डॉ. नवीन जोशी @ नवीन समाचार, 27 अक्टूबर 2026 (Daler Mehndi Controversy-Why Lip-Sync)। उत्तराखंड (Uttarakhand) के टिहरी गढ़वाल (Tehri Garhwal) जनपद के नरेंद्रनगर (Narendranagar) में सिद्धपीठ मां कुंजापुरी पर्यटन एवं विकास मेले के सांस्कृतिक कार्यक्रम में गत 18 अक्टूबर को पंजाबी गायक दलेर मेहंदी (Daler Mehndi) और कैबिनेट मंत्री सुबोध उनियाल (Subodh Uniyal) के बीच हुए विवाद ने मंचीय गायन की वास्तविकता, कलाकारों की जवाबदेही और सार्वजनिक धन से आयोजित कार्यक्रमों की गुणवत्ता पर महत्वपूर्ण प्रश्न खड़े कर दिए हैं।
दिलचस्प बात है कि मंत्री ने मंच पर दलेर मेहंदी की प्रस्तुति पर आपत्ति जताते हुए उनके ठीक से बोल न पाने और सजीव गायन के स्थान पर रिकॉर्डेड गीतों पर होंठ हिलाने-केवल लिप सिंक (Lip Syncing) करने का आरोप लगाया था। उन्होंने उनके नशे में होने का भी आरोप लगाया, जबकि गायक के समर्थन में सामने आए लोगों ने इस आरोप का विरोध किया और मामला केवल सुबोध उनियाल द्वारा दलेर मेहंदी पर शराब पीने का आरोप लगाते हुए मंच पर फटकारने पर केंद्रित होकर रह गया है। देखें संबंधित वीडियो :
लेकिन आज यह मामला फिर सुर्खियों में है कि कल माफी मांगने की खबरों को अब सुबोध उनियाल ने नकार दिया है। प्राप्त जानकारी के अनुसार, मंत्री ने कहा कि उन्होंने ऐसा कोई अपराध नहीं किया जिसके लिए उन्हें माफी मांगनी पड़े। इससे विवाद का एक पक्ष फिर चर्चा में है, लेकिन इसके साथ एक बड़ा प्रश्न भी उठता है—क्या दर्शक किसी प्रसिद्ध गायक के कार्यक्रम में उसकी सजीव आवाज सुनने के लिए पैसे देते हैं या पहले से रिकॉर्ड किए गए गीतों पर मंचीय प्रस्तुति देखने के लिए?
ऐसे में हमारा मानना है कि दलेर मेहंदी विवाद को केवल मंत्री के मंच पर व्यवहार और उनके माफी मांगने या न मांगने तक सीमित न रखा जाए, बल्कि सुबोध उनियाल द्वारा उठाए गए लिप-सिंक के सवाल की भी निष्पक्ष चर्चा होनी चाहिए।
विवाद केवल कलाकार के व्यवहार का नहीं, प्रस्तुति की गुणवत्ता का भी है
दलेर मेहंदी की प्रस्तुति को लेकर मंत्री की आपत्ति सार्वजनिक रूप से सामने आई। मंत्री का कहना था कि लोग गायक को सुनने आए थे और कार्यक्रम पर बड़ी धनराशि खर्च की गई थी, इसलिए प्रस्तुति अपेक्षा के अनुरूप होनी चाहिए थी। दूसरी ओर, दलेर मेहंदी के भाई और गायक मीका सिंह सहित कुछ कलाकारों ने दलेर का समर्थन किया। उनके पक्ष से दलेर के स्वास्थ्य को लेकर भी बातें कही गईं और मंच पर सार्वजनिक रूप से इस तरह टोकने को अनुचित बताया गया।
यहां दो अलग प्रश्नों को समझना जरूरी है। पहला, क्या किसी कलाकार को सार्वजनिक मंच पर अपमानित करने के बजाय आयोजकों के माध्यम से अपनी आपत्ति दर्ज करानी चाहिए थी? दूसरा, क्या कार्यक्रम में निर्धारित स्तर का सजीव गायन हुआ था और क्या आयोजकों को उसके लिए अपेक्षित प्रस्तुति मिली?
पहले प्रश्न पर कलाकार की गरिमा और सार्वजनिक व्यवहार की चर्चा हो सकती है। दूसरे प्रश्न का उत्तर प्रस्तुति के वास्तविक स्वरूप, अनुबंध की शर्तों और उपलब्ध साक्ष्यों से ही मिल सकता है। किसी कलाकार के व्यवहार पर विवाद होने से प्रस्तुति की गुणवत्ता का प्रश्न समाप्त नहीं हो जाता।
दर्शक किसके पैसे दे रहे हैं—गायक की आवाज के या रिकॉर्डेड गीत पर अभिनय के?
