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सल्ट चुनाव से पहले उत्तराखंड की राजनीति में तंत्र-मंत्र, वन्यजीवों की बलि एवं शराब के अनुष्ठान चर्चा में

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दिनेश शास्त्री @ नवीन समाचार, देहरादून, 16 अप्रैल 2021। राजनीति का तंत्र-मंत्र से शायद पुराना नाता है। विज्ञान के इस युग में भी आजकल लोग इस कदर तंत्र-मंत्र के मायाजाल में उलझ चुके हैं कि लगता नहीं कि उन्हें खुद पर भरोसा है।
पूर्व सीएम हरीश रावत के अतीत में खासमखास रहे रणजीत सिंह रावत ने हाल में जिस तरह का खुलासा हरदा के बारे में किया, वह चौंकाने वाला तो नहीं लेकिन उसने राजनीति में सक्रिय लोगों की खुद से ज्यादा तंत्र-मंत्र पर आसक्ति को विमर्श के केंद्र में ला दिया है। रणजीत रावत वर्ष 2016 का किस्सा याद दिलाते हैं कि उत्तराखंड में राष्ट्रपति शासन के दौरान उनके नेता टोने-टोटके के चलते अपने गले में तेरह मालाएं और हर जेब में अलग-अलग रंग के कपड़े रखते थे। यही नहीं तांत्रिकों के चक्कर मे पड़कर बंदर और सुअर कटवाते थे और श्मशान घाट में जाकर शराब से नहाते थे।
वैसे राजनीति में माना जाता है कि संबंधों में कटुता आ भी जाए तो इतनी गुंजाइश रखी जाती है कि कल अगर फिर एक होना पड़े तो पूर्व के कथनों पर शर्मिंदगी न हो लेकिन रणजीत रावत के पूर्व में हरीश रावत के मानसिक संतुलन वाले बयान के बाद अब हालिया बयान से एक तरह से भविष्य के लिए तमाम रास्ते बंद से कर दिए हैं। बहरहाल यह उनका निजी मामला है, लेकिन इस बीच उत्तराखंड परिवर्तन पार्टी के केंद्रीय अध्यक्ष पीसी तिवारी ने इस मामले में अपनी तीखी प्रतिक्रिया दर्ज करते हुए इसे विमर्श के केंद्र में लाने का प्रयास किया है। उत्तराखंड परिवर्तन पार्टी ने रणजीत रावत द्वारा हरदा पर लगाए आरोपों की प्रकृति को बहुत गंभीर बताते हुए कहा है कि सरकार को निष्पक्ष एजेंसी द्वारा इसकी जांच करनी चाहिए। श्री तिवारी का कहना है कि सोशल मीडिया पर हरीश रावत के खासमखास रहे सहयोगी के उनके आपसी संबंधों एवं पार्टी से जुड़े प्रसंग पर कुछ नहीं कहना चाहते। लेकिन उस मामले में तंत्र-मंत्र में वन्यजीवों की बलि एवं शराब के अनुष्ठान से जुड़े हुए प्रसंग निश्चय ही गंभीर प्रकृति हैं, जो एक सरकार के मुख्यमंत्री से जुड़े होने के नाते उत्तराखंडी जन जीवन के प्रति अच्छी धारणा पैदा नहीं करते। लिहाजा वन्य जीव संरक्षण अधिनियम 1972 में इस तरह के मामले को गंभीर अपराध घोषित किया गया है और तमाम लोग इन मामलों में न्यायालयों में मुकदमों का सामना कर रहे हैं। यदि इन बयानों में सच्चाई है तो इस मामले में शामिल रहे लोगों के खिलाफ वन्य जीव संरक्षण अधिनियम के अंतर्गत कानून सम्मत कार्यवाही की जानी चाहिए।
जाहिर है यह महज शुरुआत है। इस मामले के अगले कुछ दिनों में लंबा खिंचने की आशंका लग रही है। वैसे चुनाव आते रहेंगे, हार-जीत भी होती रहेगी, लेकिन जिस तरह से राजनीति का स्तर सामने आ रहा है, उससे काफी कुछ भविष्य के परिदृश्य की बानगी तो दिखती ही है। यकीन मानिए आने वाले समय में राजनीति में इस तरह के मुद्दे भी हावी हो सकते हैं, आम आदमी को अपने मुद्दों की चिंता शायद खुद ही करनी पड़े।

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नवीन समाचार, देहरादून, 01 अप्रैल 2021। उत्तराखंड में नेतृत्व परिवर्तन एवं सभी मंत्री पदों पर नियुक्ति के बाद एक बार फिर राज्य की राजनीति में फिर सक्रियता आने वाली है। विश्वस्त सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र रावत के साथ ही उनकी सरकार के सलाहकारों, मुख्यमंत्री कार्यालय के सचिवों व नजदीकी अधिकारियों के बाद अब भाजपा हाइकमान की नजर उन 114 महानुभावों पर है, जिन्हें त्रिवेंद्र सरकार में विभिन्न दायित्व दिए गए हैं। बताया जा रहा है कि पार्टी के प्रदेश प्रभारी दुश्यंत गौतम इस संबंध में हाईकमान से लाया गया फरमान राज्य भाजपा को थमा चुके हैं।
इसके पीछे भाजपा की योजना व मंशा यह है कि इस बहाने इन दायित्वधारियों को फिर से सक्रिय किया जाए। जो दायित्वधारी पहले से सक्रिय हैं और अपने दायित्व का बेहतर तरीके से निर्वहन कर रहे हैं, ऐसे दायित्वधारियों को दायित्व जारी भी रखे जा सकते हैं, जबकि निष्क्रिय दायित्वधारियों से दायित्व वापस लेकर उनकी जगह क्षमतावान पार्टी के कार्यकर्ताओं को दायित्व देकर उनकी क्षमता व योग्यता का लाभ आगामी विधानसभा चुनाव में किया जा सकता है। बताया जा रहा है कि अब भाजपा उत्तराखंड इस कसौटी पर महानुभावों को कस रही है। यह भी देखा जा रहा है कि किसी दायित्वधारी को हटाने पर क्या 2022 के विधानसभा चुनाव में पार्टी को कोई नुकसान भी हो सकता है।

