कुमाउनी रामलीला का इतिहास: 1830 में कुमाऊं नहीं मुरादाबाद से हुई कुमाउनी रामलीला की शुरुआत

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-नृत्य सम्राट उदयशंकर, महामना मदन मोहन मालवीय व भारत रत्न पंडित गोविंद बल्लभ पंत जैसे लोगों का भी रहा है कुमाउनी रामलीला से जुड़ाव डॉ. नवीन जोशी, नैनीताल। उत्तराखंड के कुमाऊं मंडल में होने वाली कुमाउनी रामलीला की अपनी मौलिकता, कलात्मकता, संगीत एवं राग-रागिनियों में निबद्ध होने के कारण देश भर में अलग पहचान है। … Read more

Foreigners : 13 वर्षों से गुजरात में रह रहा संदिग्ध बांग्लादेशी उत्तराखंड से गिरफ्तार

(Half-Burnt Body of a Women Found in the Forest) Friend's brutality, Himakat, Haldwani Vigilance arrested Teacher & Headmaster,

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Enemy Property : उत्तराखंड में अब अरबों की शत्रु संपत्तियों पर कब्जे की तैयारी में सरकार, केंद्र के बाद राज्य सरकार भी गंभीर

नवीन समाचार, देहरादून, 26 अगस्त 2023 (Enemy Property)। देहरादून में मौजूद शत्रु संपत्तियों पर मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने सख्त रुख अख्तियार कर लिया है। उन्होंने डीएम सोनिका को जिले की सभी शत्रु संपत्तियों को कब्जा मुक्त कराकर उन्हें सरकारी जमीन घोषित करने के निर्देश दिए हैं। बताया गया है कि इन शत्रु संपत्तियों की वर्तमान कीमत अरबों रुपये की हैं। उधर नैनीताल जिला मुख्यालय की कम से कम से तीन सहित जिले की कई शत्रु संपत्तियों को लेकर भी जिला प्रशासन सक्रिय बना हुआ है।

अलबत्ता जिला प्रशासन के सामने सबसे बड़ी मुश्किल काबुल के कुछ बड़े जमींदारों की जमीन को लेकर है। बताया गया है कि काबुल के ये जमींदार दून में दिलाराम, सर्वे चौक, कमिश्नरी कार्यालय, ईसी रोड, आईएसबीटी के पास, राजपुर रोड, मसूरी, माजरा, चकराता में आकर बस गए थे, लेकिन बंटवारे के बाद अपनी हजारों बीघा जमीन को छोड़कर पाकिस्तान चले गए। अब कुछ लोग खुद को जमींदारों का रिश्तेदार बताकर इन जमीनों पर अपना दावा ठोक रहे हैं। हालांकि राज्य सरकार का कहना है कि यह सभी जमीनें शत्रु संपत्ति हैं। लेकिन, जिला प्रशासन इन पर कब्जा नहीं ले पा रहा है।

यह भी बताया गया है कि इन जमीनों पर लोगों ने अवैध कब्जे किए हुए हैं। फर्जी रजिस्ट्री और स्टांप घोटालों की जांच में जुटे प्रशासन को ऐसी जमीनों को हेराफेरी कर सरकारी दस्तावेजों में चढ़ाने की जानकारी मिली है। ऐसे में इसकी जांच की जा रही है। इससे पहले भी एक तहसीलदार की भूमिका संदिग्ध मिलने पर कमिश्नर के आदेश पर शत्रु संपत्तियों को नगर निगम के दस्तावेजों में चढ़ने से रोक लिया गया था।

इधर बताया गया है कि उत्तराखंड में शत्रु संपत्ति को लेकर केंद्र सरकार भी गंभीर है। गृह मंत्रालय ने भी शत्रु संपत्तियों पर कब्जा लेने के आदेश दे रखे हैं और मंत्रालय लगातार इसकी निगारानी भी कर रहा है। अब सीएम पुष्कर सिंह धामी ने शत्रु संपत्ति मामले में सख्त रुख अपनाकर डीएम सोनिका को इन संपत्तियों को अपने कब्जे में लेकर उनकी चारदीवारी कराने के निर्देश दिए हैं। सीएम ने इन जगहों पर बोर्ड लगाकर इनका जनहित में प्रयोग करने के लिए कहा है।

