थी CBI कार्रवाई
मामला सामने आने के बाद वर्ष 2020 में हाईकोर्ट ने CBI से प्रारंभिक जांच कराई थी। इसके बाद 19 अगस्त 2020 को पुलिसकर्मियों के खिलाफ FIR दर्ज करने के आदेश दिए गए थे।
CBI ने उस समय पुलिसकर्मियों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (Indian Penal Code-IPC) की विभिन्न धाराओं में मामला दर्ज किया था। आरोपों में आपराधिक साजिश (Criminal Conspiracy), गलत दस्तावेज तैयार करना, झूठा मुकदमा बनाने, सबूत मिटाने, मारपीट और अवैध रूप से हिरासत में रखने जैसे गंभीर आरोप शामिल थे।
इस मामले में तत्कालीन उप निरीक्षक (Sub-Inspector) प्रकाश चंद्र टम्टा (Prakash Chandra Tamta) सहित अन्य पुलिसकर्मियों के नाम भी सामने आए थे।
सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा था मामला
CBI जांच के खिलाफ संबंधित पुलिसकर्मी सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) तक पहुंचे। वर्ष 2024 में जांच के एक हिस्से पर रोक लगी थी। बाद में याचिका वापस लिए जाने के बाद हाईकोर्ट में मामले की सुनवाई फिर शुरू हुई।
इस प्रकार वर्ष 2020 से शुरू हुआ यह मामला लगभग छह वर्षों तक विभिन्न न्यायिक प्रक्रियाओं (Judicial Proceedings) से गुजरता रहा और अब एक बार फिर जांच के महत्वपूर्ण चरण में पहुंच गया है।
11 अगस्त 2026 के हाईकोर्ट के आदेश ने बदली जांच की दिशा
मामले में महत्वपूर्ण मोड़ 11 अगस्त 2026 को आया, जब हाईकोर्ट ने पुलिसकर्मियों पर लगे आरोपों और पुलिस की कार्यप्रणाली पर उठे सवालों को देखते हुए मूल NDPS मामले और पुलिसकर्मियों के खिलाफ ज्यादती एवं कथित फर्जी मुकदमा बनाए जाने के आरोपों से जुड़े प्रकरण की जांच CBI को सौंपने का आदेश दिया।
न्यायालय का विचार था कि जब आरोप पुलिस विभाग के कर्मियों पर ही हों और जांच की निष्पक्षता को लेकर सवाल खड़े हों, तब उसी पुलिस व्यवस्था से निष्पक्ष जांच की अपेक्षा करना उचित नहीं माना जा सकता।
अब CBI के सामने दो प्रमुख सवाल
CBI की आगे की जांच में मुख्य रूप से दो बिंदु महत्वपूर्ण होंगे—
- क्या 97.70 ग्राम चरस वास्तव में अनिल शर्मा से बरामद हुई थी?
- यदि पुलिस कार्रवाई में अनियमितता हुई, तो क्या CCTV फुटेज, दस्तावेज और अन्य साक्ष्यों को जानबूझकर मिटाया या बदला गया?
दूसरी ओर पुलिस का पक्ष अलग रहा है। पुलिस का दावा था कि ढाबे पर चरस और शराब की बिक्री की गुप्त सूचना (Secret Information) मिली थी और कार्रवाई के दौरान बरामदगी की गई। पुलिस की ओर से CCTV फुटेज को आंशिक और बिना ऑडियो (Without Audio) वाला भी बताया गया था। शिकायतों के बाद में वापस लिए जाने का तर्क भी पुलिस की ओर से रखा गया।
हालांकि, हाईकोर्ट ने मामले की परिस्थितियों और आरोपों को देखते हुए राज्य पुलिस (State Police) की जांच को पर्याप्त नहीं माना और CBI जांच का रास्ता साफ किया।
छह साल पुराने मामले में अब फिर जुटेंगे साक्ष्य
अब यह पूरा मामला CBI के हाथ में है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार जांच अधिकारी (Investigating Officer) के रूप में एसपी स्तर के अधिकारी सुभाष चंदर (Subhash Chander) को जिम्मेदारी दी गई है।
आने वाले समय में CCTV रिकॉर्ड, पुलिस रिकॉर्ड, केस डायरी (Case Diary), कथित बरामदगी की प्रक्रिया और घटना के समय ढाबे पर मौजूद लोगों के बयान इस मामले की जांच की दिशा तय कर सकते हैं। जांच के निष्कर्ष से यह स्पष्ट होगा कि वर्ष 2020 की NDPS कार्रवाई वास्तविक बरामदगी पर आधारित थी या पुलिसकर्मियों के खिलाफ लगाए गए फर्जी मुकदमा बनाने और साक्ष्य मिटाने के आरोपों में तथ्य हैं।
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डॉ.नवीन जोशी, पिछले 20 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय, ‘कुमाऊँ विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में पीएचडी की डिग्री प्राप्त पहले और वर्ष 2015 से उत्तराखंड सरकार से मान्यता प्राप्त पत्रकार हैं। 15 लाख से अधिक नए उपयोक्ताओं के द्वारा 150 मिलियन यानी 1.5 करोड़ से अधिक बार पढी गई आपकी अपनी पसंदीदा व भरोसेमंद समाचार वेबसाइट ‘नवीन समाचार’ के संपादक हैं, साथ ही राष्ट्रीय सहारा, हिन्दुस्थान समाचार आदि समाचार पत्र एवं समाचार एजेंसियों से भी जुड़े हैं। देश के पत्रकारों के सबसे बड़े संगठन ‘नेशनल यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट्स (इंडिया) उत्तराखंड’ के उत्तराखंड प्रदेश के प्रदेश महामंत्री भी हैं और उत्तराखंड के मान्यता प्राप्त राज्य आंदोलनकारी भी हैं। डॉ. जोशी के बारे में विस्तार से पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।
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