News Politics

यशपाल-संजीव के साथ काऊ को भी करनी थी कांग्रेस में घर वापसी, पर अचानक कैसे बदला खेल और अब क्यों बदल गए हैं काऊ व हरक के सुर, जानें इनसाइड स्टोरी…

  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
समाचार को सुनने के लिए यहाँ क्लिक करें

डॉ. नवीन जोशी @ नवीन समाचार, नैनीताल, 14 अक्टूबर 2021। गत 11 अक्टूबर को यशपाल-संजीव के साथ भाजपा विधायक उमेश शर्मा ‘काऊ’ को भी कांग्रेस में घर वापसी करनी थी। ऐसी खबरें पुख्ता तौर पर मीडिया में थीं, लेकिन अचानक ऐसा कुछ हुआ कि काऊ कांग्रेस भवन से ही गायब हो गए और अब उनके ही नहीं अब तक तल्ख रहे कबीना मंत्री डॉ. हरक सिंह रावत के सुर भी बदल गए हैं। ऐसा क्या हुआ, जानें इस सबकी इनसाइड स्टोरी…

तो क्या टॉयलेट के बहाने रफ्फूचक्कर हो गए उमेश काऊ, क्या दिया इसका लालच? |  Khabar Uttarakhand Newsकाऊ के कांग्रेस भवन जाने के बावजूद कांग्रेस पार्टी में शामिल न होने की इनसाइड स्टोरी सामने आई है। स्वयं काऊ भी इस बारे में कुछ-कुछ बोले हैं। दरअसल अब इस मामले में जानकारी आई है कि यशपाल-संजीव एवं काऊ जब राहुल गांधी के घर ‘घर वापसी’ के लिए पहुंचे थे, और उनकी राहुल गाधी से मुलाकात होनी थी।

इस बीच राहुल गांधी को, जैसी कि उनकी मिलने वालों को ‘लटकाने’ की आदत है, उनसे आने में थोड़ा विलंब हुआ, तभी भाजपा के राज्य सभा सांसद अनिल बलूनी और भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष मदन कौशिक का फोन उन्हें आ गया। इस पर काऊ टॉयलेट जाने के बहाने सबके बीच से किनारे हुए और बात की, और इसके बाद वह गायब हो गए। ऐसे गायब हुए कि वह राहुल गांधी के आवास से ही बाहर निकल आए और फिर कांग्रेस नेताओं के संपर्क में ही नहीं आए।

इस बीच भाजपा नेताओं की उनसे क्या बात हुई और ऐसे क्या हालात बने की काऊ इस तरह राहुल गांधी के घर से गायब हुए, इस पर कुछ अपुष्ट बातें सामने आ रही हैं। पहला भाजपा नेताओं की ओर से उन्हें यशपाल की खाली हो रही कबीना मंत्री की कुर्सी देने की पेशकश हुई। दूसरी बात यह भी थी कि काऊ खुद के साथ हरक की भी साथ में कांग्रेस में वापसी चाहते थे, ताकि कांग्रेस में लौटकर भी अपना ‘दबाव समूह’ बनाए रखना चाहते थे, लेकिन हरीश रावत ने हरक के नाम पर ‘वीटो’ लगा रखा था। इसलिए भाजपा नेताओं के फोन के बाद अकेले कांग्रेस में शामिल होने पर उनके कदम ठिठक गए। इधर यह घटनाक्रम भी हुआ है कि हरिद्वार की डाम कोठी में हरक एवं मदन कौशिक के बीच लंबी ‘राजनीतिक वातार्’ भी हुई है। 

इन घटनाक्रमों का असर अब दिखने भी लगा है। हरक ने जहां हरीश रावत को उनके ‘पापी’ संबंधी बयान पर ‘महापापी कहकर कड़ा प्रत्युत्तर दिया है, वहीं काऊ ने भी यह कहकर खुद को भाजपा के प्रति समर्पित बताने का प्रयास किया है कि पुष्कर सिंह धामी के मुख्यमंत्री बनने के दिन यशपाल, हरक और सतपाल नाराज थे और शपथ नहीं लेना चाहते थे। उन्होंने ही यानी काऊ ने इन स्थितियों में मध्यस्थ की भूमिका निभाकर तीनों को शपथ लेने के लिए तैयार किया था और उन्हें बड़े व अधिक मंत्रालय दिलाकर उनका ‘कद’ बढ़वाया था।

इन स्थितियों के बीच जहां हरीश रावत बागियों के माफी मांगने की जिद पर अड़े हुए हैं, वह खुद से ऊपर भी किसी को नहीं देखना चाहते, ऐसे में अब लगता है कि फिलहाल भाजपा से किसी भी पूर्व कांग्रेसी की कांग्रेस में वापसी होनी फिलहाल संभव नहीं है। इस पूरे घटनाक्रम से भाजपा ने अब विधायकी से भी त्यागपत्र दे चुके यशपाल व संजीव से मुक्त होकर अपना बाकी घर बचा लिया है। इसके बाद बताया जा रहा है कि भाजपा कांग्रेस पर हमले तेज कर इस नुकसान की भरपाई का प्रयास करेगी। इस हेतु कुछ ऑडियो मीडिया में लाने की तैयारी चल रही है…..। अन्य नवीन समाचार पढ़ने के लिये यहाँ क्लिक करें।

यह भी पढ़ें : दलों के दलदल से यशपाल-संजीव के बाद दल-बदल पर एक राजनीतिक विश्लेषण

डॉ. नवीन जोशी @ नवीन समाचार, नैनीताल, 13 अक्टूबर 2021। भाजपा के तीन विधायकों को अपने खेमे में करने के बाद यशपाल आर्य की पुत्र संजीव आर्य समेत कांग्रेस में वापसी अंतिम नहीं दलों के दलदल में निष्ठाओं के बदलने का बीच का पड़ाव है। भाजपा-कांग्रेस दोनों ओर से इसके प्रयास तेज हैं। आम आदमी पार्टी सहित अन्य पार्टियां के लिए अभी सिर्फ दोनों ओर देखने का वक्त है। उन्हें चुनाव से ठीक पहले टिकट मिलने से छूट गए नेताओं के अपने खेमे में आने का इंतजार करना है।

इस दल-बदल के दौर में वैचारिक की निष्ठाएं व क्षेत्रीय विकास ताक पर और निजी हित चाक पर हैं। आम जनता में भी ऐसे दल-बदलुओं को सबक सिखाने के दशकों से किए जा रहे दावे हो रहे हैं, पर सबको पता है, चुनाव में इसका कोई प्रभाव न पहले पड़ा था-न अब पड़ेगा। क्योंकि निजी क्षणिक हित जितने नेताओं के लिए मायने रखते हैं, उतने ही उन लोगों के लिए भी, जो वोट देते हैं। नेताओं को भी पता है, ऐसी बड़ी-बड़ी बातें तो वे कर रहे हैं, जो वोट देने ही नहीं जाते, और उन्हें जिसे वोट देना है-उसे ही देंगे। उन्हें समझाकर या उनकी परवाह कर कोई फर्क नहीं पड़ने वाला है। बहरहाल, फिलवक्त स्थिति यहां तक है कि ऐसे लोगों के जाने से कहीं खुशी है तो कहीं आने पर भी खुशी नहीं है। 

यशपाल व संजीव के भाजपा छोड़ कांग्रेस में जाने के पीछे एक बड़ी वजह मोदी भी बताए जा रहे हैं। सियासी गलियारों में चर्चा है कि 2016 इमं कांग्रेस से आये नेताओं को अब भाजपा में भविष्य नहीं दिख रहा है। इसकी अहम वजह सीएम पुष्कर धामी का पीएम नरेंद्र मोदी और अमित शाह की नजरों में चढ़ जाना है। इसकी बानगी मोदी के ऋषिकेश दौरे के दौरान देखने को मिली, जब कई बार मोदी ने धामी की तारीफ की और उनको अपने मित्र के रूप में संबोधित किया। प्रदेश में भाजपा ने 3 बार सीएम बदला लेकिन किसी कांग्रेसी माने जाने वाले नेता को तरजीह देना तो दूर, उनसे पूछा तक नहीं। न ही किसी को विश्वास में लेने की कोशिश ही की। ऐसे में ‘खाओ और खाने दो’ की नीति वाली कांग्रेस से आए नेताओं में ‘न खाऊंगा-न खाने दूंगा’ वाली भाजपा में दम घुंटना तो समझ में आने की ही बात है। 

इसी क्रम में मंगलवार को कैबिनेट मंत्री हरक सिंह रावत और भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष मदन कौशिक के बीच करीब 1 घंटे बंद कमरे में बातचीत हुई। चर्चा है कि है कि यशपाल आर्य के जाने के बाद जो चर्चाएं चल रही थीं कि डॉ. हरक सिंह रावत भी कांग्रेस में शामिल हो सकते हैं। उन्हीं चर्चाओं के संबंध में मदन कौशिक ने हरक सिंह रावत से बातचीत की है। लेकिन मदन कौशिक से मुलाकात के बाद हरक सिंह रावत ने एक बार फिर चुनाव न लड़ने का ऐलान कर दिया।

उन्होंने दोहराया कि वह 2022 में विधानसभा चुनाव नहीं लड़ना चाहते हैं। इसको लेकर पार्टी के बड़े नेताओं को बता चुके हैं। उन्होंने कहा कि वे 20 साल से सदन में लोगों की आवाज को बुलंद कर रहे हैं। साथ ही यह भी कहा कि उत्तराखंड की पहाड़ से लेकर मैदान तक की करीब 30 ज्यादा से सीटों पर हरक सिंह रावत का प्रभाव है। यह बयान हरक सिंह रावत द्वारा स्वयं चुनाव न लड़कर अपनी बहू और ‘मिस इंडिया’ रह चुकीं अनुकृति गुसाईं को चुनाव लड़वाने की इच्छा के रूप में भी देखा जा रहा है।

इधर भाजपा के खेमे से कांग्रेस के कुमाऊं मंडल से आने वाले एक विधायक को और अपनी पार्टी में शामिल होने की खबरें भी आई हैं, लेकिन राजनीतिक जानकार इसे कहीं पर निगाहें कहीं पर निशाना मान रहे हैं। हरीश धामी को पहले टारगेट पर माना जा रहा था, लेकिन हरीश रावत के लिए अपनी सीट छोड़ने वाले धामी वह हो ही नहीं सकते। धामी भी यह साफ कर चुके हैं। बहरहाल, निशाना कहीं और है।

उधर, कांग्रेस में भाजपा में गए अपने नौ विधायकों को वापस लेने को लेकर दो चीजें चल रही हैं। नेता प्रतिपक्ष बनने के बाद भी प्रदेश अध्यक्ष रहने के दौरान से ही कमजोर माने जाने वाले प्रीतम सिंह इन नेताओं को पार्टी में शामिल कराकर अपनी ताकत बढ़ाने के फेर में है। कहा तो यहां तक जा रहा है कि प्रीतम ही यशपाल व संजीव की कांग्रेस में घर वापसी के पीछे थे। हरीश रावत 9 बागियों की सशर्त, माफी मांगने पर उनकी वापसी में आढ़े नहीं आने की बात कर रहे हैं। वह यह भी नहीं चाहते हैं कि उन्हें चुनौती देने की हैसियत रखने वाला कोई नेता पार्टी में आए।

दूसरी ओर भाजपा में शामिल कांग्रेस के बागी नेता उसी तरह संगठित होकर कांग्रेस में आना और अपना दबाव समूह बनाए रखना चाहते हैं, जैसा वह भाजपा में बनाए रहे। उल्लेखनीय है कि यशपाल-संजीव के साथ एक और पूर्व कांग्रेसी भाजपा विधायक उमेश शर्मा ‘काऊ’ के भी उसी दिन कांग्रेस में शामिल होना तय था, लेकिन वह हरक सिंह के साथ कांग्रेस में आना चाहते थे, जबकि हरीश रावत ने हरक के नाम पर ‘वीटो’ लगा रखा था। इधर अब दल-बदल के इच्छुक नेता इस कोशिश में भी हैं कि यशपाल-संजीव की घर वापसी से जनता व कार्यकर्ताओं की मनोदशा का आंकलन कर लिया जाए, और अनुकूल परिस्थितियां बनने पर ही अगला कोई कदम उठाया जा सके। (डॉ. नवीन समाचार) अन्य नवीन समाचार पढ़ने के लिये यहाँ क्लिक करें।

यह भी पढ़ें : तो हरीश रावत को मिल गया उत्तराखंड के अगले सीएम के लिए ‘दलित का बेटा’, इसीलिए रेणुका से उतरवाई यशपाल की आरती ?

डॉ. नवीन जोशी @ नवीन समाचार, नैनीताल, 12 अक्टूबर 2021। उत्तराखंड में चुनाव संचालन समिति के अध्यक्ष पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत उत्तराखंड में ‘दलित के बेटे’ को मुख्यमंत्री बनते देखना चाहते हैं। अब जबकि राज्य का सबसे बड़़़ा दलित चेहरा, 6 बार के विधायक, कांग्रेस के साथ ही भाजपा में भी प्रभावशाली कैबिनेट मंत्री तथा दो बार कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष एवं विधानसभा अध्यक्ष रहे यशपाल आर्य कांग्रेस पार्टी में ‘घर वापसी’ कर गए हैं, तो ऐसा लगता है कि हरीश अब मुख्यमंत्री पद के लिए यशपाल का नाम आगे करके अपने स्वप्न को साकार करने एवं राज्य की राजनीति को एक नयी दिशा देने का ऐलान भी कर सकते हैं।

इसके संकेत इस बात से भी मिले हैं कि नई दिल्ली के कांग्रेस भवन में पार्टी में शामिल होने के बाद हरीश रावत ने सबसे पहले यशपाल आर्य को अपने दिल्ली स्थित घर बुलाया और पत्नी रेणुका रावत से उन्हें तिलक करवाया और उनकी आरती भी उतरवाई। ऐसे अप्रत्याशित स्वागत से अभिभूत यशपाल ने भी उनके पैर छूकर आर्शीवाद लिया। यही नहीं हरीश ने यशपाल आर्य के कांग्रेस परिवार में शामिल होने पर उनका हृदय की गहराइयों से बहुत-बहुत स्वागत किया है, और संबंधित चित्रों युक्त पोस्ट को अत्यधिक महत्व देते हुए पिन भी किया है।

हालांकि यह संकेतों, सामान्य शिष्टाचारों व निहितार्थों की बात है, लेकिन इसके इतर भी उल्लेखनीय है कि उत्तराखंड की राजनीति अब तक जातीय तौर पर ब्राह्मण-क्षत्रिय में ही अटकी हुई है। राज्य के दोनों ही प्रमुख दल भाजपा व कांग्रेस हमेशा पर यह आरोप है कि सत्ता में रहने पर मुख्यमंत्री व प्रदेश अध्यक्ष तथा विपक्ष में रहने पर नेता प्रतिपक्ष व प्रदेश अध्यक्ष में से एक क्षत्रिय व दूसरा ब्राह्मण हो। पूर्व में केवल कांग्रेस पार्टी ने ही यशपाल आर्य को प्रदेश अध्यक्ष बनाकर यह मिथक तोड़ा, उन्हें विधानसभा अध्यक्ष भी बनाया। यह भी है कि कांग्रेस पार्टी ने हमेशा यशपाल सहित अन्य दलित वर्ग के नेताओं को भी आगे बढ़ाया और दलित वर्ग कांग्रेस पार्टी का वोट बैंक भी रहा है, जबकि इधर यह वोट बैंक भाजपा के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई में धार्मिक-राष्ट्रवाद की राजनीति के आगे बढ़ने एवं बसपा जैसे दलितों की राजनीति करने वाले दल के उत्तराखंड में नैपथ्य में चले जाने से भाजपा की ओर भी जाने लगा है।

ऐसे में अब हरीश रावत पर भी दबाव होना लाजिमी है कि वह अपने वचन व इच्छा के अनुरूप उत्तराखंड ही नहीं पूर्ववर्ती राज्य उत्तर प्रदेश में भी दो बार विधायक रहे तथा लगातार दो कार्यकाल से राज्य के कैबिनेट मंत्री रहे ‘दलित के बेटे’ यशपाल आर्य को आगामी विधानसभा चुनाव में मुख्यमंत्री के चेहरे के रूप में आगे करेंगे। इससे राज्य की राजनीति भी सामाजिक सद्भाव के एक नए मुकाम पर जाएगी और इस मामले में कांग्रेस को भी अकाट्य राजनीतिक बढ़त मिलेगी। और लगता है कि उन्होंने पत्नी से यशपाल की आरती उतरवाकर इसके संकेत भी दे दिए हैं….। आज के अन्य ताजा ‘नवीन समाचार’ पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।

यह भी पढ़ें : काबीना मंत्री यशपाल आर्य व नैनीताल विधायक संजीव आर्य कांग्रेस में शामिल हुए जानें वजहें, और देखें उनके कांग्रेस में शामिल होने की एक्सक्लूसिव फोटो एवं वीडियो:

डॉ. नवीन जोशी, नवीन समाचार, नैनीताल, 11 अक्टूबर 2021। उत्तराखंड की भाजपा सरकार में काबीना मंत्री व 6 बार के विधायक यशपाल आर्य व उनके पुत्र नैनीताल से विधायक संजीव आर्य भाजपा छोड़ कांग्रेस में शामिल हो गए हैं। नई दिल्ली में कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी से मुलाकात के बाद पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत, प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल, प्रीतम सिंह एवं कांग्रेस के प्रदेश प्रभारी देवेंद्र यादव सहित अन्य वरिष्ठ कांग्रेस नेताओं की उपस्थित में दोनों पिता-पुत्र ने कांग्रेस पार्टी का दामन थाम लिया। दोनों ने 2017 में कांग्रेस छोड़ भाजपा का दामन थामा था। देखें संबंधित फोटो एवं वीडियो एक्सक्लूसिवली नवीन समाचार पर :

यह तब है जबकि भाजपा से कांग्रेस में शामिल होने के लिए अन्य काबीना मंत्री का नाम प्रमुखता से चर्चा में था। यशपाल आर्य के बारे में केवल गत 25 सितम्बर को मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के उनके आवास पर चाय पर आने के दिन से चर्चा शुरू तेज हुई थी। जबकि स्वयं श्री आर्य ने इस संभावना को सिरे से खारिज किया था। हालांकि नैनीताल में उनके विरोधी लंबे समय से उनके कांग्रेस में शामिल होने के लिए तारीखें घोषित कर रहे थे।

इधर आखिरी बार 18 अक्टूबर की तिथि उनके कांग्रेस में शामिल होने की बताई गई थी, लेकिन इससे पहले ही उनके कांग्रेस में शामिल हो गए हैं।

उनके कांग्रेस में शामिल होने से जहां भाजपा को नैनीताल में सीधा झटका लगना कमोबेश तय है। क्योंकि संजीव चाहे भाजपा से लड़ंे या कांग्रेस में, दोनों जगह से उन्हें टिकट मिलना और जीतना कमोबेश तय माना जा रहा है। भाजपा में रहते हुए उन्हें भविष्य का मुख्यमंत्री का चेहरा भी माना जा रहा था। अलबत्ता यशपाल आर्य के लिए बाजपुर की सीट भाजपा में रहते किसान आंदोलन के दृष्टिगत कठिन मानी जा रही थी। दोनों पिता-पुत्र के कांग्रेस में शामिल होने के पीछे यही सबसे बड़ी वजह मानी जा रही है।