मामले में डीएम सोनिका ने बताया कि शत्रु संपत्तियों को लेकर जिला प्रशासन लगातार काम कर रहा है, चिह्नित जमीनों पर कब्जे लिए जा रहे हैं, कई मामले एडीएम प्रशासन के कोर्ट में लंबित हैं, उन पर सुनवाई चल रही है, जल्द फैसला आते ही ऐसी जमीनों पर कब्जा लिया जाएगा, शेष जमीनों पर कब्जे की प्रक्रिया चल रही है।

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-शत्रु संपत्तियों का कुल मूल्य एक लाख करोड़ रुपए से ज्यादा, इन संपत्तियों और 3000 करोड़ रुपए मूल्य की शत्रु हिस्सेदारी को बेचने का प्रयास कर रही है केंद्र सरकार
नवीन समाचार,  नई दिल्ली , 12 मार्च 2019। केंद्र सरकार ने बंटवारे के बाद पाकिस्तान चले गए या फिर 1962 के भारत-चीन युद्ध के बाद चीन चले गए लोगों द्वारा छोड़ी गई कुछ शत्रु संपत्तियों के सार्वजनिक इस्तेमाल की इजाजत राज्य सरकारों को दे दी है। यह कदम केंद्र सरकार के उन प्रयासों के बीच आया है जिसके तहत वह एक लाख करोड़ रुपए से ज्यादा मूल्य की 9,400 शत्रु संपत्तियों और 3000 करोड़ रुपए मूल्य की शत्रु हिस्सेदारी को बेचने का प्रयास कर रही है।

गृह मंत्रालय द्वारा जारी की गई अधिसूचना के मुताबिक शत्रु संपत्ति आदेश, 2018 के निस्तारण के लिये दिशानिर्देशों में संशोधन किया गया है जिससे राज्य सरकार द्वारा शत्रु संपत्ति का इस्तेमाल खास तौर पर सार्वजनिक इस्तेमाल के लिए किया जा सके। शत्रु संपत्तियां वो संपत्तियां हैं जो उन लोगों द्वारा पीछे छोड़ी गईं जिन्होंने पाकिस्तान और चीन की नागरिकता ले ली। मंत्रालय के एक अधिकारी ने कहा कि पाकिस्तानी नागरिकों की ऐसी 9,280 संपत्तियां हैं जबकि चीनी नागरिकों द्वारा 126 संपत्तियां यहां छोड़ी गई हैं।

पाकिस्तानी नागरिकता लेने वाले लोगों द्वारा छोड़ी गई संपत्तियों में से 4,991 उत्तर प्रदेश में स्थित हैं जो देश में सबसे ज्यादा हैं। पश्चिम बंगाल में ऐसी 2,735 संपत्तियां हैं जबकि दिल्ली में 487 संपत्तियां हैं। चीनी नागरिकों द्वारा छोड़ी गई सबसे ज्यादा संपत्तियां मेघालय में हैं जहां ऐसी 57 संपत्तियां हैं। पश्चिम बंगाल में ऐसी 29 और असम में सात संपत्तियां हैं। केंद्रीय गृह राज्य मंत्री हंसराज गंगाराम अहीर ने पिछले साल राज्यसभा को बताया था कि शत्रु संपत्तियों का अनुमानित मूल्य लगभग एक लाख करोड़ रुपए है।

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Rashtriya Sahara 13 January 2016 Page-1
राष्ट्रीय सहारा, 13 जनवरी 2016, पेज-1
  • करीब 50 हजार करोड़ की सपंत्ति के मालिक थे राजा अमीर मोहम्मद खान
  • 14 मार्च 2017  को संसद में ध्वनिमत से पारित हुआ 49 वर्ष पुराने शत्रु संपत्ति कानून में संशोधन संबंधी विधेयक
  • नैनीताल में करोड़ों का होटल, यूपी व उत्तराखंड में हैं खरबों रुपये की संपत्तियां

