नैनीताल जिले को दो बाईपास की सैद्धांतिक मंजूरी, पहली बार मानसून के दौरान नैनी झील से मलबा हटाया जा रहा, ज्योलीकोट में पेयजल संकट के बीच सख्ती और नौकरी छोड़ पहाड़ी नमक को बनाया कारोबार

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नवीन समाचार, नैनीताल, 11 सितंबर 2026 (Nainital Administrative News 11 Sept)। नैनीताल (Nainital) जनपद में यातायात और पेयजल से जुड़ी दो अलग-अलग बड़ी चुनौतियों के बीच प्रशासन ने महत्वपूर्ण कदम उठाये हैं। भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (National Highways Authority of India-NHAI) ने लालकुआं (Lalkuan) और हल्द्वानी (Haldwani) बाईपास से जुड़ी दो परियोजनाओं को सैद्धांतिक मंजूरी दी है, जबकि ज्योलीकोट (Jeolikot) में दूषित पेयजल की स्थिति के बीच टैंकरों से आपूर्ति और जल स्रोतों की जांच तेज की गयी है। इसी बीच नैनी झील (Naini Lake) में मानसून के दौरान जमा मलबा हटाने और स्थानीय उत्पादों से स्वरोजगार की मिसाल भी सामने आयी है।

जानकारी के अनुसार जिलाधिकारी ललित मोहन रयाल (Lalit Mohan Rayal) ने बताया कि दोनों बाईपास परियोजनाओं के लिए अब विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (Detailed Project Report-DPR) तैयार करने की प्रक्रिया शुरू होगी। पहली परियोजना लगभग सात किलोमीटर लंबे लालकुआं बाईपास की है, जो बरेली रोड (Bareilly Road) स्थित नगला (Nagla) से वन विकास निगम (Forest Development Corporation) के डिपो तक प्रस्तावित है। दूसरी परियोजना हल्द्वानी बाईपास के तहत काठगोदाम (Kathgodam) और हल्द्वानी के दोनों गौला पुलों के बीच लगभग 8.4 किलोमीटर सड़क को दो लेन से चार लेन में बदलने की है।

बाईपास से हल्द्वानी के यातायात दबाव में कमी की उम्मीद

एनएचएआई से सैद्धांतिक मंजूरी मिलने के बाद दोनों परियोजनाओं की विस्तृत परियोजना रिपोर्ट तैयार की जाएगी। जिलाधिकारी ने संबंधित कार्यदायी एजेंसी को इस संबंध में आवश्यक कार्रवाई करने के निर्देश दिए हैं। परियोजनाओं के पूरा होने पर हल्द्वानी शहर के भीतर भारी वाहनों का दबाव कम होने की उम्मीद है। इससे स्थानीय लोगों के साथ नैनीताल और कुमाऊं आने वाले पर्यटकों को भी जाम से राहत मिल सकती है।

लालकुआं बाईपास और हल्द्वानी के गौला पुलों के बीच सड़क चौड़ीकरण की परियोजनाएं कुमाऊं मंडल में यातायात व्यवस्था को अधिक सुगम और सुरक्षित बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण मानी जा रही हैं। हालांकि अभी दोनों परियोजनाओं की विस्तृत परियोजना रिपोर्ट तैयार होने और उसके बाद की प्रक्रिया पूरी होना बाकी है।

नैनी झील में मानसून के दौरान पहली बार मलबा हटाने का काम

Nainital Administrative News 11 Septनैनीताल में अत्यधिक मानसूनी वर्षा के कारण नैनी झील के विभिन्न हिस्सों में जमा हुए मलबे और अन्य सामग्री को हटाने का काम भी पहली बार बारिश के दौरान शुरू किया गया है। जिलाधिकारी के अनुसार झील में जमा सामग्री पानी में घुलने से पहले ही उसका निस्तारण किया जा रहा है। इसका उद्देश्य झील की जल गुणवत्ता और जल-धारण क्षमता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने से रोकना है।

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कार्य शुरू करने से पहले विशेषज्ञ भू-वैज्ञानिकों की रिपोर्ट ली गयी, ताकि झील की पारिस्थितिकी को नुकसान पहुंचाये बिना वैज्ञानिक तरीके से मलबा हटाया जा सके। इसी रिपोर्ट के आधार पर सिंचाई विभाग ने इस वर्ष बारिश के दौरान झील में जमा मलबे और अन्य सामग्री को हटाने का कार्य शुरू किया है। जलस्तर सामान्य होने के बाद झील के तल को उठाने और गहरीकरण का कार्य भी प्रस्तावित है।