हालांकि कुछ राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि हरीश रावत के किसी दलित को मुख्यमंत्री बनाने के बयान के बाद यशपाल ने कांग्रेस में जाने का मन बनाया हो या हरीश ने उनके लिए ही यह बयान दिया हो राजनीति के दूसरे जानकार ऐसा नहीं मानते। राज्य के वरिष्ठ पत्रकार दिनेश शास्त्री का मानना है कि यह बयान हरीश रावत ने प्रदीप टम्टा के लिए दिया है, क्योंकि प्रदीप हरीश के सबसे करीबी हैं। वैसे भी हरीश स्वयंभू तरीके से मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार हैं और वह कभी भी यशपाल को मुख्यमंत्री के पद पर नहीं देखना चाहंेगे।

अलबत्ता ऐसी भी चर्चाएं हैं कि यशपाल आर्य अब नैनीताल से विधानसभा चुनाव लड़ेंगे। यशपाल व संजीव आर्य के भाजपा छोड़कर कांग्रेस में जाने के साथ एक नगर पालिका अध्यक्ष एवं कुछ ब्लॉक प्रमुख व जिला पंचायत सदस्यों के भी भाजपा छोड़कर कांग्रेस में जाने की चर्चाएं है। आज के अन्य ताजा ‘नवीन समाचार’ पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।

यह भी पढ़ें : एक भाजपा विधायक ने किया चुनाव लड़ने से इंकार…

नवीन समाचार, काशीपुर, 8 अक्टूबर 2021। चार बार से काशीपुर का प्रतिनिधित्व कर रहे भाजपा विधायक हरभजन सिंह चीमा ने उम्र का हवाला देकर अगला विधानसभा चुनाव नहीं लड़ने का ऐलान किया है। अलबत्ता उन्होंने अपने बेटे त्रिलोक सिंह चीमा की टिकट के लिए दावेदारी की है। उन्होंने कहा कि वह शीघ्र ही अपने बेटे को भाजपा में शामिल करेंगे।

कहा कि वह शीघ्र ही अपने बेटे को भाजपा में शामिल करेंगे।शुक्रवार को अपने कार्यालय पर आयोजित पत्रकार वार्ता में विधायक चीमा ने कहा कि 20 साल से विधायक हैं। अपनी उम्र का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि वह 76 वर्ष का हो चुके हैं। भाजपा आमतौर पर 75 से ऊपर आयु के लोगों को टिकट नहीं देती है। दावेदारी कई लोग करते हैं लेकिन पार्टी का टिकट जिसको भी मिल जाएगा उसे सब लोग चुनाव लड़ाएंगें।

उन्होंने कहा कि उनके पुत्र त्रिलोक के टिकट की दावेदारी से कोई नाराज नहीं होगा। त्रिलोक उनके साथ लंबे समय से राजनीतिक अनुभव ले चुके हैं। जिस तरह से बीस वर्षों तक उन्होंने काशीपुर में विकास किया और जनता की सेवा की है। त्रिलोक भी उसी तरह से शहर की सेवा करेंगे। चीमा ने कहा कि मेरा प्रयास होगा कि पार्टी त्रिलोक को टिकट दे।

इस दौरान त्रिलोक सिंह ने कहा कि वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विचारधारा से प्रभावित है। इस समय कृषि सेक्टर खतरे में है। कृषि कानूनों को लेकर कहा कि अगर इनमें कोई समस्या है तो उसे मिल जुलकर हल करना होगा। किसान आंदोलन से किसानों की नाराजगी के बारे में उन्होंने कहा कि उन्हें उम्मीद थी कि जल्द ही इसक समाधान हो जाएगा। (डॉ.नवीन जोशी) आज के अन्य ताजा ‘नवीन समाचार’ पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।

यह भी पढ़ें : एजेंसी का दावा, उनके सर्वेक्षण से बदले गए उत्तराखंड, कर्नाटक, गुजरात, पंजाब, तमिलनाडु व पुडूचेरी के CM, धामी की संभावनाएं भी बताईं..

P Chidambaram के बाद अब अगला नंबर किसका है ? - YouTubeनवीन समाचार, राजनीतिक डेस्क, 23 सितंबर 2021। देश के विभिन्न राज्यों में मुख्यमंत्रियों को बदला जा रहा है। उत्तराखंड में दो मुख्यमंत्रियों के अलावा भाजपा ने हाल ही में गुजरात व कर्नाटक के मुख्यमंत्री भी बदले हैं। कांग्रेस ने भी पंजाब में अपने मुख्यमंत्री को हटाकर भगवा पार्टी का अनुसरण किया है। इससे पहले तमिलनाडु और पुडुचेरी के मुख्यमंत्रियों को भी इस साल की शुरुआत में हुए विधानसभा चुनावों के बाद बदल दिया गया था।

आईएएनएस सीवोटर ट्रैकर ने दावा किया है कि इन राज्यों में मुख्यमंत्री उनके सर्वेक्षणों में सामने आए आंकड़ों के कारण बदले गए हैं। उनका दावा है कि उनके सर्वेक्षण में अब हरियाणा और राजस्थान के मुख्यमंत्रियों की लोकप्रियता में काफी गिरावट दर्ज की गई है, इसलिए वे भी बदले जा सकते हैं।

सीवोटर इंटरनेशनल के संस्थापक-निदेशक यशवंत देशमुख ने कहा, आईएएनएस सीवोटर ट्रैकर की रेटिंग को देश भर में सही ठहराया गया है। तमिलनाडु और पुडुचेरी के मुख्यमंत्रियों को लोगों ने उनके सर्वेक्षण में की गई अपनी वोटिंग से बाहर कर दिया था। भाजपा ने भी गुजरात, कर्नाटक और उत्तराखंड में अपने मुख्यमंत्रियों को बदलने को समझदारी दिखाई और यही कार्य कांग्रेस ने भी पंजाब में किया है।

देशमुख ने कहा, रडार पर हरियाणा और राजस्थान के मुख्यमंत्री क्रमशः मनोहर लाल खट्टर और अशोक गहलोत हैं, जिनकी लोगों के बीच लोकप्रियता की रेटिंग लगातार खराब रही है। उल्लेखनीय है कि इस साल की शुरुआत में, आईएएनएस सीवोटर ने दिखाया था कि सबसे कम लोकप्रिय 10 मुख्यमंत्रियों में से 7 भाजपा के थे।

इधर, उत्तराखंड की बात करें तो यहां पुष्कर सिंह धामी को मुख्यमंत्री के रूप में नियुक्त करने के बाद, आईएएनएस सीवोटर ट्रैकर से पता चलता है कि जुलाई में उनकी नियुक्ति के बाद, लोकप्रियता रेटिंग में सुधार हुआ है और भाजपा के पास अब उत्तराखंड में त्रिकोणीय मुकाबले में अच्छी संभावनाएं हैं। इससे पहले मार्च में भाजपा ने त्रिवेंद्र सिंह रावत को हटाकर तीरथ सिंह रावत को सीएम बनाया था, लेकिन उनकी लोकप्रियता भी लगातार गिरती जा रही थी। इसलिए, भाजपा को दो मुख्यमंत्रियों को एक के बाद एक, त्वरित क्रम में बदलना पड़ा।

रिपोर्ट में कहा गया है कि कर्नाटक के मामले में जनता अभी तक नए मुख्यमंत्री बसवराज बोम्मई को संदेह का लाभ दे रही है। वहीं अगर गुजरात की बात करें तो भाजपा ने हाल ही में गुजरात में मुख्यमंत्री के रूप में भूपेंद्र पटेल को जिम्मेदारी दी और विजय रूपाणी को हटा दिया। अप्रैल-मई में कोविड के दौरान उनके खिलाफ काफी गुस्सा था। जून से रूपाणी के लिए हालात सुधरने लगे, क्योंकि भाजपा कार्यकर्ताओं ने शीर्ष नेतृत्व के दौरों से उत्साहित होकर उत्साह बढ़ाया था।

कांग्रेस के पंजाब के पूर्व सीएम अमरिंदर सिंह लंबे समय तक सीएम के लिए पसंद के मामले में निचले तीन में शामिल रहे हैं। ट्रैकर के डेटा से पता चलता है कि उन्हें जाना था और शायद कांग्रेस को ऐसा करने में बहुत अधिक समय लगा।

आंकड़ों के अनुसार, रडार पर हटाए जाने वालों में अगले हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर हो सकते हैं, क्योंकि राज्य में उनके प्रति लोगों की धारणा सही नहीं है और वह उनसे संतुष्ट नहीं हैं। लोग उनके प्रति बिल्कुल संतुष्ट नहीं वाली श्रेणी में वोटिंग कर रहे हैं और ऐसा लगातार होता जा रहा है। इसी तरह के आंकड़ों से पता चलता है कि राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत भी रडार पर हो सकते हैं। (डॉ.नवीन जोशी) आज के अन्य ताजा ‘नवीन समाचार’ पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।

यह भी पढ़ें : कांग्रेस से भाजपा में आए विधायकों में भी है भारी असंतोष, ‘काऊ’ की तरह कई और भी ‘फट’ सकते हैं…

डॉ. नवीन जोशी, नवीन समाचार, नैनीताल, 12 सितंबर 2021। एक ओर जहां भाजपा, कांग्रेस के विधायकों को अपनी टीम में लाकर फील्डिंग सजाने में लगी है, वहीं भाजपा में मौजूद कांग्रेसी विधायकों की नाराजगी की खबरें भी बेदम नहीं हैं। 2016 में कांग्रेस से भाजपा में आए विधायकों को आज तक भाजपाई दिल से अपना नहीं पाए हैं। उनकी ओर से विधायकों के अच्छे कार्य सोशल मीडिया में नहीं डाले जाते, और आम जनता में भी यह संदेश देने से गुरेज नहीं किया जाता कि वह वह उनकी नहीं सुनते हैं। ऐसे में कांग्रेस मूल के भाजपा विधायक एक तरह से अपनी टीम बनाकर अलग से ही कार्य कर रहे हैं। यह अलग बात है कि उनकी कांग्रेस व खासकर हरीश रावत से तल्खियां अब भी बनी हुई हैं, और भाजपा की सरकार के जाने व कांग्रेस की सरकार के सर्तिया आने जैसी स्थिति बनने पर ही वह कांग्रेस में जाएंगे। बल्कि यहां तक चर्चा है कि खासकर कुछ काबीना मंत्री तो कांग्रेस की जगह आम आदमी पार्टी के न केवल संपर्क में हैं, वरन इस रणनीति के अनुसार उन्होंने कार्य भी शुरू कर दिया है। लेकिन यह तभी होगा जब राजनीति के इन ‘थर्मामीटरों’ को लगेगा कि भाजपा की सरकार लौटने वाली नहीं है और जिस दल में वह जाएंगे उसकी सत्ता में हिस्सेदारी के साथ व्यक्तिगत तौर पर वह फिर से सत्ता में होंगे।

कांग्रेसी मूल के राज्य के एक भाजपा विधायक ने ‘नवीन समाचार’ से कहा, उन्हें समस्या भाजपा के राज्य या केंद्रीय हाईकमान से नहीं, बल्कि नगर मंडलों के निचले दर्जे के कार्यकर्ताओं से है। ऊपरी नेताओं से उन्हें भरपूर सहयोग मिलता है, लेकिन निचले स्तर के लोग सुई सी चुभोते रहते हैं। इसी कारण देहरादून में गत दिवस विधायक ‘काऊ’ फट पड़े। हरक भी उनके समर्थन में उतरे। यह स्थिति कहीं भी और हो सकती है। उन्होंने कहा, यदि भाजपा के कुछ मंडल अध्यक्षों व अन्य लोगों की विधायकों के बारे में कही गई अनाप-शनाप बातों की उनके पास मौजूद ऑडियो ही उजागर कर दें तो कई लोगों का राजनीतिक कॅरियर चौपट हो सकता है। बहरहाल, वह किसी तरह खुद का आपा बनाये हुए हैं। आज के अन्य ताजा ‘नवीन समाचार’ पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।

यह भी पढ़ें : हिंदू वोटों पर लक्ष्य कर भाजपा की राह चले आप और कांग्रेस, मुस्लिम बेभरोसे

डॉ. नवीन जोशी @ नवीन समाचार, नैनीताल, 22 अगस्त 2021। राजनीतिक तौर पर भाजपा को हिंदुओं की और सांप्रदायिक पार्टी कहा जाता है, और कांग्रेस सहित सभी दल अल्पसंख्यकों के तुष्टीकरण के अनेकानेक आरोपों के बावजूद खुद को ‘धर्म निरपेक्ष’ कहते नहीं थकते। लेकिन उत्तराखंड में लगता है नई राजनीतिक जमीन तलाशने निकली आम आदमी और उसके पीछे-पीछे कांग्रेस भी भाजपा की राह पर हिंदू वोटों को आकर्षित करने निकल पड़ी है। हालांकि यह पक्के तौर पर नहीं कहा जा सकता, क्योंकि बाहरी तौर पर हिंदू वोटरों को दाना डालने के बावजूद यह दोनों दल मुस्लिम मतदाताओं को नाराज करने का जोखिम कत्तई नहीं लेंगे। लेकिन यदि वह ‘मनसा, वाचा, कर्मणा’ हिंदू वोटों को केंद्रित हो उत्तराखंड की चुनावी वैतरिणी में निकलते हैं तो इससे परंपरागत तौर पर कांग्रेस का वोट बैंक माने जाने वाले और इससे पहले आम आदमी पार्टी द्वारा भी अपनी ओर आकर्षित किए जा रहे मुस्लिम मतदाताओं के लिए असमंजस की स्थिति पैदा हो सकती है।

यह बात हम इसलिए कह रहे हैं कि आम आदमी पार्टी के प्रमुख अरविंद केजरीवाल ने कर्नल अजय कोठियाल को मुख्यमंत्री पद का प्रत्याशी घोषित करते हुए उत्तराखंड को ‘हिंदुओं की आध्यात्मिक राजधानी’ बनाने का ऐलान किया है, और उनके पीछे-पीछे कांग्रेस पार्टी के स्वघोषित मुख्यमंत्री प्रत्याशी हरीश रावत ने घोषणा की है कि अब कांग्रेस का हर कार्यक्रम ‘जय श्रीगणेश और जय श्रीकृष्ण’ के उद्घोष के साथ होगा। उल्लेखनीय है कि हरीश रावत की मुख्यमंत्री रहते जुम्मे को की नमाज की छुट्टी जैसे मामलों को लेकर अल्पसंख्यक समर्थक की छवि रही, अलबत्ता रावत इससे इंकार करते रहे हैं। वहीं आप पर दिल्ली में एआईएमआईएम से हाथ मिलाने व शाहीन बाग के आंदोलन को संरक्षण देने जैसे आरोप लगते रहे हैं।

हरीश रावत ने अरविंद केजरीवाल के उत्तराखंड को हिंदुओं की आध्यात्मिक राजधानी बनाने के ऐलान पर कहा कि केजरीवाल तो उत्तराखंड को आध्यात्मिक राजधानी बनाने की बात कर उसका दर्जा छोटा कर रहे हैं। उत्तराखंड तो पहले से देवभूमि है यहां चारधाम, कलियर शरीफ, हेमकुंट साहिब हैं। इसे कोई क्या आध्यात्मिक राजधानी बनाएगा। उन्होंने कहा कि वे किसी टूरिस्ट को उत्तराखंडियत की लड़ाई हाईजैक नहीं करने देंगे। जब तक उनकी सांस में सांस है वह उत्तराखंडियत की लड़ाई लड़ते रहेंगे। वहीं ‘जय श्रीगणेश और जय श्रीकृष्ण’ के उद्घोष के साथ कांग्रेस पार्टी के कार्यक्रमों की शुरुआत करने का ऐलान कर उन्होंने भी संकेत दे दिया है कि वह भी भाजपा को अकेले ‘हिंदुत्व’ के नाम पर उत्तराखंड की सियासी फसल काटने नहीं देंगे। आज के अन्य ताजा ‘नवीन समाचार’ पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।

यह भी पढ़ें : हरीश रावत चले एनडी की राह, बोले 2022 उनका आखिरी चुनाव, त्रिवेंद्र ने तत्काल घेरा….

नवीन समाचार, देहरादून, 10 अगस्त 2021। उत्तराखंड के वरिष्ठ कांग्रेस नेता व पूर्व सीएम पार्टी के अन्य पूर्व सीएम नारायण दत्त तिवारी की राजनीतिक राह पर नजर आ रहे हैं। मंगलवार को रावत ने स्वर्गीय तिवारी द्वारा कई बार आजमाए गए ‘इमोशनल कार्ड’ को चलते हुए कह दिया, आगामी विधानसभा उनका आखिरी चुनाव होगा। साथ ही बोले कि वह उत्तराखंडियत के मुद्दे पर जनता का समर्थन मांगेंगे। लेकिन इस बार भाजपा ने तत्काल ही रावत की जुबान पकड़ ली और नहले पर दहला मार दिया। भाजपा नेता व पूर्व सीएम त्रिवेंद्र सिंह रावत ने कह दिया, रावत बूढ़े हो चले हैं तो उन्हें क्या वोट देना। हरीश रावत की अब काफी उम्र हो गई है। उनके दायें हाथ को पता नहीं होता कि बायां हाथ क्या कर रहा है।

8 जुलाई 2020 को अपने हाथों से त्रिवेन्द्र रावत को आम खिलाते हरीश रावत (फाइल फोटो)

उल्लेखनीय है कि हरीश रावत के लिए अगले विधानसभा चुनाव एक तरह से ‘करो या मरो’ वाले बन गए हैं। मुख्यमंत्री रहते दो सीटों से विधानसभा चुनाव के बाद लोक सभा चुनाव भी रिकॉर्ड वोटों से हारने के बावजूद हरीश रावत खुद को आगामी विधानसभा चुनाव के लिए कांग्रेस पार्टी का चेहरा बताने की कोशिश कर रहे हैं। दूसरी ओर भाजपा ने पुष्कर सिंह धामी के रूप में युवा चेहरा आगामी विधानसभा चुनाव के लिए खड़ा कर दिया है। इस स्थिति में कांग्रेस हाईकमान ने भी रावत खेमे के युवा गणेश गोदियाल को राज्य की कमान सोंपी। इसके बावजूद शायद हरीश चाहते हैं कि खुद को बुजुर्ग बताकर चुनाव को युवा विरुद्ध बुजुर्ग या नौसिखिया विरुद्ध अनुभवी करना चाह रहे हों। लेकिन लगता है भाजपा उन्हें किसी भी तरह छोड़ने के मूड में नहीं है। (डॉ.नवीन जोशी) आज के अन्य ताजा ‘नवीन समाचार’ पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें। 

यह भी पढ़ें : कांग्रेस ने फिर बिगाड़ा भाजपा का जातीय-क्षेत्रीय गणित…

डॉ. नवीन जोशी @ नवीन समाचार, नैनीताल, 25 जुलाई 2021। उत्तराखंड में भाजपा हो या कांग्रेस सियासी उठापठक जारी है। पहले भाजपा ने संगठन और सरकार में अहम बदलाव किए, तो अब कांग्रेस के बदलाव ने जाति और क्षेत्रीय समीकरणों को साधते हुए एक अध्यक्ष और चार-चार कार्यकारी अध्यक्ष बना डाले, तो इससे भाजपा की चुनावी रणनीति भी गड़बड़ाती हुई नजर आ रही है, उस पर अब जातिगत और क्षेत्रीय समीकरणों को साधने का दबाव बन गया है। कांग्रेस ने लगभग सभी वर्गों ब्राह्मण, ठाकुर, एससी, पंजाबी से अध्यक्ष बनाए गए हैं। इन सभी जातियों का उत्तराखंड में अपने-अपने हिस्से में प्रभुत्व है। फिर भी किसी भी महिला को कार्यकारी अध्यक्ष न बनाए जाने पर सवाल उठ गए हैं। भले बेहड के रूप में पंजाबी अल्पसंख्यकों को प्रतिनिधित्व दिया है, पर मुस्लिम अल्पसंख्यक भी दबी जुबान कह रहे हैं, उन्हें प्रतिनिधित्व देने में क्यों गुरेज किया गया, जबकि वे पारंपरिक तौर पर कांग्रेस के वोटर रहे हैं, पर उनका मत विभाजन भी महिलाओं के रूप में भाजपा की ओर हो रहा है।

