नये वर्ष में ठंड कम, बारिश अधिक कराएगा अल नीनो !

  • पिछले वर्षों में अतिवृष्टि के रूप में अपना प्रभाव दिखा चुके अल-नीनो के बाबत यूजीसी के दीर्घकालीन मौसम विशेषज्ञ डा. बीएस कोटलिया का दावा
  • अल नीनो के प्रभाव में सर्दियों में आईटीसीजेड को पर्वतीय राज्यों तक नहीं धकेल पाएगा दक्षिण-पश्चिमी मानसून
    नवीन जोशी, नैनीताल। उत्तर भारत में बारिश को तरस रही सर्दियों का क्रम आने वाले नये वर्ष में भी बना रह सकता है। अलबत्ता नए वर्ष 2018 में मानसूनी वर्षा अच्छी मात्रा में हो सकती है। यह दावा यूजीसी के दीर्घकालीन मौसम विशेषज्ञ डा. बहादुर सिंह कोटलिया ने वैश्विक मौसम को प्रभावित करने वाले ‘भाई-बहन’ अल नीनो व ला नीना के अध्ययन के जरिए किया है।

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खुल गया जसपुर में मिले डायनासोर के कंकाल का राज

पिछले वर्ष 19 नवंबर 2017 को तराई पश्चिमी वन प्रभाग के अंतर्गत जसपुर के बिजली घर में स्टोर की सफाई के दौरान मिले डायनासोर की तरह दिखने वाले कंकाल की गुत्थी सुलझ गई है। वन्य जीव संस्थान देहरादून ने कंकाल की डीएनए जांच के बाद उसके बिल्ली प्रजाति का होने की पुष्टि की है। उल्लेखनीय … Read more

विश्व व भारत में पत्रकारिता का इतिहास

डॉ. नवीन जोशी @ नवीन समाचार, नैनीताल। मानव सभ्यता करीब 150-200 करोड़ वर्ष पुरानी मानी जाती है। उत्तराखंड के कालागढ़ के निकट मिले करीब 150 करोड़ वर्ष पुराने ‘रामा पिथेकस काल’ (Ramapithecus age) के माने जाने वाले एक मानव जीवाश्म से भी इसकी पुष्टि होती है। लेकिन मानव में संचार के जरूरी मूलभूत ज्ञानेंद्रियों का … Read more

सच्चा न्याय दिलाने वाली माता कोटगाड़ी : जहां कालिया नाग को भी मिला था अभयदान

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📅🌧️🏔️🕯️18 सितम्बर : नैनीताल के साथ पूरे उत्तराखंड वासियों वालों के लिए सबक लेने का दिन

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18 सितंबर पर विशेष: आज का दिन याद कर कांपती है रूह, पर याद नहीं किये सबक-कमजोर भूगर्भीय संरचना के शहर के सुरक्षित बचे रहने में है बड़ी भूमिकाडॉ. नवीन जोशी, नवीन समाचार, नैनीताल, 18 सितंबर 2025 (18 September 1880)। 18 की तिथि सरोवरनगरी के लिये बेहद महत्वपूर्ण है। 18 नवंबर 1841 को ही इस … Read more

‘पेपरलेस’ होने की ओर बढ़ा देश, सभी राज्य विधानसभाएं होंगी ‘पेपरलेस’

कुमाऊं विश्वविद्यालय ‘ऑनलाइन प्रवेश प्रक्रिया’ के जरिये हर वर्ष बचायेगा 1785 से अधिक पेड़, परीक्षार्थियों के बचेंगे 2.6 करोड़ रुपये