ज्योलीकोट में टैंकरों से लगातार पहुंचाया जा रहा शुद्ध पानी

ज्योलीकोट और आसपास के क्षेत्रों में दूषित पेयजल से उत्पन्न स्थिति के बीच शुक्रवार को भी उत्तराखंड जल संस्थान (Uttarakhand Jal Sansthan) ने टैंकरों के माध्यम से शुद्ध पेयजल की आपूर्ति जारी रखी। जल संस्थान और पेयजल निगम (Peyjal Nigam) के अधिकारियों ने जनप्रतिनिधियों के साथ विभिन्न पेयजल टैंकों, जल स्रोतों और पाइपलाइनों का निरीक्षण किया। टैंकों की सफाई, क्लोरीनीकरण, फ्लैशिंग और मरम्मत का कार्य भी तेजी से कराया जा रहा है।

c4ca4238a0b923820dcc509a6f75849b 282230833क्षेत्र में जलजनित बीमारियों के कारण कम से कम दो लोगों की मृत्यु हो चुकी है। इस गंभीर स्थिति को देखते हुए जिलाधिकारी ललित मोहन रयाल ने पेयजल विभाग को निर्देश दिए कि स्थिति सामान्य होने तक प्रतिदिन टैंकरों से शुद्ध पानी उपलब्ध कराया जाए। सभी जल स्रोतों, टैंकों और वितरण लाइनों के नियमित क्लोरीनीकरण तथा नमूना जांच की रिपोर्ट प्रतिदिन जिला प्रशासन को देने के निर्देश भी दिए गये हैं।

पाइपलाइन में लीकेज और क्रॉस-कनेक्शन की शिकायतों का तत्काल निस्तारण करने तथा स्वास्थ्य विभाग के साथ समन्वय बनाकर घर-घर सर्वे और जलजनित रोगों की निगरानी जारी रखने को कहा गया है। जिलाधिकारी ने स्पष्ट किया कि इस मामले में लापरवाही बरतने वाले अधिकारियों और कर्मचारियों के विरुद्ध कार्रवाई की जाएगी।

पिछले दो दिनों में चार टैंकरों के माध्यम से 110 परिवारों को 15,500 लीटर से अधिक शुद्ध पेयजल उपलब्ध कराया गया है। देवलदुंगा लाइन (Devaldunga Line) की 500 मीटर फ्लैशिंग करायी गयी, 14 शिकायतों का निस्तारण किया गया और पेयजल के आठ नमूने लिये गये हैं। ग्रामीणों को दूषित पानी से बचाव के उपायों के प्रति जागरूक भी किया जा रहा है।

पीलिया नियंत्रण के लिए नौ सूत्रीय कार्ययोजना

चिकित्सा स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग (Medical Health and Family Welfare Department) के कुमाऊं मंडल निदेशक डॉ. केके अग्रवाल (Dr. KK Agrawal) और संयुक्त निदेशक डॉ. योगेश पुरोहित (Dr. Yogesh Purohit) ने ज्योलीकोट प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र और पीलिया प्रभावित क्षेत्रों का निरीक्षण किया। स्थिति की समीक्षा के बाद प्रभावित क्षेत्रों को उच्च, मध्यम और निम्न जोखिम वाली श्रेणियों में बांटकर निगरानी और कार्रवाई के निर्देश दिये गये।

उच्च जोखिम वाले क्षेत्रों में सघन निगरानी और पेयजल नमूनों की प्राथमिकता से जांच कराने को कहा गया है। अन्य क्षेत्रों में नियमित स्वास्थ्य परीक्षण और निगरानी जारी रखने के निर्देश हैं। लोगों को पानी 15 मिनट तक उबालकर ठंडा करने के बाद पीने, साबुन से हाथ धोने और घरों के आसपास जलभराव नहीं होने देने के प्रति जागरूक करने को कहा गया है।

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सभी पीलिया रोगियों की सूची तैयार करने, नये और पुराने रोगियों का अलग अभिलेख रखने तथा सरकारी और निजी चिकित्सा इकाइयों से दैनिक सूचना आईएचआईपी-आईडीएसपी पोर्टल (IHIP-IDSP Portal) पर दर्ज कराने के निर्देश दिये गये हैं। चिकित्सालयों में पीलिया की त्वरित जांच और उपचार के लिए अलग कक्ष स्थापित करने तथा आवश्यक दवाओं की पर्याप्त उपलब्धता सुनिश्चित करने को कहा गया है।

