नंदा देवी : शास्त्रों से हिमालय की लोकपरंपरा और नैनीताल के महोत्सव तक पहुंची आस्था की कहानी

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डॉ. नवीन जोशी @ नवीन समाचार, नैनीताल, 18 सितंबर 2026 (Nainital-Nanda Devi-Festival-History)। उत्तराखंड (Uttarakhand) की आराध्य देवी मां नंदा की परंपरा केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि शास्त्रीय ग्रंथों, हिमालयी लोकविश्वास, राजपरंपराओं और सदियों पुरानी सामाजिक-सांस्कृतिक मान्यताओं से जुड़ी हुई है। देवी सप्तशती (Devi Saptashati) सहित विभिन्न शास्त्रीय ग्रंथों में नंदा के देवी-स्वरूप का उल्लेख मिलता है, जबकि गढ़वाल और कुमाऊं (Kumaon) में उन्हें हिमालय की बेटी, कैलाश की बहू, मां और कुलदेवी के रूप में पूजा जाता है, और बेटी की तरह उनसे आत्मीय रिश्ता भी स्थापित किया जाता है। 

नैनीताल (Nainital) में नंदा महोत्सव (Nanda Mahotsav) की परंपरा वर्ष 1903 से चली आ रही है और समय के साथ इसमें धार्मिक परंपराओं के साथ पर्यावरण, लोककला और सामाजिक सहभागिता के अनेक आयाम जुड़ते गए हैं।

शास्त्रीय ग्रंथों में नंदा का देवी-स्वरूप

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देवी सप्तशती के अंतर्गत देवी महात्म्य (Devi Mahatmya) से जुड़े मूर्ति रहस्य में नंदा के एक रूप का स्पष्ट उल्लेख मिलता है। वहां कहा गया है कि देवी नंदा नंद के घर जन्म लेंगी और उनकी उपासना की जाएगी।

भविष्य पुराण (Bhavishya Purana) के एक अध्याय में नंदा को नवदुर्गा के समूह में रखा गया है। एक श्लोक में महालक्ष्मी, नंदा और क्षेमकरी का क्रम मिलता है।

अन्य शास्त्रीय ग्रंथ देवतामूर्ति-प्रकरण में नौ दुर्गाओं की सूची में नंदा को शामिल किया गया है और उनके स्वरूप का वर्णन भी किया गया है। रूपमंडन परंपरा में बारह गौरी-रूपों का उल्लेख मिलता है, जबकि नंदा को चामुंडा की छह अंगभूत देवियों में गिनने का उल्लेख मिलता है।

इस प्रकार शास्त्रीय देवी-परंपरा में नंदा एक स्वतंत्र देवी-स्वरूप के रूप में प्रतिष्ठित हैं और विभिन्न ग्रंथों में उन्हें दुर्गा-परंपरा तथा देवी के अन्य रूपों से जोड़ा गया है।

हिमालय की बेटी और कैलाश की बहू

हिमालयी लोकपरंपरा में पार्वती हिमालय की पुत्री हैं और उनका विवाह शिव से होता है। हिमालय के लोगों ने इसी दिव्य कथा को अपनी सामाजिक अनुभूति से जोड़ते हुए नंदा को भी हिमालय की बेटी और कैलाश की बहू के रूप में देखा है।

यहीं से ‘नंदा ध्याणी’ अर्थात बेटी का भाव जन्म लेता है। वह केवल सर्वशक्तिमान देवी नहीं, बल्कि ऐसी बेटी हैं जिसका मायका पहाड़ों में है और पति का घर कैलाश में है। इसीलिए गढ़वाल-कुमाऊं के नंदा गीतों में भक्ति के साथ बेटी के आने पर खुशी और विदाई पर दर्द तथा आत्मीयता भी दिखाई देती है। स्थानीय परंपरा में नंदा को पार्वती, भगवती, गौरा आदि नामों और रूपों से जोड़ा जाता है।

