नवीन समाचार, नैनीताल, 1 नवंबर 2026 (Bhumiyadhar Hanuman Temple-Full Story)। उत्तराखंड के नैनीताल जनपद (Nainital) में भवाली और गेठिया के बीच स्थित भूमियाधार (Bhumiyadhar) का हनुमान मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि बाबा नीब करौरी महाराज की आध्यात्मिक यात्रा और विश्वप्रसिद्ध कैंची धाम (Kainchi Dham) की स्थापना से जुड़ी स्मृतियों का भी महत्वपूर्ण केंद्र है। लोकमान्यता के अनुसार, वर्ष 1942 में नैनीताल से पैदल लौट रहे कैंची गांव के पूर्णानंद तिवारी की बाबा से खुपिया डांठ नामक स्थान पर भेंट हुई थी। देखें संबंधित वीडियो :
कहा जाता है कि जब पूर्णानंद ने दोबारा दर्शन के बारे में पूछा, तो बाबा ने 20 वर्ष बाद मिलने की बात कही। वर्ष 1962 में बाबा के कैंची पहुंचने और वहां आश्रम की स्थापना की दिशा में काम शुरू होने को इसी प्रसंग से जोड़कर देखा जाता है। इसके अतिरिक्त भूमियाधार में बाबा की साधना, हनुमान मंदिर की स्थापना और स्थानीय लोगों से जुड़े अनेक प्रसंग आज भी श्रद्धालुओं के बीच सुनाए जाते हैं।
खुपिया डांठ से कैंची धाम तक, 20 वर्ष पुराने वादे की कहानी
बाबा नीब करौरी महाराज के जीवन से जुड़े लोकप्रिय विवरणों के अनुसार, वर्ष 1942 में पूर्णानंद तिवारी किसी कानूनी कार्य से नैनीताल गए थे। वापसी में बस छूट जाने के कारण वह गेठिया के रास्ते पैदल कैंची की ओर लौट रहे थे। रास्ते में खुपिया डांठ नामक स्थान पड़ता था, जिसे उस समय लोग भूतिया डांठ भी कहते थे। अंधेरे में इस स्थान से गुजरते हुए पूर्णानंद भयभीत थे। तभी उन्हें कंबल ओढ़े एक व्यक्ति दिखाई दिए, जिन्होंने उन्हें नाम लेकर पुकारा। बताया जाता है कि वह बाबा नीब करौरी महाराज थे।
लोकप्रचलित कथा के अनुसार, बाबा ने पूर्णानंद को निर्भय होकर आगे बढ़ने को कहा और बताया कि उन्हें आगे सवारी मिल जाएगी। बातचीत के दौरान पूर्णानंद ने पूछा कि उन्हें बाबा के दर्शन फिर कब होंगे। इस पर बाबा ने कथित रूप से कहा कि वह 20 वर्ष बाद दोबारा मिलेंगे।
कहा जाता है कि लगभग दो दशक बाद वर्ष 1962 में बाबा कैंची पहुंचे और पूर्णानंद तिवारी से फिर भेंट हुई। इस प्रसंग को कैंची धाम की स्थापना से जुड़ी महत्वपूर्ण घटनाओं में गिना जाता है। अमर उजाला सहित कई प्रकाशित विवरणों में भी 1942 की इस मुलाकात और 20 वर्ष बाद बाबा के कैंची पहुंचने की कथा का उल्लेख मिलता है। हालांकि, इसे ऐतिहासिक दस्तावेज से प्रमाणित घटना के बजाय बाबा के जीवन से जुड़ी प्रचलित धार्मिक परंपरा के रूप में समझना उचित है।
भूमियाधार का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है कि यह नैनीताल, गेठिया और भवाली के बीच स्थित है। कैंची धाम जाने वाले अनेक यात्री इस मार्ग से गुजरते हैं। सड़क के समीप स्थित हनुमान मंदिर दिखाई देने के बावजूद बहुत से यात्री यहां रुके बिना आगे निकल जाते हैं। जबकि बाबा के जीवन से जुड़े प्रसंगों को जानने के इच्छुक लोगों के लिए यह स्थान अपने आप में विशेष महत्व रखता है।
भूमियाधार में साधना और हनुमान मंदिर की स्थापना