भाजपा सरकार में नए बनाए गए मुख्यमंत्री पुष्कर धामी तराई की खटीमा सीट से विधायक हैं। कांग्रेस ने खटीमा से ही उनके प्रतिद्वंद्वी युवा भुवन कापड़ी को कार्यकारी अध्यक्ष बना दिया। यही नहीं ऊधमसिंहनगर जिले से पूर्व कैबिनेट मंत्री तिलकराज बेहड़ को भी कार्यकारी अध्यक्ष बना दिया गया, और इस तरह तराई से और मुख्यमंत्री के गृह जिले से कांग्रेस ने दो-दो प्रदेश अध्यक्ष बना डाले। इसे मुख्यमंत्री पुष्कर धामी को घर में ही घेरने की रणनीति के रूप में देखा जा रहा है। इसके साथ भाजपा के लिए किसान आंदोलन से प्रभावित इस जिले में प्रभुत्व बरकरार रखना अब और चुनौती बन गया है।

वहीं भाजपा के लिए सबसे बड़ी टेंशन हरीश रावत हैं। कांग्रेस ने हरीश रावत को चुनाव कैंपेन कमेटी का प्रमुख बनाकर एक तरह से रावत को लीडिंग भूमिका में ला दिया है। पूर्व सीएम हरीश रावत का आज भी जनता में अच्छा खासा प्रभाव माना जाता है। उत्तराखंड कांग्रेस में हरीश रावत ही एकमात्र चेहरा माने जाते रहे हैं, जिनके नाम पर भीड़ को जुटाया जा सकता है। हालांकि चुनाव संचालन समिति में आर्येंद्र शर्मा को कोषाध्यक्ष बनाकर रावत के भी हाथ साफ तौर पर बांधे गए हैं। यह सवाल भी उठ रहा है कि अध्यक्ष के साथ चार कार्यकारी अध्यक्ष क्या खासकर चुनाव में टिकट वितरण में प्रभावी भी होंगे, और इतने अध्यक्ष कांग्रेस की एक नाव को एक ही दिशा में खेकर आगे बढ़ाएंगे, अथवा अलग-अलग दिशाओं में चप्पू चलाकर डुबोने का कार्य तो नहीं करेंगे। बहरहाल, फिलहाल कांग्रेस के इस दांव से भाजपा का एक बार फिर क्षेत्रीय-जातीय संतुलन का गणित तो बिगाड़ ही दिया है। आज के अन्य ताजा ‘नवीन समाचार’ पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।

यह भी पढ़ें : …तो मोदी-शाह के होते हुए भी उत्तराखंड में बनी हुई है कोश्यारी की ठसक !

डॉ. नवीन जोशी @ नवीन समाचार, नैनीताल, 09 जुलाई 2021। भले ही एक जमाने के भाजपाई दिग्गज पूर्व मुख्यमंत्री भुवन चंद्र खंडूड़ी और भगत सिंह कोश्यारी अलग-अलग वजहों से राज्य की राजनीति से दूर हों मगर भाजपा में मोदी-शाह युग होने के बावजूद, जिसमें कहा जाता है कि कोई भी अन्य नेता प्रभावी नहीं रहते, उत्तराखंड में अटल युग के दो नेता, पूर्व मुख्यमंत्री भगत सिंह कोश्यारी व भुवन चंद्र खंडूड़ी अभी भी पूरी ठसक के साथ प्रभावी हैं। खासकर कोश्यारी, वर्तमान में जिन्हें ही राजनीतिक गुरु मानने वाले एक नेता, पुष्कर सिंह धामी राज्य के मुख्यमंत्री बन गए हैं, और दूसरे, अजय भट्ट उत्तराखंड के कोटे से केंद्र में इकलौते मंत्री बनने में सफल रहे हैं। गौरतलब है कि इससे पहले खुलकर खंडूड़ी को अपना गुरु कहने वाले तीरथ सिंह रावत, जबकि उनसे पहले कोश्यारी के चहेते त्रिवेंद्र सिंह रावत उत्तराखंड के मुख्यमंत्री थे। जरूर कोश्यारी वर्तमान में सक्रिय राजनीति और उत्तराखंड से दूर, संवैधानिक पद पर विराजमान हैं, पर उनकी ठसक अभी भी उत्तराखंड में न केवल बनी हुई है बल्कि इधर और बढ़ी है।

यह विषय इसलिए भी प्रासंगिक है कि मोदी मंत्रिमंडल में हुए ताजा पुर्नगठन में यह तथ्य सुर्खियों में है कि अटल युग के नेताओं की मंत्रिमंडल से छुट्टी की गई है, और अब केंद्र में केवल रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के अलावा मुख्तार अब्बास नकवी और प्रह्लाद पटेल ही ऐसे मंत्री बचे रह गए हैं, जो अटल मंत्रिमंडल में भी मंत्री थे। यह बात इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाती है कि भाजपा के साथ कांग्रेस पार्टी की राज्य इकाइयों पर यह आरोप लगते हैं कि उनमें केंद्रीय नेतृत्व के बिना पत्ता भी नहीं हिलता। खासकर अनुशासित कही जाने वाली भाजपा में, जहां गत दिवस प्रधानमंत्री मोदी के चाहने पर केवल केंद्रीय अध्यक्ष के एक-एक फोन कॉलों पर रविशंकर प्रसाद, डॉ. हर्षवर्धन व डॉ. निशंक जैसे बड़े मंत्रालय संभाल रहे नेताओं सहित 11 मंत्रियों ने बिना एक भी प्रतिक्रिया किए अपने इस्तीफे प्रधानमंत्री को भेज कर एक तरह की मिसाल पेश कर दी।

उत्तराखंड में वर्तमान में भले मुख्यमंत्री बने धामी व केंद्रीय मंत्री बने भट्ट के समक्ष संवैधानिक मजबूरी हो कि वह पूर्व सीएम भगत सिंह कोश्यारी को खुलकर किसी तरह का श्रेय दे पाएं या उनका गुणगान कर पाएं, क्योंकि कोश्यारी वर्तमान में महाराष्ट्र के राज्यपाल हैं, और भाजपा से इस्तीफा दे चुके हैं, और गैर राजनीतिक व संवैधानिक पद पर हैं, लेकिन इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि आगामी विधान सभा चुनाव के लिए भाजपा के द्वारा बिछाई जा रही इस पूरी बिसात के तहत आगे बढ़ाए जा रहे इन दोनों नेताओं को उनका आशीर्वाद प्राप्त है। वरना उनके लिए इन पदों को पाना शायद संभव न होता। वहीं, अब यह भी कहा जाने लगा है कि यदि भाजपा को वास्तव में उत्तराखंड में सत्ता वापसी की इच्छा है तो कोश्यारी इस रणनीति की धुरी हो सकते हैं। क्योंकि यदि कांग्रेस हरीश रावत को आगामी विधानसभा चुनाव की कमान सोंपती है तो कोश्यारी राज्य की सक्रिय राजनीति में प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से जुड़ सकते हैं, इससे इंकार नहीं किया जा सकता है। कहना गलत न होगा कि 2007 के विधानसभा चुनाव में भाजपा की जीत के पीछे कोश्यारी ही थे, जो पूरे प्रदेश में जननेता के रूप में सक्रिय रहे थे। अलबत्ता, भाजपा नेतृत्व ने तब खंडूड़ी को राज्य की कमान सोंप दी थी। आज के अन्य ताजा ‘नवीन समाचार’ पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।

यह भी पढ़ें : तो इसलिए बदले गए तीरथ की जगह पुष्कर और निशंक की जगह भट्ट !

-हरदा की घेराबंदी को दून से दिल्ली तक बिछ रही बिसात

डॉ. नवीन जोशी @ नवीन समाचार, नैनीताल, 08 जुलाई 2021। भारतीय जनता पार्टी ने पिछले सात दिनों में राज्य के मुख्यमंत्री और राज्य से बने केंद्रीय मंत्री को बदल दिया है। तीरथ सिंह रावत की जगह पुष्कर सिंह धामी को मुख्यमंत्री, और डॉ. रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ से शिक्षा मंत्रालय वापस लेकर अजय भट्ट को केंद्र में पर्यटन एवं रक्षा राज्य मंत्री बना दिया गया है। इसके पीछे के कारणों को लेकर तरह-तरह के कयास लगाए जा रहे हैं। कहा जा रहा था कि तीरथ को बदलने के पीछे पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को कुछ दिनों के लिए ही सही मुख्यमंत्री पद से हटाकर और उनकी जगह पार्टी के किसी अन्य नेता के मुख्यमंत्री बनने से पार्टी में हलचल मचाने का मकसद था। वहीं निशंक के इस्तीफे के पीछे स्वास्थ्य कारण बताए गए। लेकिन सच यह है कि इसके पीछे कारण कुछ और हैं, और वह हैं उत्तराखंड में होने वाले आगामी विधानसभा चुनाव।

भले कांग्रेस पार्टी पिछले करीब तीन सप्ताह से नेता प्रतिपक्ष चुने जाने के फेर में अटकी है और अपने प्रदेश अध्यक्ष के पद पर भी सशंकित हो चुकी है, लेकिन सत्तारूढ़ भाजपा को लगता है कि देर-सबेर उत्तराखंड में कांग्रेस की धुरी पूर्व सीएम हरीश रावत ही होंगे। उनके चुनाव संचालन समिति का अध्यक्ष चुने जाने पर किसी को संदेह भी नहीं है, और वह प्रदेश अध्यक्ष प्रीतम सिंह को 6 माह के लिए नेता प्रतिपक्ष बनाकर बदले में अगले अनिश्चित समय के लिए पीसीसी अध्यक्ष का पद अपने किसी समर्थक नेता के जरिए अपने हाथ में रखने की कोशिश में हैं। ऐसे में भाजपा की पूरी घेराबंदी हरीश रावत के लिए चल रही है।

टाइमिंग भी देखिए कि भाजपा में जो कुछ इधर हो रहा है, हरीश रावत के चुनाव संचालन समिति का अध्यक्ष चुने जाने की सुगबुगाहट के बाद से हो रहा है। हरीश की काट के लिए ही भाजपा ने गढ़वाल से आने वाले तीरथ सिंह रावत को हटाकर पुष्कर सिंह धामी को मुख्यमंत्री बनाया। ऐसा न होता तो तीरथ कम से कम 9 सितंबर तक बिना चुनाव लड़े भी मुख्यमंत्री बने ही रह सकते थे। इसके बाद भी यदि भाजपा को तीरथ के नेतृत्व मंे ही चुनाव में जाना होता तो राष्ट्रपति शासन लगाकर भाजपा सत्ता को परोक्ष तौर पर केंद्र के जरिए अपने हाथ में रख सकती थी। लेकिन ऐसा करने की जगह हरीश रावत के क्षेत्र कुमाऊं से और उनकी ही जाति क्षत्रिय वर्ग से आने वाले पुष्कर सिंह धामी को मुख्यमंत्री बनाया गया। वहीं केंद्र में मोदी मंत्रिमंडल के पुर्नगठन की बात आई तो निशंक की जगह हरीश रावत के गृह क्षेत्र रानीखेत से आने वाले और उन्हें पिछले लोक सभा चुनाव में रिकॉर्ड अंतर से हराने वाले व ब्राह्मण वर्ग से आने वाले अजय भट्ट को केंद्रीय राज्य मंत्री बनाया गया है।

उल्लेखनीय है कि पिछले तीन-चार साल में भाजपा का जोर गढ़वाल पर रहा है। तब मुख्यमंत्री भी गढ़वाल से थे तो अधिकतर कद्दावर मंत्री भी गढ़वाल विशेषकर पौड़ी से रहे। 2018 में राज्यसभा की सीट पर भी गढ़वाल के नेता अनिल बलूनी राज्यसभा पहुंचे। मार्च में जब प्रदेश में सत्ता परिवर्तन हुआ तो तीरथ सिंह रावत की ताजपोशी के साथ फिर गढ़वाल मंडल की भाजपा पहले से भारी हो गयी, क्योंकि प्रदेश अध्यक्ष की कुर्सी भी गढ़वाल से आने वाले मदन कौशिक को दी गयी। बताया जा रहा है कि सत्ता के इस असंतुलन की बात दिल्ली में भी उठ रही थी। पार्टी में कुमाऊं क्षेत्र से नेताओं का भी टोटा पड़ गया था। ऐसे में भाजपा कुमाऊं से खासकर हरीश रावत को घेरने के लिए उनके बरक्स नेता तैयार करने की राह पर है। बहरहाल, अब यह देखना दिलचस्प होगा कि कांग्रेस भाजपा की इन राजनीतिक चालों का क्या तोड़ निकालती है। आज के अन्य ताजा ‘नवीन समाचार’ पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।

यह भी पढ़ें : जगा जोश: मुख्यमंत्री धामी के ‘युवा-मंत्र’ से देवभूमि में अच्छे दिन के ख्वाब देखने लगा युवा वर्ग

शंभू नाथ गौतम @ नवीन समाचार, 05 जुलाई 2021। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की ताजपोशी के बाद सड़कों पर नौजवानों में जश्न का माहौल छाया हुआ है। ये युवा चाहे किसी भी पेशे से जुड़े हुए क्यों न हो लेकिन अब उन्हें धामी के रूप में नई ‘उम्मीद’ दिखाई दे रही है। राज्य में अभी तक राजनीतिक दलों के नेताओं का युवाओं पर इतना ‘फोकस’ नहीं किया गया। जिससे युवा वर्ग ‘उपेक्षित’ भी महसूस करने लगा था। इसके साथ पिछले डेढ़ सालों से कोरोना और लॉकडाउन की वजह से युुवाओं की परेशानी और बढ़ा दी है। राज्य में रोजगार, व्यापार और काम-धंधे ठप होने से तेजी के साथ बढ़ी बेरोजगारी की वजह से युवाओं में ‘मायूसी’ छाई हुई है। लेकिन रविवार को उत्तराखंड के नए मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने शपथ लेते ही युवाओं में ‘ऊर्जा’ भर दी है।

यहां हम आपको बता दें कि मुख्यमंत्री धामी अगले वर्ष होने वाले विधानसभा चुनाव को लेकर राज्य के युवाओं को साथ लेकर चलना चाहते हैं। लखनऊ विश्वविद्यालय में पढ़ाई के दौरान से ही धामी ‘छात्र राजनीति’ में सक्रिय रहे हैं। उन्होंने अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) में कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारी भी निभाई है। वे युवाओं की सोच और महत्वकांक्षी से भलीभांति परिचित भी हैं। दिल्ली भाजपा हाईकमान का धामी को कमान सौंपने का एक उद्देश्य यह भी है कि राज्य के युवाओं को अधिक से अधिक पार्टी से जोड़ा जाए। धामी अभी खुद भी 45 साल के युवा है और प्रदेश के सबसे कम आयु वाले पहले मुख्यमंत्री बने हैं। राज्य की कमान संभालने के बाद मुख्यमंत्री पुष्कर ने नौजवानों में ‘जोश’ जगा दिया है। मुख्यमंत्री पुष्कर धामी ने शपथ लेने के दो घंटे बाद अपने इरादे जाहिर करते हुए नवयुवकों को लेकर ‘प्लान’ भी तैयार कर लिया है।

रविवार शाम बुलाई गई पहली कैबिनेट की बैठक में मुख्यमंत्री का पूरा फोकस राज्य के युवाओं को लेकर ही रहा। बैठक में युवा मुख्यमंत्री ने बढ़ती बेरोजगारी के लिए युवाओं की दुखती रग पर हाथ रख दिया हैं। उन्होंने युवाओं को आश्वासन दिलाया कि प्रदेश की राजनीति बदलेगी। धामी ने कहा, ‘मैं युवाओं के बीच काम करता रहा हूं और मुद्दों को अच्छी तरह समझता हूं। कोरोना ने उनकी जिंदगी पर असर डाला है। हम उनके लिए हालात को बेहतर बनाने के लिए काम करेंगे। राज्य में खाली पदों पर नौजवानों को अपॉइंट करने की कोशिश की जाएगी। इसमें कुछ मुश्किलें हैं। लेकिन राज्य में टूरिज्म और चार धाम यात्रा फिर से शुरू करना हमारे लिए बहुत जरूरी है। मेरी उम्र कम है। यहां हर कोई अनुभवी है। मेरी पार्टी के लिए, जिसने मुझे यह मौका दिया है, मेरा कर्तव्य है कि मैं नए और पुराने सदस्यों को एक साथ रखूं’।

कैबिनेट मीटिंग के बाद राज्य सरकार के प्रवक्ता सुबोध उनियाल ने बताया कि युवाओं और बेरोजगारों के लिए कई अहम फैसले लिए गए हैं। बता दें कि बेरोजगारी के इस मुद्दे को अगर सीएम धामी ने बेहतर तरीके से हल किया तो आगामी 2022 में होने वाले विधानसभा चुनाव में भाजपा का सरकार बनाना आसान हो सकता है। फिलहाल देवभूमि के युवा पुष्कर सिंह धामी से बड़ी उम्मीदें लगाए बैठे हैं। अब देखना होगा आने वाले समय में मुख्यमंत्री इन युवाओं की उम्मीदों पर कितना खरा उतरते हैं।

आइए अब पहलेेेे दिन कैबिनेट मंत्री अरविंद पांडे का ‘धामी गुणगान’ भी जान लिया जाए। पांडे ने कहा, ‘पुष्कर सिंह ने छह महीने के लिए नहीं, छह साल के लिए मुख्यमंत्री पद की शपथ ली हैैै, हमारी बात को रिकॉर्ड रखिएगा। पुष्कर सिंह धामी इस कार्यकाल के छह महीने और आने वाले पांच साल तक सीएम रहेंगेे’। उन्होंने कहा कि उत्तराखंड की जनता जानती है कि विकास बीजेपी की सरकार ही करेगी। उत्तराखंड राज्य को हम पर्वतीय प्रदेशों में पहले नंबर पर ले जाएंगे। दूसरी ओर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह ने मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के बाद धामी को शुभकामनाएं दी हैं। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव होने के लिए सात महीने से भी कम वक्त बचा है। पुष्कर सिंह धामी को अब तेजी के साथ काम करना होगा और अपने सहयोगियों के साथ-साथ वोटरों का भरोसा जीतना होगा। इसके साथ पार्टी के नेताओं की नाराजगी भी दूर करनी होगी, तभी वह अपने आपको ‘मिशन 22’ के लिए तैयार कर पाएंगे। आज के अन्य ताजा ‘नवीन समाचार’ पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।

यह भी पढ़ें : सीएम बनते ही मोदी, योगी, केजरीवाल, जयललिता की लंबी रेस के घोड़े साबित हुए विशिष्ट नेताओं की श्रेणी में शामिल हुए धामी

