नवीन समाचार, नैनीताल, 1 जून 2026 (Nainital-Kumaoni Cloths for Photos)। नैनीताल आने वाले अधिकांश सैलानी केवल झील, पहाड़ और प्राकृतिक सौंदर्य देखने ही नहीं आते, बल्कि वे स्थानीय संस्कृति, परंपराओं और लोकजीवन को भी करीब से जानना चाहते हैं। लेकिन सरोवर नगरी में पर्यटकों को स्थानीय संस्कृति से परिचित कराने का एक बड़ा अवसर वर्षों से अनदेखा होता दिखाई दे रहा है। नगर के मल्लीताल बोट स्टैंड, हिमालय दर्शन और अन्य पर्यटन स्थलों पर पर्यटकों को फोटो खिंचवाने के लिए जो पारंपरिक वेशभूषाएं उपलब्ध कराई जाती हैं, उनमें अधिकांश का कुमाऊं या उत्तराखंड की संस्कृति से कोई सीधा संबंध नहीं है।

स्थिति यह है कि पर्यटकों को स्थानीय कुमाउनी या उत्तराखंडी परिधान पहनाने के बजाय कश्मीरी अथवा राजस्थानी शैली के व कुछ जगह डाकुओं के वस्त्र पहनाकर फोटो खिंचवाए जाते हैं। महिलाओं और बच्चों को उनके सामान्य कपड़ों के ऊपर कश्मीरी शैली के परिधान पहना दिए जाते हैं, जबकि पुरुषों को कई बार राजस्थानी शैली की पगड़ी, तलवार और बंदूक जैसे उपकरण देकर तस्वीरें खिंचवाई जाती हैं। इससे पर्यटक आकर्षक तस्वीरें तो लेकर जाते हैं, लेकिन वे उत्तराखंड की वास्तविक सांस्कृतिक पहचान से परिचित नहीं हो पाते।
उत्तराखंड की अपनी समृद्ध सांस्कृतिक पहचान है
विशेषज्ञों और स्थानीय लोगों का मानना है कि उत्तराखंड के पास अपनी ऐसी सांस्कृतिक धरोहर है, जिसे पर्यटन से जोड़कर राज्य की पहचान को और मजबूत किया जा सकता है। उत्तराखंड की ब्रह्मकमल टोपी आज राष्ट्रीय ही नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी पहचान बना चुकी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा इसे सार्वजनिक कार्यक्रमों में धारण करने के बाद यह उत्तराखंड की सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक बन गई है।

इसी प्रकार महिलाओं का रंगवाली पिछौड़ा भी राज्य की सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा है। उत्तराखंडी मूल के पूर्व भारतीय क्रिकेट कप्तान महेंद्र सिंह धौनी की पत्नी साक्षी धौनी ने अपने विवाह में पिछौड़ा धारण किया था। बाद में उन पर बनी फिल्म में भी इसे प्रमुखता से दिखाया गया। धौनी कुमाउनी पिछौड़ा और ‘गलोबंद’ में अनंत-राधिका की प्री वेडिंग में भी दिखाई दिए थे। उत्तराखंड आने वाले अनेक विशिष्ट अतिथियों, महिला नेताओं तथा राष्ट्रपति तक को सम्मान स्वरूप पिछौड़ा भेंट किया जा चुका है।
लोकगीतों और लोकनृत्यों के परिधान बन सकते हैं आकर्षण
कुमाऊं के पारंपरिक नौ पाट के घाघरे, आंगड़ी, पुरुषों की पारंपरिक पोशाकें, पौंची, कुमाऊंनी नथ, गलोबंद तथा अन्य लोक आभूषण भी राज्य की विशिष्ट पहचान हैं। ये परिधान और आभूषण अनेक लोकप्रिय कुमाउनी एवं उत्तराखंडी लोकगीतों में भी दिखाई देते हैं और लोगों की सांस्कृतिक स्मृतियों का हिस्सा हैं।
यदि पर्यटकों को ऐसे परिधान उपलब्ध कराए जाएं तो वे केवल तस्वीर ही नहीं, बल्कि उत्तराखंड की संस्कृति का अनुभव भी अपने साथ लेकर जाएंगे।
