नवीन समाचार, हल्द्वानी, 28 सितंबर 2026 (MBPG Student Union Election-2026)। उत्तराखंड (Uttarakhand) के नैनीताल (Nainital) जनपद के हल्द्वानी (Haldwani) स्थित एमबीपीजी महाविद्यालय (MBPG College) में 29 सितंबर को होने वाले छात्रसंघ चुनाव से एक दिन पहले प्रचार अभियान में कथित बड़े खर्च को लेकर सवाल उठने लगे हैं। चुनाव मैदान में अध्यक्ष पद के लिए एबीवीपी (ABVP) के धीरज बिष्ट, एनएसयूआई (NSUI) के मेहुल शाह और निर्दलीय आर्यन बेलवाल सहित प्रत्याशी बड़े सेलिब्रिटी आयोजनों के माध्यम से प्रचार कर रहे हैं, और पोस्टरों में इन्ही छात्र नेताओं को इन आयोजनों का आयोजक दिखाया गया है।
प्रचार के दौरान बड़े होर्डिंग, फ्लेक्सी, पर्चे, वाहनों के काफिले, छात्र-छात्राओं के भ्रमण और विभिन्न आयोजनों की चर्चा के साथ कुछ प्रत्याशियों की ओर से सेलिब्रिटी शो और हॉस्टल में पार्टियां आयोजित किए जाने के दावे सामने आए हैं। हालांकि, इन आयोजनों पर खर्च हुई धनराशि और किसी प्रत्याशी द्वारा 50 हजार रुपये की निर्धारित सीमा से अधिक खर्च किए जाने की स्वतंत्र या आधिकारिक पुष्टि उपलब्ध नहीं है। लेकिन उपलब्ध रिपोर्ट में 40 से 50 लाख रुपये तक खर्च होने के दावे किए जा रहे हैं।
50 हजार रुपये है एमबीपीजी में प्रत्याशी की खर्च सीमा
एमबीपीजी कॉलेज में छात्रसंघ चुनाव के लिए प्रत्याशी के चुनावी खर्च की अधिकतम सीमा 50 हजार रुपये निर्धारित है। इसका कारण महाविद्यालय की बड़ी छात्र संख्या है। वर्ष 2019 में उत्तराखंड में छात्रसंघ चुनाव के लिए लागू व्यवस्था के संबंध में प्रकाशित जानकारी में भी 10 हजार से अधिक छात्र संख्या वाले एमबीपीजी कॉलेज और डीएवी कॉलेज देहरादून के लिए 50 हजार रुपये की खर्च सीमा बताई गई थी, जबकि 10 हजार से कम छात्र संख्या वाले महाविद्यालयों के लिए सीमा 25 हजार रुपये है।
एमबीपीजी कॉलेज के प्राचार्य प्रो. एनएस बनकोटी ने चुनाव प्रक्रिया के दौरान बताया है कि प्रत्याशियों के लिए निर्धारित खर्च सीमा 50 हजार रुपये है और चुनाव के बाद प्रत्याशियों से खर्च का विवरण लिया जाता है। उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार उन्होंने यह भी कहा कि कई बार प्रत्याशी भारी खर्च को स्पॉन्सरशिप के रूप में दर्शाते हैं।
मूल लिंगदोह सिफारिश में कितनी थी सीमा?
यहां एक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि लिंगदोह समिति (Lyngdoh Committee) की मूल सिफारिश में प्रति प्रत्याशी अधिकतम चुनाव खर्च 5,000 रुपये निर्धारित किया गया था। समिति ने यह भी सिफारिश की थी कि चुनाव परिणाम घोषित होने के दो सप्ताह के भीतर प्रत्याशी अपने चुनाव खर्च का पूरा लेखा-जोखा महाविद्यालय या विश्वविद्यालय को दें और निर्धारित सीमा से अधिक खर्च अथवा नियमों का पालन नहीं करने पर चुनाव निरस्त किया जा सकता है।
बाद में उत्तराखंड ने छात्रसंघ चुनाव के लिए खर्च सीमा में बदलाव किया। 2018 के चुनावों के संबंध में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार राज्य में 10 हजार से अधिक छात्र संख्या वाले महाविद्यालयों के लिए यह सीमा 50 हजार रुपये की गई थी। एमबीपीजी कॉलेज इसी श्रेणी में आता है। महाविद्यालय में लगभग 12 हजार विद्यार्थी मतदान के लिए पंजीकृत हैं और इस बार नौ पदों के लिए 74 वैध प्रत्याशी मैदान में हैं।इसलिए एमबीपीजी में वर्तमान 50 हजार रुपये की सीमा को सीधे मूल लिंगदोह समिति की 5 हजार रुपये की सीमा कहना सही नहीं होगा। दोनों अलग-अलग व्यवस्थाएं हैं।
सवाल यह कि खर्च किस खाते में दर्ज होगा?