New Doc 2017-07-17_1_Kumaon University Paperless-विवि ने पहली बार मांगे थे ऑनलाइन आवेदन, 24 राज्यों से 48 हजार ने किये ऑनलाइन आवेदन, गत वर्ष के मुकाबले आठ हजार अधिक आये आवेदन
-आवेदनों की संख्या पिछले वर्ष के मुकाबले करीब आठ हजार और पिछली बार हो पाये प्रवेशों से करीब 18 हजार अधिक, लिहाजा प्रवेश के लिये होगी अधिक मारामारी
नवीन जोशी, नैनीताल। कुमाऊं विश्वविद्यालय ने ऑनलाइन प्रवेश प्रक्रिया आयोजित करने के बाद देश भर में अपनी पहचान बनाने में सफलता पाई है। अब तक उत्तराखंड सहित कुछ ही प्रदेशों के छात्रों को अपने यहां प्रवेश के लिये आकर्षित कर पाने वाले राज्य सरकार के इस इकलौते विवि में इस बार देश के 24 राज्यों से 48 हजार 41 छात्र-छात्राओं ने प्रवेश के लिये आवेदन किये हैं। खास बात यह भी है कि इस बार आये आवेदन पिछले वर्ष के आवेदनों से करीब आठ हजार और पिछली बार हो पाये प्रवेशों से करीब 18 हजार अधिक हैं। इसलिये सभी प्रवेशार्थियों को प्रवेश मिल पायेगा, इस बात की संभावना कम है, साथ ही आगे प्रवेश के लिये होने वाली काउंसिलिंग की प्रक्रिया में कड़ी प्रतिस्पर्धा देखने को मिल सकती है।

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यह भी पढ़ें : मुख्यमंत्री को ‘चोर-उचक्के’ कहने वाली शिक्षिका ने अब बताया ‘पिता तुल्य’, मांगी मांफी

पिछले सप्ताह उत्तराखंड के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत को जनता दरबार में ‘चोर-उचक्के’ तक कह जाने वाली निलंबित शिक्षिका उत्तरा पंत बहुगुणा ने अब मुख्यमंत्री को ‘पिता तुल्य’ बताया है, और उनसे माफी मांग ली है। सोशल मीडिया पर आये एक वीडियो में उत्तरा कहती सुनी जा रही हैं कि वह ट्रांसफर के लिए मुख्यमंत्री के जनता दरबार में गयी थीं। क्योंकि वह पिछले 25 वर्षों से अपने घर से बाहर हैं। इधर 2015 में उनके पति का निधन हुआ, जिसके बाद से उनके बच्चों का घर पर कोई सहारा नहीं है। इसलिए ही वह अपना स्थानांतरण चाह रही थीं। और मुख्यमंत्री के जनता दरबार में गयी थीं। वहां इतने वर्षों से अंदर भरा हुआ गुस्सा बाहर निकल गया। उन्होंने पिता तुल्य अभिभावक के समक्ष अपनी शिकायत गुस्से के रूप में की। मुझसे जो गलती हुई है, उसे वह क्षमा करें। मेरे साथ शिक्षा विभाग के कारण काफी बुरा हुआ है।

शिक्षिका उत्तरा पंत के व्यवहार में अचानक आया यह परिवर्तन सोमवार को शिक्षा निदेशक आरके कुंवर एवं मंगलवार को शिक्षा मंत्री अरविंद पांडे से मिलने के बाद और इस मामले में बुरी तरह से घिरी राज्य सरकार के ‘डैमेज कंट्रोल’ का परिणाम माना जा रहा है। इससे सरकार व सत्तारूढ़ भाजपा को तो जरूर राहत मिलेगी, परंतु अपने राजनीतिक हितों के लिए उसे बिन मांगे समर्थन देने जुटे और सरकार को घेर रहे विपक्ष की किरकिरी होनी भी तय है।
इधर मुख्यमंत्री के लिए अपशब्दों का प्रयोग करने के बाद राष्ट्रीय मीडिया में भी छा चुकी और गत दिवस हाईकोर्ट की शरण में भी जाने की बात कहने वाली उत्तरा पंत को मंगलवार को टीवी के ‘बिग बॉश’ शो से भी फोन आने की खबर है।

यह भी पढ़ें: तब भी कुछ यही हुआ था: त्रिवेंद्र रावत-उत्तरा, हरीश रावत-उमा प्रकरण कुछ अलग हैं क्या ?

