दसवीं की नाबालिग छात्रा के बच्चे को जन्म देने पर शिक्षक पर लगे थे दुष्कर्म के आरोप, लेकिन डीएनए जांच पलटा मामला, मृत नवजात का पिता गांव का किशोर निकला; शिक्षक की भूमिका पर जांच जारी

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अस्कोट प्रकरण में डीएनए जांच से खुला राज, मृत नवजात का पिता गांव का किशोर निकला; शिक्षक की भूमिका पर जांच जारी

नवीन समाचार, पिथौरागढ़, 5 नवंबर 2026 (Askot-Minor Found Rapist of Minor Girl)। उत्तराखंड के पिथौरागढ़ (Pithoragarh) जनपद के अस्कोट (Askot) क्षेत्र में दसवीं की नाबालिग छात्रा के गर्भवती होने और मृत नवजात के अवशेष मिलने के चर्चित मामले में डीएनए जांच से नया खुलासा हुआ है। जिस विद्यालय के शिक्षक योगेश कुमार पांडे पर छात्रा ने दुष्कर्म का आरोप लगाया था, उसके डीएनए नमूने मृत नवजात के नमूनों से मेल नहीं खाए।

Askot-Minor Found Rapist of Minor Girl, (Dogs Were Tearing Lifeless Body of Newborn Baby)आगे की जांच में गांव के ही एक किशोर का डीएनए नवजात के जैविक पिता के रूप में मेल खा गया। पुलिस ने किशोर को संरक्षण में लेकर किशोर न्याय बोर्ड के समक्ष प्रस्तुत किया, जहां से उसे राजकीय बाल संप्रेक्षण गृह अल्मोड़ा भेज दिया गया। हालांकि, इस वैज्ञानिक जांच से शिक्षक की नवजात के जैविक पिता के रूप में भूमिका समाप्त हुई है, लेकिन छात्रा के साथ कथित दुष्कर्म के मामले में उसकी भूमिका की जांच अभी जारी है।

पुलिस से प्राप्त जानकारी के अनुसार, अस्कोट कोतवाली में शिक्षक योगेश कुमार पांडे के विरुद्ध भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 65(1) और लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम (POCSO Act) की धाराओं 5 और 6 के तहत अभियोग पंजीकृत किया गया था। पुलिस ने 24 जुलाई 2026 को इस मामले में न्यायालय में आरोपपत्र भी दाखिल किया था। इसके बाद प्राप्त हुई डीएनए जांच रिपोर्ट ने विवेचना को नया मोड़ दे दिया।

नवजात के अवशेषों की बरामदगी बनी जांच की अहम कड़ी

मामला इस वर्ष 5 जून को सामने आया था। दसवीं कक्षा में पढ़ने वाली छात्रा की तबीयत बिगड़ने पर परिजन उसे कनालीछीना प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (PHC) लेकर पहुंचे थे। चिकित्सकीय जांच में सामने आया कि गर्भपात के बाद अधिक रक्तस्राव होने के कारण उसकी हालत बिगड़ी थी। छात्रा नाबालिग होने के कारण स्वास्थ्य केंद्र के कर्मचारियों ने इसकी सूचना पुलिस को दी।

पूछताछ के दौरान छात्रा ने अपने विद्यालय के शिक्षक पर दुष्कर्म का आरोप लगाया। इसके आधार पर पुलिस ने शिक्षक को गिरफ्तार कर लिया। जांच आगे बढ़ी तो यह भी पता चला कि छात्रा ने लगभग छह से सात माह के गर्भ के मृत शिशु को जन्म दिया था। उसके अवशेष गांव के आसपास गधेरे और जंगल क्षेत्र में फेंके जाने की बात सामने आई।

नवजात के अवशेषों की तलाश के लिए 10 जून को पुलिस की लगभग 40 सदस्यीय टीम ने गांव के आसपास जंगल और गधेरे के क्षेत्रों में तलाशी अभियान चलाया। इस दौरान नवजात के अवशेष बरामद हुए। इसके बाद पुलिस ने उन्हें वैज्ञानिक जांच के लिए क्षेत्रीय विधि विज्ञान प्रयोगशाला (RFSL), रुद्रपुर भेजा। यही अवशेष आगे चलकर मामले की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी साबित हुए।

पहले शिक्षक के डीएनए का मिलान नहीं हुआ, फिर दो संदिग्धों के नमूने भेजे

पुलिस ने मृत नवजात के जैविक नमूनों के साथ शिक्षक के डीएनए नमूनों की भी जांच कराई। क्षेत्रीय विधि विज्ञान प्रयोगशाला रुद्रपुर से प्राप्त रिपोर्ट में दोनों का डीएनए मेल नहीं खाया। इससे यह स्पष्ट हुआ कि शिक्षक मृत नवजात का जैविक पिता नहीं था।

