जिसे कभी गरीब का अनाज समझा गया, आज वही बन रहा है सेहत और उत्तराखंड की पहचान
नवीन समाचार, चमोली, 2 जून 2026 (UKs Gluten-Free Superfood Jhangora)। उत्तराखंड (Uttarakhand) के जोशीमठ (Joshimath) में भारत के मुख्य न्यायाधीश (Chief Justice of India-CJI) न्यायमूर्ति सूर्यकांत (Justice Surya Kant) के एक वीडियो ने अचानक एक ऐसे पारंपरिक पहाड़ी अनाज को राष्ट्रीय चर्चा के केंद्र में ला दिया है, जो कभी उत्तराखंड के लगभग हर घर की थाली का हिस्सा हुआ करता था। लेकिन अब अधिकांश उत्तराखंडी इसका स्वाद भी नहीं ले पाए हैं, और इसके बारे में जानकारी भी कम ही रखते हैं।
एक ताज़ा वीडियो में न्यायमूर्ति सूर्यकांत एक स्थानीय दुकान पर झंगोरा (Jhangora) के बारे में जानकारी लेते और यह बताते दिखाई देते हैं कि वह स्वयं भी इसका सेवन करते हैं। इसके बाद सोशल मीडिया पर झंगोरा को लेकर उत्सुकता बढ़ गयी है। यह चर्चा केवल एक खाद्य पदार्थ की नहीं, बल्कि उत्तराखंड की पारंपरिक कृषि, लोक संस्कृति और बदलती खानपान आदतों की भी कहानी कहती है। आप यह संबंधित वीडिओ भी जरूर देखना चाहेंगे :
प्राप्त जानकारी के अनुसार झंगोरा, जिसे अंग्रेजी में बार्नयार्ड मिलेट (Barnyard Millet) कहा जाता है, उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में सदियों से उगाया और खाया जाता रहा है। कम पानी, कठिन भौगोलिक परिस्थितियों और सीमित संसाधनों में भी आसानी से तैयार होने वाली यह फसल पहाड़ के लोगों के लिए ऊर्जा और पोषण का प्रमुख स्रोत रही है। गढ़वाल (Garhwal) और कुमाऊं (Kumaon) दोनों मंडलों में झंगोरा दैनिक भोजन से लेकर त्योहारों और धार्मिक आयोजनों तक महत्वपूर्ण स्थान रखता था। आप यह पूर्व संबंधित समाचार भी जरूर पढ़ना चाहेंगे : राष्ट्रपति भवन में यूरोपीय यूनियन के नेताओं को परोसे गए उत्तराखंड के पारंपरिक व्यंजन: वैश्विक मंच पर छाए हिमालयी स्वाद, स्थानीय ज्ञान और पहाड़ी पहचान
कभी हर घर में था झंगोरा, अब नई पीढ़ी के लिए बन गया है कौतूहल
उत्तराखंड के बुजुर्ग बताते हैं कि कुछ दशक पहले तक झंगोरा, मंडुवा (Finger Millet), मादिरा, कौंड़ी, जौं, गहत (Horse Gram), भट्ट (Black Soybean) और चौलाई (Amaranth) जैसे पारंपरिक अनाज पहाड़ी जीवन का आधार और भोजन का मुख्य हिस्सा थे। लेकिन समय के साथ सार्वजनिक वितरण प्रणाली, बाजारों के विस्तार और चावल-गेहूं की बढ़ती उपलब्धता ने इन पारंपरिक खाद्यान्नों को धीरे-धीरे सामान्य पहाड़ी थाली से दूर कर दिया। आप यह पूर्व संबंधित समाचार भी जरूर पढ़ना चाहेंगे : खूब पसंद किए जा रहे हल्द्वानी में बन रहे मडुवे के ‘सुगर व ग्लूटन फ्री’ बिस्किट, पिज्जा और केक
स्थिति यह है कि आज पर्वतीय क्षेत्रों में रहने वाली नई पीढ़ी के अनेक युवक-युवतियों ने भी झंगोरे सहित परंपरागत भोजनों का स्वाद नहीं चखा है। विशेषज्ञों का मानना है कि आधे से अधिक पर्वतीय परिवारों में अब झंगोरा नियमित भोजन का हिस्सा नहीं रह गया है। हालांकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Narendra Modi) की मिलेट मिशन (Millet Mission) पहल और संयुक्त राष्ट्र (United Nations) द्वारा वर्ष 2023 को अंतरराष्ट्रीय मोटा अनाज वर्ष (International Year of Millets) घोषित किये जाने के बाद झंगोरा सहित पारंपरिक अनाजों की ओर लोगों का ध्यान फिर से गया है।
झंगोरे की खीर बनी उत्तराखंड की स्वादिष्ट पहचान-ऐसे बनती है
उत्तराखंड के पारंपरिक व्यंजनों की चर्चा झंगोरे की खीर (Jhangora Kheer) के बिना अधूरी मानी जाती है। गढ़वाल और कुमाऊं में विवाह, त्योहार, पूजा-अर्चना तथा विशेष अवसरों पर इसे बनाया जाता है। झंगोरे को साफ कर कुछ समय पानी में भिगोया जाता है। इसके बाद दूध में धीमी आंच पर पकाकर उसमें गुड़ अथवा चीनी मिलायी जाती है। स्वाद और सुगंध बढ़ाने के लिए इलायची, केसर, बादाम, काजू और किशमिश डाली जाती है।
पर्यटकों के बीच भी झंगोरे की खीर तेजी से लोकप्रिय हुई है। उत्तराखंड आने वाले अनेक पर्यटक स्थानीय भोजन के रूप में इसे विशेष रूप से चखना पसंद करते हैं। इसका स्वाद सामान्य चावल की खीर से अलग और अधिक गाढ़ा माना जाता है।
क्यों बढ़ रही है झंगोरे की मांग ?