-यह सभी भी बिना मंत्री बने सीधे विधायक से मुख्यमंत्री बने और इनकी उम्र भी 45 से 50 के बीच थी
डॉ. नवीन जोशी @ नवीन समाचार, नैनीताल, 05 जुलाई 2021। रविवार को देहरादून राजभवन में नए मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ग्रहण करने के साथ ही पुष्कर सिंह धामी देश के ऐसे कुछ विशिष्ट चुनिंदा राजनीतिज्ञों की जमात में शामिल हो गए हैं, जिन्हें बिना मंत्री बने सीधे मुख्यमंत्री की कुर्सी संभालने का अवसर मिला है। दिलचस्प बात यह भी है कि यह सभी राजनीति में लंबी रेस का घोड़ा साबित हुए और मुख्यमंत्री बनते समय इनकी उम्र धामी की तरह ही 45 से 50 की बीच ही थी। ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि धामी ऐसे नेताओं की सूची में शामिल होने के बाद लंबी रेस को घोड़ा साबित होने के मिथक को कितना सच साबित कर पाते हैं।

भाजपा की बात करें तो यहां सीधे सीएम की कुर्सी संभालने वाले नेताओं की लंबी फेहरिस्त है। इनमें सबसे बड़ा नाम नरेन्द्र मोदी का है। मोदी को २००१ में गुजरात का मुख्यमंत्री बनाया गया था तो उन्हें भी सरकार चलाने का अनुभव नहीं था। यह भी सर्वविदित है कि पहली बार ही लोकसभा का चुनाव जीतने के बाद वह २०१४ में सीधे प्रधानमंत्री जैसे अति महत्वपूर्ण पद पर पहुंच गये और तब से इसी पद पर बने हैं। इस सूची में उत्तराखंड के पड़ोसी व पूर्ववर्ती राज्य उत्तर प्रदेश जैसे विशाल राज्य के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी शामिल हैं जो २०१७ में बिना मंत्री के अनुभव के सीधे एनेक्सी के पंचम तल पर पहुंचने में कामयाब रहे। इस सूची में यूपी में ही मुख्यमंत्री रहे व बाद में राज्यपाल भी बने कल्याण सिंह भी शामिल हैं। कल्याण सिंह पहले एमएलसी हुआ करते थे और १९९१ में भाजपा की पहली सरकार बनते ही सीधे मुख्यमंत्री बनाए गए। वहीं उत्तराखंड के दूसरे पड़ोसी राज्य हिमाचल प्रदेश के पूर्व व पहले भाजपा सीएम शांता कुमार भी सूची में शामिल हैं। बल्कि सूची को इस सूची में सबसे ऊपर होना चाहिए, क्योंकि उन्हीं से किसी भाजपा नेता के विधायक से सीधे मुख्यमंत्री बनने की शुरुआत हुई थी। शांता कुमार मुख्यमंत्री बनने से पहले जिला परिषद के अध्यक्ष से आगे नहीं बढ़ पाये थे, लेकिन १९७७ में हिमाचल की पहली गैर कांग्रेसी-जनसंघ सरकार बनी तो वह पहली बार विधायक चुने जाने के साथ ही मुख्यमंत्री भी बन गये थे।

सीधे मुख्यमंत्री की कुर्सी संभालने वाले देश के अन्य दलों के राजनेताओं का राजनीतिक इतिहास देखें तो ये सभी लंबी रेस के घोड़े साबित हुए। जयललिता १९९१ में 47 वर्ष की उम्र में संगठन से सीधे तमिलनाडु की सबसे कम उम्र की मुख्यमंत्री बनीं। इसी तरह प्रफुल्ल कुमार महंत बिना किसी अनुभव के पहली बार विधायक बनते ही असम के मुख्यमंत्री बन गये। तब उनकी आयु तो केवल ३३ साल थी। वह दो कार्यकाल तक असम से सीएम रहे। इसी तरह चार बार मिजोरम के मुख्यमंत्री रहने वाले एल. ललथनहावला भी १९८४ में बिना किसी अनुभव के सीधे सीएम बन गए थे। इसी राज्य में एक समझौते के तहत अलगाववादी नेता पी लालडेंगा भी सीधे मुख्यमंत्री बनकर ऐसे ही सौभाग्यशाली नेताओं में शुमार हुए। इस सूची में दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल भी शामिल हैं, जो नई पार्टी बनाने के साथ २०१३ से सीधे सीएम के पद पर बैठे तो आज तक बैठे ही हैं। आज के अन्य ताजा ‘नवीन समाचार’ पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।

यह भी पढ़ें : धामी की राह में अभी से बिछने लगे कांटे, कई काबीना मंत्री व विधायक नाराज, शपथ ग्रहण पर भी संशय

डॉ. नवीन जोशी @ नवीन समाचार, नैनीताल, 04 जुलाई 2021। 2022 के विधानसभा चुनाव की दहलीज पर खड़े उत्तराखंड के 11वें मुख्यमंत्री के रूप में आज रविवार को शपथ ग्रहण करने जा रहे पुष्कर धामी की राह में शपथ ग्रहण से पूर्व ही कांटे बिछने शुरू हो गए हैं। राज्य के कम से कम तीन काबीना मंत्रियों सहित कई विधायकों में उनकी ताजपोषी को लेकर नाराजगी बताई जा रही है। स्थिति यहां तक हो गई है कि रविवार की शाम मुख्यमंत्री के रूप में उनकी ताजपोशी व खासकर इस दौरान मंत्रियों के शपथ ग्रहण करने को लेकर भी संशय पैदा हो गया है। अब यह इस बात पर निर्भर करेगा कि केंद्रीय नेतृत्व शाम तक के बचे हुए समय में कितना डैमेज कंट्रोल कर पाता है।

युवा पुष्कर की ताजपोशी पर उनकी पार्टी के, खासकर कांग्रेसी मूल के वरिष्ठ नेताओं को एक युवा नेतृत्व के नीचे कार्य करना रास नहीं आ रहा है। इससे उनके अरमान ठंडे पड़ रहे हैं, और जैसा कि पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने भी कहा है, एक लंबी रेस के घोड़े के आने से लगातार बढ़ती उम्र के साथ ‘उनके लिए अंगूर खट्टे ही रहने वाले है’। उनका तर्क यह भी है कि युवा पुष्कर अनुभवी हरीश के बरक्स खड़े नहीं हो पाएंगे। वे हरीश से उनकी करीबी, उनके पिछले चुनाव में करीब दो हजार मतों के अंतर से चुनाव लड़ने मंे परोक्ष मदद का भी दावा कर रहे हैं। वे मृदुभाषी हैं, अधिक उग्र नहीं हैं, ऐसे में उन पर विपक्ष पर युवा तेवरों से हमले करने की उम्मीद भी नहीं की जा रही है।

उन्हें यह भी लगता है कि पुष्कर की प्रशासनिक अनुभवहीनता में राज्य की नौकरशाही बेलगाम हो सकती है। वह तीन माह में तीसरा मुख्यमंत्री बदले जाने को लेकर जनता के बीच जाने में भी असहज महसूस कर रहे हैं। साथ ही पार्टी के वरिष्ठ-बुजुर्ग नेताओं को लगता है कि भाजपा ने पुष्कर को चुनकर पार्टी के लिए आत्मघाती कदम उठाया है, और 2022 के चुनाव के लिए आत्मसमर्पण करते हुए आगे के लिए युवा नेतृत्व तैयार करने के लिए पुष्कर को आगे किया है। यह कुछ बातें हैं जो पुष्कर के लिए मुख्यमंत्री पद संभालने से पहले ही चुनौती बन कर सामने आ खड़ी हुई हैं। ऐसे में रविवार को मुख्यमंत्री के रूप में पुष्कर की ताजपोशी व खासकर इस दौरान मंत्रियों के शपथ ग्रहण करने को लेकर भी संशय पैदा हो गया है।

उल्लेखनीय है कि युवा पुष्कर धामी के पास जहां अगले वर्ष फरवरी-मार्च 2022 में होने वाले चुनावों से पहले काम करने के लिए कम समय बचा है, लेकिन भविष्य के नेता के रूप में छवि बनाने का मौका जरूर है। वह युवा हैं। कार्य करने के साथ ही सीखने की भी क्षमता रखते हैं। लेकिन उनकी यही युवा वय, एवं कुमाऊं मंडल के क्षत्रिय जाति से होने की विशेषता, जिसके कारण वह यह पद प्राप्त कर पाए हैं, उनके लिए चुनौतियां भी खड़ी करने वाली है। युवा होने के कारण उनके लिए वरिष्ठ नेताओं का नेतृत्व करना आसान नहीं होगा। इसके लिए उन्हें वरिष्ठों को सम्मान देते हुए साथ लेकर एवं उनके अनुभवों का लाभ लेते हुए आगे बढ़ना होगा। साथ ही उन्हें गढ़वाल मंडल और राज्य की दूसरी बड़ी जाति ब्राह्मणों के साथ ही अन्य सभी जातियों व समुदायों के के लिए कार्य करते हुए केवल एक मंडल या जाति के नेता तक सीमित रहने की जगह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘सबका साथ-सबका विकास’ की अवधारणा को सही साबित करना होगा। अपनी पार्टी मंे भी सबको साथ लेकर नेताओं व कार्यकर्ताओं को गुटबाजी में बंटने से बचाना होगा, उनमें नया जोश भरना होगा, तभी वह राज्य व पार्टी के लिए लंबी रेस का घोड़ा साबित हो सकते हैं। आज के अन्य ताजा ‘नवीन समाचार’ पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।

यह भी पढ़ें : तो ममता बनर्जी की वजह से गई तीरथ सिंह रावत की कुर्सी !

डॉ. नवीन जोशी @ नवीन समाचार, नैनीताल, 03 जुलाई 2021। चार माह के भीतर उत्तराखंड में दो मुख्यमंत्रियों को इस्तीफा देना पड़ा है। अभी सबसे बड़ा सवाल यह है कि तीरथ सिंह रावत को क्यों चार माह का कार्यकाल भी पूरा नहीं कर पाए और क्यों ऐसी स्थिति आई कि उनके नाम उत्तराखंड के अब तक के मुख्यमंत्रियों में सबसे छोटे कार्यकाल तक मुख्यमंत्री रहने का अनचाहा रिकॉर्ड जुड़ गया। यदि हम कहें कि इसका एक कारण सुदूर पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री हैं तो सहसा विश्वास न होगा। लेकिन ऐसा है जरूर।
इस वर्ष 2 मई को आए पश्चिम बंगाल के चुनाव परिणामों में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की पार्टी भले तीसरी बार सरकार बनाने लायक बहुमत प्राप्त कर गई, लेकिन खुद मुख्यमंत्री बनर्जी अतिआत्मविश्वास के फेर में अपनी ही पार्टी के पूर्व नेता व भाजपा प्रत्याशी सुवेंदु अधिकारी से नंदीग्राम सीट का चुनाव हार गई थीं। लेकिन इसके बावजूद वह मुख्यमंत्री बनीं तो उनके सामने भी विधानसभा का सदस्य न होने के कारण तीरथ सिंह रावत की तरह ही मुख्यमंत्री के पद पर बने रहने के लिए 6 माह के भीतर यानी 8 नवंबर तक विधानसभा का सदस्य बनने की कानूनी बाध्यता है। किंतु केंद्रीय चुनाव आयोग पहले ही स्पष्ट कह चुका है कि कोविड-19 की परिस्थितियों के कारण वह एक वर्ष तक उपचुनाव कराने की स्थिति में नहीं है। ऐसे में यदि केंद्र सरकार यदि तीरथ की कुर्सी बचाने के लिए केंद्रीय चुनाव आयोग पर उपचुनाव कराने का दबाव बनाती तो उसे पश्चिम बंगाल में भी खाली पड़ी वीरभूम व भवानीपुर सीटों के लिए भी उपचुनाव कराने पड़ते। अब जबकि केंद्र सरकार ने केंद्रीय चुनाव आयोग के इस निर्णय के आगे अपनी पार्टी के मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत की एक तरह से बलि दे दी है तो उनकी ओर से ममता बनर्जी को कोई अभयदान मिलने की उम्मीद नहीं ही की जा सकती।
गौरतलब है कि इससे पूर्व महाराष्ट्र के मौजूदा मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे के समक्ष भी विधानसभा का सदस्य न होने के कारण ऐसी ही स्थिति आई थी, लेकिन वह प्रधानमंत्री मोदी से भीतरखाने निकटता के कारण विधान परिषद में मनोनयन के जरिए अपनी सीट बचाने में सफल हो गए थे। किंतु केंद्र सरकार पर हमेशा हमलावर रहने वाली ममता बनर्जी पर केंद्र कोई मुरौबत दिखाएगा, फिलहाल इसकी उम्मीद कम ही है। गौरतलब है कि ममता बनर्जी की कुर्सी पर यह खतरा इतना बड़ा है कि शुक्रवार को जब उत्तराखंड के मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत के इस्तीफा देने की चर्चाएं शुरू ही हो रही थीं, ममता बनर्जी की ओर से केंद्रीय चुनाव आयोग को राज्यसभा की दो रिक्त सीटों के चुनाव के साथ विधानसभा सीटों पर उपचुनाव कराने का अनुरोध भी किया गया है।

इतना रहा उत्तराखंड के अब तक के मुख्यमंत्रियों का कार्यकाल:
1.नित्यानंद स्वामी- 9 नवंबर 2000 से 29 अक्टूबर 2001
2. भगत सिंह कोश्यारी- 30 अक्टूबर 2001 से 1 मार्च 2002
3. नारायण दत्त तिवारी- 2 मार्च 2002 से 7 मार्च 2007
4.भुवन चंद्र खंडूड़ी – 7 मार्च 2007 से 26 जून 2009
5.डॉ. रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ – 27 जून 2009 से 10 सितंबर 2011
6. भुवन चंद्र खंडूड़ी – 11 सितंबर 2011 से 13 मार्च 2012
7.विजय बहुगुणा- 13 मार्च 2012 से 31 जनवरी 2014
8.हरीश चंद्र सिंह रावत- 1 फरवरी 2014 से 27 मार्च 2016
9. हरीश चंद्र सिंह रावत – 11 मई 2016 से 18 मार्च 2017
10. त्रिवेंद्र सिंह रावत- 18 मार्च 2017 से 9 मार्च 2021
11.तीरथ सिंह रावत- 10 मार्च 2021 से 2 जुलाई 2021

आज के अन्य ताजा ‘नवीन समाचार’ पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।

यह भी पढ़ें : चेहरा स्वीकार नहीं करता उत्तराखंड !! आज तक चेहरा आगे करके चुनाव लड़ने वाली पार्टी को नहीं मिली जीत,

डॉ. नवीन जोशी @ नवीन समाचार, नैनीताल, 29 जून 2021। उत्तराखंड की राजनीति भी अजब है। यहां की जनता अपने किसी भी नेता पर विश्वास करने से गुरेज करती रही है। कमोबेश बिना नेतृत्व के लड़े गए आंदोलन के बाद मिले उत्तराखंड राज्य के साथ यह मिथक जुड़ गया है कि यहां जब भी किसी पार्टी ने चुनावों के लिए अपने किसी नेता को आगे किया, जनता ने उसे दुत्कार दिया। वर्तमान में भी जहां भाजपा-कांग्रेस दोनों दलों में चेहरे को लेकर अंदरूनी तौर पर जोर आजमाइश दिखाई दे रही है, हर राजनेता अपना चेहरा आगे करने की कोशिश में नजर आ रहा है, तो यह आलेख उनके लिए पीछे मुड़कर देखने और आगे की रणनीति बनाने में सहायक हो सकता है।
राज्य के चुनावी इतिहास को देखें तो 2002 में हुए राज्य के पहले विधानसभा चुनाव में सत्तारूढ़ भाजपा ने तत्कालीन मुख्यमंत्री भगत सिंह कोश्यारी को आगे रखकर चुनाव लड़ा जबकि कांग्रेस ने बिना चेहरे के, और इस चुनाव में कांग्रेस को कामयाबी मिली। कोश्यारी चुनाव जीते मगर सीएम की कुर्सी से वंचित हो गए। चुनाव बाद नारायण दत्त तिवारी मुख्यमंत्री बने। 2007 के चुनाव में कांग्रेस के पास तिवारी बड़ा चेहरा थे। हालांकि उन्होंने विस चुनाव नहीं लड़ा मगर कांग्रेस हार गई और बिना चेहरा आगे किए चुनाव लड़ी भाजपा के हाथ सत्ता आ गई। कुर्सी के लिए भगत सिंह कोश्यारी और सेवानिवृत्त मेजर जनरल भुवन चंद्र खंडूड़ी में जंग छिड़ी तो खंडूड़ी को आलाकमान का आशीर्वाद मिला। वह सीएम बने। उनकी राह निष्कंटक न रही। खंडूड़ी-कोश्यारी की जंग में निशंक के हाथ सत्ता लगी मगर चुनाव से पहले निशंक को हटाकर खंडूड़ी को ताज सौंप दिया गया और भाजपा ने उन्हें अपने ‘खंडूड़ी है जरूरी’ के नारे के साथ अपना चेहरा बनाकर विधानसभा की चुनावी जंग में उतारा। भाजपा ने दावा किया कि खंडूड़ी का चेहरा उनके काम आया। बुरी तरह से पिछड़ रही भाजपा ने 31 सीटें जीती मगर कांग्रेस से एक सीट से पिछड़ गई। खुद खंडूड़ी भी कोटद्वार से चुनाव हार गए, और भाजपा के हाथ से सत्ता चली गई। नतीजतन 2012 में बिना चेहरे के चुनाव लड़ी कांग्रेस बसपा, उक्रांद (पी) और निर्दलीयों की मदद से सत्ता हासिल करने में कामयाब रही। हरीश रावत के दिल्ली हाइकमान के आगे किए जबर्दस्त विरोध प्रदर्शन के बावजूद विजय बहुगुणा सीएम बने। 2013 की केदारनाथ आपदा ने उनकी छवि को नुकसान किया। 2014 में कांग्रेस ने सूबे की कमान हरीश रावत को सौंपी। 2017 में कांग्रेस ने उनके चेहरे पर चुनाव लड़ा। हरीश ने खुद को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बरक्श खड़ा करने की कोशिश करते हुए चुनाव को ‘रावत वर्सेज मोदी’ करने की कोशिश की। खुद दो सीटों से लड़े और दोनों से बुरी तरह से हार गए। कांग्रेस की दुर्गत हुई और वह 11 सीटों के साथ बमुश्किल दहाई का आंकड़ा छू पाई। भाजपा-कांग्रेस को छोड़कर अन्य राजनीतिक दलों के प्रदेश अध्यक्ष या चेहरे भी उत्तराखंड में चुनाव जीते हों, इसकी मिसाल नहीं मिलती। अब पुनः हरीश चेहरे पर चुनाव लड़ने और भाजपा मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत को अपना चेहरा बताकर चुनाव लड़ने की बात कर रही है, तो यह आलेख दोनों दलों के लिए पीछे मुड़कर देखने को मजबूर कर सकता है। आज के अन्य ताजा ‘नवीन समाचार’ पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।

यह भी पढ़ें : ऐसे रहे डॉ. इंदिरा हृदयेश के आखिरी कुछ घंटे

डॉ. नवीन जोशी @ नवीन समाचार, नैनीताल, 14 जून 2021। रविवार को उत्तराखंड की नेता प्रतिपक्ष इंदिरा हृदयेश के आकस्मिक निधन से हर कोई स्तब्ध हैं। उनका इस तरह अचानक चले जाने पर किसी को विश्वास नहीं हो रहा है। हर कोई जानना चाह रहा है कि आखिर ऐसा क्या हुआ कि अच्छी-भली नई दिल्ली पार्टी की बैठक में गईं डॉ. इंदिरा के बारे में ऐसी बुरी खबर आई। इस बारे में उनके पुत्र सुमित हृदयेश ने खुलासा किया है। उन्होंने बताया कि डॉ. हृदयेश शनिवार को उत्तराखंड सदन में पहले करीब पांच घंटे कांग्रेस पार्टी के प्रदेश प्रभारी के साथ बातें करतीं रही थीं। इस कारण उन्होंने रात का खाना भी देर से किया था। इसके बाद वह सुबह चार बजे तक यानी पूरी रात जागते हुए अमिताभ बच्चन और ऋषि कपूर की फिल्म देखती रही थी। शायद उन्हें नींद न आ रही हो। इसके बाद सुबह चार बजे उन्हें उल्टी हुई। इस दौरान उनकी सहायिका पहुंची तो उन्होंने उससे कहा कि वह ठीक हैं। सुबह जल्दी उठा देना। सुबह करीब साढ़े दस बजे उनकी सहायिका ने उन्हें उठाने की कोशिश की तो वह उठ नहीं सकी। चिकित्सकों से उनकी जांच कराई गई, लेकिन चिकित्सकों के बाद उन्हें मृत घोषित कर दिया। यानी एक दहाड़ती हुई शेरनी सरीखी लौह महिला रात्रि में सोते हुए खामोश हो गईं।
इस दौरान सुमित गुरुग्राम में अपने बड़े भाई के पास थे। उन्हें डॉ. हृदयेश के पीआरओ अभिनव का फोन आया कि वह कोई रिस्पांस नहीं कर रही हैं। यह खबर जैसे ही उनके मझले भाई सौरभ को पता चली तो वह तुरंत उत्तराखंड भवन पहुंच गए। इसके बाद उत्तराखंड सदन के व्यवस्था अधिकारी रंजन मिश्रा का उन्हें फोन आया कि डॉ. हृदयेश नहीं रहीं। इस पर वह भी तत्काल उत्तराखंड सदन के लिए रवाना हुए। आज के अन्य ताजा ‘नवीन समाचार’ पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।

यह भी पढ़ें : एक तात्कालिक विश्लेषण: चली गईं उत्तराखंड की ‘आयरन लेडी’, जानें उनका राजनीतिक जीवन और कितना बदलेगी उनके जाने से उत्तराखंड की राजनीति ?