डॉ. नवीन जोशी, नैनीताल। करीब 50 हजार करोड़ यानी करीब पांच खरब रुपये की शत्रु संपत्ति के मालिक ‘राजा महमूदाबाद’ यानी राजा अमीर मोहम्मद खान एक पल में ‘‘रंक’ जैसी स्थिति में पहुंच गये हैं। ऐसा संसद में पास हुए विधेयक के बाद हुआ है। केंद्र सरकार की ओर से 49 साल पुराने 1968 में बने सरकारी स्थान (अप्राधित अधिभोगियों की बेदखली) अधिनियम 1971 कानून में संशोधन संबंधी विधेयक को मंगलवार को ध्वनिमत से पारित किया गया।

इस संशोधन विधेयक के लागू हो जाने से बंटवारे के समय पाकिस्तान चले गए अथवा 1965 और 1971 के युद्ध के बाद पाकिस्तान की नागरिकता ले चुके लोग भारत में अपनी संपत्तियों (जिन्हें शत्रु संपत्ति) कहा जाता है, का हस्तांतरण नहीं कर सकेंगे।नए विधेयक से राजा महमूदाबाद को सर्वाधिक मुश्किलें होनी तय हैं, जिनकी नैनीताल में करोड़ों के 1870 में निर्मित बताये जाने वाले मेट्रोपोल होटल व अन्य भूसंपत्ति सहित करीब 50 हजार करोड़ रुपये की सहित उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश में 10 सितम्बर 1965 में शत्रु संपत्ति घोषित देश की कुल 1519 में से करीब 936 संपत्तियां हैं।

ताजा विधेयक के अनुसार उनकी संपत्तियां संबंधित जिले के डीएम के अधिकार में चली जाएंगी। विधेयक की एक धारा के अनुसार इन शत्रु संपत्तियों पर काबिज लोगों को मालिकाना हक मिलने की बात भी कही जा रही है। इसलिए काबिज लोगों के लिए राहत भरी खबर हो सकती है। अलबत्ता केंद्र सरकार के इस विधेयक के बावजूद यह मामला आगे भी विवादों में रह सकता है, क्योंकि आगे राष्ट्रपति द्वारा हस्ताक्षर होने और विधेयक के कानून बनने के बावजूद संबंधित पक्षों को सर्वोच्च न्यायालय जाने का समय दिया जा रहा है, तथा सर्वोच्च न्यायालय में पहले से भी कई वाद लंबित हैं।

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📸🌍 19 अगस्त विश्व फोटोग्राफी दिवस पर विशेष: ‘फोटोजेनिक’ नैनीताल के साथ ही जन्मी फोटोग्राफी, साथ में पढ़ें फोटोग्राफी की पूरी जानकारी भी….

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डॉ. नवीन जोशी @ नवीन समाचार, नैनीताल, 18 अगस्त 2025 (19 August World Photography Day-History-Details)। हर कोण से एक अलग सुंदरता के लिए पहचानी जाने वाली और इस लिहाज से ‘फोटोजेनिक’ कही जाने वाली सरोवरनगरी नैनीताल के साथ यह संयोग ही है कि जिस वर्ष 1839 में अंग्रेज व्यापारी पीटर बैरन द्वारा पहली बार नैनीताल … Read more

उत्तराखण्ड की पत्रकारिता का इतिहास

Vishesh Aalekh Special Article Navin Samachar

डॉ. नवीन जोशी @ नवीन समाचार, नैनीताल (History of Journalism in Uttarakhand)। आदि-अनादि काल से वैदिक ऋचाओं की जन्मदात्री उर्वरा धरा रही देवभूमि उत्तराखण्ड में पत्रकारिता का गौरवपूर्ण अतीत रहा है। कहते हैं कि यहीं ऋषि-मुनियों के अंतर्मन में सर्वप्रथम ज्ञानोदय हुआ था। बाद के वर्षों में आर्थिक रूप से पिछड़ने के बावजूद उत्तराखंड बौद्धिक सम्पदा के मामले में हमेशा समृद्ध रहा। शायद यही कारण हो कि आधुनिक दौर के ‘जल्दी में लिखे जाने वाले साहित्य की विधा-पत्रकारिता’ का बीज देश में अंकुरित होने के साथ ही यहां के सुदूर गिरि-गह्वरों तक भी विरोध के स्वरों के रूप में पहुंच गया।