यहाँ नंदा मां भी हैं और बेटी भी

गढ़वाल से कुमाऊं तक नंदा की विविध परंपराएं

उत्तराखंड की वर्तमान महोत्सवी परंपरा में नंदा और सुनंदा बहनों के रूप में पूजी जाती हैं। हालांकि पूरे हिमालय में सुनंदा की पहचान एक जैसी नहीं है। अलग-अलग परंपराओं में उन्हें बहन, दूसरे देवी-रूप, सुनयना या गौरा के किसी रूप से जोड़ा गया है।

गढ़वाल में नौटी, कुरुड़, वाण-बधाण क्षेत्र, दसोली, तल्ली दसोली, सिमली, देवराड़ा, चांदपुर आदि अनेक स्थानों में नंदा की परंपरा मिलती है। गढ़वाल की प्रसिद्ध नंदा देवी राजजात (Nanda Devi Raj Jat) इस परंपरा का सबसे विराट रूप है।

कुमाऊं में अल्मोड़ा, बागेश्वर, डंगोली, बदियाकोट, पोथिंग, कर्मी, सोराग, चिल्ठा, सरमूल, जोहार के दूरस्थ गांवों और नैनीताल आदि क्षेत्रों में नंदा से संबंधित मंदिर, जात और मेले हैं। नेपाल सीमा से लगे धारचूला और दूरस्थ सीमांत में ‘नंदुला’ जैसे स्थानीय रूपों का भी उल्लेख मिलता है।

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बदियाकोट और पोथिंग की लोकगाथाओं में नंदा

कुछ सरकारी-सांस्कृतिक दस्तावेज तथा नौटी और चांदपुर गढ़ी की लोकपरंपरा के अनुसार कनकपाल ने 688 ईस्वी में नंदा की उपासना-परंपरा को प्रतिष्ठित किया और नंदा से उनका राजवंशीय संबंध जुड़ा।

दानपुर क्षेत्र की लोकपरंपरा नंदा की एक अलग कथा सामने रखती है। प्रकाशित लोकसाहित्य में बदियाकोट को देवी के बद्रीनाथ दिशा से आने के समय विश्राम-स्थल के रूप में वर्णित किया गया है। यह कथा सरकारी इतिहास के रूप में नहीं, बल्कि स्थानीय लोकस्मृति के रूप में दर्ज है।

बदियाकोट की एक प्रचलित स्थानीय कथा के अनुसार देवी गढ़वाल के बंड क्षेत्र से मृग के रूप में इस ओर आईं। दो पुरुष मृग स्वरूप देवी का पीछा करते हुए बदियाकोट पहुंचे। वहां देवी ने कन्या का रूप धारण कर उन्हें दर्शन दिए, उसी स्थान पर अपनी पूजा स्थापित करने को कहा और अंतर्धान हो गईं। बाद की लोकमान्यता में उन दोनों पुरुषों के छह-छह पुत्र हुए और उनसे बारह बदकोटी दानू परंपरा जुड़ी मानी जाती है।

बदियाकोट की लोकगाथाओं में देवी को केवल नंदा नहीं, बल्कि आदिबद्री भगवती के रूप में भी पूजा जाता है। यहां नंदा अष्टमी, आठूं, डोली, दानू देवता और लोकजागर की स्वतंत्र परंपरा है।

स्थानीय मान्यता के अनुसार देवी ने बदियाकोट के निकट निशुम्भ का वध किया और शुम्भ का वध निकटवर्ती सुमगढ़ क्षेत्र में हुआ। इसी कारण इस भूगोल के अनेक स्थानों को देवी की युद्धगाथा से जोड़ा जाता है।

एक मान्यता के अनुसार माता नंदा भगवती बदियाकोट से तोली गांव होते हुए पोथिंग आईं, जबकि पोथिंग की स्थानीय परंपरा के अनुसार नंदा-भगवती ने कैलाश की ओर जाते हुए पोथिंग में एक रात विश्राम किया। पोथिंग में उतरौड़ा गांव को माता का मायका माना जाता है और नंदा-सुनंदा की प्रतिमाओं के लिए कदली वृक्ष परंपरानुसार उतरौड़ा से लाया जाता है। पोथिंग में नंदा-भगवती पूजा को स्थानीय बोली में ‘आठों और स्योपाती’ कहा जाता है।

