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सफलता : आईआईटी रुड़की ने बनाया शरीर की गतिविधियों से चलने वाला स्मार्ट बैंडेज, घाव भरने में मिले उत्साहजनक परिणाम

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नवीन समाचार, रुड़की, 11 सितंबर 2026 (IIT Roorkee Developed Smart Bandage)। रुड़की (Roorkee) स्थित आईआईटी यानी भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान रुड़की (Indian Institute of Technology Roorkee-IIT Roorkee) के शोधकर्ताओं ने इंस्टीट्यूट ऑफ नैनो साइंस एंड टेक्नोलॉजी (Institute of Nano Science and Technology-INST), मोहाली के सहयोग से ऐसा स्मार्ट इलेक्ट्रॉनिक बैंडेज विकसित किया है जो शरीर की सामान्य गतिविधियों से ऊर्जा प्राप्त कर विद्युत संकेत उत्पन्न करता है। सामान्य शब्दों में समझें कि यह पट्टी शरीर के हिलने-डुलने से ऊर्जा लेकर हल्की विद्युत उत्तेजना पैदा करती है, जिसका उद्देश्य घाव की कोशिकाओं की मरम्मत को तेज करना है—और खास बात यह है कि इसके लिए बैटरी या बाहरी बिजली की जरूरत नहीं पड़ती।

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3D-MIDAS (3D Monolithic Integrated Dipolar-Ionic Fibrous Architectural Scaffold) नामक यह तकनीक बैटरी, तार या किसी बाहरी ऊर्जा स्रोत के बिना घाव पर विद्युत उत्तेजना देने के लिए डिजाइन की गयी है। प्रयोगशाला और पशु अध्ययनों में इसके उत्साहजनक परिणाम सामने आये हैं, हालांकि मानव उपचार में इसके उपयोग से पहले नैदानिक अध्ययन आवश्यक होंगे।

IIT Roorkee Developed Smart Bandageजानकारी के अनुसार यह तकनीक शरीर की गतिविधियों से उत्पन्न यांत्रिक ऊर्जा को विद्युत उत्तेजना में बदलती है। लचीली सामग्री शरीर के हिलने-डुलने के दौरान खिंचती है और इसी प्रक्रिया में विद्युत संकेत उत्पन्न होते हैं। शोधकर्ताओं ने इसे ऐसी संरचना के रूप में विकसित किया है जो घाव को विद्युत उत्तेजना देने के साथ वायु-संचार और घाव से निकलने वाले द्रव के प्रबंधन में भी सहायता कर सके।

बहुत सरल भाषा में ऐसे समझिए: असल में आईआईटी रुड़की ने क्या बनाया है?

यह एक ऐसी स्मार्ट पट्टी (Bandage/Dressing) है, जिसे घाव पर लगाया जा सकता है और जो शरीर की अपनी हलचल से थोड़ी बिजली पैदा करती है। मसलन, हाथ पर यह पट्टी लगी है और व्यक्ति हाथ को मोड़ता-सीधा करता है। पट्टी भी थोड़ी खिंचेगी। पट्टी के अंदर मौजूद विशेष रेशे इस खिंचाव की ऊर्जा को विद्युत संकेत में बदल देते हैं। यानी इसे बिजली देने के लिए अलग से बैटरी, तार या चार्जर की जरूरत नहीं है।

यह बिजली क्या करेगी?

घाव भरते समय शरीर में बहुत छोटे प्राकृतिक विद्युत संकेत काम करते हैं, जो कोशिकाओं को घाव की मरम्मत की दिशा में काम करने में मदद करते हैं। चोट लगने पर ये प्राकृतिक संकेत प्रभावित हो सकते हैं। आईआईटी की विकसित पट्टी शरीर की हलचल से पैदा हुई ऊर्जा से घाव के आसपास हल्की विद्युत उत्तेजना उपलब्ध कराने का प्रयास करती है। इसका उद्देश्य कोशिकाओं की वृद्धि और उनके घाव की ओर जाने की प्रक्रिया को बेहतर करना है।

शोध में इसका असर भी देखा गया है:

  • प्रयोगशाला में कोशिकाओं की वृद्धि लगभग तीन गुना अधिक देखी गयी।
  • कोशिकाओं का घाव की ओर जाना यानी कोशिका प्रवासन लगभग 2.5 गुना अधिक रहा।
  • पशु परीक्षण में 13–15 दिनों में लगभग 90–95 प्रतिशत घाव बंद होने की स्थिति देखी गयी।
  • नयी रक्त वाहिकाओं के निर्माण और कोलेजन जमाव में भी वृद्धि देखी गयी।

इसका सबसे बड़ा लाभ क्या हो सकता है?