उत्तराखंड के चौथे विधानसभा चुनावों के बाद जब त्रिवेंद्र सिंह रावत मुख्यमंत्री बने थे, तो हमने ‘नवीन समाचार’ में सुर्खी लगाई थी, ‘फिर रावत सरकार’। हमारी सुर्खी के मायने शायद तब इतने ही समझ आये हों कि इससे पूर्व उत्तराखंड में हरीश चंद्र सिंह रावत की सरकार थी और अब त्रिवेंद्र रावत की सरकार बन रही है। ‘फिर रावत सरकार’ पिछले मुख्यमंत्री हरीश रावत का चुनावी नारा भी था। लेकिन हमारा इशारा केवल जाति नाम ‘रावत’ और चुनावी नारे तक ही सीमित नहीं था, बल्कि जो आगे दिखाई दे रहा था, उसकी ओर भी था। अब रावत सरकार के करीब सवा वर्ष के कार्यकाल के बाद, खासकर शिक्षिका उत्तरा पंत बहुगुणा के सीएम त्रिवेंद्र रावत के जनता दरबार में हुए हंगामे और उनके निलंबन आदेशों के साथ यह बात सही साबित होती दिख रही है।
थोड़ा सा याददाश्त पर जोर दें, तो एक और ऐसी ही घटना याद आ जाएगी। यह संयोग ही है कि ऐसी ही वह घटना पिछली हरीश रावत सरकार के कार्यकाल में नवंबर 2016 में हल्द्वानी के एफटीआई मैदान में उनके ही पुत्र आनंद रावत द्वारा आयोजित कुमाउनी क्विज प्रतियोगिता के दौरान भी घटी थी। उत्तरा की ही ‘नाम-जाति राशि की’ बिंदूखत्ता निवासी अशासकीय विद्यालय में 13 वर्षों से मात्र 5 हजार रुपए के वेतन पर कार्यरत शिक्षिका उमा पांडे अपने स्कूल को सरकारी ग्रांट न मिलने को लेकर मुख्यमंत्री हरीश रावत के कदमों पर फूट-फूट कर रोई थी और मुख्यमंत्री हरीश रावत हंसते रहे थे। शिक्षिका को बमुश्किल पुलिस की मदद से कार्यक्रम स्थल से बाहर किया गया था। आज भी उत्तरा पंत बहुगुणा को मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र रावत के जनता दरबार से पुलिस के द्वारा बाहर किया गया। कस्टडी में लेने के आदेश हुए, सो अलग।
इससे कुछ बातें साफ होती हैं। सरकार मुख्यमंत्री हरीश रावत की हो, अथवा त्रिवेंद्र रावत की, उसमें महिलाओं क्या किसी भी जरूरतमंद के लिए कोई संवेदनशीलता नहीं होती है। मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठा व्यक्ति स्वयं को राजा मानता है। भले ही वह राजशाही की तरह पीढ़ी-दर-पीढ़ी प्रधानमंत्री बनने का अधिकार लेकर पैदा हुए राहुल गांधी द्वारा मुख्यमंत्री बनाये गये हरीश रावत हों, अथवा स्वयं को ‘प्रधान सेवक’ कहने वाले नरेंद्र मोदी द्वारा मुख्यमंत्री बनाये गये त्रिवेंद्र रावत।
वहीं केवल ताजा घटना की ही बात करें तो महिला-विधवा शिक्षिका उत्तरा पंत द्वारा मुख्यमंत्री के लिए सार्वजनिक तौर पर ‘चोर-उचक्के’ जैसे शब्दों के प्रयोग को कत्तई सही नहीं ठहराया जा सकता। खासकर एक महिला शिक्षिका होते, जिसका दर्जा गुरु के रूप में देवताओं से भी ऊपर तथा एक महिला और मां के रूप में समन्वित तौर पर साक्षात ‘गुर्रुब्रह्मा’ की ब्रह्माणी यानी माता सरस्वती के समान होता है, और उनसे समाज को सही शब्दों के साथ सही दिशा देने की अपेक्षा रहती है। वहीं सरकारी नौकरी कर रहे उम्रदराज सैनिक और सैन्य अधिकारी अपना घर बार छोड़ सियाचिन व लद्दाख में भी नौकरी कर रहे हैं। सो परिवार भी देखने और नौकरी भी करने की महिला शिक्षिका की चाह भी सही नहीं ठहराई जा सकती।