बदियाकोट, पोथिंग और बाछम को दानपुर की लोकपरंपरा में तीन महत्वपूर्ण शक्ति-स्थानों के रूप में जोड़ा जाता है। कुछ स्थानीय स्रोतों के अनुसार बदियाकोट की नंदा डोली का संबंध नंदा राजजात और वेदनी कुंड की यात्रा से भी जोड़ा जाता है। इस प्रकार दानपुर की नंदा परंपरा को केवल गढ़वाल से अल्मोड़ा आई हुई परंपरा मानना उचित नहीं लगता, बल्कि वहां स्वतंत्र स्थानीय पूजा-व्यवस्था और लोकदेवता-परंपरा भी विकसित हुई है।

कत्यूरी राजाओं से चंद राजाओं तक पहुंची राजपरंपरा

शोधकर्ता विलियम एस. सैक्स (William S. Sax) ने नंदा देवी की राजपरंपरा पर अध्ययन करते हुए बताया है कि पांडुकेश्वर के नौवीं शताब्दी के अभिलेखों में कत्यूरी शासकों की नंदा के प्रति भक्ति का संकेत मिलता है। शोध के अनुसार एक कत्यूरी शासक शालिपाल ने 850 ईस्वी में स्वयं को नंदा का ‘परमभक्त’ कहा था।

नौटी की प्रचलित मान्यता के अनुसार राजा शालिपाल ने नौवीं शताब्दी के आसपास नंदा की प्रतिष्ठा और राजजात की परंपरा को व्यवस्थित किया। इस आधार पर यह माना जाता है कि नौवीं शताब्दी तक नंदा देवी की प्रतिष्ठा राजसत्ता और धार्मिक वैधता से जुड़ चुकी थी।

भारतीय राष्ट्रीय कला एवं सांस्कृतिक विरासत न्यास (INTACH) के विवरण के अनुसार नौटी में परंपरागत रूप से नंदा की स्थायी मूर्ति के स्थान पर श्रीयंत्र को अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है और स्थानीय मान्यता इसे नौवीं शताब्दी से जोड़ती है।

1977 में एच. एडम्स कार्टर (H. Adams Carter) ने नंदा देवी क्षेत्र पर लिखते हुए ऋषिगंगा और धौलीगंगा क्षेत्र में नंदा के प्रभाव का उल्लेख किया। नंदा देवी, नंदा कोट, नंदा घुंघटी और नंदा खाट जैसे अनेक हिमालयी भू-नाम भी नंदा से जुड़े हैं।

विलियम सैक्स के अनुसार नौवीं शताब्दी तक कत्यूरी राजाओं ने नंदा देवी को अपनी राजसत्ता और सौभाग्य से जोड़ दिया था। आगे चलकर गढ़वाल और कुमाऊं के राजाओं में भी नंदा को कुलदेवी मानने की परंपरा विकसित हुई।

अल्मोड़ा में चंदकालीन प्रतिष्ठा

कुमाऊं में नंदा का व्यापक सार्वजनिक स्वरूप चंद राजाओं के काल में मजबूत हुआ। कुमाऊं मंडल और अल्मोड़ा के आधिकारिक प्रशासनिक स्रोतों के अनुसार अल्मोड़ा का नंदा देवी मेला चंद राजाओं के समय से चला आ रहा है और नंदा को चंद वंश की कुलदेवी माना जाता था।

कुछ लोक-स्रोत इस मेले की शुरुआत को राजा कल्याण चंद के 16वीं-17वीं शताब्दी के काल से जोड़ते हैं, हालांकि उपलब्ध स्रोतों में मेले के प्रथम आयोजन की सटीक जानकारी नहीं मिलती।

लोकप्रिय ऐतिहासिक विवरणों में कहा जाता है कि चंद राजा बाज बहादुर चंद गढ़वाल क्षेत्र के बधाणगढ़ी, बधानगढ़ या बधानकोट किलों पर विजय के बाद नंदा की एक प्रतिष्ठित प्रतिमा अल्मोड़ा लाए और उसे मल्ला महल में प्रतिष्ठित किया। अलग-अलग स्रोतों में इस घटना की तिथि 1670, 1655, 1617 आदि बताई गई है और स्थान के विवरण में भी अंतर मिलता है।