चुनाव प्रचार में बड़े आयोजन होने की स्थिति में मुख्य सवाल केवल आयोजन कराने का नहीं, बल्कि उसके वास्तविक खर्च का चुनावी लेखे में शामिल होने का है।
मसलन किसी प्रत्याशी के समर्थन में संगीत कार्यक्रम, कलाकारों की प्रस्तुति, विद्यार्थियों का भ्रमण, भोजन, वाहन, प्रचार सामग्री, होर्डिंग और अन्य आयोजन होते हैं तो इनके लिए खर्च किसने किया और वह खर्च प्रत्याशी के चुनावी खाते में किस रूप में दर्ज किया गया—यह चुनाव के बाद होने वाली खर्च जांच में महत्वपूर्ण होगा।
लिंगदोह व्यवस्था में चुनाव खर्च के लेखे-जोखे और निर्धारित सीमा के पालन को महत्वपूर्ण माना गया है। दिल्ली उच्च न्यायालय के 2019 के एक मामले में भी लिंगदोह सिफारिशों से जुड़े खर्च के विवरण, बिल और अधिक खर्च होने की स्थिति में चुनाव निरस्त किए जाने के प्रावधान का उल्लेख हुआ था।
सेलिब्रिटी कार्यक्रमों को लेकर क्या सामने आया?
चुनाव से पहले एमबीपीजी परिसर और हल्द्वानी शहर में प्रचार के दौरान विभिन्न कलाकारों के कार्यक्रम आयोजित किए जाने की चर्चा है। उपलब्ध सामग्री में श्वेता मेहरा, प्रियंका महर और अमर संधू सहित कलाकारों के कार्यक्रमों का उल्लेख किया गया है। इसके अलावा हॉस्टलों में पार्टियों, विद्यार्थियों को भ्रमण पर ले जाने, भोजन कराने, प्रचार सामग्री वितरित करने और वाहनों के इस्तेमाल की बातें भी सामने आई हैं।
लेकिन इन सभी आयोजनों का खर्च किस प्रत्याशी या संगठन ने वहन किया, कितनी धनराशि खर्च हुई और वह खर्च चुनावी खाते में दर्ज हुआ या नहीं—इसकी स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध सामग्री से नहीं होती। इसलिए इसे अभी आरोप अथवा दावे के रूप में ही देखा जाना चाहिए। हालांकि किए जा रहे आयोजनों के आयोजक स्पष्ट तौर पर संबंधित छात्र नेता ही बताए गए हैं।
इस बार चुनाव कितना बड़ा है?