-उत्तर प्रदेश में लगातार तीन बार सहित कुल चार बार रहीं एमएलसी
-उत्तराखंड की कांग्रेस सरकारों में हमेशा नंबर-2 और 2-2 बार काबीना मंत्री व नेता प्रतिपक्ष रहीं
डॉ. नवीन जोशी @ नवीन समाचार, नैनीताल, 13 जून 2021। देश में एक इंदिरा थीं और उत्तराखंड में भी एक इंदिरा थीं। यह संयोग ही है कि दोनों कांग्रेस पार्टी की वरिष्ठ नेत्रियां रहीं और दोनों को ही ‘आइरन लेडी’ यानी लौह महिला जैसे उपनाम मिले। उनका मायका मूल रूप से पिथौरागढ़ जनपद के दौंणू-दसौली ग्राम में था, लेकिन उनका जन्म 7 अप्रैल 1941 को स्वतंत्रता संग्राम सेनानी पिता टीका राम पाठक व रमा पाठक के घर में गोरखपुर उत्तर प्रदेश में हुआ था। उनका काफी बचपन पिता के साथ उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद में भी बीता। शिक्षा पूरी करने के बाद वह हल्द्वानी के ललित महिला कन्या इंटर कॉलेज में पहले लंबे समय तक शिक्षिका और फिर 38 वर्षों तक प्रधानाचार्य रहीं। इसी दौरान उन्होंने 1962 में कांग्रेस पार्टी से जुड़ने के साथ शिक्षक राजनीति के जरिए संयुक्त उत्तर प्रदेश की राजनीति में पदार्पण किया और पहले 1974 से 1980 और फिर 1986 से वर्ष 2000 में उत्तराखंड बनने तक लगातार तीन बार शिक्षक कोटे से उत्तर प्रदेश विधानपरिषद में एमएलसी रहीं। इसी दौरान बिजनौर उत्तर प्रदेश के रहने वाले हृदयेश कुमार शर्मा से उनका विवाह हुआ। वर्ष 2000 में उत्तराखंड बनते समय इंदिरा और केसी सिंह बाबा ही कांग्रेस पार्टी से विधायक की हैसियत में थे, लिहाजा उन्हें नेता प्रतिपक्ष बनाया गया। वर्ष 2002 में पंडित नारायण दत्त तिवारी के नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार बनने पर वह प्रदेश में ‘शैडो मुख्यमंत्री’ की हैसियत में रहीं। इस बीच उनकी छवि अपनी विधानसभा हल्द्वानी की सड़कों को चमकाने के कारण ‘विकास की देवी’ के रूप में भी रही। आगे मुख्यमंत्री का चेहरा होने के बावजूद 2012 से 17 के बीच रही कांग्रेस सरकारों में भी अंदरूनी राजनीति के बावजूद उनकी हैसियत मुख्यमंत्री के बाद नंबर-2 की बनी रही। वर्तमान में भी नेता प्रतिपक्ष होने के साथ लगातार सक्रिय थीं, और उत्तराखंड में कांग्रेस की इकलौती ऐसी पार्टी नेता भी रहीं जो वर्ष 2000 से अब तक, बीच में 2007 के चुनाव को छोड़कर लगातार विधायक बनी रहें व राजनीति में सक्रिय रहीं।
यह भी पढ़ें: उत्तराखंड की राजनीति के लिए बड़ा दुःखद समाचार, नहीं रहीं नेता प्रतिपक्ष डॉ. इंदिरा हृदयेश

विपक्षी नेताओं से भी रहे मधुर राजनीतिक सम्बन्ध : 28 जून को राज्य अतिथि गृह नैनीताल के बाहर अजय भट्ट के साथ हलके-फुल्के मूड में डा. इंदिरा हृदयेश.

बहरहाल, अब जबकि डॉ. इंदिरा हृदयेश हमारे बीच नहीं हैं, इस बात पर भी चर्चा शुरू होने लगी है कि उनके जाने से उत्तराखंड व खासकर कांग्रेस की राजनीति में आया शून्य कैसे भरा जाएगा। यह तो तय माना जा रहा है कि उनकी राजनीतिक विरासत उनके पुत्र सुमित हृदयेश संभालेंगे, जो पहले से राजनीति में पदार्पण कर चुके हैं। संभव है कि राज्य विधानसभा के बचे करीब 8-9 माह के समय में गंगोत्री के साथ हल्द्वानी में भी उप चुनाव हो। वहीं कांग्रेस पार्टी को जल्द ही उनकी जगह नए नेता प्रतिपक्ष का चयन करना होगा। कांग्रेस पार्टी में उनका एक बड़ा ध्रुव भी होता था, अब उन निचले दर्जे के पार्टी नेताओं को उनकी अनुपस्थिति में कोई नया ध्रुव भी चुनना होगा। वह धु्रव उनके कमोबेश धुर विरोधी रहे हरीश रावत होंगे या कोई और, साथ ही हरीश रावत को लगातार और एक दिन पहले भी, हरीश रावत के चेहरा घोषित करने की रट के इतर केंद्रीय हाइकमान से ‘सामूहिक नेतृत्व’ में चुनाव लड़ने की घोषणा कराकर चुनौती देती रहीं इंदिरा के जाने से राज्य की राजनीति में और भी क्या-क्या बदलेगा, यह सब अभी भविष्य के गर्भ में है। उल्लेखनीय है कि श्री रावत ने ही डॉ. इंदिरा हृदयेश के जाने पर सबसे मर्मस्पर्शी एवं लंबा शोक संदेश लिखा है।  आज के अन्य ताजा ‘नवीन समाचार’ पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।

यह भी पढ़ें : भाजपाइयों ने सरकार के 7 वर्ष का कार्यकाल पूरा होने पर भाजपाइयों ने सेवा की, कांग्रेसियों ने धरना

कोटाबाग में जन प्रतिनिधियों को कोरोना के विरुद्ध लड़ने हेतु उपकरण भेंट करते विधायक संजीव आर्य।

डॉ.नवीन जोशी @ नवीन समाचार, नैनीताल, 30 मई 2021। भारतीय जनता पार्टी की केंद्र में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार को रविवार को 7 वर्ष पूरे हो गए। इस मौके पर भारतीय जनता पार्टी कार्यकर्ताओं ने ‘सेवा ही संगठन’ अभियान के तहत जनसेवा कर मनाया। इस अवसर पर पार्टी के अल्पसंख्यक मोर्चा मंडल नैनीताल द्वारा नगर में अपर माल रोड, हरि नगर वार्डों एवं धोबी घाट क्षेत्र में लोगों को मास्क का वितरण किया। यह अभियान अल्पसंख्यक मोर्चा के मंडल अध्यक्ष फैजल कुरेशी एवं मोर्चा के जिला प्रभारी व भारतीय जनता पार्टी के जिला उपाध्यक्ष विवेक साह के नेतृत्व में चलाया गया। कार्यक्रम में जिला उपाध्यक्ष मोहम्मद नफीस ‘पप्पू’, महामंत्री मोहम्मद हसीन, सलमान जाफरी, मोहम्मद आदिल, सोनू मंडल, मोहम्मद तारिक, मोहम्मद आमिर एवं पार्टी के मंडल मंत्री संजय कुमार आदि शामिल रहे।
वहीं नैनीताल मंडल के ही अंतर्गत आने वाले कोटाबाग के स्यात, पांडेगांव, तलिया, रियाड़, डोला, जलना, बाघनी, छड़ा, बाँसी व सौड़ आदि दूरस्थ ग्रामीण क्षेत्रो में इस मौके पर विधायक संजीव आर्य ने कोविड-19 के बचाव हेतु ग्रामीणों के लिए मास्क, सेनिटाइजर, और छिड़काव के लिए सोडियम हाइपो क्लोराइड का वितरण संगठन कार्यकर्ताओं और जनप्रतिनिधियो के माध्यम से उपलब्ध कराया। साथ ही ग्रामीण क्षेत्रों में कोरोना योद्धाओं के रूप में काम कर रहे ग्राम प्रधानों, क्षेेत्र पंचायत सदस्यों को किट में फेस शील्ड, ग्लव्ज, एन-95 मास्क, सर्जिकल मास्क व सेनिटाइजर तािा एनआरएलएम के अंतर्गत कार्यरत महिला समूहों को मास्क, सेनिटाइजर व साबुन आदि उपलब्ध कराए गए।

कांग्रेस ने भाजपा सरकार के 7 वर्षों पर दिया सांकेतिक धरना
नैनीताल। केंद्र की भाजपा सरकार के 7 साल के कार्यकाल को विफल करार देते हुए कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने कांग्रेस जिलाध्यक्ष सतीश नैनवाल के नेतृत्व में मुख्यालय में सांकेतिक धरना दिया। आरोप लगाया कि इन 7 सालों में केंद्र सरकार ने जनता को सिर्फ महंगाई और बेरोजगारी दी है। कोरोना काल मे बदहाल स्वास्थ्य सुविधाओं के कारण देश के लाखों लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी।
तल्लीताल डांठ पर गांधी मूर्ति के निकट करीब एक घंटे तक आयोजित हुए इस सांकेतिक धरना-प्रदर्शन में जिलाध्यक्ष नैनवाल ने पेट्रोल-डीजल, रसोई गैस और सरसों के तेल के दामों में आई बढ़ोत्तरी तथा स्वास्थ्य सुविधाओं व टीकाकरण में आ रही समस्याओं को लेकर केंद्र सरकार पर निशाना साधा। उन्होंने गांवों के एएनएम सेंटर पर टीकाकरण की व्यवस्था करने की मांग भी की। प्रदर्शन में पूर्व सांसद डॉ. महेंद्र पाल, पूर्व विधायक सरिता आर्य, महिला कांग्रेस महिला उपाध्यक्ष खष्टी बिष्ट, महिला कांग्रेस नगर अध्यक्ष भावना भट्ट, नगर अध्यक्ष युकां संजय कुमार, कृष्णा साह, हेम आर्य व मोहन कांडपाल सहित अनेक पार्टीजन मौजूद रहे।

यह भी पढ़ें : उत्तराखंड में असम का फॉर्मूला लागू कर सकती है भाजपा

डॉ. नवीन जोशी @ नवीन समाचार, नैनीताल, 25 मई 2021। एक ओर जहां विपक्षी कांग्रेस पार्टी के वरिष्ठ नेता व पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत अपने पार्टी हाईकमान को उत्तराखंड में किसी चेहरे पर चुनाव लड़ाने के लिए मनाने का प्रयास कर रहे हैं, वहीं उत्तराखंड में अगले साल फरवरी माह में संभावित विधानसभा चुनावों में भाजपा असम का फॉर्मूला अपना सकती है। भाजपा हाईकमान अभी से इन चुनावों के लिए रणनीति बनाने में जुट गया है। इस हेतु विभिन्न पहलुओं व रणनीतियों पर विचार किया जा रहा है। जिनमें एक फॉर्मूला यह भी है कि असम में जिस तरह मुख्यमंत्री सर्बानंद सोनोवाल की जगह भाजपा सामूहिक नेतृत्व पर चुनाव लड़ी और चुनाव में जीत दर्ज की। तथा चुनाव जीतने के बाद मुख्यमंत्री सोनोवाल को दुबारा से मुख्यमंत्री बनाने की जगह सर्वाधिक मेहनत करने वाले पार्टी अध्यक्ष हेमंत बिस्वा सरमा को मुख्यमंत्री बना दिया है। इस रणनीति का लाभ यह है कि सभी पार्टी नेता अपनी पूरी ताकत से पार्टी की जीत के लिए काम करेंगे और एक-दूसरे की टांग खिंचाई भी नहीं करेंगे। अलबत्ता, इस फॉर्मूले को अपनाने का एक नुकसान यह है कि विपक्षी पार्टी जनता में यह कहकर लाभ उठाने की कोशिश करेगी कि मुख्यमंत्री नाकाम रहे, इसलिए सत्तारूढ़ पार्टी बिना चेहरे के चुनाव में उतर रही है।
बताने की आवश्यकता नहीं कि सत्तारूढ़ भाजपा पहले से ही अगले वर्ष की चुनावी रणनीति बनाने में जुट चुकी है। पार्टी के आंतरिक सर्वे में तत्कालीन मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत के नेतृत्व में चुनाव लड़ने पर अपेक्षित बहुमत न मिलने की आशंका पर प्रदेश में नेतृत्व परिवर्तन किया गया। अब मौजूदा मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत के विरुद्ध हालांकि राज्य की जनता में अलग से कोई नाराजगी नहीं है, किंतु उनके कुछ विवादित बना दिए गए बयानों और कोरोना की बेहद विषम परिस्थितियों को देखते हुए भाजपा फिर से अपनी रणनीति पर पुर्नविचार करने की स्थिति में आ गई है। यह भी कारण है कि भाजपा पहले आम आदमी पार्टी को अगले चुनाव में कुछ प्रभावी होता मान रही थी, जिसका परोक्ष लाभ सत्तारूढ़ भाजपा को ही मिलता, क्योंकि आप को जो भी वोट मिलता वह कांग्रेस को मिलने वाला भाजपा का नकारात्मक वोट ही होता जो कांग्रेस की जगह आप को जाकर बंट जाता। किंतु आप शुरू में कुछ दिन बुलबुले ही उछलने के बाद शांत पड़ गई और आगामी चुनावों में सीमित होती नजर आ रही है। इसलिए भाजपा नई रणनीतियां बनाने को मजबूर हुई है। इनमें से जिन कई रणनीतियों पर विचार किया जा रहा है, उनमें असम फार्मूले पर सबसे अधिक विचार किया जा रहा है। इस संबंध में पार्टी के बड़े नेताओं का मन भी भांपा जा रहा है, तथा इसके संभावित दुष्परिणामों का तोड़ निकालने पर भी विचार किया जा रहा है।

यह भी पढ़ें : असोम के ‘बिस्वास’ से उत्तराखंड के पुराने कांग्रेसियों के मन में खिलने लगा ‘कमल’

नवीन समाचार, नैनीताल, 11 मई 2021। सुदूर पश्चिमोत्तर के एक हिमालयी राज्य असोम में कांग्रेसी मूल के हिमंत बिस्वा सरमा को भाजपा हाईकमान के विश्वास जता कर मुख्यमंत्री पद पर ताजपोषी कर दी है। इससे उत्तराखंड के पुराने कांग्रेसियों के दिलों में मानो ‘कमल’ खिल गया है। हम उत्तराखंड के उन पुराने कांग्रेसियों की बात कर रहे हैं जो मूलतः कांग्रेस में रहे हैं पर पिछले पांच वर्षों से भाजपा में शोभा बढ़ा रहे हैं। मंत्री हैं, नहीं भी हैं, पर मुख्यमंत्री बनना चाहते हैं, लेकिन इसलिए मन मसोस कर रह जाते हैं कि भाजपा कभी भी उन पर मुख्यमंत्री बनाने लायक विश्वास नहीं जताएगी। इसलिए मौका मिले तो वापस अपनी पुरानी या ऐसी अन्य पार्टी में जाने की फिराक में भी लगते हैं, जिसकी राज्य में अगली सरकार आ सकती हो।
जी हां, उत्तराखंड भाजपा में सतपाल महाराज, विजय बहुगुणा और डॉ. हरक सिंह रावत जैसे कई नाम हैं जो पिछले पांच वर्षों से भाजपा में अच्छे ओहदे पर होने के बावजूद मुख्यमंत्री बनने का अपना ख्वाब पूरा नहीं कर पा रहे हैं, इसलिए यदा-कदा अपने कद का अहसास भी कराते रहते हैं। सतपाल 2014 के लोकसभा चुनाव के दौरान ही भाजपा में आ गए थे, जबकि 2016 में पूर्व मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा और कैबिनेट मंत्री डॉ. हरक सिंह रावत की अगुवाई में हरीश रावत सरकार से विद्रोह करके कांग्रेस के 9 विधायक-मंत्री भाजपा में शामिल हो गए थे। 2017 में भाजपा का प्रचंड बहुमत आने और इधर राज्य में सत्ता परिवर्तन के दौरान इन नेताओं के नाम भी मुख्यमंत्री पद के लिए चर्चा में आए, लेकिन वे हाईकमान का अपेक्षित विश्वास प्राप्त नहीं कर पाए। लेकिन अब जबकि असोम में हिमंत बिस्व सरमा की मुख्यमंत्री पद पर ताजपोषी हो गई है, तो इसका सबसे बड़ा संकेत उत्तराखंड के इन पुराने कांग्रेसी दिग्गजों में पहुंचा है। उन्हें ‘विश्वास’ हो रहा है कि यदि 2022 के विधानसभा चुनावों में वे हिमंत की तरह अपने दम पर सरकार वापस लाने की ताकत दिखाते हैं तो भाजपा हाईकमान उन्हें मुख्यमंत्री बनाने से भी संकोच नहीं करेगा। बताया गया है कि भाजपा हाइकमान की ओर से उन्हें यह संदेश दे भी दिया गया है।

यह भी पढ़ें : सल्ट उपचुनाव : एक नतीजे ने दिए उत्तराखंड की राजनीति ने कई संदेश..