शोधकर्ता विलियम सैक्स का अधिक सावधान निष्कर्ष यह है कि सत्रहवीं शताब्दी में कुमाऊं के राजा गढ़वाल की प्रसिद्ध नंदा प्रतिमा प्राप्त करके कुमाऊं लाए और इसके बाद नंदा देवी की राजकीय प्रतिष्ठा और मजबूत हुई।

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अल्मोड़ा में वर्तमान नंदा देवी मंदिर परिसर वाली जगह पर राजा उद्योत चंद ने 1690-91 के आसपास उद्योत चंद्रेश्वर और पार्वती चंद्रेश्वर मंदिरों का निर्माण कराया। बाद में यही परिसर नंदा देवी मंदिर के रूप में प्रसिद्ध हुआ।

स्थानीय ऐतिहासिक विवरणों में 1699 में राजा ज्ञान चंद द्वारा बधानकोट से एक और स्वर्ण प्रतिमा अल्मोड़ा लाए जाने तथा 1710 में राजा जगत चंद द्वारा 200 अशर्फियां गलाकर नंदा की प्रतिमा बनवाए जाने का भी उल्लेख मिलता है। ये प्रतिमाएं मल्ला महल में प्रतिष्ठित की गईं।

एक अन्य जानकारी के अनुसार कुमाऊं के तत्कालीन कमिश्नर जॉर्ज विलियम ट्रेल (George William Traill) ने 1815 के आसपास नंदा की मूर्ति को मल्ला महल से हटाकर वर्तमान नंदा देवी परिसर में रखवाया। इससे जुड़ी स्थानीय मान्यता में उनकी हिमालय यात्रा और नंदा देवी शिखर की ओर देखने के बाद आंखों की रोशनी खराब होने की कथा मिलती है। इसके बाद 1816 में नंदा का मंदिर बनवाए जाने और मूर्ति की स्थापना की परंपरा प्रचलित हुई।

कदली वृक्ष से जुड़ी प्रतिमा परंपरा

नंदा-सुनंदा की मूर्तियों को बांस की खपच्चियों, केलों के तनों और पाती नाम की घास, जिसे फूल-पाती भी कहा जाता है, से बनाने की मान्यता है। कदली-वृक्ष को पवित्र माना जाता है और नंदा-सुनंदा की प्रतिमाओं में कदली के तनों, बांस, वस्त्र और अन्य प्राकृतिक सामग्री का प्रयोग किया जाता है।

अल्मोड़ा की एक प्रसिद्ध लोककथा इस परंपरा को राजा कल्याण चंद की बहन नंदा की कथा से जोड़ती है। कथा में नंदा को भैंस से बचने के लिए केले के पौधे के पीछे छिपते हुए बताया गया है, लेकिन बकरी द्वारा पत्ते खा लेने के बाद वह दिखाई पड़ गईं। इसी के बाद कदली-वृक्ष और बलि की परंपरा जुड़ने की कथा कही जाती है। यह अल्मोड़ा की लोककथा है, सार्वभौमिक ऐतिहासिक घटना नहीं।

नैनीताल में नंदा महोत्सव : वर्षानुसार इतिहास

Nainital-Nanda Devi-Festival-History1903 — नैनीताल में नंदा महोत्सव की शुरुआत

नैनीताल में नंदा महोत्सव की शुरुआत वर्ष 1903 में हुई।

1918 — श्रीराम सेवक सभा की स्थापना

श्रीराम सेवक सभा (Shri Ram Sevak Sabha) की स्थापना वर्ष 1918 में हुई। तब से संस्था रामलीला और अन्य सामाजिक-धार्मिक कार्य करती रही।

1926 — श्रीराम सेवक सभा को आयोजन की जिम्मेदारी

वर्ष 1926 से नंदा महोत्सव के आयोजन की जिम्मेदारी श्रीराम सेवक सभा को दी गई।

1945 के आसपास — प्रतिमा निर्माण में बदलाव

1945 के आसपास नंदा-सुनंदा की प्रतिमाओं के निर्माण की शैली में बदलाव शुरू हुए। पहले प्रतिमाएं अधिक पारंपरिक ढंग से तैयार होती थीं। बाद में चेहरे, भाव-भंगिमा और पर्वताकार रूप पर अधिक कलात्मक ध्यान दिया जाने लगा।