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नवीन समाचार, नैनीताल, 24 मार्च 2021। एक काबीना मंत्री सतपाल महाराज के इंकार के बाद दूसरे काबीना मंत्री डॉ. हरक सिंह रावत व बद्रीनाथ विधायक महेंद्र भट्ट के बाद अब निर्दलीय विधायक राम सिंह कैड़ा ने मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत को भीमताल से चुनाव लड़ने का न्यौता दिया है। विधायक कैड़ा भाजपा के एसोसिएट सदस्य भी हैं। कैड़ा का कहना है कि उन्होंने सीएम मुख्यमंत्री रावत की कुशल क्षेम पूछी और कहा कि यदि वे भीमताल विधानसभा क्षेत्र से उप चुनाव लड़ना चाहते हैं तो वे सीट छोड़ने के लिए तैयार हैं। उन्हें उम्मीद है कि इससे विधानसभा क्षेत्र ओखलकांडा, धारी व रामगढ़ आदि का विकास होगा। उन्होंने कहा कि उनकी हार्दिक इच्छा यही है कि विधानसभा क्षेत्र का विकास हो, ताकि क्षेत्र के लोगों को सहूलियत मिल सके। उल्लेखनीय है कि सीएम तीरथ ने अभी अपने पत्ते नहीं खोले हैं। मालूम हो कि सीएम तीरथ अभी पौड़ी से सांसद हैं और उन्हें छह महीने के अंदर विधानसभा की सदस्यता लेनी जरूरी है। उनके पास सल्ट से उप चुनाव लड़ने का मौका था, लेकिन उन्होंने सल्ट से चुनाव लड़ने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई। हालांकि विपक्षी कंाग्रेस की आशंका को सही मानें तो भाजपा एक और उप चुनाव में जाने से पहले आम चुनाव की घोषणा भी कर सकती है।

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डॉ. नवीन जोशी @ नवीन समाचार, नैनीताल, 21 मार्च 2021। अब जबकि यह करीब-करीब साफ हो गया है कि मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत सल्ट से चुनाव नहीं लड़ने जा रहे हैं, सत्तारूढ़ भाजपा सरकार ने राज्य व खासकर कुमाऊं मंडल की जनता में कई अच्छे संदेश देने का मार्ग बंद करना कमोबेश तय कर लिया है। पार्टी मुख्यमंत्री रावत को सल्ट से चुनाव लड़ते तो इसके कई लाभ पार्टी एवं राज्य की जनता को मिल सकते थे, जिन्हें देने के लिए अब पार्टी व सरकार को कोई अन्य यत्न करने होंगे।
उल्लेखनीय है कि पार्टी द्वारा पिछले दिनों राज्य में नेतृत्व परिवर्तन के पीछे उन आंतरिक व आईबी की सर्वेक्षण रिपोर्टों को मुख्य आधार बताया जा रहा है, जिनमें खासकर कुमाऊं मंडल में भाजपा की स्थिति काफी खराब बताई गई है। भाजपा कुमाऊं मंडल से आने वाले बंशीधर भगत को भी प्रदेश अध्यक्ष के पद से हटा चुकी है। इसलिए मुख्यमंत्री के सल्ट से चुनाव लड़ने से कुमाऊं मंडल की जनता में पार्टी एवं सरकार के प्रति विश्वास बढ़ाया जा सकता था। मुख्यमंत्री के कुमाऊं मंडल की सल्ट सीट से चुनाव लड़ने से यह संदेश भी जाता कि मुख्यमंत्री राजनीतिक मजबूती व आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़कर ‘फ्रंट फुट’ पर बैटिंग कर रहे हैं। इससे राज्य अगले छह माह के भीतर एक और उपचुनाव का खर्च व चुनाव आचार संहिता से होने वाले नुकसान से भी बच जाता। इसके अलावा वर्तमान में मुख्यमंत्री सहित 12 सदस्यीय राज्य मंत्रिमंडल में मुख्यमंत्री सहित 7 सदस्य गढ़वाल मंडल से और पांच सदस्य ही कुमाऊं मंडल से हैं। यदि मुख्यमंत्री कुमाऊं की सल्ट सीट से चुनाव लड़ते और जीतते तो इससे कुमाऊं व गढ़वाल मंडलों से राज्य मंत्रिमंडल में 6-6 सदस्य हो जाते। साथ ही मुख्यमंत्री के सल्ट से चुनाव जीतने पर राज्य में मुख्यमंत्री कुमाऊं मंडल का क्षत्रिय और पार्टी अध्यक्ष गढ़वाल मंडल का ब्राह्मण होने का जातीय व क्षेत्रीय संतुलन भी स्वयं ही बन जाता, और यह 2022 के आम चुनाव के लिए भाजपा के लिए संजीवनी की तरह होता।

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नवीन समाचार, देहरादून, 16 मार्च 2021। चुनाव आयोग ने उत्तराखंड में अल्मोड़ा जिले की सल्ट विधानसभा सीट के उपचुनाव का कार्यक्रम जारी कर दिया है। नामांकन की प्रक्रिया 23 मार्च से शुरू होगी, जबकि अंतिम तिथि 30 मार्च 2021 रखी गई है, जबकि चुनाव 17 अप्रैल को होगा और मतगणना दो मई को होगी। उल्लेखनीय है कि सल्ट में उपचुनाव की प्रक्रिया 12 मई से पहले पूरी की जानी है। 17 अप्रैल को मतदान और 02 मई को मतगणना होगी। उल्लेखनीय है कि सल्ट विधानसभा भाजपा विधायक सुरेंद्र सिंह जीना के निधन से रिक्त हुई थी और पहले यहां से उपचुनाव में स्वर्गीय जीना के परिवार के किसी व्यक्ति को ही चुनाव में खड़ा करने की योजना थी, लेकिन इधर राज्य में नेतृत्व परिवर्तन के बाद मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत के भी इस सीट से चुनाव लड़ने की संभावना राजनीतिक हल्कों में व्यक्त की जा रही है।
गौरतलब है कि आम आदमी पार्टी ने सल्ट उपचुनाव नहीं लड़ने का फैसला किया है। जबकि कांग्रेस पूरी ताकत से चुनाव लड़ने की बात कह रही है। सल्ट उपचुनाव में कुल 95 हजार मतदाता भाग लेंगे। एक जनवरी 2021 के आधार पर तैयार मतदाता सूची के अनुसार सल्ट में कुल मतदाताओं की संख्या 95, 241 है, जिसमें 48,682 पुरुष और 46,559 महिला मतदाता हैं। इसके लिए यहां कुल 136 मतदान केंद्र बनाए गए हैं।

यह भी पढ़ें : एक कैबिनेट मंत्री ने की तीरथ के लिए सीट छोड़ने की पेशकश, वहीं मंत्री बनने से रहे एक विधायक ने कहा-कांग्रेसी विधायक तीरथ के लिए सीट छोड़ेगा, पर सल्ट से चौंकाएंगे तीरथ!