इसके बाद पुलिस ने जांच को आगे बढ़ाते हुए दो अन्य संदिग्ध व्यक्तियों के रक्त नमूने एकत्र किए और 12 अक्टूबर को दोबारा परीक्षण के लिए रुद्रपुर प्रयोगशाला भेजे। प्राप्त रिपोर्ट में एक किशोर का डीएनए मृत नवजात के नमूनों से मेल खा गया। इस तरह किशोर के नवजात का जैविक पिता होने की पुष्टि हुई।

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अस्कोट के प्रभारी निरीक्षक रवींद्र यादव के अनुसार, डीएनए जांच में किशोर के मृत शिशु का जैविक पिता होने की पुष्टि हुई है। इसके बाद उसे संरक्षण में लेकर राजकीय बाल संप्रेक्षण गृह अल्मोड़ा भेजा गया। पिथौरागढ़ के पुलिस अधीक्षक अक्षय प्रह्लाद कोंडे ने भी किशोर को किशोर न्याय बोर्ड के समक्ष प्रस्तुत किए जाने और बोर्ड की प्रक्रिया के तहत संप्रेक्षण गृह भेजे जाने की पुष्टि की है।

शिक्षक की भूमिका को लेकर पुलिस ने जांच समाप्त नहीं मानी

इस मामले में डीएनए रिपोर्ट को शिक्षक के विरुद्ध लगाए गए सभी आरोपों का खंडन मानना उचित नहीं होगा। पुलिस के हवाले से स्पष्ट किया गया है कि शिक्षक की भूमिका को अभी पूरी तरह नकारा नहीं गया है। शुरुआती पूछताछ में छात्रा ने शिक्षक पर दुष्कर्म का आरोप लगाया था।

इसी रिपोर्ट के अनुसार, शिक्षक के मोबाइल फोन की प्रारंभिक जांच में छात्राओं के आपत्तिजनक फोटो और वीडियो भी मिले थे। पुलिस ने इन्हें साक्ष्य के तौर पर सुरक्षित रखा है। रिपोर्ट में बताया गया है कि संबंधित शिक्षक की पूर्व तैनाती चमोली से लेकर पिथौरागढ़ तक रही थी और मोबाइल में मिली सामग्री की जांच भी मामले का हिस्सा है।

इसलिए डीएनए जांच से केवल मृत नवजात के जैविक पिता की पहचान हुई है। इससे यह अपने-आप साबित नहीं होता कि छात्रा के साथ शिक्षक ने कोई अपराध नहीं किया। किशोरी की शिकायत, मोबाइल से प्राप्त सामग्री और अन्य साक्ष्यों के आधार पर शिक्षक की भूमिका की अलग से जांच आवश्यक बनी हुई है।

डीएनए जांच ने बदला मामले का रुख

इस पूरे प्रकरण में मृत नवजात के अवशेषों की बरामदगी और उनके वैज्ञानिक परीक्षण ने पुलिस की जांच को महत्वपूर्ण दिशा दी। शुरुआती शिकायत और बयानों के आधार पर शिक्षक गिरफ्तार हुआ तथा उसके विरुद्ध आरोपपत्र भी न्यायालय में दाखिल किया गया था। बाद में डीएनए रिपोर्ट आने पर पुलिस को दो अन्य संदिग्धों के नमूने लेकर जांच आगे बढ़ानी पड़ी। अंततः गांव के एक किशोर के जैविक पिता होने की पुष्टि हुई।

इस मामले में एक ओर किशोर न्याय व्यवस्था के तहत नाबालिग के विरुद्ध आगे की प्रक्रिया चलेगी, वहीं दूसरी ओर छात्रा के साथ कथित दुष्कर्म के आरोप और शिक्षक के मोबाइल से मिली सामग्री की जांच का प्रश्न बना हुआ है। अब पुलिस की आगे की विवेचना और न्यायालय में प्रस्तुत होने वाले साक्ष्य यह तय करने में महत्वपूर्ण होंगे कि इस प्रकरण में किन लोगों की क्या भूमिका रही।

नाबालिग छात्रा की पहचान और उससे जुड़े निजी विवरणों को सार्वजनिक करना कानूनन प्रतिबंधित है। इसलिए उसकी पहचान उजागर करने वाली जानकारी प्रकाशित नहीं की गई है।

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