Gumani Pant or Lokratn or Loknath | Biography | Real Name | Poems | गुमानी  पंत व लोकरत्न व लोकनाथ | जीवनी | परिचय | रचनाएँकुमाउनी के आदि कवि गुमानी पंत (जन्म 1790-मृत्यु 1846, रचनाकाल 1810 ईसवी से) ने अंग्रेजों के यहां आने से पूर्व ही 1790 से 1815 तक सत्तासीन रहे महा दमनकारी गोरखों के खिलाफ कुमाउनी के साथ ही हिंदी की खड़ी बोली में कलम चलाकर एक तरह से पत्रकारिता का धर्म निभाना प्रारंभ कर दिया था। इस आधार पर उन्हें अनेक भाषाविदों के द्वारा उनके स्वर्गवास के चार वर्ष बाद उदित हुए ‘आधुनिक हिन्दी के पहले रचनाकार’ भारतेंदु हरिश्चंद्र (जन्म 1850-मृत्यु 1885) से आधी सदी पहले का पहला व आदि हिंदी कवि भी कहा जाता है।

हालांकि समाचार पत्रों का प्रकाशन यहां काफी देर में 1842 में अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित ‘द हिल्स’ नामक उत्तरी भारत के पहले समाचार पत्र के साथ शुरू हुआ, लेकिन 1868 में जब भारतेंदु हिंदी में लिखना प्रारंभ कर रहे थे, नैनीताल से ‘समय विनोद’ नामक पहले देशी (हिंदी-उर्दू) पाक्षिक पत्र ने प्रकाशित होकर एक तरह से हिंदी पत्रकारिता का छोर शुरू में ही पकड़ लिया। यह संयोग ही है कि आगे 1953 में उत्तराखंड का पहला हिंदी दैनिक अखबार ‘पर्वतीय’ भी नैनीताल से ही प्रकाशित हुआ।

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नैनीताल में ऐसे मनाया गया था 15 अगस्त 1947 को पहला स्वतंत्रता दिवस, जिम कार्बेट सहित यह 67 लोग थे खास..

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नैनीताल क्लब में बिजली के तारों और वाहनों पर गिरा विशाल पेड़…

डॉ. नवीन जोशी @ नवीन समाचार, नैनीताल, 25 जुलाई 2022। सोमवार शाक करीब सात बजे बिन वर्षा के ही राज्य अतिथि गृह नैनीताल क्लब में एक पूर्व से पॉपुलर के सूखे पेड़ की विशाल पेड़ का मोटा हिस्सा टूट कर बिजली के तारों और वहां खड़े वाहनों के ऊपर गिर गया। इससे पूरे क्षेत्र की … Read more

नैनीताल के पर्यटन व्यवसायियों से मिले राज्यपाल, वीआईपी कल्चर को हतोत्साहित करने की मांग भी उठाई, राजभवन में पहली बार हवन-यज्ञ !

डॉ. नवीन जोशी @ नवीन समाचार, नैनीताल, 8 जून 2022। उत्तराखंड के राज्यपाल सेवानिवृत्त लेफ्टिनेंट जनरल गुरमीत सिंह ने बुधवार को नैनीताल राजभवन में नैनीताल के होटल एसोसिएशन, व्यापार मंडल और बोट हाउस क्लब के पदाधिकारियों के साथ बैठक की। बैठक में नैनीताल में पर्यटकों की बढ़ती संख्या के अनुरूप अवस्थापना सुविधाओं की स्थापना से … Read more

हर्षोल्लास से मनाई गई बाबा साहेब की जयंती

डॉ. नवीन जोशी @ नवीन समाचार, नैनीताल, 14 अप्रैल 2022। संविधान निर्माता बाबा साहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर की 131वीं जयंती गुरुवार को देश-प्रदेश के साथ जिला व मंडल मुख्यालय में भी हर्षोल्लास से मनाई गई। इस अवसर पर यहां राजनीतिक और सामाजिक संगठनों के लोगों ने बाबा साहेब की तल्लीताल दर्शन घर पार्क स्थित विशाल … Read more