-लेकिन कुमाऊं की सल्ट सीट से ही चुनाव लड़ कर चौंका सकते हैं सीएम तीरथ सिंह रावत, इससे कुमाऊं-गढ़वाल के बीच क्षेत्रीय संतुलन भी बन जाएगा, पूर्व सीएम ने कहा-चुनाव ही नहीं
डॉ. नवीन जोशी @ नवीन समाचार, नैनीताल, 15 मार्च 2021। विधानसभा का सदस्य न होने के कारण मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत के लिए छह माह के भीतर विधानसभा का सदस्य होना जरूरी है। इस पर तरह-तरह की राजनीतिक चर्चाएं शुरू हो गई हैं। कांग्रेस नेता व पूर्व सीएम हरीश रावत की ओर से इस बारे में बयान आया है कि भाजपा उपचुनाव कराना ही नहीं चाहती, बल्कि सीधे अगले विधानसभा चुनाव ही जल्दी करा सकती है। वहीं अब काबीना मंत्री डॉ. हरक सिंह ने सीएम तीरथ रावत के लिए अपनी कोटद्वार सीट छोड़ने की पेशकश कर दी है। एक मीडिया रिपोर्ट के अनुसार उन्होंने कहा कि वह तीरथ की पौड़ी सीट से लोकसभा का चुनाव लड़ने को भी तैयार हैं। उल्लेखनीय है कि हरक पूर्व में अगला विधानसभा चुनाव न लड़ने की बात भी कह चुके हैं।
इसके अलावा तीरथ सरकार में मंत्री बनने से रह गए भाजपा के बदरीनाथ विधायक महेंद्र भट्ट ने पहले सीएम के लिए अपनी सीट की पेशकश करने के बादअब एक नया शिगूफा छोड़ दिया है। उन्होंने फेसबुक में पोस्ट कर लिखा है कि सूत्रों के मुताबिक एक कांग्रेस विधायक मौजूदा मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत के लिए अपनी सीट छोड़ सकता है। इससे पहले सतपाल महाराज तीरथ के लिए अपनी चौबट्टाखाल सीट छोड़ने से इनकार कर चुके हैं।

उल्लेखनीय है कि कुमाऊं मंडल की सल्ट सीट भाजपा विधायक सुरेंद्र सिंह जीना के निधन से खाली है।  उल्लेखनीय है कि सल्ट सीट कुमाऊं मंडल में होने के बावजूद गढ़वाल मंडल से भी जुड़ी हुई है। बहुत संभावना है कि तीरथ सल्ट से ही चुनाव लड़ सकते हैं, और इस तरह कुमाऊं से क्षत्रिय जाति का मुख्यमंत्री हो जाएगा, और गढ़वाल मंडल से पार्टी अध्यक्ष मदन कौशिक के होने के साथ पूर्व से चली आ रही परंपरा का निर्वाह भी हो जाएगा। साथ ही तीरथ के 12 सदस्यीय मंत्रिमंडल में कुमाऊं व गढ़वाल से 6-6 सदस्य हो जाएंगे। क्योंकि अभी मंत्रिमंडल में 7 सदस्य गढ़वाल से और पांच कुमाऊं से हैं, तथा मुख्यमंत्री और प्रदेश अध्यक्ष दोनों गढ़वाल मंडल से हो गए हैं।

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नवीन समाचार, देहरादून, 12 मार्च 2021। उत्तराखंड के नए मुख्यमंत्री के रूप में दायित्व संभालने के बाद तीरथ सिंह रावत अब अपने मंत्रिमंडल का गठन करने जा रहे हैं। इस क्रम में वह शुक्रवार को दिल्ली जा सकते हैं। अगर कोई पेच न फंसा तो शनिवार तक तीरथ की टीम आकार ले लेगी। मंत्रिमंडल में सभी 11 पदों को भरे जाने की तैयारी है। मंत्रिमंडल में कुमाऊं मंडल को तवज्जो मिलने और महिलाओं का प्रतिनिधित्व बढऩे की संभावना है। स्वयं मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत ने जल्द मंत्रिमंडल के शपथ ग्रहण के संकेत दे दिए हैं। उन्होंने कहा कि केंद्रीय नेतृत्व से चर्चा के बाद मंत्रियों को शपथ दिला दी जाएगी।
बुधवार को शपथ ग्रहण करने के बाद अब मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत अपने मंत्रिमंडल में शामिल किए जाने वाले चेहरों को लेकर मशक्कत में जुटे हुए हैं। गुरुवार को एक दिनी हरिद्वार दौरे से लौटने के बाद उन्होंने पार्टी नेताओं से इस विषय पर मंथन किया। वह लगातार केंद्रीय नेतृत्व के संपर्क में भी बने हुए हैं। सूत्रों के मुताबिक यह लगभग तय है कि पिछले त्रिवेंद्र मंत्रिमंडल के सभी आठ सदस्यों को फिर से रखा जाएगा। त्रिवेंद्र मंत्रिमंडल में तीन मंत्री पद रिक्त थे, लेकिन तीरथ की टीम में सभी 11 पदों को भरा जाएगा। उत्तराखंड में संवैधानिक प्रविधानों के मुताबिक मुख्यमंत्री समेत 12 सदस्यीय मंत्रिमंडल हो सकता है।
सूत्रों के मुताबिक तीरथ की कवायद अब मंत्रिमंडल के तीन पदों के इर्द-गिर्द सिमटी हुई है। त्रिवेंद्र मंत्रिमंडल में पौड़ी गढ़वाल से तीन, ऊधमसिंह नगर से दो और टिहरी, हरिद्वार व अल्मोड़ा जिले से एक-एक मंत्री थे, जबकि स्वयं त्रिवेंद्र देहरादून का प्रतिनिधित्व कर रहे थे। यानी, राज्य के 13 में से महज पांच जिलों को ही मंत्रिमंडल में प्रतिनिधित्व मिला हुआ था। अब अगर तीरथ सिंह रावत, त्रिवेंद्र मंत्रिमंडल के सभी सदस्यों को अपनी टीम में जगह देते हैं, तो बाकी तीन स्थान उन जिलों के हिस्से जाएंगे, जहां से कोई विधायक मंत्री नहीं था। इस स्थिति में उत्तरकाशी, चमोली, देहरादून, रुद्रप्रयाग, पिथौरागढ़, बागेश्वर, चम्पावत व नैनीताल के किन्हीं तीन विधायकों को मंत्री बनाया जा सकता है। माना जा रहा है कि बिशन सिंह चुफाल, ऋतु खंडूड़ी, बलवंत सिंह भौर्याल को मंत्री बनाया जा सकता है। अब तक के राज्य मंत्रियों को कैबिनेट मंत्री बनाया जा सकता है। यह भी चर्चा है कि वर्तमान विधानसभा अध्यक्ष को मंत्री व चुफाल को विधानसभा अध्यक्ष बनाया जा सकता है। एक कैबिनेट मंत्री को हटाए जाने की भी सूत्र संभावना जता रहे हैं। हालांकि भाजपा की कार्यशैली में हमेशा की तरह सभी संभावनाएं निर्मूल भी साबित हो जाएं तो आश्चर्य न होगा।

