एससी-एसटी अधिनियम पर हाईकोर्ट का बड़ा निर्णय, लोक सेवकों को दिया संरक्षण, कार्रवाई से पहले जांच होगी जरूरी

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नवीन समाचार, नैनीताल, 18 जून 2026 (High Courts Major Ruling onSC-ST Act)। उत्तराखंड (Uttarakhand) के नैनीताल (Nainital) जनपद मुख्यालय से न्यायिक व्यवस्था (Judicial System) और अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण कानून (SC/ST Prevention of Atrocities Act) से जुड़ा महत्वपूर्ण समाचार है। उत्तराखंड उच्च न्यायालय (High Court of Uttarakhand) ने स्पष्ट किया है कि राज्य में किसी भी लोक सेवक (Public Servant) के विरुद्ध अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत अभियोग दर्ज करने से पहले प्रशासनिक जांच कराना अनिवार्य होगा।

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High Courts Major Ruling onSC-ST Act) The SC/ST Act, 1989 protects the rights and dignity of SC and ST  communities—call 14566 for immediate help or to report any atrocity. एससी/ एसटी अधिनियम, 1989 अनुसूचित जाति और जनजाति समुदायों केन्यायालय ने कहा कि बिना प्रशासनिक जांच में आरोपों की पुष्टि और संस्तुति के किसी सरकारी अधिकारी या कर्मचारी के विरुद्ध इस अधिनियम के अंतर्गत कार्रवाई नहीं की जा सकती। इस निर्णय को सरकारी अधिकारियों से जुड़े मामलों में कानूनी प्रक्रिया की दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

उच्च न्यायालय से प्राप्त जानकारी के अनुसार न्यायमूर्ति आलोक मेहरा (Alok Mehra) की एकलपीठ ने तत्कालीन पुलिस क्षेत्राधिकारी भूपेंद्र धोनी (Bhupendra Dhoni) और उप निरीक्षक रमेश बोहरा (Ramesh Bohra) की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश पारित किया। मामला हल्द्वानी (Haldwani) के मुखानी (Mukhani) थाना क्षेत्र से संबंधित है। न्यायालय ने अपने निर्णय में कहा कि किसी भी लोक सेवक के विरुद्ध एससी-एसटी अधिनियम के तहत अभियोग दर्ज करने से पहले प्रशासनिक स्तर पर आरोपों की जांच और उसकी संस्तुति आवश्यक है।

सत्र न्यायालय के आदेश को बताया कानूनी प्रक्रिया के विपरीत

न्यायालय ने कहा कि संबंधित सत्र न्यायालय (Sessions Court) ने बिना किसी प्रशासनिक जांच रिपोर्ट के ही लोक सेवकों के विरुद्ध अभियोग दर्ज करने के निर्देश देकर स्थापित कानूनी प्रक्रिया का पालन नहीं किया। एकलपीठ ने सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India) के विभिन्न निर्णयों में निर्धारित सिद्धांतों का उल्लेख करते हुए कहा कि लोक सेवकों के विरुद्ध कार्रवाई के मामलों में आवश्यक प्रक्रियाओं का पालन किया जाना अनिवार्य है।

इसी आधार पर उच्च न्यायालय ने सत्र न्यायालय के उस आदेश को निरस्त कर दिया, जिसमें संबंधित पुलिस अधिकारियों के विरुद्ध अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति अधिनियम के तहत अभियोग दर्ज करने के निर्देश दिये गये थे। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि प्रशासनिक जांच की संस्तुति के अभाव में ऐसे आदेश विधिक कसौटी पर टिक नहीं सकते।

वर्ष 2024 के परिवाद से जुड़ा है मामला

मामले के अनुसार वर्ष 2024 में नैनीताल की जिला एवं सत्र अदालत (District and Sessions Court Nainital) ने एक महिला के परिवाद पर सुनवाई करते हुए एक युवक के साथ-साथ तत्कालीन पुलिस क्षेत्राधिकारी और मुखानी थाने के तत्कालीन थानाध्यक्ष के विरुद्ध भी एससी-एसटी अधिनियम के तहत अभियोग दर्ज करने के निर्देश दिये थे।

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महिला ने दंड प्रक्रिया संहिता (Code of Criminal Procedure-CRPC) की धारा 156(3) के तहत प्रस्तुत प्रार्थना पत्र में आरोप लगाया था कि उसके साथ जातिसूचक टिप्पणियां की गयीं, दुर्व्यवहार किया गया तथा मारपीट की गयी। हालांकि पुलिस जांच में इन आरोपों की पुष्टि नहीं हुई थी। इसी कारण पुलिस ने अभियोग दर्ज नहीं किया था।

पुलिस अधिकारियों ने उच्च न्यायालय में दी थी चुनौती

सत्र न्यायालय के आदेश के विरुद्ध तत्कालीन पुलिस क्षेत्राधिकारी भूपेंद्र धोनी और उप निरीक्षक रमेश बोहरा ने उच्च न्यायालय में याचिका दायर की थी। याचिकाकर्ताओं की ओर से कहा गया कि बिना प्रशासनिक जांच रिपोर्ट के लोक सेवकों के विरुद्ध अभियोग दर्ज करने के निर्देश देना विधिक प्रक्रिया के अनुरूप नहीं है।

सुनवाई के दौरान न्यायालय ने सभी पक्षों को सुनने के बाद कहा कि अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति अधिनियम का उद्देश्य सामाजिक न्याय और संरक्षण सुनिश्चित करना है, लेकिन साथ ही विधिक प्रक्रिया का पालन भी समान रूप से आवश्यक है। इसलिए लोक सेवकों के विरुद्ध कार्रवाई से पहले प्रशासनिक जांच की प्रक्रिया को अनदेखा नहीं किया जा सकता।

फैसले के व्यापक प्रभाव

कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार यह निर्णय भविष्य में ऐसे मामलों के लिए महत्वपूर्ण नजीर साबित हो सकता है, जिनमें सरकारी अधिकारियों अथवा कर्मचारियों के विरुद्ध एससी-एसटी अधिनियम के तहत कार्रवाई की मांग की जाती है। न्यायालय के इस निर्णय से जांच प्रक्रिया और विधिक परीक्षण को अधिक महत्व मिलने की संभावना है।

विशेषज्ञों का मानना है कि इस निर्णय का उद्देश्य किसी भी पक्ष के अधिकारों को प्रभावित करना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि गंभीर आरोपों से जुड़े मामलों में निर्धारित कानूनी प्रक्रिया का पूर्ण पालन हो। इससे प्रशासनिक जवाबदेही और न्यायिक संतुलन दोनों को मजबूती मिलने की संभावना है। पाठकों से आग्रह है कि इस समाचार से संबंधित अपनी राय और विचार नीचे दिए गए कमेन्ट बॉक्स में अवश्य साझा करें।

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