Aastha-Vigyan : आधुनिक विज्ञान से कहीं अधिक समृद्ध और प्रामाणिक था प्राचीन भारतीय ज्ञान

डॉ. नवीन जोशी @ नवीन समाचार, नैनीताल (Aastha-Vigyan)। विज्ञान के वर्तमान दौर में आस्था व विश्वास को अंधविश्वास कहे जाने का चलन चल पड़ा है। आस्था और विज्ञान को एक दूसरे का बिल्कुल उलट-विरोधाभाषी कहा जा रहा है। यानी जो विज्ञान नहीं है, वैज्ञानिक नियमों और आज के वैज्ञानिक दौर के उपकरणों से संचालित नहीं … Read more

बड़ा समाचार: कोरोना महामारी के चलते उत्तराखंड के राष्ट्रीय स्मारक आम लोगों के लिये बंद

रवींद्र देवलियाल @ नवीन समाचार, नैनीताल, 18 अप्रैल 2021। केन्द्र सरकार की ओर से कोरोना महामारी के प्रभावी रोकथाम के दृष्टिगत उत्तराखंड के समस्त राष्ट्रीय स्मारकों व पुरास्थलों को पर्यटकों व आम लोगों के लिये बंद कर दिया गया है। फिलहाल 15 मई तक इन पर रोक रहेगी। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) की ओर से … Read more

नैनीताल विंटर कार्निवाल पर बड़ा समाचार

नवीन समाचार, नैनीताल, 22 दिसम्बर 2020। जनपद नैनीताल में आगामी 26 दिसम्बर से 30 दिसम्बर तक आयोजित होने वाला विंटर कार्निवाल स्थगित कर दिया गया है। जानकारी देते हुये नैनीताल महोत्सव समिति के सचिव जिला पर्यटन विकास अधिकारी अरविंद कुमार गौड़ ने बताया है कि विंटर कार्निवाल 2020 के आयोजन हेतु आयोजन समिति के तकनीकी … Read more

देश के लिए जान लुटाने वाले सेनानियों के आश्रितों को मात्र 4 हजार की कुटुंब पेंशन हास्यास्पद

-अपनी समस्याओं को लेकर मंडलायुक्त से मिले स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के आश्रित

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मंडलायुक्त को ज्ञापन सोंपते अखिल भारतीय स्वतंत्रता संग्राम सेनानी उत्तराधिकारी समिति संगठन के सदस्य।

डॉ. नवीन जोशी @ नवीन समाचार, नैनीताल, 9 दिसंबर 2021। स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के आश्रितों का एक शिष्टमंडल बृहस्पतिवार को अखिल भारतीय स्वतंत्रता संग्राम सेनानी उत्तराधिकारी समिति संगठन के बैनर तले कुमाऊं मंडल के आयुक्त दीपक रावत से मिला। सदस्यों ने बताया कि स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के आश्रितों को वर्ष 2018 से उत्तराखंड सरकार के द्वारा चार हजार रुपए की कुटुंब पेंशन दिए जाने का प्राविधान किया गया है।

हास्यास्पद है कि यह पेंशन स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के सभी आश्रितों में बंटनी है। यानी यदि किसी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी के 4 आश्रित हों तो सबको 1-1 हजार रुपए या 8 आश्रित होने पर 500-500 रुपए पेंशन मिलेगी। इसके बावजूद कई शर्ताें के कारण यह पेंशन भी पात्रों को नहीं मिल पा रही है।

इस दौरान स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के प्रथम पीढ़ी के आश्रितों को स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की भांति सुविधाएं एवं द्वितीय पीढ़ी के आश्रितों को भी प्रथम पीढ़ी के आश्रितों की भांति सुविधाएं देने, पूर्व में हो चुकी घोषणा के अनुरूप कुटुंब पेंशन की धनराशि 4 हजार को बढ़ाकर 10 हजार करने का शासनादेश जारी करने, बस के साथ रेलयात्रा की सुविधा भी देने, शिक्षा व नौकरी में 3 की जगह 5 फीसद आरक्षण दने, उत्तराधिकारी की बेटी की बेटियों को भी भी विवाह हेतु 50 हजार रुपए की धनराशि अनुदान स्वरूप देने तथा भूमिहीन उत्तराधिकारियों को शासनादेश के अनुरूप 100 वर्ग मीटर भूमि निःशुल्क आवंटित करने की मागें भी उठाई गई।