यह भी पढ़ें : आज 20 वर्ष के उत्तराखंड को मिलेगा 9वां मुख्यमंत्री, पर क्या हाइकमान गलतियों से कुछ सबक लेगा और हश्र वही होगा…?

डॉ. नवीन जोशी @ नवीन समाचार, नैनीताल, 10 मार्च 2021। उत्तराखंड की राजनीति और के साथ ही राज्य के भविष्य के लिए बुधवार का दिन फिर एक नई करवट लेने वाला होने जा रहा है। आज राज्य को नया मुख्यमंत्री मिलने जा रहा है। इस मौके पर यह चर्चा करना जरूरी है कि छोटे से 20 वर्ष के राज्य में 10वीं बार मुख्यमंत्री का चेहरा बदलने की नौबत क्यों आ रही है। क्या भाजपा हाईकमान पुरानी गलतियांे से कुछ सबक लेगा ?
उत्तराखंड राज्य का सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह रहा है कि यहां राज्य के जन्म से लेकर अब तक हमेशा केंद्र से मुख्यमंत्री थोपे गए हैं। केवल उन्हें थोपे जाते वक्त विधानमंडल दल की बैठकों में विधायकों की पसंद बताने का ढोंग रचा गया। यही कारण रहा कि नौ नवंबर 2000 को राज्य बनने पर उस दौर में भगत सिंह कोश्यारी के राज्य में भाजपा का प्रमुख चेहरा होने के बावजूद यूपी विधान परिषद के सदस्य रहे, यानी जनता से चुने विधायक भी न रहे नित्यानंद स्वामी को मुख्यमंत्री बनाया गया। लिहाजा वही हुआ, स्वामी को 29 अक्टूबर 2001 तक यानी एक वर्ष का कार्यकाल भी पूरा किए बिना मुख्यमंत्री रहकर कुर्सी गंवानी पड़ी। बाद में भाजपा ने 30 अक्टूबर 2001 को कोश्यारी को मुख्यमंत्री बनाकर भूल सुधार किया, लेकिन तब तक देर हो चुकी थी। कोश्यारी को 123 दिन में सत्ताच्युत होना पड़ा। वह भाजपा की सरकार वापस नहीं लाए। कांग्रेस को 2002 के विधानसभा चुनाव में बहुमत मिला। तब हरीश रावत स्वाभाविक तौर पर मुख्यमंत्री पद पर जनता की पसंद थे, लेकिन कांग्रेस हाइकमान ने भाजपा की ही गलती दोहराते हुए ‘मेरी लाश पर उत्तराखंड बनेगा’ कहने वाले पं. नारायण दत्त तिवारी को मुख्यमंत्री बना दिया। रावत तिवारी सरकार में हमेशा विपक्ष में रहे। उनकी सरकार हर दिन संकट में रही, फिर भी यूपी जैसे बड़े राज्य के मुख्यमंत्री व केंद्रीय मंत्री रहे अनुभवी तिवारी किसी तरह अपना पांच वर्ष का कार्यकाल पूरा कर पाए, पर कांग्रेस की सरकार वापस न ला पाए। 2007 के विधानसभा चुनाव में भाजपा जीती तो इसमें बड़ा योगदान पूर्व मुख्यमंत्री भगत सिंह कोश्यारी का रहा, लेकिन भाजपा हाइकमान ने फिर पुरानी गलती दोहराते हुए आश्चर्यजनक तौर पर केंद्र में सड़क परिवहन मंत्री रहे सेना से आए सेवानिवृत्त मेजर जनरल भुवन चंद्र खंडूड़ी को मुख्यमंत्री बना दिया। कड़क मिजाज के खंडूड़ी अपने विधायकों को भी डांटते-फटकारते 23 जून 2009 तक मात्र 839 दिन तक मुख्यमंत्री रह पाए। इस बार भी भाजपा ने कोश्यारी को दरकिनार किया और डॉ. रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ को मुख्यमंत्री बना दिया। निशंक भ्रष्टाचार के आरोपों में घिरे और पार्टी सर्वे में उनके नेतृत्व में मात्र 16 सीटें जीतने की संभावना प्रकाश मंे आई तो एक बार फिर 11 सितंबर 2011 को खंडूड़ी को फिर से जरूरी बताकर मुख्यमंत्री बना दिया गया। बावजूद खंडूड़ी के नेतृत्व में भाजपा स्वयं खंडूड़ी की एक सीट से कांग्रेस से पीछे रह गई और सत्ता गंवा बैठी। कांग्रेस 2012 में वापस सत्ता में आई तो हरीश रावत पुनः मुख्यमंत्री पद के स्वाभाविक दावेदार थे, किंतु एक बार पुनः उन्हें दरकिनार कर विधायक भी न रहे विजय बहुगुणा को मुख्यमंत्री बना दिया गया। हरीश रावत ने दिल्ली में खुद को मुख्यमंत्री बनाने के लिए धरना दे दिया। इस बीच 2013 में आई केदारनाथ आपदा में बहुगुणा के राजनीतिक कौशल की विफलता जगजाहिर हुई तो कांग्रेस ने मजबूरी में हरीश रावत को मुख्यमंत्री बना दिया। अब तक हरीश को यह गुमान हो गया था कि वह अपने दम पर मुख्यमंत्री बने हैं। उन्होंने कांग्रेस को ‘हरीश कांग्रेस’ भी बनाने का प्रयास किया। परिणाम यह हुआ कि पार्टी में बड़ी टूट हो गई। नौ विधायक विधानसभा के सत्र के दौरान ही कांग्रेस छोड़ भाजपा में शामिल हो गए। फिर भी राजनीतिक कौशल से हरीश केंद्र में भाजपा सरकार होने के बावजूद अपना बचा कार्यकाल पूरा करने में तो सफल रहे पर 2017 के विधानसभा चुनावों में खुद दो सीटों से चुनाव हारने के साफ भाजपा को 70 में से 57 सीटों की बड़ी जीत दिला गए। भाजपा सरकार में आ रही थी तो इस बार भी भाजपा हाइकमान ने विधायकों को उनका नेता चुनने देने की जगह अपनी पसंद के त्रिवेंद्र सिंह रावत को मुख्यमंत्री बना दिया। नतीजा सामने है।