पहली परीक्षा में सीएम तीरथ सिंह रावत हुए पास, हरदा की प्रतिष्ठा लगी थी यहां दांव पर, गंगा तो सिर्फ प्रतीक थी, नोटा के तीसरे स्थान पर रहने के भी बड़े निहितार्थ…रणजीत रावत की नाराजगी भी पड़ी भारी
दिनेश शास्त्री @ नवीन समाचार, देहरादून, 2 मई 2021। अल्मोड़ा जिले की सल्ट विधान सभा सीट पर हुए उपचुनाव ने एक साथ कई संदेश दिए हैं। सबसे बड़ा संदेश तो हमेशा अंतर्कलह से जूझती रही कांग्रेस के लिए है, जो तमाम कोशिशों के बावजूद एकजुट नहीं हो पाई। अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव के लिए इस नतीजे ने पार्टी के मनोबल को कमजोर सा कर दिया है। हैरत की बात तो यह है कि 2017 के चुनाव में जहां बीजेपी प्रत्याशी सुरेंद्र सिंह जीना महज 3000 मतों के अंतर से जीते थे, इस बार यह अंतर चार हजार से ऊपर हो गया है। जबकि छवि के मामले में महेश जीना कोई बड़ी सख्शियत नहीं थे। इसके विपरीत कांग्रेस की गंगा पंचोली परिचित प्रत्याशी थी वे ब्लॉक प्रमुख रह चुकी हैं और सबसे बड़ी बात कांग्रेस के बड़े नेता हरीश रावत की पसंद थे। यानी सीधे तौर पर यह चुनाव हरदा की प्रतिष्ठा का चुनाव था। गंगा तो प्रतीक थी, लेकिन सल्ट की जनता ने महेश का वरण किया। गंगा के लिए यह भविष्य की राह बंद करने जैसा दुस्वप्न जैसा ही है।
सुरेंद्र सिंह जीना के निधन के बाद खाली हुए सल्ट विस क्षेत्र उपचुनाव में भाजपा के महेंद्र सिंह जीना ने कांग्रेस की गंगा पंचोली को 4700 वोट से हराया है। 2017 में हुए विधानसभा चुनाव से भी कांग्रेस की गंगा पंचोली इस सीट से चुनाव हार गई थी। इस उपचुनाव में सबसे चौकाने वाली बात यह रही कि तीसरे स्थान पर लोगों ने नोटा को पसंद किया है। चुनाव मैदान में खड़े अन्य लोगों को इतने वोट नहीं मिल पाए जितने कि नोटा को। भाजपा के महेश जीना को 21,874 मत मिले, जबकि कांग्रेस की गंगा पंचोली को 17,177 वोट मिले। इस तरह बीजेपी ने यह सीट 4697 वोटों के अंतर से जीत ली, जो पिछली जीत से भी बड़ी है। खास बात यह कि इस सीट पर नोटा तीसरे स्थान पर रहा। 721 मतदाताओं ने नोटा बटन दबाया। जाहिर है भाजपा व कांग्रेस प्रत्याशियों के बाद तीसरे नंबर पर नोटा ही रहा। उसके बाद निर्दलीय सुरेंद्र सिंह को 620, उपपा के जगदीश चंद्र को 493, सर्वजन स्वराज पार्टी के शिव सिंह रावत को 466, उक्रांद समर्थित पान सिंह को 346 और पीपीई डेमोक्रेटिव के नंदकिशोर को 209 वोटों से संतोष करना पड़ा। इसके अलावा 63 मत निरस्त मत हुए हैं।
देखा जाए तो इस उपचुनाव की कोई जरूरत भी नहीं थी। महेश जीना को लोगों के बीच काम करने के लिए मात्र आठ माह का वक्त मिल रहा है। अगले वर्ष जनवरी में आचार संहिता लागू हो जाएगी और मार्च तक नए चुनाव संपन्न हो जाएंगे। ऊपर से कोरोना की मार चल रही है। इस स्थिति में वे जनता के लिए उपयोगी कितना सिद्ध होंगे, समझा जा सकता है। लेकिन हरदा जैसे महारथी की तुलना में जीत दर्ज करने से महेश जीना सल्ट की राजनीति में स्थापित जरूर हो गए हैं। इस क्षेत्र के भाजपा कार्यकर्ता ख्यात सिंह तड़ियाल कहते हैं कि जनता ने बीजेपी को जो आशीर्वाद दिया है, उसके कई मायने हैं। सुरेंद्र सिंह जीना के प्रति यह श्रद्धांजलि तो है ही, बीजेपी के सेवाभाव पर भी जनता की मुहर है और सबसे ज्यादा नए मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत पर भरोसा, जो उन्होंने प्रचार के दौरान लोगों को दिया। उनके मुताबिक यह उपचुनाव सीएम तीरथ सिंह रावत की पहली परीक्षा थी और वे उसमें अच्छे अंकों के साथ पास हो गए।
दूसरी ओर देखा जाए तो कांग्रेस ने इस चुनाव में बहुत कुछ खोया है। उसने न सिर्फ जनता का भरोसा खोया, बल्कि अपने लोगों को भी खो दिया। सल्ट के स्थापित नेता रणजीत सिंह रावत अपने बेटे के लिए टिकट मांग रहे थे, पार्टी का प्रदेश नेतृत्व इसके लिए तैयार भी था लेकिन हरदा के वीटो ने उन्हें दौड़ से बाहर कर दिया, नतीजा यह हुआ कि पूरे चुनाव अभियान के दौरान रणजीत सिंह रावत कहीं नजर नहीं आए, उल्टे उन्होंने चुनाव प्रचार के आखिरी दौर में हरदा को तंत्र मंत्र करने वाला नेता बता कर पार्टी की संभावनाओं को कमजोर ही किया। ये नोटा के वोट कम से कम उसी ओर इशारा कर रहे हैं।
निसंदेह भाजपा का चुनाव प्रबंधन बेहतर था। पार्टी ने न सिर्फ शिद्दत से यह चुनाव लड़ा, बल्कि संगठन की एकजुटता का प्रदर्शन भी किया। कांग्रेस अगर बीजेपी से इतना ही सीख ले तो उसकी ताकत लौट सकती है किंतु आदत से मजबूर कांग्रेसी शायद ही कभी इस दिशा में गंभीर हों। अब तो कहावत सी हो गई है कि कांग्रेस को जनता नहीं हराती, बल्कि कांग्रेसी खुद हार का कारण बनते हैं। अगर यह सच न होता तो 2017 में हरदा सीएम रहते हुए दो सीटों से नहीं हारते। यह भी इस चुनाव का बड़ा संदेश है। कांग्रेसी न समझें तो यह उनकी समस्या है।
एक बात और – पांच राज्यों में हुए चुनाव के बाद जो तस्वीर उभरी है, उसने कांग्रेस की भविष्य की तस्वीर का खाका भी खींच दिया है। अगर पार्टी के अंदर बने जी 23 समूह को संतुष्ट नहीं किया गया तो कौन गारंटी देगा कि अगले चुनाव तक कांग्रेस फिर खड़ी हो पाएगी। केरल और असम में उसके लिए पर्याप्त संभावनाएं थी लेकिन वहां का प्रदर्शन सबके सामने है। तमिलनाडु में पिछलग्गू की तरह संतोष करने भर से पार्टी एकजुट नहीं हो सकती। कोरोना के इस दौर में जितनी जरूरत पीड़ितों को पड़ रही है, उससे ज्यादा ऑक्सीजन की जरूरत कांग्रेस को है।

यह भी पढ़ें : सल्ट चुनाव से पहले उत्तराखंड की राजनीति में तंत्र-मंत्र, वन्यजीवों की बलि एवं शराब के अनुष्ठान चर्चा में

दिनेश शास्त्री @ नवीन समाचार, देहरादून, 16 अप्रैल 2021। राजनीति का तंत्र-मंत्र से शायद पुराना नाता है। विज्ञान के इस युग में भी आजकल लोग इस कदर तंत्र-मंत्र के मायाजाल में उलझ चुके हैं कि लगता नहीं कि उन्हें खुद पर भरोसा है।
पूर्व सीएम हरीश रावत के अतीत में खासमखास रहे रणजीत सिंह रावत ने हाल में जिस तरह का खुलासा हरदा के बारे में किया, वह चौंकाने वाला तो नहीं लेकिन उसने राजनीति में सक्रिय लोगों की खुद से ज्यादा तंत्र-मंत्र पर आसक्ति को विमर्श के केंद्र में ला दिया है। रणजीत रावत वर्ष 2016 का किस्सा याद दिलाते हैं कि उत्तराखंड में राष्ट्रपति शासन के दौरान उनके नेता टोने-टोटके के चलते अपने गले में तेरह मालाएं और हर जेब में अलग-अलग रंग के कपड़े रखते थे। यही नहीं तांत्रिकों के चक्कर मे पड़कर बंदर और सुअर कटवाते थे और श्मशान घाट में जाकर शराब से नहाते थे।
वैसे राजनीति में माना जाता है कि संबंधों में कटुता आ भी जाए तो इतनी गुंजाइश रखी जाती है कि कल अगर फिर एक होना पड़े तो पूर्व के कथनों पर शर्मिंदगी न हो लेकिन रणजीत रावत के पूर्व में हरीश रावत के मानसिक संतुलन वाले बयान के बाद अब हालिया बयान से एक तरह से भविष्य के लिए तमाम रास्ते बंद से कर दिए हैं। बहरहाल यह उनका निजी मामला है, लेकिन इस बीच उत्तराखंड परिवर्तन पार्टी के केंद्रीय अध्यक्ष पीसी तिवारी ने इस मामले में अपनी तीखी प्रतिक्रिया दर्ज करते हुए इसे विमर्श के केंद्र में लाने का प्रयास किया है। उत्तराखंड परिवर्तन पार्टी ने रणजीत रावत द्वारा हरदा पर लगाए आरोपों की प्रकृति को बहुत गंभीर बताते हुए कहा है कि सरकार को निष्पक्ष एजेंसी द्वारा इसकी जांच करनी चाहिए। श्री तिवारी का कहना है कि सोशल मीडिया पर हरीश रावत के खासमखास रहे सहयोगी के उनके आपसी संबंधों एवं पार्टी से जुड़े प्रसंग पर कुछ नहीं कहना चाहते। लेकिन उस मामले में तंत्र-मंत्र में वन्यजीवों की बलि एवं शराब के अनुष्ठान से जुड़े हुए प्रसंग निश्चय ही गंभीर प्रकृति हैं, जो एक सरकार के मुख्यमंत्री से जुड़े होने के नाते उत्तराखंडी जन जीवन के प्रति अच्छी धारणा पैदा नहीं करते। लिहाजा वन्य जीव संरक्षण अधिनियम 1972 में इस तरह के मामले को गंभीर अपराध घोषित किया गया है और तमाम लोग इन मामलों में न्यायालयों में मुकदमों का सामना कर रहे हैं। यदि इन बयानों में सच्चाई है तो इस मामले में शामिल रहे लोगों के खिलाफ वन्य जीव संरक्षण अधिनियम के अंतर्गत कानून सम्मत कार्यवाही की जानी चाहिए।
जाहिर है यह महज शुरुआत है। इस मामले के अगले कुछ दिनों में लंबा खिंचने की आशंका लग रही है। वैसे चुनाव आते रहेंगे, हार-जीत भी होती रहेगी, लेकिन जिस तरह से राजनीति का स्तर सामने आ रहा है, उससे काफी कुछ भविष्य के परिदृश्य की बानगी तो दिखती ही है। यकीन मानिए आने वाले समय में राजनीति में इस तरह के मुद्दे भी हावी हो सकते हैं, आम आदमी को अपने मुद्दों की चिंता शायद खुद ही करनी पड़े।

यह भी पढ़ें : अब उत्तराखंड में 114 महानुभावों की कुर्सी पर संकट !

नवीन समाचार, देहरादून, 01 अप्रैल 2021। उत्तराखंड में नेतृत्व परिवर्तन एवं सभी मंत्री पदों पर नियुक्ति के बाद एक बार फिर राज्य की राजनीति में फिर सक्रियता आने वाली है। विश्वस्त सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र रावत के साथ ही उनकी सरकार के सलाहकारों, मुख्यमंत्री कार्यालय के सचिवों व नजदीकी अधिकारियों के बाद अब भाजपा हाइकमान की नजर उन 114 महानुभावों पर है, जिन्हें त्रिवेंद्र सरकार में विभिन्न दायित्व दिए गए हैं। बताया जा रहा है कि पार्टी के प्रदेश प्रभारी दुश्यंत गौतम इस संबंध में हाईकमान से लाया गया फरमान राज्य भाजपा को थमा चुके हैं।
इसके पीछे भाजपा की योजना व मंशा यह है कि इस बहाने इन दायित्वधारियों को फिर से सक्रिय किया जाए। जो दायित्वधारी पहले से सक्रिय हैं और अपने दायित्व का बेहतर तरीके से निर्वहन कर रहे हैं, ऐसे दायित्वधारियों को दायित्व जारी भी रखे जा सकते हैं, जबकि निष्क्रिय दायित्वधारियों से दायित्व वापस लेकर उनकी जगह क्षमतावान पार्टी के कार्यकर्ताओं को दायित्व देकर उनकी क्षमता व योग्यता का लाभ आगामी विधानसभा चुनाव में किया जा सकता है। बताया जा रहा है कि अब भाजपा उत्तराखंड इस कसौटी पर महानुभावों को कस रही है। यह भी देखा जा रहा है कि किसी दायित्वधारी को हटाने पर क्या 2022 के विधानसभा चुनाव में पार्टी को कोई नुकसान भी हो सकता है।

यह भी पढ़ें : अब नैनीताल के एक विधायक ने की सीएम के लिए सीट छोड़ने की पेशकश

नवीन समाचार, नैनीताल, 24 मार्च 2021। एक काबीना मंत्री सतपाल महाराज के इंकार के बाद दूसरे काबीना मंत्री डॉ. हरक सिंह रावत व बद्रीनाथ विधायक महेंद्र भट्ट के बाद अब निर्दलीय विधायक राम सिंह कैड़ा ने मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत को भीमताल से चुनाव लड़ने का न्यौता दिया है। विधायक कैड़ा भाजपा के एसोसिएट सदस्य भी हैं। कैड़ा का कहना है कि उन्होंने सीएम मुख्यमंत्री रावत की कुशल क्षेम पूछी और कहा कि यदि वे भीमताल विधानसभा क्षेत्र से उप चुनाव लड़ना चाहते हैं तो वे सीट छोड़ने के लिए तैयार हैं। उन्हें उम्मीद है कि इससे विधानसभा क्षेत्र ओखलकांडा, धारी व रामगढ़ आदि का विकास होगा। उन्होंने कहा कि उनकी हार्दिक इच्छा यही है कि विधानसभा क्षेत्र का विकास हो, ताकि क्षेत्र के लोगों को सहूलियत मिल सके। उल्लेखनीय है कि सीएम तीरथ ने अभी अपने पत्ते नहीं खोले हैं। मालूम हो कि सीएम तीरथ अभी पौड़ी से सांसद हैं और उन्हें छह महीने के अंदर विधानसभा की सदस्यता लेनी जरूरी है। उनके पास सल्ट से उप चुनाव लड़ने का मौका था, लेकिन उन्होंने सल्ट से चुनाव लड़ने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई। हालांकि विपक्षी कंाग्रेस की आशंका को सही मानें तो भाजपा एक और उप चुनाव में जाने से पहले आम चुनाव की घोषणा भी कर सकती है।

यह भी पढ़ें : सल्ट उप चुनाव : तो भाजपा करने जा रही है बड़ी राजनीतिक चूक

डॉ. नवीन जोशी @ नवीन समाचार, नैनीताल, 21 मार्च 2021। अब जबकि यह करीब-करीब साफ हो गया है कि मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत सल्ट से चुनाव नहीं लड़ने जा रहे हैं, सत्तारूढ़ भाजपा सरकार ने राज्य व खासकर कुमाऊं मंडल की जनता में कई अच्छे संदेश देने का मार्ग बंद करना कमोबेश तय कर लिया है। पार्टी मुख्यमंत्री रावत को सल्ट से चुनाव लड़ते तो इसके कई लाभ पार्टी एवं राज्य की जनता को मिल सकते थे, जिन्हें देने के लिए अब पार्टी व सरकार को कोई अन्य यत्न करने होंगे।
उल्लेखनीय है कि पार्टी द्वारा पिछले दिनों राज्य में नेतृत्व परिवर्तन के पीछे उन आंतरिक व आईबी की सर्वेक्षण रिपोर्टों को मुख्य आधार बताया जा रहा है, जिनमें खासकर कुमाऊं मंडल में भाजपा की स्थिति काफी खराब बताई गई है। भाजपा कुमाऊं मंडल से आने वाले बंशीधर भगत को भी प्रदेश अध्यक्ष के पद से हटा चुकी है। इसलिए मुख्यमंत्री के सल्ट से चुनाव लड़ने से कुमाऊं मंडल की जनता में पार्टी एवं सरकार के प्रति विश्वास बढ़ाया जा सकता था। मुख्यमंत्री के कुमाऊं मंडल की सल्ट सीट से चुनाव लड़ने से यह संदेश भी जाता कि मुख्यमंत्री राजनीतिक मजबूती व आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़कर ‘फ्रंट फुट’ पर बैटिंग कर रहे हैं। इससे राज्य अगले छह माह के भीतर एक और उपचुनाव का खर्च व चुनाव आचार संहिता से होने वाले नुकसान से भी बच जाता। इसके अलावा वर्तमान में मुख्यमंत्री सहित 12 सदस्यीय राज्य मंत्रिमंडल में मुख्यमंत्री सहित 7 सदस्य गढ़वाल मंडल से और पांच सदस्य ही कुमाऊं मंडल से हैं। यदि मुख्यमंत्री कुमाऊं की सल्ट सीट से चुनाव लड़ते और जीतते तो इससे कुमाऊं व गढ़वाल मंडलों से राज्य मंत्रिमंडल में 6-6 सदस्य हो जाते। साथ ही मुख्यमंत्री के सल्ट से चुनाव जीतने पर राज्य में मुख्यमंत्री कुमाऊं मंडल का क्षत्रिय और पार्टी अध्यक्ष गढ़वाल मंडल का ब्राह्मण होने का जातीय व क्षेत्रीय संतुलन भी स्वयं ही बन जाता, और यह 2022 के आम चुनाव के लिए भाजपा के लिए संजीवनी की तरह होता।

यह भी पढ़ें : सल्ट में उपचुनाव का कार्यक्रम जारी, मुख्यमंत्री तीरथ के भी चुनाव लड़ने की संभावना !

नवीन समाचार, देहरादून, 16 मार्च 2021। चुनाव आयोग ने उत्तराखंड में अल्मोड़ा जिले की सल्ट विधानसभा सीट के उपचुनाव का कार्यक्रम जारी कर दिया है। नामांकन की प्रक्रिया 23 मार्च से शुरू होगी, जबकि अंतिम तिथि 30 मार्च 2021 रखी गई है, जबकि चुनाव 17 अप्रैल को होगा और मतगणना दो मई को होगी। उल्लेखनीय है कि सल्ट में उपचुनाव की प्रक्रिया 12 मई से पहले पूरी की जानी है। 17 अप्रैल को मतदान और 02 मई को मतगणना होगी। उल्लेखनीय है कि सल्ट विधानसभा भाजपा विधायक सुरेंद्र सिंह जीना के निधन से रिक्त हुई थी और पहले यहां से उपचुनाव में स्वर्गीय जीना के परिवार के किसी व्यक्ति को ही चुनाव में खड़ा करने की योजना थी, लेकिन इधर राज्य में नेतृत्व परिवर्तन के बाद मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत के भी इस सीट से चुनाव लड़ने की संभावना राजनीतिक हल्कों में व्यक्त की जा रही है।
गौरतलब है कि आम आदमी पार्टी ने सल्ट उपचुनाव नहीं लड़ने का फैसला किया है। जबकि कांग्रेस पूरी ताकत से चुनाव लड़ने की बात कह रही है। सल्ट उपचुनाव में कुल 95 हजार मतदाता भाग लेंगे। एक जनवरी 2021 के आधार पर तैयार मतदाता सूची के अनुसार सल्ट में कुल मतदाताओं की संख्या 95, 241 है, जिसमें 48,682 पुरुष और 46,559 महिला मतदाता हैं। इसके लिए यहां कुल 136 मतदान केंद्र बनाए गए हैं।

यह भी पढ़ें : एक कैबिनेट मंत्री ने की तीरथ के लिए सीट छोड़ने की पेशकश, वहीं मंत्री बनने से रहे एक विधायक ने कहा-कांग्रेसी विधायक तीरथ के लिए सीट छोड़ेगा, पर सल्ट से चौंकाएंगे तीरथ!