स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार झंगोरा प्राकृतिक रूप से ग्लूटेन-फ्री (Gluten Free) अनाज है। इसमें रेशा (Fiber), कैल्शियम (Calcium), आयरन (Iron) और अन्य पोषक तत्व पर्याप्त मात्रा में पाए जाते हैं। यह अपेक्षाकृत आसानी से पच जाता है और लंबे समय तक ऊर्जा प्रदान करता है। यही कारण है कि स्वास्थ्य के प्रति जागरूक लोग तथा फिटनेस को महत्व देने वाले युवा इसे सुपर फूड (Super Food) के रूप में अपने भोजन में शामिल करने लगे हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि झंगोरा केवल एक अनाज नहीं, बल्कि जलवायु परिवर्तन, टिकाऊ कृषि और स्थानीय खाद्य सुरक्षा से भी जुड़ा हुआ है। कम पानी में तैयार होने वाली यह फसल भविष्य की कृषि आवश्यकताओं के अनुरूप मानी जा रही है।
मुख्य न्यायाधीश के वीडियो के बाद झंगोरा एक बार फिर चर्चा में है, लेकिन इससे भी महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या उत्तराखंड अपने पारंपरिक खाद्यान्नों को फिर से दैनिक जीवन में स्थान दिला पाएगा। यदि ऐसा होता है तो यह केवल स्वास्थ्य के लिए ही नहीं, बल्कि पहाड़ की कृषि, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण के लिए भी महत्वपूर्ण कदम होगा।
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डॉ.नवीन जोशी, पिछले 20 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय, ‘कुमाऊँ विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में पीएचडी की डिग्री प्राप्त पहले और वर्ष 2015 से उत्तराखंड सरकार से मान्यता प्राप्त पत्रकार हैं। 15 लाख से अधिक नए उपयोक्ताओं के द्वारा 150 मिलियन यानी 1.5 करोड़ से अधिक बार पढी गई आपकी अपनी पसंदीदा व भरोसेमंद समाचार वेबसाइट ‘नवीन समाचार’ के संपादक हैं, साथ ही राष्ट्रीय सहारा, हिन्दुस्थान समाचार आदि समाचार पत्र एवं समाचार एजेंसियों से भी जुड़े हैं। देश के पत्रकारों के सबसे बड़े संगठन ‘नेशनल यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट्स (इंडिया) उत्तराखंड’ के उत्तराखंड प्रदेश के प्रदेश महामंत्री भी हैं और उत्तराखंड के मान्यता प्राप्त राज्य आंदोलनकारी भी हैं। डॉ. जोशी के बारे में विस्तार से पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।
नवीन समाचार’ विश्व प्रसिद्ध पर्यटन नगरी नैनीताल से जून 2009 से इंटरननेट-वेब मीडिया पर सक्रिय, उत्तराखंड का सबसे पुराना ऑनलाइन पत्रकारिता में सक्रिय समूह है। यह उत्तराखंड शासन से मान्यता प्राप्त रहा, अलेक्सा रैंकिंग के अनुसार उत्तराखंड के समाचार पोर्टलों में अग्रणी, गूगल सर्च पर उत्तराखंड के सर्वश्रेष्ठ, भरोसेमंद समाचार पोर्टल के रूप में अग्रणी, समाचारों को नवीन दृष्टिकोण से प्रस्तुत करने वाला ऑनलाइन समाचार पोर्टल भी है।























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