यह भी पढ़ें : अभी-अभी मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने राज्यपाल से मिलकर इस्तीफा दिया

नवीन समाचार, देहरादून, 09 मार्च 2021। उत्तराखंड के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने मंगलवार को सायं 4.15 बजे राज्यपाल बेबी रानी मौर्य से भेंट कर मुख्यमंत्री पद से त्याग पत्र सौंप दिया है। राज्यपाल बेबी रानी मौर्य ने मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत का इस्तीफ़ा स्वीकार करते हुए उनसे राज्य में नए मुख्यमंत्री की नियुक्ति होने एवं पदभार ग्रहण करने की अवधि तक कार्यवाहक मुख्यमंत्री बने रहने को कहा है।

मंगलवार शाम करीब सवा चार बजे मुख्यमंत्री रावत ने देहरादून स्थित राजभवन में राज्यपाल को अपना इस्तीफा दे दिया है। इस्तीफा देने के तुरंत बाद त्रिवेंद्र ने कहा कि वह लंबे समय से राजनीति में हैं। पार्टी ने पिछले चार वर्षों से राज्य में सरकार का नेतृत्व करने का मौका दिया। वह एक छोटे से गांव, जहां अब भी चार-पांच परिवार ही रहते हैं, पिता पूर्व सैनिक थे। उन्होंने कभी कल्पना भी नहीं की थी कि छोटे से गांव के, एक सामान्य परिवार के व्यक्ति को मुख्यमंत्री बनाया। इतना बड़ा सम्मान दिया। इधर पार्टी ने सामूहिक रूप से यह निर्णय लिया कि उन्हें किसी और को यह मौका देना चाहिए। चार वर्ष से नौ दिन शेष रहते किसी अन्य को मौका दे रहे हैं। इस दौरान स्वरोजगार, महिलाओं के उत्थान व सशक्तीकरण, बच्चों की शिक्षा व किसानों के लिए कई नए कार्यक्रम दिए। पार्टी यदि यह चार वर्ष का मौका न देती तो यह योजनाएं नहीं ला पाते। महिलाओं को उनके पतियों की संपत्ति में खातेदार के रूप में अधिकार व घस्यारी कल्याण योजनाएं उनकी सरकार के लिए बड़ी संवेदनशील पहलें हैं। कल जिसे भी मुख्यमंत्री बनाया जाएगा, उन्हें शुभकामनाएं देते हैं। कल पार्टी मुख्यालय पर सुबह 10 बजे विधानमंडल दल की बैठक है, सभी विधायक इस बैठक में मौजूद रहेंगे। उन्होंने हटाए जाने का कारण पूछने पर कहा कि इसके लिए आपको दिल्ली जाना पड़ेगा।

उल्लेखनीय है कि भाजपा के उत्तराखंड के मुख्य प्रवक्ता मुन्ना सिंह चौहान ने सुबह कहा था कि मुख्यमंत्री आज शाम तीन-साढ़े तीन बजे मीडिया से बात कर सकते हैं। हालांकि बाद में भाजपा प्रदेश अध्यक्ष बंशीधर भगत ने कहा कि मुख्यमंत्री की ओर से कोई प्रेस कांफ्रेंस नहीं बुलाई गई है। इससे मुख्यमंत्री आवास में घंटे भर से इंतजार कर रहे पत्रकारों को मायूसी हुई है। भगत ने कहा कि मुख्यमंत्री द्वारा शाम साढ़े चार बजे प्रदेश की राज्यपाल से मिलने का समय लिया है। उन्होंने बताया कि डॉ. रमन सिंह व दुश्यंत गौतम देहरादून आ रहे हैं। मंगलवार को विधानमंडल दल की बैठक बुलाई गई है। माना जा रहा है कि इस दौरान मुख्यमंत्री राज्यपाल को अपना इस्तीफा सोंप सकते हैं। इसके बाद मंगलवार सुबह 11 बजे भाजपा विधानमंडल दल की बैठक हो सकती है। साथ ही यह भी जानकारी आ रही है कि राज्यसभा सांसद अनिल बलूनी व राज्य मंत्री धन सिंह रावत में से ही कोई एक मुख्यमंत्री बन सकता है।

यह भी पढ़ें : आज सुबह दून लौटेंगे त्रिवेंद्र, विधानमंडल दल की बैठक आज नहीं

नवीन समाचार, नई दिल्ली, 09 मार्च 2021। उत्तराखंड में छाया राजनीतिक कुहांसा अभी छंटा नहीं है, अलबत्ता नई अपडेट यह है कि राज्य के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत मंगलवार को सुबह 10-11 बजे नई दिल्ली से देहरादून लौट रहे हैं, और देहरादून में पार्टी की विधानमंडल दल की कोई औपचारिक बैठक अभी तक नहीं बुलाई गई है। उत्तराखंड भाजपा के मुख्य प्रवक्ता मुन्ना सिंह चौहान ने औपचारिक तौर यह बयान जारी किया है। उन्होंने अपने वक्तव्य में यह दावा भी किया है कि मुख्यमंत्री और उनके कामकाज को लेकर पार्टी के विधायकों या कार्यकर्ताओं में कभी भी कोई नाराजगी नहीं रही है। उन्होंने यह भी कहा कि भाजपा में कोई भी नीतिगत निर्णय व नीतिगत चर्चाओं पर पार्टी हाईकमान, पार्टी का संसदीय दल निर्णय करते हैं। भाजपा में पूर्णतः आंतरिक लोकतंत्र है, इसमें लगातार चर्चाएं चलती रहती हैं। अलबत्ता पार्टी हाईकमान व पार्टी के संसदीय दल में हुई या हो रही चर्चाओं पर वह कुछ भी कहने के लिए अधिकृत नहीं हैं। उल्लेखनीय है कि सोमवार शाम सभी मंत्री और विधायकों को दिल्ली आने का फरमान जारी किया गया था, लेकिन बाद में उन्हें मंगलवार को देहरादून पहुंचने को कहा गया है। इससे यह साफ है कि पार्टी हाईकमान ने अभी कोई निर्णय सार्वजनिक नहीं किया है। यह निर्णय बहुत संभव है कि आज साफ हो। विधायकों को देहरादून बुला ही लिया गया है। 

यह भी पढ़ें : एक साथ कई नईं सुर्खिया….