शिष्टमंडल में संगठन की संयोजक अनुपम उपाध्याय, जिलाध्यक्ष उमेश जोशी, महिला अध्यक्ष डॉ. सरिता कैड़ा, महिला उपाध्यक्ष बीना उप्रेती, पवन बिष्ट, आनंद जोशी व आकांक्षा उप्रेती आदि शामिल रहे।

2017-18 की इंटर उत्तीर्ण बालिकाओं को सिर्फ 5000 कन्याधन, अन्य को 51 हजार
नैनीताल। वार्ता के दौरान समस्या रखे जाने पर मंडलायुक्त दीपक रावत ने जिला कार्यक्रम अधिकारी वे वार्ता कर स्पष्ट किया कि 2017 व 2018 में इंटरमीडिएट उत्तीर्ण करने वाली बालिकाओं को केवल 5000 रुपए ही नंदा गौरा कन्याधन योजना के तहत मिलेगा, जबकि इससे पूर्व व बाद के वर्षों की बालिकाओं को 51 हजार रुपए कन्याधन दिया जा रहा है। माना गया कि यह इन बालिकाओं के साथ अन्याय जैसा है।

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-सोते हुए घर से गिरफ्तार किये गये, यातनाएं झेलीं, फिर भी अपनी सरकार ने भी नहीं दिया सम्मान-मान्यता
नवीन जोशी @ नवीन समाचार, नैनीताल, 25 जून 2020। 25 जून 1975 की मध्य रात्रि से 21 मार्च 1977 के बीच लगे आपातकाल के भारतीय लोकतंत्र के सर्वाधिक काले इतिहास दौर की भेंट चढ़ने वालों के जख्म हर वर्ष 25 जून को हरे हो जाते हैं। सरोवरनगरी के भी दो ऐसे वयोवृद्ध लोग हैं, जिन्होंने लोकतंत्र की हत्या होते न केवल अपनी आंखों से देखा, वरन इसके भुक्तभोगी भी बने। पुलिस द्वारा रात्रि में सोते हुए पकड़े गए। दो रात हवालात में रखकर पीटे गए। जेल जाने पर जमानत के लिए आवेदन किया तो न्यायालयों में भी व्याप्त हो चला भ्रष्टाचार झेला। किसी तरह जमानत मिली तो जमानती भी इसलिए नहीं मिले कि संबंध होने के आरोप में कहीं पुलिस उन्हें भी गिरफ्तार न कर ले। इसी कारण ना ही गिरफ्तार होने पर घर वालों की और ना ही जेल से छूटने के बाद उनकी कुशल क्षेम पूछने ही कोई परिचित-पड़ोसी आया। इसी कारण लंबे समय तक लोग उनकी दुकान पर भी नहीं आते थे। इतनी परेशानियां झेलीं तो स्वप्न देखते थे कि कभी अपनी सरकार भी आएगी। अपनी सरकार आई और है भी, लेकिन उसने भी ठुकरा दिया। कभी ताम्रपत्र देने की बात हुई। कभी लोकतंत्र सेनानी घोषित करने का ख्वाब दिखाया। लेकिन नतीजा सिफर। फलस्वरूप लोकतंत्र के ये सेनानी आज भी उन स्थितियों से उबर नहीं पा रहे हैं। अपनी ही सरकार में भी हताश-निराश हैं।