आजीविका भी सुरक्षित रहेगी, पहचान भी मजबूत होगी
नैनीताल में डेढ़-दो दर्जन से अधिक फोटोग्राफरों और स्थानीय व्यवसायियों की आजीविका इन पारंपरिक वेशभूषाओं पर आधारित है। वर्तमान में पर्यटकों से इन परिधानों के साथ फोटो खिंचवाने के लिए लगभग 150 रुपये और केवल परिधान लेकर स्वयं फोटो लेने के लिए 50 रुपये तक शुल्क लिया जाता है।
गौरतलब है कि वर्तमान में उपयोग किए जा रहे अधिकांश कश्मीरी और राजस्थानी शैली के परिधान देश के अन्य अनेक पर्यटन स्थलों पर भी उपलब्ध हैं। ऐसे में नैनीताल में यदि स्थानीय कुमाउनी और उत्तराखंडी वेशभूषा को बढ़ावा दिया जाए तो यह नगर की एक विशिष्ट पहचान बन सकती है और अन्य पर्यटन स्थलों के लिए भी अनुकरणीय मॉडल साबित हो सकती है।
ऐपण कला और स्थानीय उत्पादों को भी मिल सकता है नया बाजार
पर्यटन विशेषज्ञों का मानना है कि केवल पारंपरिक वस्त्र ही नहीं, बल्कि उत्तराखंड की प्रसिद्ध लोककला ऐपण (Aipan) को भी पर्यटन से जोड़ा जा सकता है। ऐपण कला पर आधारित स्मृति-चिह्न, दीवार सज्जा सामग्री, हस्तशिल्प उत्पाद, उपहार सामग्री और अन्य स्थानीय उत्पाद पर्यटकों को आकर्षित कर सकते हैं।
इससे स्थानीय महिलाओं, स्वयं सहायता समूहों, कारीगरों और लोक कलाकारों को नया बाजार मिलेगा तथा राज्य की पारंपरिक कला और संस्कृति को भी संरक्षण प्राप्त होगा।
सांस्कृतिक पर्यटन को मिल सकती है नई दिशा
आज दुनिया भर में सांस्कृतिक पर्यटन तेजी से लोकप्रिय हो रहा है। पर्यटक किसी स्थान की प्राकृतिक सुंदरता के साथ वहां की संस्कृति, पहनावा, भोजन और लोकजीवन को भी जानना चाहते हैं। ऐसे में नैनीताल और उत्तराखंड के अन्य पर्यटन स्थलों पर स्थानीय वेशभूषा, लोककलाओं और पारंपरिक उत्पादों को बढ़ावा देने की पहल न केवल राज्य की सांस्कृतिक पहचान को सशक्त बनाएगी, बल्कि स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी नई गति प्रदान कर सकती है।
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डॉ.नवीन जोशी, पिछले 20 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय, ‘कुमाऊँ विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में पीएचडी की डिग्री प्राप्त पहले और वर्ष 2015 से उत्तराखंड सरकार से मान्यता प्राप्त पत्रकार हैं। 15 लाख से अधिक नए उपयोक्ताओं के द्वारा 150 मिलियन यानी 1.5 करोड़ से अधिक बार पढी गई आपकी अपनी पसंदीदा व भरोसेमंद समाचार वेबसाइट ‘नवीन समाचार’ के संपादक हैं, साथ ही राष्ट्रीय सहारा, हिन्दुस्थान समाचार आदि समाचार पत्र एवं समाचार एजेंसियों से भी जुड़े हैं। देश के पत्रकारों के सबसे बड़े संगठन ‘नेशनल यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट्स (इंडिया) उत्तराखंड’ के उत्तराखंड प्रदेश के प्रदेश महामंत्री भी हैं और उत्तराखंड के मान्यता प्राप्त राज्य आंदोलनकारी भी हैं। डॉ. जोशी के बारे में विस्तार से पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।
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