नवीन समाचार, नैनीताल, 08 मार्च 2021। उत्तराखंड की बदलती राजनीति से संबंधित लगातार नई सुर्खियां आ रही हैं। प्रदेश के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत की केंद्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा व अमित साह से मुलाकात हो गई है। वहीं आश्चर्यजनक तौर पर मुख्यमंत्री रावत अनिल बलूनी से उनके आवास पर करीब डेढ़ घंटे तक मिले हैं। वहीं केंद्रीय हाइकमान द्वारा उत्तराखंड के भाजपा से जुड़े जिला पंचायत अध्यक्ष, मेयर व जिलाध्यक्षों को नई दिल्ली बुलाने की भी जानकारी आ रही है। कुछ जिला पंचायतों के लिए इसके लिए टिकट लेने की जानकारी आई है। वहीं उत्तराखंड के सभी भाजपा विधायकों को कल देहरादून बुलाने की भी जानकारी आ रही है। इसके बाद माना जा रहा है कि देहरादून में कल या परसों विधानमंडल दल की बैठक हो सकती है। इधर राज्य मंत्री धन सिंह रावत का नाम भी मुख्यमंत्री के तौर पर पहली बार आगे बढ़ा है। उन्हें मुख्यमंत्री रावत की पसंद के तौर पर देखा जा रहा है। वहीं मुख्यमंत्री की अनिल बलूनी से मुलाकात को भी बचाव के प्रयासों के रूप में देखा जा रहा है। उल्लेखनीय है कि सीएम त्रिवेंद्र सिंह रावत सुबह से दावा कर रहे थे कि उनकी पार्टी हाईकमान के साथ बैठक है लेकिन उन्हें बैठक में शामिल नहीं किया गया। 

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डॉ. नवीन जोशी @ नवीन समाचार, नैनीताल, 08 मार्च 2021। उत्तराखंड की राजनीति से जुड़ी नई अपडेट है। प्राप्त जानकारी के अनुसार भाजपा के केंद्रीय हाईकमान ने मंगलवार 9 मार्च यानी कल संसदीय दल की बैठक आहूत कर दी है। हालांकि अभी यह तय नहीं है कि संसदीय दल की बैठक में किन विषयों पर मुख्य रूप से चर्चा होगी। बाहरी व सामान्य तौर पर कहा जा सकता है कि संसदीय दल पांच राज्यों में होने जा रहे विधानसभा चुनावों पर चर्चा करेगा और प्रत्याशियों के नामों को अंतिम रूप से हरी झंडी देगा, वहीं उत्तराखंड की राजनीति के जानकारों की मानें तो इस बैठक में उत्तराखंड के दो पर्यवेक्षक तय हो सकते हैं जो देहरादून में अगले एक-दो दिनों के भीतर ही बुलाई जाने वाली विधानमंडल दल की बैठक में मौजूद रह सकते हैं, जिसमें राज्य भाजपा के विधायक अपना नया नेता चुन सकते हैं। इस तरह राज्य में नेतृत्व परिवर्तन की अटकलों को संसदीय दल की बैठक के आहूत होने से और बल मिल रहा है। साथ ही यह भी यह भी कहा जा रहा है कि यदि सीएम त्रिवेंद्र रावत को इस बार अभयदान मिलता है तो वह अपना कार्यकाल पूरा करेंगे। साथ ही यदि उन्हें अभयदान मिलता है तो उन्हें तुरंत मंत्रिमंडल का विस्तार करना होगा। अपने पास के महत्वपूर्ण विभागों को नए मंत्रियों को बांटना होगा। वहीं यदि उन्हें हटाया जाता है तो उन्हें केंद्र में भेजा जा सकता है। इधर ताजा समाचार यह है कि सोमवार शाम करीब छह बजे से अमित साह और जेपी नड्डा के बीच नई दिल्ली में उत्तराखंड को लेकर बैठक शुरू हो गई है। डॉ. रमन सिंह ने बीती मध्य रात्रि जेपी नड्डा को देहरादून में हुई कोर ग्रुप की बैठक की रिपोर्ट सोंपी, जिसमें त्रिवेंद्र रावत के नेतृत्व में विधानसभा चुनाव में जाने पर भाजपा को भारी नुकसान की संभावना जताई गई है। यह भी समाचार है कि भाजपा हाईकमान ने राज्य से पार्टी के विधायकों को दिल्ली बुला लिया है। दिल्ली में पार्टी के पहले से कई मुख्यमंत्री के विरोधी गुट के मुख्यमंत्री मौजूद हैं। इधर भाजपा के उत्तराखंड प्रभारी दुश्यंत गौतम का बयान आया है कि मुख्यमंत्री रावत पर अनेक विभागों का बोझ है। उन्हें यह मंत्रालय विधायकों को देने चाहिए।
इसके साथ ही उत्तराखंड के अगले मुख्यमंत्री पद के लिए भी चर्चाएं तेज हो गई हैं। इस दिशा में राज्य सभा सांसद अनिल बलूनी का नाम सबसे ऊपर है। वह केंद्रीय नेतृत्व की पहली पसंद हैं। उन्होंने मीडिया के जरिये जनता के बीच बड़े नेता के रूप में अपनी छवि भी बनाई है। लेकिन इसके साथ ही बनी उनकी किसी से सीधे संवाद न करने वाले एरिस्टोक्रेट नेता की छवि को देखते हुए न केवल केंद्रीय नेतृत्व बल्कि राज्य के विधायक भी सशंकित हैं कि वह जमीनी स्तर पर कितना कार्य कर पाएंगे। विधायकों को भय है कि उन तक उनकी पहुंच हो भी पाएगी कि नहीं। बलूनी अब तक कोई चुनाव भी नहीं लड़े हैं। यदि वे राज्य की राजनीति में आते हैं तो उन्हें सल्ट से चुनाव लड़ाया जा सकता है। ऐसे में भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष बंशीधर भगत को बदला जाना भी तय है।
कुछ यही बात संघ की पसंद बताए जा रहे सतपाल महाराज के साथ भी है। उनके बारे में भी विधायकों की सर्वस्वीकार्यता सवालों के घेरे में है। ऐसे में प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री एवं महाराष्ट्र के साथ गोवा के राज्यपाल पद की दोहरी जिम्मेदारी संभाल रहे भगत सिंह कोश्यारी की पसंद के रूप में नैनीताल के सांसद अजय भट्ट का नाम भी तेजी से उभर रहा है, जिन्हें यूपी के जमाने से न केवल चुनाव लड़ने का न केवल अनुभव है। वरन भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष के तौर पर भाजपा को पिछले चुनाव में सत्ता में लौटाने के साथ पूरे राज्य के जनमानस से वाकिफ हैं। वह पिछले लोक सभा चुनाव में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता व पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत को बड़े अंतर से चुनाव हराकर सांसद बने हैं। राज्य में स्वास्थ्य मंत्री के रूप में भी उनका कार्यकाल यादगार रहा है, जबकि संसद में भी उत्तराखंड के मूलभूत प्रश्नों पर लगातार अपनी आवाज बुलंद किए हुए हैं। हालांकि वे मुख्यमंत्री पद के लिए बहुत इच्छुक नहीं बताए जा रहे हैं। इस बीच कोश्यारी के आज शाम तक दिल्ली आने की भी मीडिया में खबरें हैं, पर इसकी संभावना अब तक नहीं के बराबर है।