यह कहानी मुख्यालय निवासी भारतीय जनता पार्टी के पूर्व जिलाध्यक्ष रहे भुवन चंद्र हरबोला एवं आरएसएस के कामेश्वर प्रसाद काला की है। हरबोला को 16 नवंबर 1975 को किराये के घर में सोते हुए हल्की पूछताछ के नाम पर मल्लीताल कोतवाली के गब्बर सिंह कहे जाने वाले तत्कालीन थाना प्रभारी ने की थी। उन्हें एक रात मल्लीताल और एक रात तल्लीताल थाने में रखा गया और 18 नवंबर को हल्द्वानी जेल भेजा गया, जबकि काला 1 दिसंबर को हल्द्वानी में सरकार विरोधी एक रैली के दौरान गिरफ्तार हुए। दोनों संघ के स्वयं सेवक थे। इसलिए सरकार उनके पीछे लगी थी। संघ के बड़े अधिकारियों ने उन्हें जल्दी जमानत ले लेने की सलाह दी, ताकि वे संघ की शाखाएं लगाने जैसी अपनी गतिविधियों को जारी रख सकें। इसलिए दोनों करीब एक सप्ताह जेल में रहकर जमानत पर बाहर आ गये। लेकिन न्यायालय में मुकदमा 21 मार्च 1977 को जनता पार्टी की सरकार आने तक चलता रहा। 1977 के चुनाव में देश के साथ नैनीताल लोक सभा में भी इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस पार्टी को भारतीय लोकदल के  एक गुमनाम से चेहरे भारत भूषण ने पटखनी दे दी थी। श्री काला बताते हैं, जेल से आने पर भी कोई उनके घर की सीढ़ियां चढ़ने को तैयार नहीं था, क्योंकि लोग डरते थे कि उन्हें भी पकड़ लिया जाएगा। वहीं हरबोला बताते हैं जेल से छूटने के बाद भी पुलिस-प्रशासन उन्हें फिर से किसी तरह अंदर करने की जुगत में था। इसलिए वे एक दिन अपने भाई के साथ नैनीताल की बिड़ला चुंगी से होते हुए पैदल जंगल के रास्ते रातीघाट होते हुए जनपद से बाहर निकल गये थे। उन्होंने कहा कि आपातकाल के दौरान जेल में गये गिने-चुने लोग ही बचे हैं, फिर भी सरकार की मंशा उन्हें किसी तरह की मान्यता-सम्मान देने की नहीं है। इससे वे निराश और हताश हैं।

उत्तराखंड सरकार की योजना का लाभ नहीं मिला

नैनीताल। विगत वर्षों में उत्तराखंड सरकार ने आपातकाल के दौरान डीआईआर यानी ‘डिफेंस इंडिया रूल्स’ से इतर मीसायानी ‘मेन्टीनेंस ऑफ इंटरनल सिक्योरिटी एक्ट’ में जेल गये ‘लोकतंत्र सेनानियों’ को प्रतिमाह 16 हजार रुपये की पेंशन देने की घोषणा की थी। इस पर नैनीताल जनपद में ऐसे लोगों की पड़ताल की गयी, तो तत्कालीन संयुक्त नैनीताल जिले के कुल 10 लोगों की पहचान हुई, जिनमें से पांच लोग वर्तमान में भी नैनीताल जिले और शेष पांच अब ऊधमसिंह नगर के हिस्से के निवासी मिले। सरकारी रिपोर्टों के अनुसार नैनीताल जिले के मौजूदा निवासी बताये गये पांच में से तीन लोगों की मृत्यु हो चुकी थी, जबकि शेष दो अपने पतों पर मिल नहीं पाये। अलबत्ता जिला प्रशासन के प्रयासों से अन्य जिलों से भी नैनीताल जनपद व खासकर हल्द्वानी में आ बसे कुल 9 लोगों ने आवेदन किये। इनमें हरबोला और काला भी शामिल रहे, लेकिन निर्धारित से कम अवधि जेल में रहने के कारण उन्हें योजना का लाभ नहीं मिला।

कोश्यारी, त्रिपाठी, शर्मा सहित उत्तराखंड के 325 सेनानी गये आपातकाल में जेल

नैनीताल। आपातकाल में उत्तराखंड के 325 लोगों को डीआईआर यानी ‘डिफेंस इंडिया रूल्स’ एवं मीसा यानी ‘मेन्टीनेंस ऑफ इंटरनल सिक्योरिटी एक्ट’ के जेलों में ठूंसा गया। इनमें पूर्व मुख्यमंत्री व मौजूदा महाराष्ट्र के राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी, पूर्व विधायक अधिवक्ता गोविंद सिंह, भाजपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष पूरन चंद्र शर्मा, उत्तराखंड क्रांति दल के संस्थापक सदस्य व विधायक विपिन चंद्र त्रिपाठी जैसे वरिष्ठ नेता भी शामिल रहे।