सरल उदाहरण से समझिए—आज यदि किसी विद्युत-उत्तेजना आधारित घाव उपचार उपकरण को लगातार चलाना है तो उसे बैटरी या बाहरी बिजली चाहिए। इस नई पट्टी में शरीर की गतिविधि ही ऊर्जा का स्रोत बन सकती है। इसलिए भविष्य में यह खासकर ऐसी जगह उपयोगी हो सकती है जहां:

बिजली उपलब्ध नहीं है → बैटरी लगाने की जरूरत नहीं → शरीर की हलचल से ऊर्जा → घाव को विद्युत उत्तेजना मिलती रहे।

इससे दूरदराज के क्षेत्रों, आपातकालीन परिस्थितियों और आपदा के समय घाव की देखभाल में संभावित लाभ हो सकता है।

लेकिन अभी यह अस्पतालों में इस्तेमाल होने वाली तैयार चिकित्सा पट्टी नहीं है

यह बात बहुत महत्वपूर्ण है। अभी इसके परिणाम प्रयोगशाला और पशु परीक्षणों में उत्साहजनक मिले हैं। इसका मतलब यह नहीं है कि इसे अभी मनुष्यों के घाव पर सामान्य चिकित्सा उपचार के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है। इसके लिए पहले मानव नैदानिक परीक्षण करने होंगे और सुरक्षा तथा प्रभावशीलता की पुष्टि करनी होगी।

शरीर की हर गतिविधि से उपचार में मदद की संभावना

घाव भरना एक जटिल जैविक प्रक्रिया है। त्वचा के क्षतिग्रस्त होने पर ऊतक की मरम्मत के दौरान कोशिकाओं को दिशा देने वाले प्राकृतिक विद्युत संकेत बाधित हो सकते हैं। 3D-MIDAS को इसी प्रक्रिया में विद्युत उत्तेजना उपलब्ध कराने के उद्देश्य से तैयार किया गया है। इसकी लचीली संरचना अपनी मूल लंबाई की लगभग 800 प्रतिशत तक खिंच सकती है, जिससे यह शरीर की गतिविधियों के अनुरूप ढल सकती है।

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इस तकनीक में एकल त्रि-आयामी रेशेदार संरचना के भीतर विद्युत रूप से सक्रिय नैनोफाइबर और आयनिक रूप से प्रवाहकीय नेटवर्क को एकीकृत किया गया है। सामग्री के खिंचने पर दोनों घटक मिलकर विद्युत संकेत उत्पन्न करते हैं। इसकी छिद्रयुक्त संरचना वायु-संचार बनाए रखने और घाव से निकलने वाले द्रव के प्रबंधन में भी सहायक है।

आईआईटी रुड़की के निदेशक प्रो. केके पंत (Prof. K K Pant) ने कहा कि अनुसंधान का वास्तविक मूल्य समाज से जुड़ी महत्वपूर्ण चुनौतियों के समाधान में योगदान देने की क्षमता में है। उनके अनुसार उन्नत सामग्रियों और विभिन्न विषयों के विशेषज्ञों के संयुक्त अनुसंधान से व्यावहारिक स्वास्थ्य संबंधी आवश्यकताओं के समाधान की दिशा में काम किया जा सकता है। प्राकृतिक शारीरिक गतिविधियों से घाव देखभाल की तकनीक को ऊर्जा देने का विचार सरल, लचीले और स्व-संचालित समाधान की दिशा में महत्वपूर्ण संभावना रखता है।

शोध के प्रधान अन्वेषक प्रो. कौशिक पारिदा (Prof. Kaushik Parida) ने बताया कि विद्युत आधारित घाव भरने वाली कई मौजूदा प्रणालियों में बाहरी ऊर्जा स्रोत की आवश्यकता होती है। 3D-MIDAS में शरीर की गतिविधियां ही विद्युत उत्तेजना उत्पन्न करने के लिए आवश्यक यांत्रिक ऊर्जा उपलब्ध कराती हैं। उन्होंने कहा कि ड्रेसिंग लचीली, वायु-संचार योग्य और घाव से निकलने वाले द्रव के प्रबंधन में सक्षम है तथा इसके परिणाम भविष्य में अधिक सुविधाजनक और स्व-संचालित घाव देखभाल तकनीकों के विकास की संभावना दिखाते हैं।

कोशिका वृद्धि और घाव बंद होने में बेहतर परिणाम

शोधकर्ताओं ने 3D-MIDAS का मूल्यांकन प्रयोगशाला और पशु अध्ययनों के माध्यम से किया। प्रयोगशाला परीक्षणों में नियंत्रण परिस्थितियों की तुलना में इस तकनीक ने लगभग तीन गुना अधिक कोशिका प्रसार और 2.5 गुना अधिक कोशिका प्रवासन प्रदर्शित किया। दोनों प्रक्रियाएं ऊतक की मरम्मत में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

पशु अध्ययनों में 3D-MIDAS ड्रेसिंग से उपचारित घावों में 13 से 15 दिनों के भीतर लगभग 90 से 95 प्रतिशत तक घाव बंद होने की स्थिति देखी गयी। इसके साथ नयी रक्त वाहिकाओं के निर्माण में वृद्धि भी देखी गयी। ऊतक संबंधी सूक्ष्म परीक्षण में उपचारित घावों में ऊतक संरचना में सुधार और कोलेजन के अधिक जमाव का पता चला।