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नवीन समाचार, देहरादून, 08 मार्च 2021। उत्तराखंड के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने सोमवार सुबह देहरादून से दिल्ली के लिए निकल गए हैं। पहले उनका मंगलवार को दिल्ली जाना प्रस्तावित था, लेकिन इधर विश्वस्त सूत्रों के अनुसार इससे पहले ही उनके सुबह करीब 10.40 बजे दिल्ली के लिए उड़ान भरने का समाचार है। इसके साथ आज और अगले कुछ दिन एक बार फिर उत्तराखंड की राजनीति के लिए महत्वपूर्ण होने जा रहे हैं।
इधर बताया गया है कि उत्तराखंड में केंद्रीय पर्यवेक्षक बनकर आए छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने रविवार को ही अपनी रिपोर्ट भाजपा के कंेद्रीय अध्यक्ष जगत प्रसाद नड्डा को सोंप दी है। इसके बाद अपना पक्ष प्रस्तुत करने के लिए मुख्यमंत्री दिल्ली पहुंच रहे हैं। यहां उनके केंद्रीय अध्यक्ष नड्डा के साथ ही अन्य शीर्ष नेताओं से भी मुलाकात करने की संभावना है। ऐसे में यह भी साफ है कि उत्तराखंड की राजनीति में कुछ बड़ा जरूर होने वाला है। या तो राज्य में मुख्यमंत्री बदला जा सकता है, अन्यथा राज्य में तीन मंत्रियों की ताजपोशी सहित अन्य बड़ी राजनीतिक घटनाएं हो सकती हैं।

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डॉ. नवीन जोशी @ नवीन समाचार, देहरादून, 07 मार्च 2021। उत्तराखंड में नेतृत्व परिवर्तन के प्रयास नए नहीं हैं। राज्य बनने के बाद से शायद ही कोई मुख्यमंत्री हो जो इसका शिकार न हुआ हो। शायद इसीलिए पंडित नारायण दत्त तिवारी के अलावा राज्य के कोई भी मुख्यमंत्री अपने पांच वर्ष का कार्यकाल पूरा नहीं कर पाए। यहां राज्य के मुख्यमंत्रियों के खिलाफ ऐसी-ऐसी साजिशें भी हुईं कि पहले मुख्यमंत्री नित्यानंद स्वामी से लेकर भुवन चंद्र खंडूड़ी, नारायण दत्त तिवारी, विजय बहुगुणा व पिछले मुख्यमंत्री हरीश रावत दुबारा विधानसभा नहीं पहुंच पाए।
राज्य के मौजूदा मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र रावत के खिलाफ भी ऐसी साजिशें कई बार होती रही हैं, और इसे रावत की किस्मत कहें कि राजनीतिक कौशल, ऐसी साजिशें सफल नहीं हो पाई हैं। शनिवार को ग्रीष्मकालीन राजधानी में चल रहे बजट सत्र के दौरान अप्रत्याशित तौर पर घटित घटनाक्रम का भी यही हश्र हो तो आश्चर्च न होगा। अब शनिवार के पीछे की कहानी की कड़ियां धीरे-धीरे सूत्रों के हवाले से खुलती नजर आ रही हैं। रावत के खिलाफ राज्य के भीतर पूर्व में कांग्रेस से आए कम से कम दो नेताओं के गुटों के साथ ही कुमाऊं के कुछ नए व पुराने विधायक तो पहले से ही लगे हुए हैं, वहीं दिल्ली से भी साजिशें होती रही हैं। पिछले दिनों दिल्ली में भाजपा के मीडिया प्रबंधन की कमान उत्तराखंड के ही नेता के पास होने के बावजूद राष्ट्रीय मीडिया में त्रिवेंद्र रावत को देश का सबसे फिसड्डी मुख्यमंत्री बताया गया। गौरतलब है कि शनिवार को भी उत्तराखंड में कोर कमेटी की बैठक में छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह को भेजे जाने की खबरें भी राष्ट्रीय मीडिया से ही पहले आईं। वहीं शाम को जब त्रिवेंद्र रावत के कोर कमेटी की बैठक से बाहर निकलने की खबरें आईं, उसी दौरान उत्तराखंड के नए मुख्यमंत्री के रूप में मीडिया के एक वर्ग द्वारा प्रचारित किए जा रहे नेता के दिल्ली में भाजपा के केंद्रीय कार्यालय में होने की सूचना भी मीडिया से छुपी न रह सकीं। यह भी संयोग नहीं हो सकता कि एक सप्ताह पूर्व ही गंभीर बीमारी से उबरने के बाद पार्टी के एक केंद्रीय नेता उत्तराखंड आए थे और हल्द्वानी में एक सप्ताह रुकने की बात कहने के बावजूद अचानक दिल्ली लौट गए थे।

