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::ब्रेकिंग समाचार::तो आ गया उत्तराखंड में भूकंप का झटका ! भारत-नेपाल सीमा पर धारचूला के पास हुआ महसूस

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नैनीताल, 11 नवंबर 2018। मीडिया में कुछ दिनों से उत्तराखंड में बड़े भूकंप के आने की संभावनाएं जताते हुए आ रही खबरों के बीच रविवार अपराह्न 12 बजकर 37 मिनट पर भारत-नेपाल सीमा पर भूकंप के झटके पिथौरागढ़ जिला मुख्यालय को छोड़कर जिले के सीमांत धारचूला, मुन्स्यारी, डीडीहाट व थल आदि क्षेत्रों में महसूस किये गये। इससे लोग आशंकित हो उठे। साथ ही किसी भूकंप के कुछ देर बाद भी भूकंप के झटके दुबारा भी आने की भूतकाल की घटनाओं के मद्देनजर लोगों में आगे बड़ा झटका आने को लेकर चिंता देखी जा रही है। भारतीय मौसम विभाग के अनुसार भूकंप की तीव्रता रिक्टर स्केल पर 4.5 थी, और इसका केंद्र उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले में धारचूला से 4 किमी उत्तर में 29.88 अंश उत्तरी अक्षांश एवं 80.52 डिग्री दक्षिणी देशांतर के मध्य धरती से 20 किमी की गहराई पर था। अलबत्ता, अभी तक इस भूकंप से जान-माल के किसी तरह के नुकसान का कोई समाचार नहीं है।

पूर्व समाचार: उत्तरी भारत में अभी-अभी 6.2 तीव्रता के भूकंप के हलके झटके महसूस किये गए

बुधवार 31 जनवरी 2018 को उत्तर भारत में भूकंप के हल्के झटके महसूस किए गए। इसका केंद्र हिंदुकुश हिमालय क्षेत्र में अफगानिस्तान में 36.55 अंश उत्तरी अक्षांस व 70.87 अंश देशांतर के बीच काबुल से 272 किमी उत्तर में स्थानीय समय के अनुसार 11 बजकर छह मिनट 59 सेकेंड यानी भारतीय समय के अनुसार दोपहर 12 बजकर 6 मिनट 59 सेकेंड पर महसूस किया गया। नैनीताल में कुछ ही सेकेंड के लिए जमीन पर बैठे लोगों ने बहुत मामूली रूप से महसूस किया। बताया गया है कि इसकी रिक्टर स्केल पर तीव्रता 6.1 थी।

इसके उपरांत भी अपराह्न में अफगानिस्तान के हिंदुकुश क्षेत्र में अपराह्न 3 बजकर 31 मिनट 38 सेकेंड यानी भारतीय समयानुसार 4 बजकर 31 मिनट 38 सेकेंड पर भूकंप का एक और झटका महसूस किया गया। इसका केंद्र काबुल से 240 किमी उत्तर में यानी पहले झटके के करीब ही, तीव्रता रिक्टर स्केल पर 4 और धरती की सतह से 212 किमी की गहराई में बताई गयी है।

केदारनाथ के पास था 6 दिसंबर 2017 को रात्रि आये 5 magnitude के भूकंप का केंद्र

बुधवार 06 दिसंबर 2017 को रात्रि 8 बजकर 49 मिनट 54 सेकण्ड पर आये 5 मैग्नीट्यूड तीव्रता के भूकंप का केंद्र उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग क्षेत्र में केदारनाथ के पास कालीमठ घाटी स्थित स्वानसू में 30.71 N ; 79.27 E पर (मेरठ से 244 किमी उत्तरपूर्व, देहरादून से 126 किमी पूर्व व जोशीमठ से 33 किमी उत्तर पश्चिम में धरती से 10 किमी की गहराई पर था।

फिलहाल भूकंप से किसी तरह के नुक्सान की खबर नहीं है। अलबत्ता, रुद्रप्रयाग में कुछ घरों में दरारें आने की खबरें आ रही हैं। वैसे भी भूकंप के केंद्र का क्षेत्र निर्जन एवं संचार सुविधाओं के दृष्टिकोण से काफी दूर बताया जा रहा है। भूकंप पूरे उत्तराखंड के साथ ही दिल्ली व राजधानी क्षेत्र में महसूस किया गया है।