शोधकर्ताओं ने यह भी जांच की कि क्या यह ड्रेसिंग प्राकृतिक शारीरिक गतिविधियों से विद्युत उत्पादन कर सकती है। स्वतंत्र रूप से गति करने वाले चूहों के घावों पर ड्रेसिंग लगाने पर बिना किसी बाहरी यांत्रिक उत्तेजना के चूहों की गतिविधियों के दौरान लगातार विद्युत उत्पादन दर्ज किया गया।

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तकनीक ने 500 बार खिंचाव चक्रों के दौरान स्थिर विद्युत प्रदर्शन किया। दीर्घकालिक परीक्षणों में तीन महीने तक भी स्थिर प्रदर्शन देखा गया। इससे बार-बार होने वाले यांत्रिक खिंचाव को सहन करने की इसकी क्षमता का संकेत मिलता है। अध्ययन में कोशिका अनुकूलता, रक्त अनुकूलता, सूजन संबंधी प्रतिक्रियाओं और ऊतक पुनर्जनन का भी मूल्यांकन किया गया है।

दूरस्थ और आपातकालीन स्वास्थ्य सेवाओं में संभावित उपयोग

इस तकनीक की बैटरी रहित और स्व-संचालित प्रकृति उन परिस्थितियों में उपयोगी हो सकती है जहां बैटरी, तार या विद्युत उत्तेजना देने वाले उपकरण साथ रखना सुविधाजनक नहीं होता। संभावित क्षेत्रों में दूरस्थ स्वास्थ्य सेवाएं, आपातकालीन और आपदा प्रतिक्रिया जैसी परिस्थितियां शामिल हैं।

शोध में रक्षा क्षेत्र में इसका उपयोग नहीं किया गया है और किसी रक्षा अनुप्रयोग की स्थापना भी नहीं हुई है। भविष्य में ऐसे किसी उपयोग पर विचार करने के लिए अलग परीक्षण आवश्यक होंगे। इसी तरह नियमित चिकित्सा उपयोग से पहले मनुष्यों पर नैदानिक अध्ययन और आवश्यक सत्यापन पूरा करना होगा।

शोधकर्ताओं के अनुसार 3D-MIDAS का महत्व केवल घाव देखभाल तक सीमित नहीं हो सकता। लचीली, स्व-संचालित और शरीर की प्राकृतिक गतिविधियों के अनुरूप काम करने वाली इसकी संरचना भविष्य में अन्य पहनने योग्य और जैव-इलेक्ट्रॉनिक अनुप्रयोगों के लिए भी उपयोगी हो सकती है।

भारत में अंतर्विषयक अनुसंधान को मिला समर्थन

इस अनुसंधान को भारत सरकार की प्रमुख अनुसंधान वित्तपोषण संस्थाओं और कार्यक्रमों से सहायता मिली है। इनमें अनुसंधान नेशनल रिसर्च फाउंडेशन (Anusandhan National Research Foundation-ANRF), भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (Indian Council of Medical Research-ICMR), विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (Department of Science and Technology-DST) और प्रधानमंत्री अनुसंधान फेलोशिप (Prime Minister’s Research Fellowship-PMRF) शामिल हैं।

शोध दल में आईआईटी रुड़की के पॉलिमर एवं प्रक्रिया अभियांत्रिकी विभाग (Department of Polymer and Process Engineering) तथा सेंटर फॉर सस्टेनेबल एनर्जी (Center for Sustainable Energy) से प्रो. कौशिक पारिदा, प्रथम लेखक विशु वर्मा (Vishu Verma), रोमि गर्ग (Romi Garg), सायंती मल्लिक (Sayanti Mallik) और अनीश अली (Aneesh Ali) तथा आईएनएसटी मोहाली की केमिकल बायोलॉजी इकाई (Chemical Biology Unit) से कनिका (Kanika), जट्टिन कुमार (Jattin Kumar) और रेहान खान (Rehan Khan) शामिल रहे।

यह अध्ययन पीयर-रिव्यूड जर्नल नैनो एनर्जी (Nano Energy) में “3D monolithic integrated dipolar-ionic fibrous scaffold for self-powered wound healing and exudate management” शीर्षक से प्रकाशित हुआ है। शोध वर्ष 2026 के वॉल्यूम 157 में अनुच्छेद संख्या 112266 के रूप में प्रकाशित हुआ है। मानव नैदानिक परीक्षण अभी बाकी होने के कारण फिलहाल इसे संभावित घाव देखभाल तकनीक के रूप में देखना अधिक उचित होगा, लेकिन शरीर की सामान्य गतिविधियों से ऊर्जा लेकर उपचार में सहायक विद्युत संकेत उत्पन्न करने की इसकी क्षमता चिकित्सा प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में एक उल्लेखनीय शोध दिशा प्रस्तुत करती है।

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