सर्वाधिक 116 सेनानी ठूंसे गये हल्द्वानी जेल में

नैनीताल। आपातकाल के दौरान उत्तराखंड के जिन 325 लोगों को जेलों में ठूंसा गया, उनमें से सर्वाधिक 116 को नैनीताल जिले के हल्द्वानी उप कारागार में, 81 को नैनीताल जिला कारागार में, 52 को देहरादून की जेल में, 39 को अल्मोड़ा जिला जेल में, 29 को रुड़की जेल में और चार को टिहरी जेल में डाला गया था।

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-नैनीताल जनपद से पहले 9 लोगों ने किया था आवेदन, इनमें से 7 को 1 वर्ष की पेंशन जारी, 2 के मामले में फिर से मांगी गयी है जांच रिपोर्ट, 2 नये आवेदन भी आये
नवीन जोशी, नैनीताल। उत्तराखंड सरकार ने 1975-77 के दौर में लगे आपातकाल के दौर में जेलों में ठूंस दिये गये ‘लोकतंत्र सेनानियों’ की सुध लेने में देर से ही सही लेकिन पहल कर दी है। कमोबेश बिना कारण झेली गयी उन भयावह यातनाओं को चार दशक से अधिक समय बीत जाने के बाद ‘लोकतंत्र सेनानियों’ को प्रतिमाह 16 हजार रुपये की पेंशन देने की घोषणा हुई है, जिसके बाद जनपद में जीवित बचे 10 में से 9 लोकतंत्र सेनानियों ने यह दर्जा व पेंशन हासिल करने के लिए आवेदन किया था। अलबत्ता, नैनीताल के पूर्व भाजपा जिलाध्यक्ष भुवन चंद्र हरबोला एवं वयोवृद्ध आरएसएस नेता कामेश्वर प्रसाद काला को छोड़कर शेष 7 लोगों को बीते माह पेंशन स्वीकृत होने के साथ ही 1 वर्ष की एकमुश्त जारी हो गयी है। वहीं इधर 2 नए लोगों ने भी बीते माह आवेदन कर दिये हैं। नैनीताल मुख्यालय निवासी इन दो लोकतंत्र सेनानियों के बारे में शासन ने फिर से जांच रिपोर्ट जिला प्रशासन से मांगी है।

उल्लेखनीय है कि 25 जून 1975 की मध्य रात्रि से 21 मार्च 1977 के बीच देश में लगे आपातकाल के दौर में देश भर के साथ उत्तराखंड राज्य के लोगों को भी तत्कालीन इंदिरा गांधी की अगुवाई वाली केंद्र सरकार के आंखों में वैचारिक तौर पर खटकने भर से जेलों में ठूंस दिया गया था। इधर इस वर्ष राज्य सरकार ने आपातकाल के दौरान डीआईआर यानी ‘डिफेंस इंडिया रूल्स’ से इतर मीसायानी ‘मेन्टीनेंस ऑफ इंटरनल सिक्योरिटी एक्ट’ में जेल गये ‘लोकतंत्र सेनानियों’ को प्रतिमाह 16 हजार रुपये की पेंशन देने की घोषणा की थी। इस पर नैनीताल जनपद में ऐसे लोगों की पड़ताल की गयी, तो तत्कालीन संयुक्त नैनीताल जिले के कुल 10 लोगों की पहचान हुई, जिनमें से पांच लोग वर्तमान में भी नैनीताल जिले और शेष पांच अब ऊधम सिंह नगर के हिस्से के निवासी हैं। सरकारी रिपोर्टों के अनुसार नैनीताल जिले के मौजूदा निवासी बताये गये पांच में से तीन लोगों की मृत्यु हो चुकी है, जबकि शेष दो अपने पतों पर मिल नहीं पाये। अलबत्ता जिला प्रशासन के प्रयासों से अन्य जिलों से भी नैनीताल जनपद व खासकर हल्द्वानी में आ बसे कुल 9 लोगों ने आवेदन किये हैं।

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