आजकल मंचीय संगीत कार्यक्रमों में पहले से रिकॉर्ड किए गए संगीत का उपयोग सामान्य है। वाद्ययंत्रों की ध्वनि, सहायक गायन और अन्य ध्वनि प्रभावों के लिए रिकॉर्डेड ट्रैक का उपयोग अपने आप में गलत नहीं है। प्रश्न तब उठता है, जब कार्यक्रम को सजीव गायन के रूप में प्रस्तुत किया जाए, लेकिन मुख्य आवाज भी रिकॉर्डेड हो और गायक केवल उसके साथ होंठ मिलाता दिखाई दे।
ऐसी स्थिति में दर्शक का प्रश्न स्वाभाविक है—यदि मुख्य गीत पहले से रिकॉर्ड किया हुआ है, तो वह गायक की सजीव आवाज सुनने के लिए टिकट या प्रवेश शुल्क क्यों दे रहा है? क्या उसे यह जानने का अधिकार नहीं होना चाहिए कि मंच पर वास्तविक गायन होगा, रिकॉर्डेड आवाज का सहारा लिया जाएगा या दोनों का मिश्रण होगा?
यह प्रश्न किसी एक गायक तक सीमित नहीं है। बड़े कलाकारों के कार्यक्रमों में दर्शक केवल गीत सुनने नहीं आते, बल्कि उस कलाकार की आवाज, गायन-कला और मंच पर वास्तविक प्रस्तुति का अनुभव लेने आते हैं। यदि सजीव गायन के स्थान पर मुख्य रूप से रिकॉर्डेड आवाज का उपयोग किया जा रहा हो, तो कार्यक्रम के प्रचार और वास्तविक प्रस्तुति के बीच अंतर की जानकारी दर्शकों को मिलनी चाहिए।
क्या गायक अब अपने ही गीतों पर अभिनय करने वाले कलाकार बनते जा रहे हैं?
यहां एक असहज लेकिन प्रासंगिक सवाल भी उठता है—क्या कुछ मंचीय कार्यक्रमों में गायक की भूमिका धीरे-धीरे अपने ही गीतों पर अभिनय करने वाले कलाकार या डीजे (DJ) जैसी प्रस्तुति देने वाले व्यक्ति तक सीमित होती जा रही है?
डीजे का काम रिकॉर्डेड संगीत को चुनना, संयोजित करना और उसके माध्यम से श्रोताओं का मनोरंजन करना है। इसमें कोई बुराई नहीं है, क्योंकि दर्शक उस प्रस्तुति का स्वरूप जानते हैं। इसी तरह, नृत्य, प्रकाश और मंचीय अभिनय किसी गायक की प्रस्तुति को अधिक आकर्षक बना सकते हैं। लेकिन यदि कोई कलाकार अपने नाम और गायन की प्रतिष्ठा के आधार पर कार्यक्रम में बुलाया जाता है, तो मुख्य आकर्षण उसकी सजीव आवाज है या रिकॉर्डेड गीत पर उसका अभिनय—यह स्पष्ट होना चाहिए।
किसी गायक द्वारा रिकॉर्डेड संगीत के साथ प्रस्तुति देना और पूरी तरह रिकॉर्डेड मुख्य आवाज पर लिप-सिंक करना एक ही बात नहीं है। जहां दर्शक सजीव गायन की अपेक्षा लेकर आए हों और प्रस्तुति में उसकी जगह रिकॉर्डेड आवाज का उपयोग होने का आरोप लगे, वहां सवाल पूछना अनुचित नहीं है।
पलाश सेन ने 2023 में उठाया था भारतीय संगीत जगत में लिप-सिंक का सवाल
भारतीय संगीत जगत में सजीव गायन और लिप-सिंक को लेकर यह बहस नई नहीं है। बैंड यूफोरिया (Euphoria) के गायक व संगीतकार पलाश सेन (Palash Sen) ने अप्रैल 2023 में दिए एक साक्षात्कार में दावा किया था कि आजकल लगभग 99 प्रतिशत सजीव प्रस्तुतियां वास्तविक गायन के बजाय लिप-सिंक पर आधारित हैं। उन्होंने कुछ ऐसे कलाकारों के नाम भी गिनाए, जिन्हें वह सजीव प्रस्तुति देने वालों में मानते थे।
पलाश सेन का यह कथन उनके अनुभव और आकलन पर आधारित था। इसे भारतीय संगीत जगत के प्रत्येक कार्यक्रम के बारे में प्रमाणित आंकड़ा नहीं माना जा सकता। लेकिन उनका बयान इस बहस को अवश्य सामने लाता है कि जब किसी कार्यक्रम को सजीव प्रस्तुति के रूप में प्रचारित किया जाता है, तो उसकी वास्तविकता कैसे सुनिश्चित की जाए।
यदि मंच पर कलाकार की आवाज के स्थान पर रिकॉर्डेड आवाज ही मुख्य भूमिका निभा रही है, तो क्या दर्शक को इसका पता होना चाहिए? क्या आयोजकों को यह बताना चाहिए कि कार्यक्रम में सजीव गायन कितना होगा और रिकॉर्डेड ट्रैक का उपयोग किस सीमा तक किया जाएगा?