इधर बताया गया है कि शनिवार को मुख्यमंत्री रावत के बारे में केंद्रीय हाइकमान के स्तर पर बड़ी शिकायतें और विधायकों के बड़े असंतोष की शिकायतें पहुंचीं हैं। साथ ही सर्वोच्च न्यायालय के आगामी 10 मार्च की तिथि के झारखंड से संबंधित सीबीआई जांच मामले में संभावित फैसले को लेकर भी केंद्रीय हाइकमान को संशंकित किया गया है। साथ एवं पार्टी आईबी आदि के द्वारा कराए गए तीन सर्वे में पार्टी की आगामी विधानसभा चुनाव में संभावित बुरी स्थिति, मुख्यमंत्री के पास 50 से अधिक विभागों के होने की वजह से विकास कार्य अवरुद्ध होने, तीन मंत्री पद रिक्त होने व मंत्रियों के पास जनता से सीधे जुड़े विभाग न होने के तर्क भी दिए गए हैं।केंद्रीय पर्यवेक्षकों ने इस बारे में मुख्यमंत्री का पक्ष जाना। मुख्यमंत्री ने विधायकों के बड़े वर्ग से पर्यवेक्षकों की मुलाकात कराकर यह संदेश दिया कि विरोध करने वाले विधायकों की विरोध की वजहें क्या हैं, और उनके पीछे कौन बड़े नेता हैं। बताया जा रहा है कि इसके बाद केंद्रीय पर्यवेक्षक काफी संतुष्ट हुए और इसके बाद ही भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष बंशीधर भगत मीडिया के समक्ष आए और राज्य में नेतृत्व परिवर्तन और विधायकों की नाराजगी की खबरों का खंडन किया। वहीं यह बात भी दिलचस्प है कि पूर्व में भाजपा बीच कार्यकाल मुख्यमंत्रियों को बदलती रही है। किंतु प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी व अमित शाह के दौर के बाद भाजपा ने पिछले छह वर्षों में हार झेलने के बावजूद किसी भी राज्य में मुख्यमंत्री नहीं बदला है। इससे यह संकेत लग रहा है कि प्रदेश में नेतृत्व परिवर्तन की संभावनाएं काफी क्षींण हैं। वैसे भी चुनाव के एक वर्ष ही शेष रहते और अलगे पखवाड़े 18 मार्च को सरकार के कार्यकाल के चार वर्ष का जश्न मनाने की तैयारी कर रही सरकार के मुखिया को पांच राज्यों में घोषित हो चुके चुनावों से ठीक पहले बदलकर भाजपा हाईकमान कोई रिस्क नहीं लेगा।
अलबत्ता इधर खबर यह भी है कि केंद्रीय पर्यवेक्षक डा. रमन सिंह व दुश्यंत गौतम उत्तराखंड से रिपोर्ट लेकर नई दिल्ली पहुंच चुके हैं, किंतु रविवार को प्रधानमंत्री मोदी, गृह मंत्री अमित शाह व भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा दिल्ली से बाहर हैं, इसलिए वह अभी केंद्रीय नेतृत्व को अपनी रिपोर्ट नहीं दे पाए होंगे। आगे मंगलवार को मुख्यमंत्री रावत को नई दिल्ली तलब किए जाने की भी चर्चाएं हैं।

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नवीन समाचार, नैनीताल, 06 मार्च 2021। उत्तराखंड की राजनीति में शनिवार का दिन महत्वपूर्ण रहा। पहले राज्य की ग्रीष्मकालीन राजधानी गैरसेंण में चल रहे बजट सत्र के अचानक अनिश्चितकाल के लिए स्थगित होने और फिर देहरादून में नेतृत्व परिवर्तन की चर्चाएं। इनके बीच बड़ी बात यह कि भाजपा ने विपक्ष सहित राज्य के मीडिया व चिंतकों का ध्यान दूसरी ओर मोढ़कर गैरसेंण में खासकर अब तक लगातार विभिन्न मुद्दों पर विरोध में अड़ रहे कांग्रेसी विधायकों की बजट पर चर्चा करने की मंशा को ध्वस्त कर दिया। कांग्रेसी कुछ समझते, तब तक सत्तारूढ़ भाजपा ने बजट सत्र बिना चर्चा के पास करा लिया और सत्र अनिश्चितकाल तक के लिए स्थगित भी करवा लिया।
उल्लेखनीय है कि बजट सत्र 10 मार्च तक के लिए प्रस्तावित था। इस अनुरूप कार्यमंत्रणा समिति की बैठक में कार्यक्रम भी तय किया गया था। लेकिन इसी बीच भाजपा में मची कथित कलह के बीच मुख्यमंत्री और कई मंत्रियों को शनिवार दोपहर ही देहरादून आना पड़ा। इसके बीच माना जा रहा था कि सत्र तय कार्यक्रम के अनुसार ही चलेगा। लेकिन इसी बीच भाजपा विधायकों को भी देहरादून आने का फरमान मिला। इस बीच कांग्रेसी भी अचानक भाजपा में तेज हुई राजनीति की अपडेट लेने में व्यस्त हुए कि इधर सरकार अपना काम करती रही। भोजनावकाश के बाद सरकार ने अपने प्रचंड बहुमत का इस्तेमाल करते हुए कुछ ही मिनट में तमाम विभागों को बजट पास करा लिया। इससे पहले कि विपक्षी कांग्रेसी विधायक कुछ समझ पाते तब तक राज्य का बजट पास करने की घोषणा के साथ ही सदन को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दिया गया। जाहिर है कि विपक्ष को बजट पर अपनी बात रखने का मौका ही न मिला, लेकिन उनके पास अपने चूकने का कारण बताने के लिए भी कुछ नहीं है।

नवीन समाचार
‘नवीन समाचार’ विश्व प्रसिद्ध पर्यटन नगरी नैनीताल से ‘मन कही’ के रूप में जनवरी 2010 से इंटरननेट-वेब मीडिया पर सक्रिय, उत्तराखंड का सबसे पुराना ऑनलाइन पत्रकारिता में सक्रिय समूह है। यह उत्तराखंड शासन से मान्यता प्राप्त, अलेक्सा रैंकिंग के अनुसार उत्तराखंड के समाचार पोर्टलों में अग्रणी, गूगल सर्च पर उत्तराखंड के सर्वश्रेष्ठ, भरोसेमंद समाचार पोर्टल के रूप में अग्रणी, समाचारों को नवीन दृष्टिकोण से प्रस्तुत करने वाला ऑनलाइन समाचार पोर्टल भी है।
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