अलबत्ता, मुख्यमंत्री रावत ने उन्हें उनके निवेदन पर प्राथमिक शिक्षा विभाग में ‘जिला कैडर’ होने की याद दिलायी, जिसके तहत जिलों से बाहर अंर्तजिला स्थानांतरण होने पर शिक्षकों को अपनी वरिष्ठता खोनी पड़ती है। पता नहीं शिक्षिका उत्तरा पंत अपनी नौकरी के आखिरी पड़ाव में अंर्तजिला स्थानांतरण किये जाने पर अपनी 25 वर्ष की वरिष्ठता खोने को तैयार हैं अथवा नहीं। मुख्यमंत्री रावत की धर्मपत्नी सुनीता रावत ने अपनी आठ वर्ष की सेवा के बाद ही पौड़ी से देहरादून जिले को अंर्तजिला स्थानांतरण करा लिया था। शायद वरिष्ठता भी खोई हो। मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र रावत ने उन्हें सरकारी नौकरी शुरू करने से पहले नियमों के पालन करने के लिए स्वीकार की जाने वाली सेवा नियमावली भी याद दिलाई, यहां तक सब ठीक मान भी लिया जाये तो भी यह मानना पड़ेगा कि मुख्यमंत्री रावत ने इस घटना के साथ एक राजनीतिज्ञ के लिए अपेक्षित धैर्य खोकर स्वयं की बुद्धिमत्ता और संवेदनशीलता (या कि मूर्खता और संवेदनहीनता) का सैकड़ों कैमरों के बीच स्वयं नग्न प्रदर्शन कर दिया है। उनकी स्थिति कालीदास की तरह नजर आ रही है, जिन्हें काफी समय से विद्वान बना कर रखा गया था, लेकिन आज वे ‘उट्र-उट्र’ कर बैठे हैं।
इस संबंध में एक और घटना याद हो आती है। नैनीताल क्लब के खचाखच भरे सभागार में मुख्यमंत्री बनने के बाद पहले बड़े सार्वजनिक कार्यक्रम में स्थानीय विधायक संजीव आर्य एक समस्या रखते हैं। वे कहते हैं, ‘हमारी कई सड़कें स्वीकृत हैं। धन भी उपलब्ध है। लेकिन उनकी विधानसभा के साथ ही पूरे प्रदेश में सड़कों के बदले किये जाने वाले प्रतिपूरक वृक्षारोपण के लिए वन भूमि उपलब्ध नहीं है। अलबत्ता प्रदेश में सिविल सोयम की काफी भूमि निरुपयोगी पड़ी है। मुख्यमंत्री जी से निवेदन है कि वे वन भूमि की जगह सिविल सोयम की भूमि पर प्रतिपूरक वृक्षारोपण कराने की अनुमति प्रदान करने हेतु कुछ करें।’ उनके बाद मुख्यमंत्री का आधा भाषण 20 रुपए में बनने वाली एक ऐसी करिश्माई बोतल पर चलता है, जिसका रिस्पना नदी की सफाई में प्रयोग किया जा रहा है, और जिसे हर घर में तैयार किया जा सकता है और इससे हर कहीं गंदगी से पटे नालों को ‘खुशबूदार’ बनाया जा सकता है। यह अलग बात है कि वह करिश्माई बोतल आज तक कहीं नजर नहीं आई। अलबत्ता वे विधायक की बात पर कहते हैं, ‘मैं घोषणाएं नहीं करता हूं। लेकिन विधायक जी कह रहे हैं तो यहां-वहां से, सड़कों के निर्माण के लिए 5 करोड़ रुपए देने की घोषणा करता हूं।’ यानी विधायक आर्य की वन-सिविल सोयम भूमि की बात कहीं हवा में ही उड़ गयी, अथवा उनकी समझ में ही नहीं आयी।
यह ठीक है कि मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र रावत की छवि आमतौर पर शालीन राजनीतिज्ञ की मानी जाती है। वे हरीश रावत की तरह, केवल कुछ चुनिंदा चाटुकारों से घिरे और उन्हें छोड़कर अन्य के खिलाफ मौका ढूंढ-ढ़ूंढकर जहर उगलने वाले अधिक वाचाल व तिकड़मी राजनीतिज्ञ नहीं हैं, जो घर के भीतर उगाये जाने वाले पवित्र हरेले को कुछ सौ रुपए के ईनाम के लिए गांव के चौराहे पर सार्वजनिक प्रदर्शन के लिए लाने और वह मामूली इनाम भी सबको न पहुंचा पाने जैसी योजनाएं लाते हैं। कभी रिक्शे-नाव में सफर करने तथा बाजार में पकोड़े खाने, काफल पार्टी करने के साथ ही आंखों पर दूरबीन लगाकर केदारनाथ जाने व भजन-कीर्तन करने में भी शुद्ध नौटंकी करते हैं। वहीं करीब छः महीने के कार्यकाल के बाद भी त्रिवेन्द्र रावत सरकार के काम तो धरातल पर कुछ दिखाई नहीं दे रहे हैं, अलबत्ता मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र रावत हरीश रावत की तरह ही हमेशा ‘प्लेन’ से नहीं कभी आम आदमी की तरह ‘ट्रेन’ से भी सफर कर लेते हैं। सुबह देहरादून से हल्द्वानी आते हैं, और दिन भर काम निपटाकर शाम तक लौट जाते हैं। लेकिन राज्य और राज्य की जनता के हितों के मोर्चे पर बरती जाने वाली संवेदनशीलता के मोर्चे पर वे कहीं से भी वे अपनी सरकार के कार्यों की तरह हरीश रावत से श्रेष्ठ नहीं दीखते। (नवीन जोशी, , 28 जून 2018)

