अंग्रेजों के जमाने में प्रस्तावित किशाऊ बांध परियोजना अब धरातल पर उतरेगी, 86 साल बाद छह राज्यों में बनी सहमति, उत्तराखंड-हिमाचल के 17 गांव होंगे प्रभावित

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नवीन समाचार, नई दिल्ली, 15 सितंबर 2026 (Kishau Dam Project-MOU in 6 States)। उत्तराखंड (Uttarakhand) और हिमाचल प्रदेश (Himachal Pradesh) की सीमा पर टोंस नदी (Tons River) पर अंग्रेजों के जमाने में प्रस्तावित किशाऊ बहुउद्देशीय बांध परियोजना (Kishau Multipurpose Dam Project) को लेकर छह राज्यों के बीच अब आजादी के 8 दशक बाद महत्वपूर्ण समझौता हुआ है।

मंगलवार को नई दिल्ली (New Delhi) में केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह (Amit Shah) की मौजूदगी में उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, उत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh), राजस्थान (Rajasthan), दिल्ली (Delhi) और हरियाणा (Haryana) के मुख्यमंत्रियों ने परियोजना समझौते पर हस्ताक्षर किये। लगभग 86 वर्ष पुरानी इस परियोजना के आगे बढ़ने से कई राज्यों की जल जरूरतों को पूरा करने की उम्मीद है, हालांकि उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश के 17 गांवों के प्रभावित होने और विस्थापन की चुनौती भी सामने है।

86 साल पुराने प्रोजेक्ट की पूरी कहानी और अब आगे की राह

Kishau Dam Project-MOU in 6 States सिरमौर:किशाऊ बांध परियोजना की डीपीआर बनाने का टेंडर अवार्ड - Tender Award  For Making Dpr Of Kishau Dam Project - Amar Ujala Hindi News Liveप्राप्त जानकारी के अनुसार लगभग तीन महीने पहले हुई बैठक में परियोजना के जल घटक की लागत और राज्यों की हिस्सेदारी को लेकर सहमति बनी थी। अब छह राज्यों के समझौते से जल बंटवारे, लागत साझेदारी और विद्युत लाभों से जुड़े प्रावधानों के लिए औपचारिक ढांचा तैयार हुआ है। जल घटक की कुल लागत का 90 प्रतिशत केंद्र सरकार केंद्रीय सहायता के रूप में वहन करेगी, जबकि शेष 10 प्रतिशत छह राज्यों के बीच साझा किया जाएगा।

हिमाचल प्रदेश की विद्युत घटक में हिस्सेदारी के बदले उसके आवंटित पानी में से दिल्ली और राजस्थान को पानी उपलब्ध कराने की व्यवस्था की गयी है। परियोजना को यमुना में स्वच्छ जल प्रवाह बढ़ाने और यमुना पुनर्जीवन के लिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

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किशाऊ परियोजना टोंस नदी पर प्रस्तावित है, जो यमुना की प्रमुख सहायक नदी है। इसका उद्देश्य जलविद्युत उत्पादन के साथ सिंचाई, पेयजल, बाढ़ नियंत्रण और यमुना में पर्यावरणीय प्रवाह सुनिश्चित करना है। प्रस्तावित व्यवस्था के अनुसार हरियाणा को 836 क्यूसेक, उत्तर प्रदेश को 543.2 क्यूसेक, राजस्थान को 163.52 क्यूसेक और दिल्ली को 105.28 क्यूसेक पानी मिलने का प्रावधान है।

परियोजना की अनुमानित लागत वर्ष 2018 में लगभग 11,550 करोड़ रुपये थी, जो अब बढ़कर लगभग 15 हजार करोड़ रुपये हो गयी है। परियोजना की पहली परिकल्पना वर्ष 1940 में ब्रिटिश शासन के दौरान हुई थी और तत्कालीन पंजाब सरकार ने 1944-45 में क्षेत्र का सर्वेक्षण कराया था। वर्ष 1946 में प्रशासनिक और तकनीकी कारणों से सर्वेक्षण रोक दिया गया। वर्ष 1962 में उत्तर प्रदेश सरकार ने इसे फिर आगे बढ़ाया और 1964 में लगभग 235 मीटर ऊंचे बांध की प्रारंभिक परियोजना रिपोर्ट तैयार हुई।

मूल बांध स्थल के प्रमुख फॉल्ट लाइन (Fault Line) पर होने से सुरक्षा संबंधी प्रश्न उठे। केंद्रीय जल आयोग (Central Water Commission) की समीक्षा के बाद अटल, सांबरखेड़ा और मोहराड़ सहित वैकल्पिक स्थलों का अध्ययन किया गया और विस्तृत भू-वैज्ञानिक परीक्षणों के बाद सांबरखेड़ा को उपयुक्त माना गया। वर्ष 1988 में नई विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (Detailed Project Report-DPR) तैयार हुई और संशोधनों के बाद 1998 में इसे फिर केंद्रीय जल आयोग के समक्ष भेजा गया। पर्यावरणीय स्वीकृति, पुनर्वास, लागत और राज्यों के बीच सहमति के कारण परियोजना आगे नहीं बढ़ सकी।

वर्ष 2008 में किशाऊ परियोजना को राष्ट्रीय परियोजना का दर्जा मिला, लेकिन निर्माण शुरू नहीं हो पाया। 13 सितंबर 2014 को प्रधानमंत्री कार्यालय में हुई बैठक के बाद प्रक्रिया फिर तेज हुई और 16 जनवरी 2017 को किशाऊ कॉरपोरेशन लिमिटेड (Kishau Corporation Limited-KCL) का गठन उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश के 50:50 संयुक्त उपक्रम के रूप में किया गया। अब छह राज्यों के समझौते के बाद वैधानिक, तकनीकी, पर्यावरणीय और प्रशासनिक स्वीकृतियों की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी।

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परियोजना के सामाजिक प्रभाव भी महत्वपूर्ण हैं। बांध बनने से उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश के 17 गांव प्रभावित होंगे तथा बड़ी संख्या में परिवारों के विस्थापन की चुनौती सामने आयेगी। प्रभावित भूमि, परिवारों के मुआवजे, पुनर्वास और आजीविका से जुड़े प्रश्न निर्माण शुरू होने से पहले महत्वपूर्ण रहेंगे। इस प्रकार किशाऊ परियोजना एक ओर उत्तर भारत की दीर्घकालिक जल और ऊर्जा जरूरतों से जुड़ी है तो दूसरी ओर प्रभावित परिवारों के उचित पुनर्वास और पर्यावरणीय संतुलन की कसौटी पर भी खरा उतरना होगा।

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