1950 — मूर्तियों में कलात्मकता का विस्तार

वर्ष 1950 में शारदा संघ के संस्थापक कलाप्रेमी बाबू चंद्र लाल साह और कला मंदिर फोटो शॉप से जुड़े मूलचंद की जुगलबंदी से मूर्तियों को अधिक सौंदर्यपूर्ण और अभिव्यंजक बनाने का प्रयास तेज हुआ। बाबू जी लगभग 1971 तक मूर्ति निर्माण से जुड़े रहे। पुराने लोगों के अनुसार नंदा-सुनंदा के चेहरों पर उनके द्वारा दी गई मुस्कान आज भी विशेष रूप से याद की जाती है।

1968 — चांदी की प्रतिमाएं

वर्ष 1968 में नंदा-सुनंदा की मूर्तियां चांदी से भी बनाई गईं। इसके बाद परंपरागत प्राकृतिक सामग्री से प्रतिमा निर्माण की ओर फिर वापसी हुई, लेकिन उसमें कलात्मकता पहले से अधिक विकसित थी।

इसी दौरान सुंदर लाल साह द्वारा माता की आंखों को अधिक सुंदर बनाने का कार्य किया गया। बाद में विश्वम्भर नाथ साह ‘सखा दाज्यू’, नाथ लाल साह, रमेश चौधरी, ठाकुर दास साह, गंगा प्रसाद साह और अब चंद्र लाल साह इस परंपरा को आगे बढ़ाते रहे हैं।

1978 तक — भैंसे की बलि

वर्ष 1978 तक नंदा देवी महोत्सव में भैंसे की बलि की परंपरा थी।

1980 के दशक से पहले — नेपाली मजदूरों की भूमिका

1980 के दशक से पहले तक नंदा-सुनंदा के डोले को नगर भ्रमण कराने में नेपाली मजदूरों का प्रमुख सहयोग लिया जाता था। कदली वृक्षों को लाने और डोले के संचालन में भी उनकी भूमिका रहती थी।

1980 — श्रद्धालुओं ने संभाला डोले का भार

वर्ष 1980 में मुरादाबाद के दंगों के समय पैदा हुई परिस्थितियों के कारण डीएसए मैदान क्षेत्र में कुमाऊं यंग क्लब से जुड़े मुकेश जोशी, कमलेश ढोंढियाल, निखिल जोशी और हिमांशु जोशी आदि युवाओं ने डोले को अपने कंधों पर उठाकर विसर्जन कराया। इसके बाद धीरे-धीरे श्रद्धालुओं में स्वयं डोला उठाने की परंपरा मजबूत हुई। आज डोले को कंधा लगाना श्रद्धालु धार्मिक सौभाग्य मानते हैं।

1987-88 — कदली वृक्षों को लाने की परंपरा मजबूत

1987-88 से कदली वृक्षों को श्रद्धालु उत्साह और धार्मिक उमंग के साथ लाने की परंपरा मजबूत हुई। इससे कदली वृक्ष महोत्सव की सामुदायिक यात्रा का प्रमुख हिस्सा बन गए।

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1988-89 — पंचआरती की शुरुआत

1988-89 के आसपास पंडित भगवती प्रसाद जोशी द्वारा पंचआरती की शुरुआत किए जाने का उल्लेख मिलता है। यह परंपरा आगे चलकर नंदा महोत्सव को नैनी झील के धार्मिक-सांस्कृतिक संबंध से जोड़ने वाली प्रमुख परंपरा बनी।

1998 — दो कदली वृक्षों के बदले 21 फलदार पौधे

वर्ष 1998 से पर्यावरणविद् यशपाल रावत के सुझाव पर मूर्ति निर्माण में प्रयुक्त दो कदली वृक्षों के बदले 21 फलदार वृक्ष लगाने की परंपरा शुरू हुई।