भूकंप : नेपाल से कम खतरनाक नहीं उत्तराखंड

-यहां अधिक लंबा है बड़े भूकंप न आने के कारण साइस्मिक गैप, इसलिए लगातार बढ़ती जा रही है बड़े भूकंपों की संभावना
-एमसीटी यानी मेन सेंट्रल थ्रस्ट पर है नेपाल में भूकंप का केंद्र, उत्तराखंड के धारचूला-मुन्स्यारी से होकर गुजरता है यही थ्रस्ट

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नवीन जोशी, नैनीताल। नेपाल के उत्तर पश्चिमी शहर लामजुम में शनिवार को आए रिक्टर स्केल पर 7.9 तीव्रता के भूकंप का भले उत्तराखंड के पहाड़ों पर सीधा फर्क न पड़ा हो, लेकिन इससे उत्तराखंड में भी लोग सशंकित हो उठे हैं। चिंताजनक यह भी है कि लोगों की आशंकाओं को वैज्ञानिक तथ्य भी स्वीकार कर रहे हैं। नेपाल और उत्तराखंड दोनों उस यूरेशियन-इंडियन प्लेट की बाउंड्री-मेन सेंट्रल थ्रस्ट यानी एमसीटी पर स्थित हैं, जो शनिवार को नेपाल में आये महाविनाशकारी भूकंप और पूरी हिमालय क्षेत्र में भूकंपों और भूगर्भीय हलचलों का सबसे बड़ा कारण है। और यही कारण है, जिसके चलते उत्तराखंड और नेपाल का बड़ा क्षेत्र भूकंपों के दृष्टिकोण से सर्वाधिक खतरनाक जोन-पांच में आता है। इसके अलावा भी उत्तराखंड में पिछले 200 वर्षों में बड़े भूकंप न आने के कारण साइस्मिक गैप अधिक लंबा है, और इसलिए यहां बड़े भूकंपों की संभावना लगातार बढ़ती जा रही है।

चिंता के बढ़ने का कारण इसलिये भी अधिक है कि उत्तराखंड में पिछले 200 वर्षों में इस श्रेणी के ‘ग्रेट अर्थक्वेक” नहीं आए हैं। इस क्षेत्र में सबसे बड़ा भूकंप 1905 में कांगड़ा (हिमांचल प्रदेश) में आया था। उत्तराखंड को इस लिहाज से ‘लॉक्ड सेगमेंट” भी कहा जाता है। भूवैज्ञानिक 1905 में कांगड़ा में आये भूकंप के बाद से उत्तराखंड में बड़ा भूकंप न आने के कारण यहां केंद्रीय कुमाऊं (अल्मोड़ा व बागेश्वर जनपद) एवं देहरादून में बड़े भूकंप आने की संभावना लगातार जताते रहे हैं। इस भूकंप को जबकि 120 वर्षों का समय हो चुका है, और औसतन 100 वर्ष में भूकंप आने की बात कही जाती है, इसलिये ऐसे भूकंप की आशंका वैज्ञानिकों द्वारा जताई जा रही है। 1991 में उत्तरकाशी व 1999 के चमोली के भूकंपों को इस लिहाज से छोटा बताया जाता है। कुमाऊं विवि के भूविज्ञान विभाग के अध्यक्ष प्रो. चारु चंद्र पंत ने नेपाल भूकंप के बाद आगे लगातार छोटे भूकंप (आफ्टर शॉक्स) आने की संभावना भी जताई है। ऐसे 6.6, 5.1 व 4.8 तीव्रता के भूकंप शनिवार को अपराह्न तक आ भी गए हैं। उनके अनुसार देखा गया है कि एक जगह भूकंप से धरती के भीतर तनाव निकल जाने के बाद तनाव के संतुलन के लिये कहीं और बड़ा भूकंप आ सकता है, पर यह कहां और कब आयेगा, यह नहीं कहा जा सकता। प्रो. पंत ने कहा नेपाल और उत्तराखंड की भूगर्भीय परिस्थितियां, चट्टानें देशों की सीमाओं से इतर भूगर्भीय दृष्टिकोण से बिलकुल एक जैसी हैं। ऐसी स्थितियों का सामना घबराने के बजाय आवश्यक सुरक्षा प्रबंधों के जरिये करने की जरूरत है।