-लेकिन कुमाऊं की सल्ट सीट से ही चुनाव लड़ कर चौंका सकते हैं सीएम तीरथ सिंह रावत, इससे कुमाऊं-गढ़वाल के बीच क्षेत्रीय संतुलन भी बन जाएगा, पूर्व सीएम ने कहा-चुनाव ही नहीं
डॉ. नवीन जोशी @ नवीन समाचार, नैनीताल, 15 मार्च 2021। विधानसभा का सदस्य न होने के कारण मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत के लिए छह माह के भीतर विधानसभा का सदस्य होना जरूरी है। इस पर तरह-तरह की राजनीतिक चर्चाएं शुरू हो गई हैं। कांग्रेस नेता व पूर्व सीएम हरीश रावत की ओर से इस बारे में बयान आया है कि भाजपा उपचुनाव कराना ही नहीं चाहती, बल्कि सीधे अगले विधानसभा चुनाव ही जल्दी करा सकती है। वहीं अब काबीना मंत्री डॉ. हरक सिंह ने सीएम तीरथ रावत के लिए अपनी कोटद्वार सीट छोड़ने की पेशकश कर दी है। एक मीडिया रिपोर्ट के अनुसार उन्होंने कहा कि वह तीरथ की पौड़ी सीट से लोकसभा का चुनाव लड़ने को भी तैयार हैं। उल्लेखनीय है कि हरक पूर्व में अगला विधानसभा चुनाव न लड़ने की बात भी कह चुके हैं।
इसके अलावा तीरथ सरकार में मंत्री बनने से रह गए भाजपा के बदरीनाथ विधायक महेंद्र भट्ट ने पहले सीएम के लिए अपनी सीट की पेशकश करने के बादअब एक नया शिगूफा छोड़ दिया है। उन्होंने फेसबुक में पोस्ट कर लिखा है कि सूत्रों के मुताबिक एक कांग्रेस विधायक मौजूदा मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत के लिए अपनी सीट छोड़ सकता है। इससे पहले सतपाल महाराज तीरथ के लिए अपनी चौबट्टाखाल सीट छोड़ने से इनकार कर चुके हैं।

उल्लेखनीय है कि कुमाऊं मंडल की सल्ट सीट भाजपा विधायक सुरेंद्र सिंह जीना के निधन से खाली है।  उल्लेखनीय है कि सल्ट सीट कुमाऊं मंडल में होने के बावजूद गढ़वाल मंडल से भी जुड़ी हुई है। बहुत संभावना है कि तीरथ सल्ट से ही चुनाव लड़ सकते हैं, और इस तरह कुमाऊं से क्षत्रिय जाति का मुख्यमंत्री हो जाएगा, और गढ़वाल मंडल से पार्टी अध्यक्ष मदन कौशिक के होने के साथ पूर्व से चली आ रही परंपरा का निर्वाह भी हो जाएगा। साथ ही तीरथ के 12 सदस्यीय मंत्रिमंडल में कुमाऊं व गढ़वाल से 6-6 सदस्य हो जाएंगे। क्योंकि अभी मंत्रिमंडल में 7 सदस्य गढ़वाल से और पांच कुमाऊं से हैं, तथा मुख्यमंत्री और प्रदेश अध्यक्ष दोनों गढ़वाल मंडल से हो गए हैं।

यह भी पढ़ें : TSR 2.0 मंत्रिमंडल गठन की तैयारियां शुरू, जानें कौन बन सकते हैं मंत्री..

नवीन समाचार, देहरादून, 12 मार्च 2021। उत्तराखंड के नए मुख्यमंत्री के रूप में दायित्व संभालने के बाद तीरथ सिंह रावत अब अपने मंत्रिमंडल का गठन करने जा रहे हैं। इस क्रम में वह शुक्रवार को दिल्ली जा सकते हैं। अगर कोई पेच न फंसा तो शनिवार तक तीरथ की टीम आकार ले लेगी। मंत्रिमंडल में सभी 11 पदों को भरे जाने की तैयारी है। मंत्रिमंडल में कुमाऊं मंडल को तवज्जो मिलने और महिलाओं का प्रतिनिधित्व बढऩे की संभावना है। स्वयं मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत ने जल्द मंत्रिमंडल के शपथ ग्रहण के संकेत दे दिए हैं। उन्होंने कहा कि केंद्रीय नेतृत्व से चर्चा के बाद मंत्रियों को शपथ दिला दी जाएगी।
बुधवार को शपथ ग्रहण करने के बाद अब मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत अपने मंत्रिमंडल में शामिल किए जाने वाले चेहरों को लेकर मशक्कत में जुटे हुए हैं। गुरुवार को एक दिनी हरिद्वार दौरे से लौटने के बाद उन्होंने पार्टी नेताओं से इस विषय पर मंथन किया। वह लगातार केंद्रीय नेतृत्व के संपर्क में भी बने हुए हैं। सूत्रों के मुताबिक यह लगभग तय है कि पिछले त्रिवेंद्र मंत्रिमंडल के सभी आठ सदस्यों को फिर से रखा जाएगा। त्रिवेंद्र मंत्रिमंडल में तीन मंत्री पद रिक्त थे, लेकिन तीरथ की टीम में सभी 11 पदों को भरा जाएगा। उत्तराखंड में संवैधानिक प्रविधानों के मुताबिक मुख्यमंत्री समेत 12 सदस्यीय मंत्रिमंडल हो सकता है।
सूत्रों के मुताबिक तीरथ की कवायद अब मंत्रिमंडल के तीन पदों के इर्द-गिर्द सिमटी हुई है। त्रिवेंद्र मंत्रिमंडल में पौड़ी गढ़वाल से तीन, ऊधमसिंह नगर से दो और टिहरी, हरिद्वार व अल्मोड़ा जिले से एक-एक मंत्री थे, जबकि स्वयं त्रिवेंद्र देहरादून का प्रतिनिधित्व कर रहे थे। यानी, राज्य के 13 में से महज पांच जिलों को ही मंत्रिमंडल में प्रतिनिधित्व मिला हुआ था। अब अगर तीरथ सिंह रावत, त्रिवेंद्र मंत्रिमंडल के सभी सदस्यों को अपनी टीम में जगह देते हैं, तो बाकी तीन स्थान उन जिलों के हिस्से जाएंगे, जहां से कोई विधायक मंत्री नहीं था। इस स्थिति में उत्तरकाशी, चमोली, देहरादून, रुद्रप्रयाग, पिथौरागढ़, बागेश्वर, चम्पावत व नैनीताल के किन्हीं तीन विधायकों को मंत्री बनाया जा सकता है। माना जा रहा है कि बिशन सिंह चुफाल, ऋतु खंडूड़ी, बलवंत सिंह भौर्याल को मंत्री बनाया जा सकता है। अब तक के राज्य मंत्रियों को कैबिनेट मंत्री बनाया जा सकता है। यह भी चर्चा है कि वर्तमान विधानसभा अध्यक्ष को मंत्री व चुफाल को विधानसभा अध्यक्ष बनाया जा सकता है। एक कैबिनेट मंत्री को हटाए जाने की भी सूत्र संभावना जता रहे हैं। हालांकि भाजपा की कार्यशैली में हमेशा की तरह सभी संभावनाएं निर्मूल भी साबित हो जाएं तो आश्चर्य न होगा।

यह भी पढ़ें : आज 20 वर्ष के उत्तराखंड को मिलेगा 9वां मुख्यमंत्री, पर क्या हाइकमान गलतियों से कुछ सबक लेगा और हश्र वही होगा…?

डॉ. नवीन जोशी @ नवीन समाचार, नैनीताल, 10 मार्च 2021। उत्तराखंड की राजनीति और के साथ ही राज्य के भविष्य के लिए बुधवार का दिन फिर एक नई करवट लेने वाला होने जा रहा है। आज राज्य को नया मुख्यमंत्री मिलने जा रहा है। इस मौके पर यह चर्चा करना जरूरी है कि छोटे से 20 वर्ष के राज्य में 10वीं बार मुख्यमंत्री का चेहरा बदलने की नौबत क्यों आ रही है। क्या भाजपा हाईकमान पुरानी गलतियांे से कुछ सबक लेगा ?
उत्तराखंड राज्य का सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह रहा है कि यहां राज्य के जन्म से लेकर अब तक हमेशा केंद्र से मुख्यमंत्री थोपे गए हैं। केवल उन्हें थोपे जाते वक्त विधानमंडल दल की बैठकों में विधायकों की पसंद बताने का ढोंग रचा गया। यही कारण रहा कि नौ नवंबर 2000 को राज्य बनने पर उस दौर में भगत सिंह कोश्यारी के राज्य में भाजपा का प्रमुख चेहरा होने के बावजूद यूपी विधान परिषद के सदस्य रहे, यानी जनता से चुने विधायक भी न रहे नित्यानंद स्वामी को मुख्यमंत्री बनाया गया। लिहाजा वही हुआ, स्वामी को 29 अक्टूबर 2001 तक यानी एक वर्ष का कार्यकाल भी पूरा किए बिना मुख्यमंत्री रहकर कुर्सी गंवानी पड़ी। बाद में भाजपा ने 30 अक्टूबर 2001 को कोश्यारी को मुख्यमंत्री बनाकर भूल सुधार किया, लेकिन तब तक देर हो चुकी थी। कोश्यारी को 123 दिन में सत्ताच्युत होना पड़ा। वह भाजपा की सरकार वापस नहीं लाए। कांग्रेस को 2002 के विधानसभा चुनाव में बहुमत मिला। तब हरीश रावत स्वाभाविक तौर पर मुख्यमंत्री पद पर जनता की पसंद थे, लेकिन कांग्रेस हाइकमान ने भाजपा की ही गलती दोहराते हुए ‘मेरी लाश पर उत्तराखंड बनेगा’ कहने वाले पं. नारायण दत्त तिवारी को मुख्यमंत्री बना दिया। रावत तिवारी सरकार में हमेशा विपक्ष में रहे। उनकी सरकार हर दिन संकट में रही, फिर भी यूपी जैसे बड़े राज्य के मुख्यमंत्री व केंद्रीय मंत्री रहे अनुभवी तिवारी किसी तरह अपना पांच वर्ष का कार्यकाल पूरा कर पाए, पर कांग्रेस की सरकार वापस न ला पाए। 2007 के विधानसभा चुनाव में भाजपा जीती तो इसमें बड़ा योगदान पूर्व मुख्यमंत्री भगत सिंह कोश्यारी का रहा, लेकिन भाजपा हाइकमान ने फिर पुरानी गलती दोहराते हुए आश्चर्यजनक तौर पर केंद्र में सड़क परिवहन मंत्री रहे सेना से आए सेवानिवृत्त मेजर जनरल भुवन चंद्र खंडूड़ी को मुख्यमंत्री बना दिया। कड़क मिजाज के खंडूड़ी अपने विधायकों को भी डांटते-फटकारते 23 जून 2009 तक मात्र 839 दिन तक मुख्यमंत्री रह पाए। इस बार भी भाजपा ने कोश्यारी को दरकिनार किया और डॉ. रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ को मुख्यमंत्री बना दिया। निशंक भ्रष्टाचार के आरोपों में घिरे और पार्टी सर्वे में उनके नेतृत्व में मात्र 16 सीटें जीतने की संभावना प्रकाश मंे आई तो एक बार फिर 11 सितंबर 2011 को खंडूड़ी को फिर से जरूरी बताकर मुख्यमंत्री बना दिया गया। बावजूद खंडूड़ी के नेतृत्व में भाजपा स्वयं खंडूड़ी की एक सीट से कांग्रेस से पीछे रह गई और सत्ता गंवा बैठी। कांग्रेस 2012 में वापस सत्ता में आई तो हरीश रावत पुनः मुख्यमंत्री पद के स्वाभाविक दावेदार थे, किंतु एक बार पुनः उन्हें दरकिनार कर विधायक भी न रहे विजय बहुगुणा को मुख्यमंत्री बना दिया गया। हरीश रावत ने दिल्ली में खुद को मुख्यमंत्री बनाने के लिए धरना दे दिया। इस बीच 2013 में आई केदारनाथ आपदा में बहुगुणा के राजनीतिक कौशल की विफलता जगजाहिर हुई तो कांग्रेस ने मजबूरी में हरीश रावत को मुख्यमंत्री बना दिया। अब तक हरीश को यह गुमान हो गया था कि वह अपने दम पर मुख्यमंत्री बने हैं। उन्होंने कांग्रेस को ‘हरीश कांग्रेस’ भी बनाने का प्रयास किया। परिणाम यह हुआ कि पार्टी में बड़ी टूट हो गई। नौ विधायक विधानसभा के सत्र के दौरान ही कांग्रेस छोड़ भाजपा में शामिल हो गए। फिर भी राजनीतिक कौशल से हरीश केंद्र में भाजपा सरकार होने के बावजूद अपना बचा कार्यकाल पूरा करने में तो सफल रहे पर 2017 के विधानसभा चुनावों में खुद दो सीटों से चुनाव हारने के साफ भाजपा को 70 में से 57 सीटों की बड़ी जीत दिला गए। भाजपा सरकार में आ रही थी तो इस बार भी भाजपा हाइकमान ने विधायकों को उनका नेता चुनने देने की जगह अपनी पसंद के त्रिवेंद्र सिंह रावत को मुख्यमंत्री बना दिया। नतीजा सामने है।

यह भी पढ़ें : अभी-अभी मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने राज्यपाल से मिलकर इस्तीफा दिया

नवीन समाचार, देहरादून, 09 मार्च 2021। उत्तराखंड के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने मंगलवार को सायं 4.15 बजे राज्यपाल बेबी रानी मौर्य से भेंट कर मुख्यमंत्री पद से त्याग पत्र सौंप दिया है। राज्यपाल बेबी रानी मौर्य ने मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत का इस्तीफ़ा स्वीकार करते हुए उनसे राज्य में नए मुख्यमंत्री की नियुक्ति होने एवं पदभार ग्रहण करने की अवधि तक कार्यवाहक मुख्यमंत्री बने रहने को कहा है।

मंगलवार शाम करीब सवा चार बजे मुख्यमंत्री रावत ने देहरादून स्थित राजभवन में राज्यपाल को अपना इस्तीफा दे दिया है। इस्तीफा देने के तुरंत बाद त्रिवेंद्र ने कहा कि वह लंबे समय से राजनीति में हैं। पार्टी ने पिछले चार वर्षों से राज्य में सरकार का नेतृत्व करने का मौका दिया। वह एक छोटे से गांव, जहां अब भी चार-पांच परिवार ही रहते हैं, पिता पूर्व सैनिक थे। उन्होंने कभी कल्पना भी नहीं की थी कि छोटे से गांव के, एक सामान्य परिवार के व्यक्ति को मुख्यमंत्री बनाया। इतना बड़ा सम्मान दिया। इधर पार्टी ने सामूहिक रूप से यह निर्णय लिया कि उन्हें किसी और को यह मौका देना चाहिए। चार वर्ष से नौ दिन शेष रहते किसी अन्य को मौका दे रहे हैं। इस दौरान स्वरोजगार, महिलाओं के उत्थान व सशक्तीकरण, बच्चों की शिक्षा व किसानों के लिए कई नए कार्यक्रम दिए। पार्टी यदि यह चार वर्ष का मौका न देती तो यह योजनाएं नहीं ला पाते। महिलाओं को उनके पतियों की संपत्ति में खातेदार के रूप में अधिकार व घस्यारी कल्याण योजनाएं उनकी सरकार के लिए बड़ी संवेदनशील पहलें हैं। कल जिसे भी मुख्यमंत्री बनाया जाएगा, उन्हें शुभकामनाएं देते हैं। कल पार्टी मुख्यालय पर सुबह 10 बजे विधानमंडल दल की बैठक है, सभी विधायक इस बैठक में मौजूद रहेंगे। उन्होंने हटाए जाने का कारण पूछने पर कहा कि इसके लिए आपको दिल्ली जाना पड़ेगा।

उल्लेखनीय है कि भाजपा के उत्तराखंड के मुख्य प्रवक्ता मुन्ना सिंह चौहान ने सुबह कहा था कि मुख्यमंत्री आज शाम तीन-साढ़े तीन बजे मीडिया से बात कर सकते हैं। हालांकि बाद में भाजपा प्रदेश अध्यक्ष बंशीधर भगत ने कहा कि मुख्यमंत्री की ओर से कोई प्रेस कांफ्रेंस नहीं बुलाई गई है। इससे मुख्यमंत्री आवास में घंटे भर से इंतजार कर रहे पत्रकारों को मायूसी हुई है। भगत ने कहा कि मुख्यमंत्री द्वारा शाम साढ़े चार बजे प्रदेश की राज्यपाल से मिलने का समय लिया है। उन्होंने बताया कि डॉ. रमन सिंह व दुश्यंत गौतम देहरादून आ रहे हैं। मंगलवार को विधानमंडल दल की बैठक बुलाई गई है। माना जा रहा है कि इस दौरान मुख्यमंत्री राज्यपाल को अपना इस्तीफा सोंप सकते हैं। इसके बाद मंगलवार सुबह 11 बजे भाजपा विधानमंडल दल की बैठक हो सकती है। साथ ही यह भी जानकारी आ रही है कि राज्यसभा सांसद अनिल बलूनी व राज्य मंत्री धन सिंह रावत में से ही कोई एक मुख्यमंत्री बन सकता है।

यह भी पढ़ें : आज सुबह दून लौटेंगे त्रिवेंद्र, विधानमंडल दल की बैठक आज नहीं

नवीन समाचार, नई दिल्ली, 09 मार्च 2021। उत्तराखंड में छाया राजनीतिक कुहांसा अभी छंटा नहीं है, अलबत्ता नई अपडेट यह है कि राज्य के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत मंगलवार को सुबह 10-11 बजे नई दिल्ली से देहरादून लौट रहे हैं, और देहरादून में पार्टी की विधानमंडल दल की कोई औपचारिक बैठक अभी तक नहीं बुलाई गई है। उत्तराखंड भाजपा के मुख्य प्रवक्ता मुन्ना सिंह चौहान ने औपचारिक तौर यह बयान जारी किया है। उन्होंने अपने वक्तव्य में यह दावा भी किया है कि मुख्यमंत्री और उनके कामकाज को लेकर पार्टी के विधायकों या कार्यकर्ताओं में कभी भी कोई नाराजगी नहीं रही है। उन्होंने यह भी कहा कि भाजपा में कोई भी नीतिगत निर्णय व नीतिगत चर्चाओं पर पार्टी हाईकमान, पार्टी का संसदीय दल निर्णय करते हैं। भाजपा में पूर्णतः आंतरिक लोकतंत्र है, इसमें लगातार चर्चाएं चलती रहती हैं। अलबत्ता पार्टी हाईकमान व पार्टी के संसदीय दल में हुई या हो रही चर्चाओं पर वह कुछ भी कहने के लिए अधिकृत नहीं हैं। उल्लेखनीय है कि सोमवार शाम सभी मंत्री और विधायकों को दिल्ली आने का फरमान जारी किया गया था, लेकिन बाद में उन्हें मंगलवार को देहरादून पहुंचने को कहा गया है। इससे यह साफ है कि पार्टी हाईकमान ने अभी कोई निर्णय सार्वजनिक नहीं किया है। यह निर्णय बहुत संभव है कि आज साफ हो। विधायकों को देहरादून बुला ही लिया गया है। 

यह भी पढ़ें : एक साथ कई नईं सुर्खिया….