पूर्व आलेख : उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2017 : फिर रावत की, पर ‘डबल इंजन’ सरकार

आखिर 17 की किशोर वय और चौथी विधानसभा में ही उत्तराखंड को 9वां (बदलते हुए 10वां) मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत के रूप में मिलना तय हो गया है। पिछले सीएम हरीश रावत का ‘फिर रावत सरकार’ का नारा भी एक अर्थ में ‘त्रिवेन्द्र रावत’ की सरकार आने के साथ सही साबित हुआ है। लिहाजा, प्रदेश में लगातार दूसरी बार ‘रावत सरकार’ ही होगी, अलबत्ता दुआ करनी होगी कि यह वाली रावत सरकार पिछली (हरीश रावत वाली) रावत सरकार जैसी ‘राज्य को काट-पीट कर खा जाओ’ और ‘सब कुछ अपनी जेब में भरो’ वाली नहीं होगी, बल्कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के वादे के अनुरूप ‘डबल इंजन’ वाली सरकार होगी। मालूम हो कि राज्य में भाजपा ने उत्तराखंड में करिश्माई प्रदर्शन करते हुए 70 में से 57 सीटें हासिल की हैं, जबकि पिछले बार 2012 में उससे एक सीट अधिक जीतने वाली कांग्रेस 11 सीट पर आकर सिमट गयी है।

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देवभूमि के कण-कण में ‘देवत्व’: विश्व हिंदी सम्मेलन के संयोजक व अंतर्राष्ट्रीय पत्रकार डा. अशोक ओझा के हाथों हुआ विमोचन