जल संस्थान के साथ समन्वय कर प्रभावित क्षेत्रों में नियमित पेयजल नमूना जांच, निर्धारित मानकों के अनुसार अत्यधिक क्लोरीनीकरण और स्वच्छता अभियान चलाने के निर्देश भी दिये गये हैं। हल्द्वानी के निजी चिकित्सालयों और क्लीनिकों में पीलिया एवं जलजनित रोगों की दैनिक निगरानी और सूचना देने की व्यवस्था सुनिश्चित करने तथा अब तक की कार्रवाई और आगे की कार्ययोजना की विस्तृत रिपोर्ट प्रस्तुत करने को कहा गया है।

नौकरी छोड़ी, गांव लौटे और पहाड़ी नमक को बनाया कारोबार

रामगढ़ विकासखंड (Ramgarh Development Block) के नथुवाखान (Nathuakhan) निवासी हरीश बिष्ट (Harish Bisht) ने नौकरी छोड़कर गांव लौटने के बाद पारंपरिक पहाड़ी उत्पादों को स्वरोजगार का माध्यम बनाया है। सिलबट्टे पर तैयार मसालों से युक्त पहाड़ी नमक से शुरू हुआ उनका प्रयास अब लगभग 11 लाख रुपये के वार्षिक कारोबार तक पहुंच गया है। इससे लगभग 35 महिलाओं सहित कई लोगों को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से आय का अवसर मिल रहा है।

c4ca4238a0b923820dcc509a6f75849b 401221176हरीश के पहाड़ी नमक में जीरा, हींग, लहसुन, अजवाइन, भांग दाना, जाखिया, भंगीरा, पुदीना, राई और सेंधा नमक जैसे पारंपरिक मसालों का प्रयोग होता है। सिलबट्टे पर पीसने की पारंपरिक विधि इसे अलग स्वाद और पहाड़ी पहचान देती है। स्थानीय लोगों के साथ पर्यटकों के बीच भी इसकी मांग बनी हुई है। हरीश के अनुसार विभिन्न संस्थाओं में काम करने के दौरान इन्होंने टिकाऊ खेती, पोषण वाटिका तथा हर्बल और जैविक उत्पादों के निर्माण एवं विपणन का अनुभव हासिल किया। वर्ष 2022 में इन्होंने अंशकालिक स्तर पर हर्बल और पहाड़ी उत्पादों का निर्माण एवं विपणन शुरू किया और 2023 से इसे पूर्णकालिक व्यवसाय बना लिया।

वर्तमान में हरीश पहाड़ी नमक के अलावा बुरांश चाय, हर्बल चाय, बुरांश जूस, चटनी, रोजमेरी, तुलसी, थाइम, नेटल, ऑर्गेनो, कैमोमाइल, लेमन ग्रास, भांग दाना, मड़वा आटा, मल्टीग्रेन आटा और पहाड़ी दाल सहित अनेक उत्पाद तैयार कर रहे हैं। इनकी बिक्री नैनीताल, कैंची धाम (Kainchi Dham), भीमताल (Bhimtal), खुरपाताल (Khurpatal), नौकुचियाताल (Naukuchiatal), रामनगर (Ramnagar), कौसानी (Kausani), अल्मोड़ा (Almora) और मुक्तेश्वर (Mukteshwar) सहित 250 से अधिक पर्यटन स्थलों पर की जा रही है।

ग्राहक घर से भी उत्पाद मंगवा रहे हैं और ऑनलाइन माध्यम से भी बिक्री हो रही है। वर्ष 2022 में जहां कारोबार 10 हजार रुपये से कम था वहीं लगातार प्रयास और बाजार से जुड़ाव के बाद वार्षिक कारोबार लगभग 11 लाख रुपये तक पहुंच गया। इस यात्रा में राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (National Rural Livelihood Mission) से मिली 25 हजार रुपये की आर्थिक सहायता भी उपयोगी रही, जिससे तौलने की मशीन, सीलिंग मशीन और अन्य आवश्यक उपकरण खरीदे गये।

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हरीश का मानना है कि पर्यटन स्थलों, रेलवे स्टेशनों, हवाई अड्डों, मॉल, संग्रहालयों और सरकारी अतिथि गृहों में स्थानीय उत्पादों के लिए बेहतर बाजार और स्टॉल उपलब्ध कराये जाएं तो पहाड़ के अनेक परिवारों को स्वरोजगार से जोड़ा जा सकता है। उनकी पहल स्थानीय संसाधनों, पारंपरिक ज्ञान और बाजार को जोड़कर गांवों में रोजगार तथा आत्मनिर्भरता के अवसर पैदा करने की संभावनाएं दिखाती है।

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