जैस्मिन सैंडलस के कार्यक्रमों पर भी उठे थे लिप-सिंक के आरोप
अप्रैल 2026 में धुरंधर फिल्म से चर्चा में आई पंजाबी गायिका जैस्मिन सैंडलस (Jasmine Sandlas) के दो कार्यक्रमों को लेकर भी इसी तरह की चर्चा सामने आई। अहमदाबाद में उनके एक कार्यक्रम के वीडियो प्रसारित होने के बाद कुछ दर्शकों ने आरोप लगाया कि प्रस्तुति के कुछ हिस्सों में वह रिकॉर्डेड आवाज के साथ होंठ मिला रही थीं। वीडियो के कुछ क्षणों में उनके हाथ में मौजूद माइक्रोफोन नीचे होने के बावजूद गीत जारी रहने पर सवाल उठे।
इसके बाद जून 2026 में हैदराबाद के क्वेक एरीना में हुए उनके कार्यक्रम को लेकर भी दर्शकों ने शिकायतें कीं। समाचार माध्यमों में प्रकाशित विवरण के अनुसार, एक दर्शक ने आरोप लगाया कि कार्यक्रम रात आठ बजे शुरू होना था, लेकिन गायिका लगभग रात 11:20 बजे मंच पर पहुंचीं। उसी दर्शक ने प्रस्तुति के दौरान लिप-सिंक का आरोप भी लगाया। उस समय प्रकाशित समाचारों में गायिका और आयोजकों की ओर से इन आरोपों पर कोई प्रतिक्रिया दर्ज नहीं थी।
इन दोनों घटनाओं को लिप-सिंक के आरोपों और दर्शकों की शिकायतों के उदाहरण के रूप में देखा जा सकता है, न कि किसी अंतिम जांच में सिद्ध तथ्य के रूप में। फिर भी, ये घटनाएं यह प्रश्न उठाती हैं कि सजीव कार्यक्रम के नाम पर दर्शकों की अपेक्षाओं और वास्तविक प्रस्तुति के बीच अंतर होने पर जवाबदेही किसकी होगी।
सार्वजनिक धन खर्च करने वाले आयोजकों की जिम्मेदारी क्या है?
कुंजापुरी मेले जैसे सार्वजनिक महत्व के आयोजन केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं होते। इनसे स्थानीय संस्कृति, पर्यटन और धार्मिक परंपराओं की प्रतिष्ठा भी जुड़ी होती है। जब ऐसे आयोजनों में कलाकारों को बुलाने, उनके आवागमन, आवास और मंचीय व्यवस्था पर सार्वजनिक धन या संस्थागत संसाधन खर्च होते हैं, तो आयोजकों की जवाबदेही और भी महत्वपूर्ण हो जाती है।
यदि किसी कार्यक्रम में मुख्य गायन रिकॉर्डेड है, तो क्या आयोजकों को टिकट खरीदने वाले दर्शकों और सार्वजनिक धन खर्च करने वाली संस्थाओं को इसकी जानकारी नहीं देनी चाहिए? यदि अनुबंध में सजीव गायन की शर्त थी, तो क्या वास्तविक प्रस्तुति की जांच नहीं होनी चाहिए? और यदि अनुबंध में रिकॉर्डेड ट्रैक के उपयोग की अनुमति थी, तो क्या केवल लिप-सिंक के आरोप के आधार पर कलाकार को दोषी ठहराना उचित होगा?
इन प्रश्नों का उत्तर कार्यक्रम के अनुबंध, प्रचार सामग्री, भुगतान की शर्तों और प्रस्तुति के उपलब्ध साक्ष्यों की जांच से मिल सकता है। कलाकार को कितनी राशि दी गई, यह अपने आप में सजीव गायन का प्रमाण नहीं है। उसी तरह, रिकॉर्डेड संगीत का उपयोग होना अपने आप में अनुबंध उल्लंघन नहीं है। निर्णायक बात यह है कि आयोजक और कलाकार के बीच क्या तय हुआ था तथा दर्शकों को किस प्रकार की प्रस्तुति का आश्वासन दिया गया था।
जांच केवल व्यवहार की हो या अनुबंध और प्रस्तुति की भी?