एमबीपीजी कॉलेज में इस वर्ष लगभग 12 हजार विद्यार्थी मतदान करेंगे। 29 सितंबर को सुबह 9 बजे से दोपहर 2 बजे तक मतदान निर्धारित किया गया है। नामांकन पत्रों की जांच और नाम वापसी के बाद नौ पदों के लिए 74 प्रत्याशी मैदान में हैं। संयुक्त सचिव छात्रा और सांस्कृतिक सचिव पद पर एक-एक प्रत्याशी होने के कारण इन पदों पर चुनाव नहीं होगा।
अध्यक्ष पद पर मुकाबला तीन प्रत्याशियों के बीच है—धीरज बिष्ट (एबीवीपी), मेहुल शाह (एनएसयूआई) और आर्यन बेलवाल (निर्दलीय)। आर्यन बेलवाल पहले एबीवीपी से जुड़े रहे हैं और टिकट नहीं मिलने के बाद निर्दलीय मैदान में उतरे हैं।
राजनीतिक संगठनों की सक्रियता भी चर्चा में
इस बार एमबीपीजी चुनाव में एबीवीपी और एनएसयूआई की सक्रियता स्पष्ट दिखाई दे रही है। एनएसयूआई प्रत्याशी मेहुल शाह के समर्थन में कांग्रेस की जिला एवं महानगर इकाइयों की बैठक भी हुई थी, जिसमें चुनावी रणनीति पर चर्चा की गई। वहीं एबीवीपी की ओर से धीरज बिष्ट को अध्यक्ष पद का प्रत्याशी बनाया गया है और संगठन से जुड़े आर्यन बेलवाल के निर्दलीय चुनाव लड़ने के कारण मुकाबला तीन प्रत्याशियों के बीच है।
पुलिस और कॉलेज प्रशासन की भी नजर
चुनाव में नियमों के पालन को लेकर पुलिस ने भी प्रत्याशियों और समर्थकों को चेतावनी दी है। पुलिस के अनुसार चुनाव प्रचार में लिंगदोह कमेटी के नियमों का उल्लंघन, रैली और बाहरी लोगों की भागीदारी जैसी गतिविधियों पर कार्रवाई की जाएगी। कॉलेज प्रशासन ने शांतिपूर्ण मतदान के लिए सुरक्षा व्यवस्था बढ़ाई है। मतदान केंद्रों पर सीसीटीवी निगरानी की व्यवस्था की गई है।
असली तस्वीर चुनाव खर्च के विवरण से सामने आएगी
एमबीपीजी छात्रसंघ चुनाव में बड़े आयोजन और प्रचार पर लाखों रुपये खर्च होने के दावे फिलहाल दावों तक सीमित हैं। दूसरी ओर, महाविद्यालय की निर्धारित सीमा 50 हजार रुपये है और चुनाव के बाद प्रत्याशियों से खर्च का विवरण लिया जाना है।
ऐसे में यह स्पष्ट करने के लिए कि किसी प्रत्याशी ने वास्तव में निर्धारित सीमा से अधिक खर्च किया या नहीं, चुनाव के बाद जमा किए जाने वाले खर्च विवरण, बिल और संबंधित आयोजनों के भुगतान स्रोत महत्वपूर्ण होंगे। यदि किसी आयोजन को प्रायोजन के रूप में दिखाया जाता है तो यह भी जांच का विषय होगा कि वह खर्च नियमों के अनुसार प्रत्याशी के चुनावी खर्च में शामिल होना चाहिए या नहीं।
छात्रसंघ चुनाव का उद्देश्य विद्यार्थियों को अपने प्रतिनिधि चुनने का अवसर देना है। एमबीपीजी जैसे लगभग 12 हजार विद्यार्थियों वाले महाविद्यालय में चुनाव प्रचार का बढ़ता खर्च इसलिए महत्वपूर्ण विषय है क्योंकि इससे चुनाव में आर्थिक संसाधनों की भूमिका और नियमों के प्रभावी अनुपालन पर चर्चा होती है। कॉलेज प्रशासन और चुनाव अधिकारियों के पास अब यह सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी होगी कि मतदान के साथ-साथ निर्धारित चुनावी खर्च सीमा और आचार नियमों का भी पालन हो।
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डॉ.नवीन जोशी, पिछले 20 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय, ‘कुमाऊँ विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में पीएचडी की डिग्री प्राप्त पहले और वर्ष 2015 से उत्तराखंड सरकार से मान्यता प्राप्त पत्रकार हैं। 15 लाख से अधिक नए उपयोक्ताओं के द्वारा 150 मिलियन यानी 1.5 करोड़ से अधिक बार पढी गई आपकी अपनी पसंदीदा व भरोसेमंद समाचार वेबसाइट ‘नवीन समाचार’ के संपादक हैं, साथ ही राष्ट्रीय सहारा, हिन्दुस्थान समाचार आदि समाचार पत्र एवं समाचार एजेंसियों से भी जुड़े हैं। देश के पत्रकारों के सबसे बड़े संगठन ‘नेशनल यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट्स (इंडिया) उत्तराखंड’ के उत्तराखंड प्रदेश के प्रदेश महामंत्री भी हैं और उत्तराखंड के मान्यता प्राप्त राज्य आंदोलनकारी भी हैं। डॉ. जोशी के बारे में विस्तार से पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।
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