नैनीताल। अमेरिका में हिंदी के जरिये रोजगार के अवसर विषयक कार्यक्रम के दौरान विश्व हिंदी सम्मेलन के संयोजक, अमेरिकी सरकार समर्थित स्टारटॉक हिंदी कार्यक्रम के निदेशक व अंतर्राष्ट्रीय पत्रकार डा. अशोक ओझा, उत्तराखंड मुक्त विवि के पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग के निदेशक डा. गोविंद सिंह, कुमाऊं विवि के कुलपति प्रो. एचएस धामी, कला संकायाध्यक्ष प्रो. … Read more

भद्रकालीः जहां वैष्णो देवी की तरह त्रि-पिंडी स्वरूप में साथ विराजती हैं माता सरस्वती, लक्ष्मी और महाकाली

ॐ जयन्ती मंगला काली भद्रकाली कपालिनी।
दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोस्तुते।।

कहते हैं आदि-अनादि काल में सृष्टि की रचना के समय आदि शक्ति ने त्रिदेवों-ब्रह्मा, विष्णु व महेश के साथ उनकी शक्तियों-सृष्टि का पालन व ज्ञान प्रदान करने वाली ब्रह्माणी यानी माता सरस्वती, पालन करने वाली वैष्णवी यानी माता लक्ष्मी और बुरी शक्तियों का संहार करने वाली शिवा यानी माता महाकाली का भी सृजन किया। सामान्यतया अलग-अलग स्थानों पर प्रतिष्ठित रहने वाली यह तीनों देवियां कम ही स्थानों पर एक स्थान पर तीनों के एकत्व स्वरूप् में विराजती हैं। ऐसा एक स्थान है माता का सर्वोच्च स्थान बताया जाने वाला वैष्णो देवी धाम।

माता भद्रकाली के मंदिर का गर्भगृह
माता भद्रकाली के मंदिर का गर्भगृह

लेकिन कम ही लोग जानते हैं कि देवभूमि कहे जाने वाले उत्तराखंड राज्य के कुमाऊं अंचल में भी एक ऐसा ही दिव्य एवं अलौकिक विरला धाम मौजूद है, जहां माता सरस्वती, लक्ष्मी और महाकाली एक साथ एक स्थान पर वैष्णो देवी की तरह ही स्वयंभू लिंग या पिंडी स्वरूप में आदि-अनादि काल से एक साथ माता भद्रकाली के रूप में विराजती हैं, और सच्चे मन से आने वाले अपने भक्तों को साक्षात दर्शन देकर उनके कष्टों का हरती तथा जीवन पथ पर संबल प्रदान करती हैं। इस स्थान को माता के 51 शक्तिपीठों में से भी एक माना जाता है। शिव पुराण में आये माता भद्रकाली के उल्लेख के आधार पर श्रद्धालुओं का मानना है कि महादेव शिव द्वारा आकाश मार्ग से कैलाश की ओर ले जाये जाने के दौरान यहां दक्षकुमारी माता सती की मृत देह का दांया गुल्फ यानी घुटने से नीचे का हिस्सा गिरा था।

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पर्यटन, हर्बल के बाद अब जैविक प्रदेश बनेगा उत्तराखंड

विभिन्न प्रकार के बीज
विभिन्न प्रकार के बीज

-प्रदेश के जैविक उत्पादों का बनेगा अपना राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय ब्रांड
-उत्तराखंड कृषि उत्पादन विपणन बोर्ड के प्रस्ताव को मुख्य मंत्री ने दी हरी झंडी
-राज्य में ही पहली बार लगने जा रही कलर सॉर्टिंग मशीनों से स्थानीय ख्याति प्राप्त उत्पाद राजमा, चौलाई, गहत, भट्ट आदि के जियोग्रेफिकल इंडेक्स बनेंगे
-इस हेतु रुद्रपुर में मंडी परिषद के द्वारा एक वर्ष के भीतर बनाया जाएगा 1500 टन क्षमता का कोल्ड स्टोर और तीन हजार टन क्षमता का गोदाम