दलेर मेहंदी और सुबोध उनियाल के विवाद में यदि मंच पर कलाकार के व्यवहार, स्वास्थ्य या मंत्री की सार्वजनिक टिप्पणी पर चर्चा होती है, तो वह एक पक्ष है। लेकिन यदि वास्तविक सवाल यह भी है कि कार्यक्रम में सजीव गायन हुआ या नहीं, तो जांच का विषय केवल मंच पर हुई बहस तक सीमित नहीं रहना चाहिए।
यदि लिप-सिंक की शिकायत हो, तो क्या आयोजकों को कार्यक्रम के अनुबंध, भुगतान की शर्तों, प्रचार में किए गए दावों और वास्तविक प्रस्तुति की भी समीक्षा नहीं करनी चाहिए? क्या दर्शकों को यह बताने की व्यवस्था नहीं होनी चाहिए कि कार्यक्रम में मुख्य गायन सजीव होगा, रिकॉर्डेड होगा या दोनों का मिश्रण?
ऐसी स्पष्टता से कलाकारों की गरिमा भी बनी रह सकती है और दर्शकों का विश्वास भी। इससे किसी कलाकार पर बिना प्रमाण आरोप लगाने की प्रवृत्ति कम होगी तथा वास्तविक अनुबंध उल्लंघन होने पर जिम्मेदारी तय करना आसान होगा।
असली बहस कलाकार के सम्मान और दर्शकों के अधिकार—दोनों की है
दलेर मेहंदी प्रकरण को केवल मंत्री की माफी या कलाकार के सम्मान तक सीमित कर देना इस बहस के एक महत्वपूर्ण पक्ष को छोड़ देना होगा। कलाकार के साथ सम्मानजनक व्यवहार आवश्यक है, लेकिन दर्शकों को भी यह जानने का अधिकार है कि वे जिस प्रस्तुति के लिए समय और धन खर्च कर रहे हैं, उसका वास्तविक स्वरूप क्या है।
यदि किसी कलाकार ने सजीव गायन का वचन दिया है, तो उससे उसी स्तर की प्रस्तुति की अपेक्षा करना अनुचित नहीं है। दूसरी ओर, यदि कार्यक्रम में रिकॉर्डेड संगीत या लिप-सिंक की व्यवस्था पहले से स्पष्ट है, तो केवल रिकॉर्डेड ट्रैक के उपयोग को धोखा नहीं कहा जा सकता।
इसलिए सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यही है—क्या दर्शकों को गायक की सजीव आवाज सुनने का अवसर दिया जा रहा है, या वे अनजाने में रिकॉर्डेड गीतों पर मंचीय अभिनय देखने के लिए पैसे खर्च कर रहे हैं? इस प्रश्न का उत्तर आरोप-प्रत्यारोप से नहीं, बल्कि पारदर्शिता, स्पष्ट अनुबंध और निष्पक्ष जांच से मिलना चाहिए।
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डॉ.नवीन जोशी, पिछले 20 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय, ‘कुमाऊँ विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में पीएचडी की डिग्री प्राप्त पहले और वर्ष 2015 से उत्तराखंड सरकार से मान्यता प्राप्त पत्रकार हैं। 15 लाख से अधिक नए उपयोक्ताओं के द्वारा 150 मिलियन यानी 1.5 करोड़ से अधिक बार पढी गई आपकी अपनी पसंदीदा व भरोसेमंद समाचार वेबसाइट ‘नवीन समाचार’ के संपादक हैं, साथ ही राष्ट्रीय सहारा, हिन्दुस्थान समाचार आदि समाचार पत्र एवं समाचार एजेंसियों से भी जुड़े हैं। देश के पत्रकारों के सबसे बड़े संगठन ‘नेशनल यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट्स (इंडिया) उत्तराखंड’ के उत्तराखंड प्रदेश के प्रदेश महामंत्री भी हैं और उत्तराखंड के मान्यता प्राप्त राज्य आंदोलनकारी भी हैं। डॉ. जोशी के बारे में विस्तार से पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।
नवीन समाचार’ विश्व प्रसिद्ध पर्यटन नगरी नैनीताल से जून 2009 से इंटरननेट-वेब मीडिया पर सक्रिय, उत्तराखंड का सबसे पुराना ऑनलाइन पत्रकारिता में सक्रिय समूह है। यह उत्तराखंड शासन से मान्यता प्राप्त रहा, अलेक्सा रैंकिंग के अनुसार उत्तराखंड के समाचार पोर्टलों में अग्रणी, गूगल सर्च पर उत्तराखंड के सर्वश्रेष्ठ, भरोसेमंद समाचार पोर्टल के रूप में अग्रणी, समाचारों को नवीन दृष्टिकोण से प्रस्तुत करने वाला ऑनलाइन समाचार पोर्टल भी है।