नवीन समाचार, नैनीताल, 08 मार्च 2021। उत्तराखंड की बदलती राजनीति से संबंधित लगातार नई सुर्खियां आ रही हैं। प्रदेश के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत की केंद्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा व अमित साह से मुलाकात हो गई है। वहीं आश्चर्यजनक तौर पर मुख्यमंत्री रावत अनिल बलूनी से उनके आवास पर करीब डेढ़ घंटे तक मिले हैं। वहीं केंद्रीय हाइकमान द्वारा उत्तराखंड के भाजपा से जुड़े जिला पंचायत अध्यक्ष, मेयर व जिलाध्यक्षों को नई दिल्ली बुलाने की भी जानकारी आ रही है। कुछ जिला पंचायतों के लिए इसके लिए टिकट लेने की जानकारी आई है। वहीं उत्तराखंड के सभी भाजपा विधायकों को कल देहरादून बुलाने की भी जानकारी आ रही है। इसके बाद माना जा रहा है कि देहरादून में कल या परसों विधानमंडल दल की बैठक हो सकती है। इधर राज्य मंत्री धन सिंह रावत का नाम भी मुख्यमंत्री के तौर पर पहली बार आगे बढ़ा है। उन्हें मुख्यमंत्री रावत की पसंद के तौर पर देखा जा रहा है। वहीं मुख्यमंत्री की अनिल बलूनी से मुलाकात को भी बचाव के प्रयासों के रूप में देखा जा रहा है। उल्लेखनीय है कि सीएम त्रिवेंद्र सिंह रावत सुबह से दावा कर रहे थे कि उनकी पार्टी हाईकमान के साथ बैठक है लेकिन उन्हें बैठक में शामिल नहीं किया गया। 

यह भी पढ़ें : संसदीय दल की बैठक कल, और मजबूत हुईं उत्तराखंड में नेतृत्व परिवर्तन की अटकलें

डॉ. नवीन जोशी @ नवीन समाचार, नैनीताल, 08 मार्च 2021। उत्तराखंड की राजनीति से जुड़ी नई अपडेट है। प्राप्त जानकारी के अनुसार भाजपा के केंद्रीय हाईकमान ने मंगलवार 9 मार्च यानी कल संसदीय दल की बैठक आहूत कर दी है। हालांकि अभी यह तय नहीं है कि संसदीय दल की बैठक में किन विषयों पर मुख्य रूप से चर्चा होगी। बाहरी व सामान्य तौर पर कहा जा सकता है कि संसदीय दल पांच राज्यों में होने जा रहे विधानसभा चुनावों पर चर्चा करेगा और प्रत्याशियों के नामों को अंतिम रूप से हरी झंडी देगा, वहीं उत्तराखंड की राजनीति के जानकारों की मानें तो इस बैठक में उत्तराखंड के दो पर्यवेक्षक तय हो सकते हैं जो देहरादून में अगले एक-दो दिनों के भीतर ही बुलाई जाने वाली विधानमंडल दल की बैठक में मौजूद रह सकते हैं, जिसमें राज्य भाजपा के विधायक अपना नया नेता चुन सकते हैं। इस तरह राज्य में नेतृत्व परिवर्तन की अटकलों को संसदीय दल की बैठक के आहूत होने से और बल मिल रहा है। साथ ही यह भी यह भी कहा जा रहा है कि यदि सीएम त्रिवेंद्र रावत को इस बार अभयदान मिलता है तो वह अपना कार्यकाल पूरा करेंगे। साथ ही यदि उन्हें अभयदान मिलता है तो उन्हें तुरंत मंत्रिमंडल का विस्तार करना होगा। अपने पास के महत्वपूर्ण विभागों को नए मंत्रियों को बांटना होगा। वहीं यदि उन्हें हटाया जाता है तो उन्हें केंद्र में भेजा जा सकता है। इधर ताजा समाचार यह है कि सोमवार शाम करीब छह बजे से अमित साह और जेपी नड्डा के बीच नई दिल्ली में उत्तराखंड को लेकर बैठक शुरू हो गई है। डॉ. रमन सिंह ने बीती मध्य रात्रि जेपी नड्डा को देहरादून में हुई कोर ग्रुप की बैठक की रिपोर्ट सोंपी, जिसमें त्रिवेंद्र रावत के नेतृत्व में विधानसभा चुनाव में जाने पर भाजपा को भारी नुकसान की संभावना जताई गई है। यह भी समाचार है कि भाजपा हाईकमान ने राज्य से पार्टी के विधायकों को दिल्ली बुला लिया है। दिल्ली में पार्टी के पहले से कई मुख्यमंत्री के विरोधी गुट के मुख्यमंत्री मौजूद हैं। इधर भाजपा के उत्तराखंड प्रभारी दुश्यंत गौतम का बयान आया है कि मुख्यमंत्री रावत पर अनेक विभागों का बोझ है। उन्हें यह मंत्रालय विधायकों को देने चाहिए।
इसके साथ ही उत्तराखंड के अगले मुख्यमंत्री पद के लिए भी चर्चाएं तेज हो गई हैं। इस दिशा में राज्य सभा सांसद अनिल बलूनी का नाम सबसे ऊपर है। वह केंद्रीय नेतृत्व की पहली पसंद हैं। उन्होंने मीडिया के जरिये जनता के बीच बड़े नेता के रूप में अपनी छवि भी बनाई है। लेकिन इसके साथ ही बनी उनकी किसी से सीधे संवाद न करने वाले एरिस्टोक्रेट नेता की छवि को देखते हुए न केवल केंद्रीय नेतृत्व बल्कि राज्य के विधायक भी सशंकित हैं कि वह जमीनी स्तर पर कितना कार्य कर पाएंगे। विधायकों को भय है कि उन तक उनकी पहुंच हो भी पाएगी कि नहीं। बलूनी अब तक कोई चुनाव भी नहीं लड़े हैं। यदि वे राज्य की राजनीति में आते हैं तो उन्हें सल्ट से चुनाव लड़ाया जा सकता है। ऐसे में भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष बंशीधर भगत को बदला जाना भी तय है।
कुछ यही बात संघ की पसंद बताए जा रहे सतपाल महाराज के साथ भी है। उनके बारे में भी विधायकों की सर्वस्वीकार्यता सवालों के घेरे में है। ऐसे में प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री एवं महाराष्ट्र के साथ गोवा के राज्यपाल पद की दोहरी जिम्मेदारी संभाल रहे भगत सिंह कोश्यारी की पसंद के रूप में नैनीताल के सांसद अजय भट्ट का नाम भी तेजी से उभर रहा है, जिन्हें यूपी के जमाने से न केवल चुनाव लड़ने का न केवल अनुभव है। वरन भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष के तौर पर भाजपा को पिछले चुनाव में सत्ता में लौटाने के साथ पूरे राज्य के जनमानस से वाकिफ हैं। वह पिछले लोक सभा चुनाव में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता व पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत को बड़े अंतर से चुनाव हराकर सांसद बने हैं। राज्य में स्वास्थ्य मंत्री के रूप में भी उनका कार्यकाल यादगार रहा है, जबकि संसद में भी उत्तराखंड के मूलभूत प्रश्नों पर लगातार अपनी आवाज बुलंद किए हुए हैं। हालांकि वे मुख्यमंत्री पद के लिए बहुत इच्छुक नहीं बताए जा रहे हैं। इस बीच कोश्यारी के आज शाम तक दिल्ली आने की भी मीडिया में खबरें हैं, पर इसकी संभावना अब तक नहीं के बराबर है।

यह भी पढ़ें : उत्तराखंड बिग ब्रेकिंग: सीएम ने भरी दिल्ली के लिए उड़ान !! चर्चाओं का बाजार फिर गर्म…

नवीन समाचार, देहरादून, 08 मार्च 2021। उत्तराखंड के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने सोमवार सुबह देहरादून से दिल्ली के लिए निकल गए हैं। पहले उनका मंगलवार को दिल्ली जाना प्रस्तावित था, लेकिन इधर विश्वस्त सूत्रों के अनुसार इससे पहले ही उनके सुबह करीब 10.40 बजे दिल्ली के लिए उड़ान भरने का समाचार है। इसके साथ आज और अगले कुछ दिन एक बार फिर उत्तराखंड की राजनीति के लिए महत्वपूर्ण होने जा रहे हैं।
इधर बताया गया है कि उत्तराखंड में केंद्रीय पर्यवेक्षक बनकर आए छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने रविवार को ही अपनी रिपोर्ट भाजपा के कंेद्रीय अध्यक्ष जगत प्रसाद नड्डा को सोंप दी है। इसके बाद अपना पक्ष प्रस्तुत करने के लिए मुख्यमंत्री दिल्ली पहुंच रहे हैं। यहां उनके केंद्रीय अध्यक्ष नड्डा के साथ ही अन्य शीर्ष नेताओं से भी मुलाकात करने की संभावना है। ऐसे में यह भी साफ है कि उत्तराखंड की राजनीति में कुछ बड़ा जरूर होने वाला है। या तो राज्य में मुख्यमंत्री बदला जा सकता है, अन्यथा राज्य में तीन मंत्रियों की ताजपोशी सहित अन्य बड़ी राजनीतिक घटनाएं हो सकती हैं।

यह भी पढ़ें : तो इस बार भी दिल्ली से ही लिखी गई उत्तराखंड में नेतृत्व परिवर्तन की कहानी 

डॉ. नवीन जोशी @ नवीन समाचार, देहरादून, 07 मार्च 2021। उत्तराखंड में नेतृत्व परिवर्तन के प्रयास नए नहीं हैं। राज्य बनने के बाद से शायद ही कोई मुख्यमंत्री हो जो इसका शिकार न हुआ हो। शायद इसीलिए पंडित नारायण दत्त तिवारी के अलावा राज्य के कोई भी मुख्यमंत्री अपने पांच वर्ष का कार्यकाल पूरा नहीं कर पाए। यहां राज्य के मुख्यमंत्रियों के खिलाफ ऐसी-ऐसी साजिशें भी हुईं कि पहले मुख्यमंत्री नित्यानंद स्वामी से लेकर भुवन चंद्र खंडूड़ी, नारायण दत्त तिवारी, विजय बहुगुणा व पिछले मुख्यमंत्री हरीश रावत दुबारा विधानसभा नहीं पहुंच पाए।
राज्य के मौजूदा मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र रावत के खिलाफ भी ऐसी साजिशें कई बार होती रही हैं, और इसे रावत की किस्मत कहें कि राजनीतिक कौशल, ऐसी साजिशें सफल नहीं हो पाई हैं। शनिवार को ग्रीष्मकालीन राजधानी में चल रहे बजट सत्र के दौरान अप्रत्याशित तौर पर घटित घटनाक्रम का भी यही हश्र हो तो आश्चर्च न होगा। अब शनिवार के पीछे की कहानी की कड़ियां धीरे-धीरे सूत्रों के हवाले से खुलती नजर आ रही हैं। रावत के खिलाफ राज्य के भीतर पूर्व में कांग्रेस से आए कम से कम दो नेताओं के गुटों के साथ ही कुमाऊं के कुछ नए व पुराने विधायक तो पहले से ही लगे हुए हैं, वहीं दिल्ली से भी साजिशें होती रही हैं। पिछले दिनों दिल्ली में भाजपा के मीडिया प्रबंधन की कमान उत्तराखंड के ही नेता के पास होने के बावजूद राष्ट्रीय मीडिया में त्रिवेंद्र रावत को देश का सबसे फिसड्डी मुख्यमंत्री बताया गया। गौरतलब है कि शनिवार को भी उत्तराखंड में कोर कमेटी की बैठक में छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह को भेजे जाने की खबरें भी राष्ट्रीय मीडिया से ही पहले आईं। वहीं शाम को जब त्रिवेंद्र रावत के कोर कमेटी की बैठक से बाहर निकलने की खबरें आईं, उसी दौरान उत्तराखंड के नए मुख्यमंत्री के रूप में मीडिया के एक वर्ग द्वारा प्रचारित किए जा रहे नेता के दिल्ली में भाजपा के केंद्रीय कार्यालय में होने की सूचना भी मीडिया से छुपी न रह सकीं। यह भी संयोग नहीं हो सकता कि एक सप्ताह पूर्व ही गंभीर बीमारी से उबरने के बाद पार्टी के एक केंद्रीय नेता उत्तराखंड आए थे और हल्द्वानी में एक सप्ताह रुकने की बात कहने के बावजूद अचानक दिल्ली लौट गए थे।

इधर बताया गया है कि शनिवार को मुख्यमंत्री रावत के बारे में केंद्रीय हाइकमान के स्तर पर बड़ी शिकायतें और विधायकों के बड़े असंतोष की शिकायतें पहुंचीं हैं। साथ ही सर्वोच्च न्यायालय के आगामी 10 मार्च की तिथि के झारखंड से संबंधित सीबीआई जांच मामले में संभावित फैसले को लेकर भी केंद्रीय हाइकमान को संशंकित किया गया है। साथ एवं पार्टी आईबी आदि के द्वारा कराए गए तीन सर्वे में पार्टी की आगामी विधानसभा चुनाव में संभावित बुरी स्थिति, मुख्यमंत्री के पास 50 से अधिक विभागों के होने की वजह से विकास कार्य अवरुद्ध होने, तीन मंत्री पद रिक्त होने व मंत्रियों के पास जनता से सीधे जुड़े विभाग न होने के तर्क भी दिए गए हैं।केंद्रीय पर्यवेक्षकों ने इस बारे में मुख्यमंत्री का पक्ष जाना। मुख्यमंत्री ने विधायकों के बड़े वर्ग से पर्यवेक्षकों की मुलाकात कराकर यह संदेश दिया कि विरोध करने वाले विधायकों की विरोध की वजहें क्या हैं, और उनके पीछे कौन बड़े नेता हैं। बताया जा रहा है कि इसके बाद केंद्रीय पर्यवेक्षक काफी संतुष्ट हुए और इसके बाद ही भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष बंशीधर भगत मीडिया के समक्ष आए और राज्य में नेतृत्व परिवर्तन और विधायकों की नाराजगी की खबरों का खंडन किया। वहीं यह बात भी दिलचस्प है कि पूर्व में भाजपा बीच कार्यकाल मुख्यमंत्रियों को बदलती रही है। किंतु प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी व अमित शाह के दौर के बाद भाजपा ने पिछले छह वर्षों में हार झेलने के बावजूद किसी भी राज्य में मुख्यमंत्री नहीं बदला है। इससे यह संकेत लग रहा है कि प्रदेश में नेतृत्व परिवर्तन की संभावनाएं काफी क्षींण हैं। वैसे भी चुनाव के एक वर्ष ही शेष रहते और अलगे पखवाड़े 18 मार्च को सरकार के कार्यकाल के चार वर्ष का जश्न मनाने की तैयारी कर रही सरकार के मुखिया को पांच राज्यों में घोषित हो चुके चुनावों से ठीक पहले बदलकर भाजपा हाईकमान कोई रिस्क नहीं लेगा।
अलबत्ता इधर खबर यह भी है कि केंद्रीय पर्यवेक्षक डा. रमन सिंह व दुश्यंत गौतम उत्तराखंड से रिपोर्ट लेकर नई दिल्ली पहुंच चुके हैं, किंतु रविवार को प्रधानमंत्री मोदी, गृह मंत्री अमित शाह व भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा दिल्ली से बाहर हैं, इसलिए वह अभी केंद्रीय नेतृत्व को अपनी रिपोर्ट नहीं दे पाए होंगे। आगे मंगलवार को मुख्यमंत्री रावत को नई दिल्ली तलब किए जाने की भी चर्चाएं हैं।

यह भी पढ़ें : आज सीएम बदलने की चर्चाओं के बीच भाजपा ने कर दिया गैरसेंण में कर दिया कुछ ऐसा कि कांग्रेसी सकते में…

नवीन समाचार, नैनीताल, 06 मार्च 2021। उत्तराखंड की राजनीति में शनिवार का दिन महत्वपूर्ण रहा। पहले राज्य की ग्रीष्मकालीन राजधानी गैरसेंण में चल रहे बजट सत्र के अचानक अनिश्चितकाल के लिए स्थगित होने और फिर देहरादून में नेतृत्व परिवर्तन की चर्चाएं। इनके बीच बड़ी बात यह कि भाजपा ने विपक्ष सहित राज्य के मीडिया व चिंतकों का ध्यान दूसरी ओर मोढ़कर गैरसेंण में खासकर अब तक लगातार विभिन्न मुद्दों पर विरोध में अड़ रहे कांग्रेसी विधायकों की बजट पर चर्चा करने की मंशा को ध्वस्त कर दिया। कांग्रेसी कुछ समझते, तब तक सत्तारूढ़ भाजपा ने बजट सत्र बिना चर्चा के पास करा लिया और सत्र अनिश्चितकाल तक के लिए स्थगित भी करवा लिया।
उल्लेखनीय है कि बजट सत्र 10 मार्च तक के लिए प्रस्तावित था। इस अनुरूप कार्यमंत्रणा समिति की बैठक में कार्यक्रम भी तय किया गया था। लेकिन इसी बीच भाजपा में मची कथित कलह के बीच मुख्यमंत्री और कई मंत्रियों को शनिवार दोपहर ही देहरादून आना पड़ा। इसके बीच माना जा रहा था कि सत्र तय कार्यक्रम के अनुसार ही चलेगा। लेकिन इसी बीच भाजपा विधायकों को भी देहरादून आने का फरमान मिला। इस बीच कांग्रेसी भी अचानक भाजपा में तेज हुई राजनीति की अपडेट लेने में व्यस्त हुए कि इधर सरकार अपना काम करती रही। भोजनावकाश के बाद सरकार ने अपने प्रचंड बहुमत का इस्तेमाल करते हुए कुछ ही मिनट में तमाम विभागों को बजट पास करा लिया। इससे पहले कि विपक्षी कांग्रेसी विधायक कुछ समझ पाते तब तक राज्य का बजट पास करने की घोषणा के साथ ही सदन को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दिया गया। जाहिर है कि विपक्ष को बजट पर अपनी बात रखने का मौका ही न मिला, लेकिन उनके पास अपने चूकने का कारण बताने के लिए भी कुछ नहीं है।

नवीन समाचार
‘नवीन समाचार’ विश्व प्रसिद्ध पर्यटन नगरी नैनीताल से ‘मन कही’ के रूप में जनवरी 2010 से इंटरननेट-वेब मीडिया पर सक्रिय, उत्तराखंड का सबसे पुराना ऑनलाइन पत्रकारिता में सक्रिय समूह है। यह उत्तराखंड शासन से मान्यता प्राप्त, अलेक्सा रैंकिंग के अनुसार उत्तराखंड के समाचार पोर्टलों में अग्रणी, गूगल सर्च पर उत्तराखंड के सर्वश्रेष्ठ, भरोसेमंद समाचार पोर्टल के रूप में अग्रणी, समाचारों को नवीन दृष्टिकोण से प्रस्तुत करने वाला ऑनलाइन समाचार पोर्टल भी है।
https://navinsamachar.com

Leave a Reply