नवीन जोशी, नैनीताल। देश में दालों की बढ़ती कीमतों के बीच यह खबर काफी सुकून देने वाली हो सकती है। अभी भी अपेक्षाकृत सस्ती मिल रहीं उत्तराखण्ड की जैविक दालें (मौंठ 50, भट्ट 70 तथा गहत और राजमा 120 रुपये प्रति किग्रा.) देश की महँगी दालों का विकल्प हो सकती हैं। पर्यटन और जड़ी-बूटी प्रदेश के रूप में प्रचारित उत्तराखंड एक नए स्वरूप में स्वयं को ढालने की राह पर चलने जा रहा है। यह राह है हर्बल प्रदेश बनने की, जिस पर अब तक पर्यटन और जड़ी-बूटी प्रदेश के रूप में प्रचारित किये जा रहे उत्तराखण्ड ने कदम बढ़ा दिए हैं। प्रदेश सरकार ने उत्तराखंड कृषि उत्पादन विपणन बोर्ड, मंडी परिषद, उत्तराखंड जैविक उत्पाद परिषद एवं कृषि एवं उद्यान आदि विभागों के संयुक्त तत्वावधान में प्रदेश को जैविक प्रदेश यानी जैविक उत्पादों का प्रदेश बनाने की कवायद शुरू कर दी है। इस कड़ी में राज्य के सभी पर्वतीय जिलों के 10 ब्लॉकों को जैविक ब्लॉक घोषित कर दिया गया है। रुद्रप्रयाग जिला जैविक जिले के रूप में विकसित किया जा रहा है, और आगे चमोली व पिथौरागढ़ को भी जैविक जनपद बनाने की तथा अगले चरण में सभी पर्वतीय जिलों को जैविक जिलों के रूप में विकसित किए जाने की योजना है। साथ ही प्रदेश के जैविक उत्पादों के लिए प्रदेश में ही बड़ी प्रोसेसिंग यूनिट स्थापित किए जाने को मुख्यमंत्री के स्तर से हरी झंडी मिल गई है। प्रस्तावित जैविक प्रदेश में जैविक खाद्यान्नों के साथ जैविक दालों के उत्पादन को भी बढ़ावा मिलेगा, ऐसी उम्मीद की जा सकती है।

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पंतनगर विवि की इस गलती से हजारों युवाओं की सांसें अटकीं

Pantnagar Univदेश के प्रतिष्ठित पंतनगर विश्वविद्यालय की एक लापरवाही से उत्तराखंड सहित देश भर के हजारों युवाओं की सांसें अटक गयी हैं। पंतनगर विवि ने आगामी तीन जून को स्नातक एवं एमसीए की परीक्षा की तिथि नियत कर दी है, जबकि इसी दिन देश के एक अन्य प्रतिष्ठित जिपमर यानी जवाहर लाल नेहरू मेडिकल इंस्टीट्यूट की प्रवेश परीक्षा पहले से तय है। हास्यास्पद एवं पंतनगर विवि के स्तर के विवि के लिए चिंताजनक बात यह भी है कि पंतनगर विवि के कुलपति को इस बात की जानकारी ही नहीं है, और जानकारी दिये जाने पर छात्रों के समक्ष बनी इस बड़ी दुविधा की स्थिति को लेकर कोई संवेदनशीलता नजर नहीं आ रही है। बताया गया है कि जिपमर की परीक्षा में करीब 3 लाख छात्र-छात्राएं शामिल हो रहे हैं। जबकि दो परीक्षाओं का एक ही दिन होना इतना गंभीर विषय है कि प्रभावित हो रहे दुविधाग्रस्त छात्र मुख्यमंत्री से लेकर प्रदेश के कुलाधिपति राज्यपाल तक से गुहार लगा रहे हैं।

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