हिमालय के युवा होने के कारण है गतिशीलता

नैनीताल। भू वैज्ञानिकों के अनुसार मध्य हिमालय में स्थित उत्तराखंड में अधिकतम 3800 मिलियन वर्ष पुरानी चट्टानें पाई गई हैं। वैसे मध्य हिमालय का क्षेत्र 560 मिलियन वर्ष पुराना बताया जाता है। यहां यह भी एक अनोखी बात यहां दिखती है कि अपेक्षाकृत पुराना मध्य हिमालय अपने से नये केवल 15 मिलियन वर्ष पुराने शिवालिक पहाड़ों के ऊपर स्थित हैं। भारतीय प्लेट अपने से मजबूत यूरेशियन प्लेट में हर वर्ष 55 मिमी की दर से समा रहा है, तथा स्वयं उठने के साथ-भूस्खलनों का शिकार भी होता रहता है। ऐसे में यहां कठोर व कमजोर पहाड़ों का एक-दूसरे के अंदर समाना एक सतत प्रक्रिया है। समाने की यह प्रक्रिया धरती के भीतर लीथोस्फेरिक व ऐस्थेनोस्फियर परतों के बीच होती है। इससे भू गर्भ में अत्यधिक मात्रा में ऊर्जा एकत्र होती है, जो ज्वालामुखी तथा भूकंपों के रूप में बाहर निकलती है। चूंकि भारतीय व तिब्बती प्लेटें उत्तराखंड के करीब से एक-दूसरे में समा रही हैं, इसलिये यहां भूकंपों का खतरा अधिक बढ़ जाता है। इधर यह खतरा इसलिये भी बढ़ता जा रहा है कि बीते 200 वर्षों में वर्ष 1905 के कांगड़ा व 1934 के ‘ग्रेट आसाम अर्थक्वेक” के बाद के 120 वर्षों में यहां आठ मैग्नीटूड से अधिक के भूकंप नहीं आऐ हैं, लिहाजा धरती के भीतर बहुत बड़ी मात्रा में ऊर्जा बाहर निकलने को प्रयासरत है।

अपेक्षा से कहीं अधिक है भूगर्भ में ऊर्जा

eq newsनैनीताल। भूवैज्ञानिकों के अनुसार अकेले एमसीटी ही अरुणांचल प्रदेश के नामचा बरुआ पर्वत से पाक अधिकृत कश्मीर के नंगा पर्वत तक करीब 2500 किमी लंबाई और करीब 60-65 किमी चौड़ाई में अनेकों दरारों के रूप में है। इतने बड़े क्षेत्रफल के एक-दूसरे में धंसने-समाने के फलस्वरूप कितनी अधिक मात्रा में ऊर्जा उत्पन्न होती होगी, इसका अंदाजा लगाना भी आसान नहीं है। इसका अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि रिक्टर स्केल पर एक और दो तीव्रता के भूकंपों के बीच 31.5 गुना अधिक भूगर्भीय ऊर्जा बाहर निकलती है, जबकि एक से तीन तीव्रता के भूकंपों के बीच ऊर्जा का अंतर 31.5 गुणा 31.5 गुणा होता है। इसी प्रकार एक और आठ तीव्रता के भूकंप की ऊर्जा का अंतर ज्ञात करने के लिए 31.5 को आपस में आठ बार गुणा करना होगा।

