क्या केवल शराब की गंध से नशे में माना जा सकता है? उपनल संविदा कर्मचारियों की अवमानना याचिका, रोडवेज कर्मचारियों के वेतन कटौती व वृद्ध आश्रितों को सुविधाएं उपलब्ध कराने वाली याचिकाओं पर हाई कोर्ट के बड़े निर्देश-फैसले

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केवल शराब की गंध के आधार पर नशे में वाहन चलाने का आरोप सिद्ध नहीं माना जा सकता : उच्च न्यायालय

नवीन समाचार, नैनीताल, 15 जुलाई 2026 (UK High Court News 15 July 2026)। उत्तराखंड उच्च न्यायालय (Uttarakhand High Court) ने महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया है कि केवल किसी व्यक्ति के मुंह से शराब की गंध आने के आधार पर उसे नशे की स्थिति में वाहन चलाने का दोषी नहीं माना जा सकता। न्यायालय ने कहा कि रक्त परीक्षण अथवा ब्रेथ एनालाइजर (Breath Analyzer) जांच के माध्यम से यह वैज्ञानिक रूप से सिद्ध होना आवश्यक है कि चालक के रक्त में मोटर वाहन अधिनियम, 1988 (Motor Vehicles Act, 1988) की धारा 185 में निर्धारित सीमा से अधिक शराब मौजूद थी। ऐसी जांच के अभाव में भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 105 के अंतर्गत आरोप निर्धारित नहीं किए जा सकते।

UK High Court News 15 July 2026 एल्कोमीटर से जांच कराना बड़ा खतरा : जोगेश लांबान्यायमूर्ति आलोक मेहरा की एकलपीठ ने आपराधिक पुनरीक्षण याचिका पर सुनवाई करते हुए सत्र न्यायालय के उस आदेश को आंशिक रूप से निरस्त कर दिया, जिसमें याचिकाकर्ता के विरुद्ध भारतीय न्याय संहिता की धारा 105, 125(क), 125(ख) तथा 281 के अंतर्गत आरोप निर्धारित किए गए थे।

प्रकरण के अनुसार याचिकाकर्ता अमर सिंह बदरीनाथ धाम (Badrinath Dham) से चमोली (Chamoli) की ओर जीप चला रहा था। आरोप है कि वाहन अनियंत्रित होकर पलट गया, जिससे कई यात्री घायल हो गये तथा एक यात्री की मृत्यु हो गई। दुर्घटना के बाद चिकित्सकीय परीक्षण में चालक के मुंह से शराब की गंध आने का उल्लेख किया गया, लेकिन न तो उसका रक्त परीक्षण कराया गया और न ही ब्रेथ एनालाइजर जांच की गई।

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याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया कि मोटर वाहन अधिनियम की धारा 185 के अनुसार किसी व्यक्ति को नशे की स्थिति में वाहन चलाने वाला तभी माना जा सकता है, जब वैज्ञानिक जांच से यह सिद्ध हो कि उसके प्रति 100 मिलीलीटर रक्त में 30 मिलीग्राम से अधिक अल्कोहल मौजूद थी। यह भी कहा गया कि दुर्घटना चालक की लापरवाही से नहीं, बल्कि वाहन के अगले बाएं टायर के फट जाने के कारण हुई थी।

उच्च न्यायालय ने माना कि चिकित्सकीय परीक्षण में शराब की गंध का उल्लेख अवश्य है, किंतु वैज्ञानिक परीक्षण के अभाव में धारा 105 के अंतर्गत प्रथम दृष्टया आवश्यक तत्व सिद्ध नहीं होते। हालांकि न्यायालय ने भारतीय न्याय संहिता की धारा 125(क), 125(ख) एवं 281 के अंतर्गत निर्धारित आरोप यथावत बनाए रखे हैं।

उपनल संविदा कर्मचारियों की अवमानना याचिका पर तीन सप्ताह बाद होगी अगली सुनवाई

उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने सरकारी विभागों में वर्षों से कार्यरत उपनल (UPNL) संविदा कर्मचारियों के नियमितीकरण, चयनित वेतनमान लागू न किए जाने तथा वेतन से जीएसटी कटौती के मामले में दायर अवमानना याचिका पर सुनवाई की।

सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से सर्वोच्च न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता तुषार मेहता ने कहा कि वह पहली बार इस प्रकरण में उपस्थित हुए हैं और उन्हें अभिलेखों का अध्ययन करने के लिए समय दिया जाए। इस पर न्यायालय ने तीन सप्ताह का समय प्रदान करते हुए अगली सुनवाई तीन सप्ताह बाद निर्धारित की। मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति राकेश थपलियाल की एकलपीठ में हुई।

रोडवेज कर्मचारियों के वेतन कटौती प्रकरण में प्रबंधन को तीन सप्ताह में जवाब देने के निर्देश

उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने रोडवेज कर्मचारियों के वेतन से की जा रही कटौती तथा कटौती की गई अंशदान धनराशि संबंधित सोसाइटी में जमा नहीं किए जाने के मामले में रोडवेज प्रबंधन को तीन सप्ताह के भीतर जवाब प्रस्तुत करने के निर्देश दिए हैं।

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रोडवेज कर्मचारी यूनियन तथा रोडवेज कर्मचारी संयुक्त परिषद की ओर से दायर प्रार्थना पत्र पर मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति मनोज कुमार गुप्ता एवं न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की खंडपीठ ने सुनवाई की।

वृद्ध आश्रितों को सुविधाएं उपलब्ध कराने संबंधी जनहित याचिका पर राज्य सरकार से चार सप्ताह में जवाब तलब

उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने वृद्ध आश्रित व्यक्तियों को आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध नहीं कराए जाने संबंधी जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए राज्य सरकार से चार सप्ताह के भीतर जवाब प्रस्तुत करने को कहा है।

मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति मनोज कुमार गुप्ता एवं न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की खंडपीठ ने राज्य सरकार से वृद्धजनों की देखभाल एवं सुरक्षा के लिए उठाए गए कदमों का विस्तृत विवरण प्रस्तुत करने के निर्देश दिए हैं।

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