भूमियाधार से जुड़ी स्थानीय स्मृतियों और बाबा के जीवन पर आधारित विवरणों के अनुसार, बाबा ने यहां एकांत में साधना की थी। दिसंबर 1961 में पूरन सिंह नाम के एक भक्त द्वारा अपनी भूमि का हिस्सा बाबा को समर्पित किए जाने का उल्लेख मिलता है। बताया जाता है कि बाबा ने यहां एक छोटी कुटिया बनाई, जहां वह ध्यान और विश्राम करते थे।
बाबा के जीवन से संबंधित प्रकाशित विवरणों में भूमियाधार में हनुमान मंदिर की स्थापना का उल्लेख भी मिलता है। यहां हनुमान जी की प्रतिमा स्थापित की गई और बाद में जयपुर से लाई गई प्रतिमा को वर्ष 1965 में मंदिर में प्रतिष्ठित किए जाने की जानकारी मिलती है। इन घटनाओं की अलग-अलग तिथियों के संबंध में विवरणों में कुछ अंतर मिलता है, इसलिए किसी एक तिथि को अंतिम मानने के बजाय मंदिर के उपलब्ध अभिलेखों से पुष्टि करना उपयोगी होगा।
आज भूमियाधार मंदिर परिसर में हनुमान जी के दर्शन के साथ बाबा नीब करौरी महाराज की प्रतिमा के दर्शन भी किए जा सकते हैं। स्थानीय जानकारी के अनुसार, यहां श्रद्धालुओं को प्रसाद उपलब्ध कराया जाता है और दर्शन के लिए कोई निर्धारित शुल्क नहीं है। मंदिर में दान न लिए जाने की परंपरा का भी उल्लेख किया जाता है।
प्राकृतिक जलस्रोत और चेचक से जुड़ी लोककथाएं
भूमियाधार के इतिहास में केवल मंदिर और आश्रम ही शामिल नहीं हैं। यहां के स्थानीय लोगों के बीच बाबा से जुड़ी कई अन्य कथाएं भी प्रचलित हैं। इनमें क्षेत्र में पानी की कमी और एक प्राकृतिक जलस्रोत से जुड़ा प्रसंग प्रमुख है।
स्थानीय जनश्रुतियों के अनुसार, पहले इस पहाड़ी क्षेत्र में पानी की कमी के कारण लोगों को कठिनाइयों का सामना करना पड़ता था। बाबा के यहां रहने के दौरान एक प्राकृतिक जलस्रोत के महत्व और उसके पानी के उपयोग से जुड़ी कहानियां सुनाई जाती हैं। कुछ स्थानीय विवरणों में बच्चों को प्रसाद देने और चेचक जैसे रोगों से राहत मिलने की कथाएं भी मिलती हैं। ये धार्मिक आस्था और स्थानीय स्मृतियों से जुड़ी बातें हैं; इनके चमत्कारिक पहलुओं की स्वतंत्र ऐतिहासिक या वैज्ञानिक पुष्टि उपलब्ध विवरणों से नहीं होती।
बाबा के स्वभाव को लेकर भी स्थानीय लोगों के बीच कई प्रसंग प्रचलित हैं। बताया जाता है कि वह कंबल ओढ़कर कभी भी ग्रामीणों के घर पहुंच जाते थे। उनकी सहज उपस्थिति, लोगों से मेलजोल और उनसे जुड़ी निजी स्मृतियां आज भी इस क्षेत्र में उनकी लोकप्रियता का हिस्सा हैं।
वर्ष 1998 के भूस्खलन को भी बाबा की कृपा से जोड़ते हैं स्थानीय लोग
भूमियाधार के लोगों के बीच वर्ष 1998 में हुए एक बड़े भूस्खलन का प्रसंग भी विशेष रूप से सुनाया जाता है। स्थानीय कथाओं के अनुसार, भारी वर्षा के बाद गांव के ऊपर की पहाड़ी से बड़ी मात्रा में मलबा नीचे की ओर आया। लोगों को आशंका थी कि मलबा गांव और मंदिर परिसर को अपनी चपेट में ले सकता है, लेकिन बताया जाता है कि वह आश्रम के मुख्य द्वार के पास रुक गया और गांव को बड़ा नुकसान नहीं हुआ।
स्थानीय श्रद्धालु इस घटना को बाबा की कृपा से जोड़कर देखते हैं। हालांकि, इस घटना के सटीक विवरण, मलबे के रुकने के स्थान और नुकसान की स्थिति की पुष्टि के लिए उस समय के प्रशासनिक अभिलेखों या अन्य स्वतंत्र स्रोतों की आवश्यकता होगी। इस प्रसंग का उल्लेख स्थानीय आस्था और स्मृतियों के संदर्भ में ही किया जाना चाहिए।
कैंची धाम जाने वाले श्रद्धालु भूमियाधार में क्यों नहीं रुकते?