यह हैं उत्तराखंड में भूगर्भीय संवेदनशीलता के कारण

ऐसा होता है मूल भूकंप मापी यन्त्र

ऐसा होता है मूल भूकंप मापी यन्त्र

नैनीताल। भारत देश में भूकंपों और भूगर्भीय हलचलों का मुख्य कारण भारतीय प्लेट के उत्तर दिशा की ओर बढ़ते हुए तिब्बती प्लेट में धंसते जाने के कारण है। बताया जाता है कि करीब दो करोड़ वर्ष पूर्व भारतीय प्लेट तिब्बती प्लेट से टकराई थी, और इसी कारण उस दौर के टेथिस महासागर में इन दोनों प्लेटों की भीषण प्लेट से आज के हिमालय का जन्म हुआ था। आज भी दोनों प्लेटों के बीच यह गतिशीलता बनी हुई है, और इसकी गति करीब ५५ मिमी प्रति वर्ष है। इसके प्रभाव में ही गंगा-यमुना के मैदानों को शिवालिक पर्वत श्रृंखला से अलग करने वाले हिमालया फ्रंटल थ्रंस्ट, शिवालिक व लघु हिमालय को अलग करने वाले मेन बाउंड्री थ्रस्ट (एमबीटी), इसी तरह आगे रामगढ़ थ्रस्ट, साउथ अल्मोड़ा थ्रस्ट, नार्थ अल्मोड़ा थ्रस्ट, बेरीनाग थ्रस्ट व मध्य हिमालय से उच्च हिमालय को विभक्त करने वाले मेन सेंट्रल थ्रस्ट (एमसीटी) जैसे विभिन्न टैक्टोनिक सेगमेंट्स भी आपस में उत्तर दि%E

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मेरा जन्म 26 नवंबर 1972 को हुआ था। मैं नैनीताल, भारत में मूलतः एक पत्रकार हूँ। वर्तमान में मार्च 2010 से राष्ट्रीय हिन्दी दैनिक समाचार पत्र-राष्ट्रीय सहारा में ब्यूरो चीफ के रूप में कार्य कर रहा हूँ। इससे पहले मैं पांच साल के लिए दैनिक जागरण के लिए काम कर चुका हूँ। कुमाऊँ विश्वविद्यालय के पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग से ‘नए मीडिया’ विषय पर शोधरत हूँ। फोटोग्राफ़ी मेरा शौक है। मैं NIKON COOLPIX P530 और अडोब फोटोशॉप 7.0 के साथ फोटोग्राफी कर रहा हूँ। फोटोग्राफी मेरे लिए दुनियां की खूबसूरती को अपनी ओर से चिरस्थाई बनाने का बहुत छोटा सा प्रयास है। एक फोटो पत्रकार के रूप में मेरी तस्वीरों को नैनीताल राजभवन सहित विभिन्न प्रदर्शनियों में प्रस्तुत किया गया, तथा उत्तराखंड की राज्यपाल श्रीमती मार्गरेट अलवा द्वारा सम्मानित किया गया है। कुछ चित्रों को राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार भी प्राप्त हो चुके हैं। गूगल अर्थ पर चित्र उपलब्ध कराने वाली पैनोरामियो साइट पर मेरी प्रोफाइल को 18.85 Lacs से भी अधिक हिट्स प्राप्त हैं।पत्रकारिता और फोटोग्राफी के अलावा मुझे कवितायेँ लिखना पसंद है। काव्य क्षेत्र में मैंने नवीन जोशी “नवेन्दु” के रूप में अपनी पहचान बनाई है। मैंने बहुत सी कुमाउनी कवितायेँ लिखी हैं, कुमाउनी भाषा में मेरा काव्य संकलन उघड़ी आंखोंक स्वींड़ प्रकाशित हो चुका है, जो कि पुस्तक के के साथ ही डिजिटल (PDF) फार्मेट पर भी उपलब्ध होने वाली कुमाउनी की पहली पुस्तक है। मेरी यह पुस्तक गूगल एप्स पर भी उपलब्ध है। ’ यहां है एक पत्रकार, लेखक, कवि एवं छाया चित्रकार के रूप में मेरी रचनात्मकता, लेख, आलेख, छायाचित्र, कविताएं, हिंदी-कुमाउनी के ब्लॉग आदि कार्यों का पूरा समग्र। मेरी कोशिश है कि यहां नैनीताल, कुमाऊं, उत्तराखंड और वृहद संदर्भ में देश की विरासत, संस्कृति, इतिहास और वर्तमान को समग्र रूप में संग्रहीत करने की….। मेरे दिल में बसता है, मेरा नैनीताल, मेरा कुमाऊं और मेरा उत्तराखंड