2005 — महोत्सव की स्मारिका का प्रकाशन

वर्ष 2005 से नंदा महोत्सव की स्मारिका प्रकाशित होने लगी। प्रारंभ में इसका स्वरूप छोटा था, लेकिन बाद में इसका आकार और सामग्री दोनों बढ़ते गए। वर्ष 2014 के आसपास इसके लगभग 400 पृष्ठ तक पहुंचने का विवरण मिलता है।

2007 — नैनी सरोवर की आरती

वर्ष 2007 से तल्लीताल दर्शन घर पार्क से मां नंदा के साथ नैनी सरोवर की आरती की नई परंपरा जुड़ी। इसे महोत्सव और झील के रिश्ते को और गहरा करने वाले कार्यक्रम के रूप में देखा गया। बाद में यही भाव पंच आरती, दीपदान और घर-घर से दीपक लाकर सरोवर आरती जैसी पहलों में दिखाई देने लगा।

2009 — प्रतिमा निर्माण पर्यावरण-मित्र हुआ

वर्ष 2009 को नंदा महोत्सव के पर्यावरणीय परिवर्तन में महत्वपूर्ण पड़ाव माना जाता है। प्रतिमा निर्माण को पर्यावरण-मित्र दिशा में ले जाते हुए थर्मोकोल का उपयोग बंद किया गया और कदली वृक्ष के तने, पाती, कपड़ा, रूई तथा प्राकृतिक रंग जैसी सामग्री का प्रयोग होने लगा।

2010-11 — डिजिटल माध्यम से देश-दुनिया तक पहुंच

2010-11 के आसपास नंदा देवी महोत्सव की अपनी वेबसाइट और डिजिटल माध्यम से देश-दुनिया तक पहुंच बनाने का उल्लेख मिलता है। इसके बाद फेसबुक, गूगल और ट्विटर जैसी सामाजिक माध्यम सेवाओं के माध्यम से महोत्सव की लोककला, लोकगीत, नृत्य और संगीत को व्यापक दर्शक मिले।

2011 — पशुबलि पर प्रतिबंध

वर्ष 2011 से उच्च न्यायालय के आदेश के अनुपालन के बाद बकरों की बलि की परंपरा प्रतिबंधित हुई। बाद में मंदिर में पशुबलि के स्थान पर नारियल चढ़ाने की परंपरा बढ़ी। इसके साथ नंदा महोत्सव धार्मिक अनुष्ठानों के साथ पर्यावरण और सामाजिक चेतना से भी जुड़ता गया।

2014 — सीसीटीवी और पुलिस सत्यापन

वर्ष 2014 में मल्लीताल क्षेत्र में लगभग 2.25 लाख रुपये की लागत से 16 सीसीटीवी कैमरे (CCTV Cameras) लगाए गए। मेले में आने वाले दुकानदारों से पहचान संबंधी जानकारी लेकर पुलिस सत्यापन की व्यवस्था भी की गई।

2015 — मेले के व्यापारिक प्रबंधन में बदलाव

वर्ष 2015 से फ्लैट्स मैदान में होने वाले मेले की जिम्मेदारी नैनीताल नगर पालिका को दी गई। इससे मेले के व्यापारिक प्रबंधन में परिवर्तन हुआ।

2025 — पारंपरिक खोखों से व्यवस्थित स्टॉलों तक

वर्ष 2025 तक नंदा देवी मेले का स्वरूप भी काफी बदल गया। पहले छोटे-छोटे पॉलीथीन, तिरपाल और टिन के अस्थायी खोखे मेले की पहचान हुआ करते थे। दूर-दराज के ग्रामीण नंदा मेले में केवल धार्मिक अनुष्ठानों के लिए नहीं, बल्कि रोजमर्रा की जरूरत का सामान खरीदने भी आते थे।

मेले में परात जैसे लोहे के बर्तन, कृषि एवं घरेलू औजार, गुब्बारे, मिट्टी और लकड़ी के खिलौने तथा ग्रामीण जीवन से जुड़ी अनेक वस्तुएं मिलती थीं। अब मेला वाटरप्रूफ जर्मन हैंगर और कैनोपी में व्यवस्थित व्यापारिक स्टॉलों के साथ सजने लगा है।

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