कैंची धाम की पहचान देश-विदेश में स्थापित हो चुकी है। हर वर्ष बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं, जबकि भूमियाधार का इतिहास और बाबा की आध्यात्मिक यात्रा से उसका संबंध अपेक्षाकृत कम लोगों तक पहुंचा है। इस अंतर का एक कारण यह भी हो सकता है कि कैंची धाम की तरह भूमियाधार के संबंध में मार्ग पर पर्याप्त सूचना-पट्ट और ऐतिहासिक विवरण उपलब्ध नहीं हैं।
दिसंबर 2023 में कुमाऊं आयुक्त दीपक रावत ने भूमियाधार का भ्रमण करते हुए स्थानीय लोगों से बातचीत के बाद इस स्थल के प्रचार-प्रसार की आवश्यकता पर जोर दिया था। यहां सूचना-पट्ट लगाने, पार्किंग और शौचालय जैसी सुविधाओं के विकास की बात भी कही गई थी। इससे स्पष्ट होता है कि भूमियाधार को धार्मिक पर्यटन से जोड़ने का विचार पहले भी सामने आ चुका है।
यदि संबंधित विभाग यहां मंदिर के इतिहास, बाबा की साधना और खुपिया डांठ से जुड़ी लोककथा की जानकारी देने वाले प्रमाणिक सूचना-पट्ट लगाएं, तो यात्रियों को इस स्थल का महत्व समझने में मदद मिल सकती है। खुपिया डांठ के स्थान की पहचान और उससे जुड़ी कथा को भी सावधानीपूर्वक दर्ज किया जा सकता है, ताकि श्रद्धालुओं को केवल मौखिक परंपराओं पर निर्भर न रहना पड़े।
भूमियाधार में सुविधाओं का विकास करते समय यहां की प्राकृतिक शांति और धार्मिक वातावरण को बनाए रखना भी आवश्यक है। उद्देश्य केवल पर्यटकों की संख्या बढ़ाना नहीं, बल्कि इस स्थान के इतिहास और स्थानीय परंपराओं को व्यवस्थित ढंग से सामने लाना होना चाहिए।
भूमियाधार की कहानी कैंची धाम से जुड़ती अवश्य है, लेकिन उसका महत्व केवल कैंची धाम के रास्ते में पड़ने तक सीमित नहीं है। बाबा नीब करौरी महाराज की साधना, हनुमान मंदिर की स्थापना, पूर्णानंद तिवारी से जुड़ी 20 वर्ष पुराने वादे की कथा और स्थानीय लोगों की स्मृतियां इसे नैनीताल क्षेत्र के महत्वपूर्ण धार्मिक स्थलों में स्थान देती हैं।
अब प्रश्न यह है कि क्या भूमियाधार के इतिहास को अधिक व्यवस्थित रूप से श्रद्धालुओं तक पहुंचाया जाना चाहिए? क्या खुपिया डांठ और मंदिर के संबंध में प्रमाणिक जानकारी वाले सूचना-पट्ट लगाए जाने चाहिए, या इस स्थल की शांत प्रकृति को बनाए रखते हुए इसका सीमित प्रचार ही उचित होगा? यह विषय स्थानीय प्रशासन, मंदिर प्रबंधन, इतिहासकारों और श्रद्धालुओं के बीच विचार-विमर्श का आधार बन सकता है।
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डॉ.नवीन जोशी, पिछले 20 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय, ‘कुमाऊँ विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में पीएचडी की डिग्री प्राप्त पहले और वर्ष 2015 से उत्तराखंड सरकार से मान्यता प्राप्त पत्रकार हैं। 15 लाख से अधिक नए उपयोक्ताओं के द्वारा 150 मिलियन यानी 1.5 करोड़ से अधिक बार पढी गई आपकी अपनी पसंदीदा व भरोसेमंद समाचार वेबसाइट ‘नवीन समाचार’ के संपादक हैं, साथ ही राष्ट्रीय सहारा, हिन्दुस्थान समाचार आदि समाचार पत्र एवं समाचार एजेंसियों से भी जुड़े हैं। देश के पत्रकारों के सबसे बड़े संगठन ‘नेशनल यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट्स (इंडिया) उत्तराखंड’ के उत्तराखंड प्रदेश के प्रदेश महामंत्री भी हैं और उत्तराखंड के मान्यता प्राप्त राज्य आंदोलनकारी भी हैं। डॉ. जोशी के बारे में विस्तार से पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।
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